नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने NEET-UG 2026 पेपर लीक के विरोध में हुए छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों को लेकर अहम स्पष्टीकरण दिया है। अदालत ने कहा कि दिल्ली और संबंधित राज्य सरकारें कानून के मुताबिक ऐसे मामलों में FIR वापस लेने या बंद करने पर विचार कर सकती हैं। हालांकि, गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपी लोगों को इस राहत से बाहर रखा गया है। गंभीर अपराध के मामलों में नहीं मिलेगी राहत सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज हर मामले को स्वतः खत्म करने का निर्देश नहीं दिया गया है। जिन लोगों पर गंभीर अपराधों के आरोप हैं या जिनका आपराधिक रिकॉर्ड है, उनके मामलों की जांच और कानूनी प्रक्रिया जारी रह सकती है। अदालत ने यह भी साफ किया कि पहले दिए गए आदेश में इस्तेमाल किए गए ‘criminal antecedents’ शब्द का मतलब गंभीर आपराधिक मामलों से है। इस स्पष्टीकरण के बाद राज्यों के लिए गैर-गंभीर मामलों में FIR वापस लेने का रास्ता साफ हुआ है। छात्रों की पढ़ाई प्रभावित न हो, कोर्ट की चिंता सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शन में शामिल ऐसे युवा, जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक आरोप नहीं हैं, उन्हें मुकदमों के डर के कारण अपनी पढ़ाई जारी रखने में परेशानी नहीं होनी चाहिए। अदालत का रुख छात्रों के शैक्षणिक भविष्य को ध्यान में रखते हुए राहत देने वाला माना जा रहा है। यह मामला उन प्रदर्शनों से जुड़ा है जो NEET-UG 2026 पेपर लीक और परीक्षा से जुड़ी अनियमितताओं के विरोध में दिल्ली समेत कई राज्यों में हुए थे। प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई और छात्रों के खिलाफ दर्ज मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गई थीं। राज्यों को कानून के अनुसार फैसला लेने की छूट सुप्रीम कोर्ट के ताजा स्पष्टीकरण का मतलब यह है कि राज्य सरकारें संबंधित मामलों की प्रकृति को देखते हुए कानूनी प्रक्रिया के तहत FIR वापस लेने या केस बंद करने की कार्रवाई कर सकती हैं। यानी कोर्ट ने सभी मामलों को एक साथ खत्म करने का आदेश नहीं दिया है। इससे उन छात्रों को राहत मिलने की उम्मीद है जिनके खिलाफ प्रदर्शन में शामिल होने के कारण मामले दर्ज हुए थे, लेकिन उन पर गंभीर आपराधिक आरोप नहीं हैं।
रांची। झारखंड में JPSC और JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ चल रहे अभ्यर्थियों के आंदोलन को असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का समर्थन मिला है। उन्होंने प्रदर्शन कर रहे झारखंड के छात्रों के प्रति समर्थन जताते हुए परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता और कथित गड़बड़ियों की जांच की मांग का समर्थन किया है। छात्रों के आंदोलन को मिला समर्थन JPSC और JSSC की विभिन्न परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर झारखंड में अभ्यर्थी लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। छात्रों की मांग है कि विवादित परीक्षाओं की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। हिमंत बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया के जरिए छात्रों के आंदोलन का समर्थन किया। उनके समर्थन के बाद यह मामला झारखंड की सीमाओं से बाहर भी राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग आंदोलन कर रहे अभ्यर्थी भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों को लेकर सवाल उठा रहे हैं। छात्रों का कहना है कि सरकारी नौकरी की परीक्षाओं में पारदर्शिता और निष्पक्षता से किसी भी तरह का समझौता नहीं होना चाहिए। अभ्यर्थियों की ओर से संबंधित परीक्षाओं को रद्द करने, पूरे मामले की जांच कराने और भर्ती प्रक्रिया में सुधार की मांग की जा रही है। रांची में आंदोलन जारी JPSC-JSSC विवाद को लेकर रांची में छात्रों का आंदोलन जारी है। प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांगों को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल भी शुरू की है। छात्रों का कहना है कि जब तक उनकी प्रमुख मांगों पर सरकार की ओर से ठोस कदम नहीं उठाया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। सरकार के रुख पर टिकी नजर छात्र आंदोलन और हिमंत बिस्वा सरमा के समर्थन के बाद अब झारखंड सरकार के रुख पर नजर है। आंदोलनकारियों की मांगों पर सरकार क्या कदम उठाती है और परीक्षा विवाद की जांच को लेकर क्या फैसला होता है, यह आने वाले दिनों में महत्वपूर्ण रहेगा। वहीं, छात्रों के आंदोलन को दूसरे नेताओं और संगठनों से मिलने वाले समर्थन के कारण यह मुद्दा झारखंड में और बड़ा राजनीतिक विषय बनता जा रहा है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन को लेकर अब राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। NEET पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन धीरे-धीरे राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया। विपक्षी नेताओं ने प्रदर्शनकारी छात्रों के समर्थन में केंद्र सरकार पर निशाना साधा, जबकि सरकार की ओर से आंदोलन और उससे जुड़े आरोपों पर जवाब दिया गया। छात्रों के समर्थन में विपक्ष ने सरकार को घेरा जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों के नेता छात्रों के समर्थन में सामने आए। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल समेत नेताओं ने परीक्षा व्यवस्था, कथित पेपर लीक और छात्रों पर कार्रवाई को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाए। विपक्ष ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग भी उठाई। राहुल गांधी ने सरकार से कार्रवाई की मांग की कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों से मुलाकात की। उन्होंने सरकार से केवल बयान देने के बजाय ठोस कार्रवाई करने की मांग की और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठाए। राहुल गांधी ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को दोहराया। पीएम मोदी की अपील के बाद सियासत और तेज प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल का मामला भी राजनीतिक विवाद का हिस्सा बन गया। हालांकि बाद में प्रधानमंत्री मोदी ने प्रदर्शनकारी छात्रों के प्रति नरम रुख अपनाते हुए कहा कि युवाओं को सजा देने के बजाय उन्हें समझाने और सही दिशा दिखाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अपशब्द किसी समस्या का समाधान नहीं करते। प्रदर्शन ने शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था को बनाया बड़ा राजनीतिक मुद्दा जंतर-मंतर का आंदोलन अब केवल परीक्षा सुधार तक सीमित नहीं रहा। पेपर लीक, छात्रों की सुरक्षा, परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और सरकार की जवाबदेही जैसे मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं। प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं और नेताओं के बयानों ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
20 जुलाई को दिल्ली में CJP के नेतृत्व में हुए प्रदर्शन के दौरान घायल हुए दिल्ली पुलिसकर्मियों के परिजनों ने शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी पीड़ा साझा की। परिवारों ने कहा कि ड्यूटी के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों को न्याय मिलना चाहिए और हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। 'खून से सनी वर्दी में घर लौटे थे मेरे पति' प्रेस कॉन्फ्रेंस में घायल एक ACP की पत्नी ने कहा कि 20 जुलाई की रात उनके पति गंभीर रूप से घायल होकर घर लौटे थे। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने अपने पति को खून से सनी वर्दी में देखा तो वह पल पूरे परिवार के लिए बेहद दर्दनाक था। उन्होंने कहा कि वह अपनी दो साल की बेटी और अन्य पुलिसकर्मियों के परिवारों के साथ इसलिए सामने आई हैं ताकि लोग ड्यूटी के दौरान पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों की पीड़ा को समझ सकें। SI की बेटी बोली- पिता की वर्दी खून से लथपथ थी घायल एक सब-इंस्पेक्टर (SI) की बेटी ने बताया कि उनके पिता पहले भारतीय नौसेना में मरीन कमांडो रह चुके हैं और 15 वर्षों तक देश की सेवा करने के बाद दिल्ली पुलिस में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन के दौरान उनके पिता जंतर-मंतर पर बैरिकेड्स के पास तैनात थे। परिवार के मुताबिक, 25 जुलाई को भीड़ ने उनके पिता के साथ मारपीट की, जिसके बाद उन्हें गंभीर हालत में RML अस्पताल ले जाया गया। वहां वे करीब चार घंटे तक बेहोश रहे। बेटी ने कहा कि रात में जब उनके पिता घर पहुंचे तो उनकी वर्दी खून से सनी हुई थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सोशल मीडिया पर उनके पिता को ही दोषी ठहराया गया, जिससे परिवार को गहरा मानसिक आघात पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट में न्याय की मांग परिजनों ने बताया कि उन्होंने अन्य घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है और मामले में निष्पक्ष जांच तथा न्याय की मांग की है। 'हिंसा करने वालों पर हो कड़ी कार्रवाई' प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद एक अन्य पुलिसकर्मी के परिजन ने कहा कि प्रदर्शन में केवल छात्र ही नहीं, बल्कि कुछ असामाजिक और उपद्रवी तत्व भी शामिल थे। उनका आरोप है कि इन्हीं लोगों ने हिंसा को बढ़ावा दिया और संसद की गरिमा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। उन्होंने मांग की कि हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, जबकि जिन छात्रों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उनकी जांच पूरी होने के बाद उन्हें उचित राहत दी जाए।
Goa Protest News: दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे NEET पेपर लीक विरोध प्रदर्शन के समर्थन में गोवा के मापुसा में हुए प्रदर्शन के बाद पुलिस की कार्रवाई तेज हो गई है। प्रदर्शन में शामिल सामाजिक कार्यकर्ताओं से 240 सवालों वाली विस्तृत प्रश्नावली भरवाई गई। इसमें 'Free Umar Khalid' पोस्टर का अर्थ, सरकार की आलोचना, प्रदर्शन के वित्तपोषण और आंदोलन से जुड़े संगठनों को लेकर सवाल पूछे गए। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रदर्शन 24 जुलाई को आयोजित किया गया था। अगले दिन 25 जुलाई की शाम गोवा पुलिस ने पणजी के आजाद मैदान में 'Free Umar Khalid' लिखा पोस्टर लेकर पहुंचे एक व्यक्ति को हिरासत में लिया। इसके बाद प्रदर्शन में शामिल कम से कम दो सामाजिक कार्यकर्ताओं को पूछताछ के लिए तलब किया गया। यह कार्रवाई 'Citizens of Mapusa' नामक स्थानीय संगठन की शिकायत के आधार पर की गई। प्रदर्शनकारियों से क्या-क्या पूछे गए सवाल? रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने प्रदर्शन में शामिल लोगों से 240 से अधिक सवाल पूछे। उनसे यह जानकारी मांगी गई कि प्रदर्शन का नेतृत्व किसने किया, वे किस उद्देश्य से शामिल हुए, कार्यक्रम के लिए आर्थिक मदद किसने दी और क्या वे किसी व्हाट्सएप, टेलीग्राम या सिग्नल ग्रुप का हिस्सा हैं। इसके अलावा पुलिस ने यह भी पूछा कि क्या वे किसी राजनीतिक दल, छात्र संगठन, सामाजिक संस्था, एनजीओ या एक्टिविस्ट समूह से जुड़े हैं और प्रदर्शन स्थल तक कैसे पहुंचे। 'Free Umar Khalid' पोस्टर पर आपत्ति गोवा पुलिस के अनुसार, पिछले सप्ताह मापुसा और पणजी में तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों की भी जांच की जा रही है। पुलिस का कहना है कि इन कार्यक्रमों का आयोजन 'उजवाद' नामक एनजीओ ने किया था। वहीं, 'Citizens of Mapusa' संगठन ने प्रदर्शन के दौरान 'Free Umar Khalid' लिखी तख्तियों और नारों पर आपत्ति जताते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। दो युवकों को हिरासत में लिया गया पीटीआई के मुताबिक, पुलिस ने बताया कि पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का जश्न मनाने के दौरान जेल में बंद छात्र कार्यकर्ता उमर खालिद के समर्थन में नारे लगाने के आरोप में दो युवकों को हिरासत में लिया गया था। पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन के उद्देश्य, फंडिंग और आयोजन से जुड़े सभी पहलुओं की जांच की जा रही है। वहीं, प्रदर्शन में शामिल लोगों से पूछताछ का सिलसिला अभी जारी है।
Student Protest Pellet Gun Case: सुप्रीम कोर्ट ने 20 जुलाई को हुए छात्र आंदोलन के दौरान पैलेट गन से घायल लोगों के इलाज को लेकर अहम निर्देश जारी किया है। अदालत ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि आंदोलन के दौरान घायल हुए सभी लोगों को उचित और समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस मामले से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। पैलेट गन के इस्तेमाल को चुनौती याचिका दो ऐसे लोगों की ओर से दाखिल की गई है, जो 20 जुलाई के छात्र प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर पैलेट गन से घायल हुए थे। इस याचिका में पूर्व आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन आजाद भी तीसरे याचिकाकर्ता हैं। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की है कि आम नागरिकों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पैलेट गन के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाए। साथ ही पैलेट गन से घायल लोगों को उचित मुआवजा और बेहतर इलाज उपलब्ध कराने के निर्देश भी देने की अपील की गई है। दिल्ली सरकार को कोर्ट का निर्देश सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि छात्र आंदोलन में घायल हुए लोगों का उचित मेडिकल इलाज सुनिश्चित किया जाना चाहिए। अदालत ने दिल्ली सरकार को आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के निर्देश दिए, ताकि घायलों का समय पर इलाज हो सके। मुआवजा और प्रतिबंध की भी मांग याचिका में यह भी कहा गया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान आम लोगों पर पैलेट गन का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की है कि भविष्य में ऐसे मामलों को रोकने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं और घायल लोगों को उचित मुआवजा दिया जाए। मामले की सुनवाई फिलहाल जारी है और सुप्रीम कोर्ट आगे इस याचिका पर विस्तृत सुनवाई करेगा।
संसद के मानसून सत्र के दौरान बुधवार को राज्यसभा में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई का मुद्दा उठाया, जबकि केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने पुलिस की कार्रवाई को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक बताया। छात्रों पर कार्रवाई को लेकर सरकार से जवाब मांगा राज्यसभा में मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रदर्शनकारी छात्रों पर कथित लाठीचार्ज और पुलिस कार्रवाई का मुद्दा उठाते हुए कहा कि जिन लोगों ने छात्रों के खिलाफ बल प्रयोग किया, उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि पुलिस कार्रवाई का आदेश किसने दिया और जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए। खरगे ने कहा कि यदि प्रदर्शन के दौरान किसी ने नियमों का उल्लंघन किया है तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है, लेकिन छात्रों पर कथित अत्याचार करने वालों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से सदन में बयान देने की मांग की। नड्डा बोले- कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए हुई कार्रवाई सरकार की ओर से जवाब देते हुए केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने कहा कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने कानून के दायरे में रहकर सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई की। उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह कानून-व्यवस्था से जुड़ा सामान्य मामला था और इसे अनावश्यक रूप से सनसनीखेज बनाया जा रहा है। नड्डा ने कहा, "जो भी छात्र एक्टिविस्ट बनेगा, उसे ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।" उन्होंने अपने छात्र जीवन का जिक्र करते हुए कहा कि आपातकाल के दौरान छात्र आंदोलन में हिस्सा लेने के कारण उन्हें भी कई बार गिरफ्तार किया गया था। आपातकाल का दिया उदाहरण जेपी नड्डा ने कहा कि कांग्रेस शासन के दौरान लगाए गए आपातकाल में उन्हें कक्षा से गिरफ्तार किया गया था। उन्होंने कहा कि छात्र आंदोलनों में शामिल लोगों को कई बार कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है और इसे असामान्य नहीं माना जाना चाहिए। विपक्ष पर लगाया मुद्दे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप नड्डा ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह इस मामले को राजनीतिक रंग देकर बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है। उन्होंने कहा कि पुलिस ने केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कार्रवाई की थी और इसे लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है। राज्यसभा में इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। विपक्ष ने पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करने की मांग दोहराई, जबकि सरकार ने अपने रुख का बचाव करते हुए कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है।
लोकसभा में लोक परीक्षा (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने केंद्र सरकार पर पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था और रोजगार के मुद्दों को लेकर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को "कैमरे का एंगल नहीं, बल्कि दिल का एंगल बदलना पड़ेगा" और युवाओं से जुड़े सवालों का जवाब देना होगा। युवाओं पर कार्रवाई को लेकर सरकार से सवाल प्रियंका गांधी ने कहा कि देशभर में छात्रों के आंदोलनों के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई पर सरकार को जवाब देना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर पैलेट गन और AK-47 जैसे हथियारों के इस्तेमाल का आदेश किसने दिया। उन्होंने पूछा कि क्या यह फैसला प्रधानमंत्री या गृह मंत्री के स्तर पर लिया गया था और कहा कि पूरे देश के युवा इसका जवाब चाहते हैं। पेपर लीक और रोजगार के मुद्दे पर सरकार को घेरा कांग्रेस सांसद ने आरोप लगाया कि पिछले दस वर्षों में 152 पेपर लीक की घटनाओं ने करोड़ों छात्रों के भविष्य को प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि इसके बावजूद पेपर लीक माफिया के खिलाफ कोई बड़ी और प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई तथा किसी बड़े आरोपी को सजा नहीं मिली। उनके मुताबिक, इससे युवाओं का सरकार पर भरोसा लगातार कमजोर हुआ है। शिक्षा व्यवस्था पर लगाए गंभीर आरोप प्रियंका गांधी ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने शिक्षा व्यवस्था को कमजोर किया है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) के जरिए परीक्षा प्रणाली का अत्यधिक केंद्रीकरण किया गया, जिससे कई नई समस्याएं सामने आईं। उन्होंने यह भी दावा किया कि शिक्षा संस्थानों में वैचारिक हस्तक्षेप बढ़ा है और शिक्षा का बजट वास्तविक रूप से घटता जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना है तो केवल सख्त कानून बनाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी, जवाबदेह और भरोसेमंद बनाना होगा। पूर्व शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का भी किया जिक्र प्रियंका गांधी ने अपने भाषण में पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का उल्लेख करते हुए कहा कि जब देश के कई छात्र पेपर लीक से प्रभावित थे और कुछ परिवार गहरे संकट से गुजर रहे थे, तब सरकार का रवैया संवेदनशील नहीं दिखा। उन्होंने कहा कि सरकार को आत्ममंथन करने की जरूरत है ताकि छात्र दोबारा परीक्षा प्रणाली पर विश्वास कर सकें। एंटी पेपर लीक बिल पर जारी है चर्चा लोकसभा में एंटी पेपर लीक बिल पर चर्चा जारी है। सरकार का कहना है कि नए कानून से परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाया जाएगा और पेपर लीक जैसे अपराधों पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित होगी। वहीं विपक्ष का आरोप है कि केवल कड़ी सजा का प्रावधान पर्याप्त नहीं है, बल्कि परीक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार और युवाओं के भरोसे की बहाली भी उतनी ही जरूरी है।
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने केंद्र सरकार पर छात्रों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेने के वादे को पूरा न करने का आरोप लगाया है। पार्टी ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने लिखित आश्वासन नहीं दिया और अपने वादे से पीछे हटी, तो देशभर में एक बार फिर बड़ा आंदोलन शुरू किया जाएगा। CJP के प्रवक्ता सौरभ दास ने कहा कि सरकार ने अब तक छात्रों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने तथा भविष्य में कोई कार्रवाई नहीं करने का लिखित भरोसा नहीं दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी का सहारा लेकर अपने वादे से पीछे हटने की कोशिश कर सकती है। 'सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का राजनीतिक इस्तेमाल न हो' CJP ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी बयान में कहा कि पार्टी को आशंका है कि केंद्र सरकार और भाजपा शासित राज्य 20 जुलाई के प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का इस्तेमाल प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर जारी रखने और उन्हें परेशान करने के लिए कर सकते हैं। पार्टी ने कहा कि अदालत की टिप्पणी का राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए और इसे छात्रों के साथ किए गए वादे से मुकरने का आधार नहीं बनाया जा सकता। 'छात्रों के भरोसे के साथ धोखा नहीं होना चाहिए' सौरभ दास ने कहा कि हजारों छात्रों और युवा प्रदर्शनकारियों को जो भरोसा दिया गया था, उसे बाद की कानूनी प्रक्रियाओं के आधार पर कमजोर या निष्प्रभावी नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने कहा कि ऐसा करने से युवाओं का सरकार और व्यवस्था पर विश्वास टूटेगा। उन्होंने दावा किया कि अंतरिम आदेश में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो केंद्र या राज्य सरकारों को एफआईआर वापस लेने या शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई रोकने से रोकता हो। ऐसे में सरकार को अपने वादे से पीछे हटने के लिए अदालत के आदेश का हवाला नहीं देना चाहिए। देशव्यापी आंदोलन की दी चेतावनी CJP ने कहा कि यदि सरकार ने अपने आश्वासन का पालन नहीं किया, तो संगठन के पास दोबारा देशव्यापी आंदोलन शुरू करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। पार्टी ने अपने बयान में कहा, "जो सरकार अपना वादा तोड़ती है, वह युवाओं से चुप रहने की उम्मीद नहीं कर सकती। यदि छात्रों को दी गई गारंटी का सम्मान नहीं किया गया, तो देश की सड़कें एक बार फिर युवाओं की आवाज बनेंगी।" मंगलवार तक दिया था अल्टीमेटम सौरभ दास ने समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में कहा कि सरकार को मंगलवार तक का समय दिया गया था, लेकिन तय समय सीमा समाप्त होने से पहले भी कोई लिखित आश्वासन नहीं मिला। उन्होंने दोहराया कि CJP ऐसा कोई फैसला स्वीकार नहीं करेगा, जो सरकार द्वारा प्रदर्शनकारियों को दिए गए आश्वासन के विपरीत हो।
Baba Ramdev on Gen Z Protest: योग गुरु बाबा रामदेव ने जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि भारत सड़क पर होने वाले प्रदर्शनों से नहीं, बल्कि संसद और संविधान के अनुसार चलता है। साथ ही उन्होंने आंदोलन के दौरान लगाए गए कुछ नारों पर भी आपत्ति जताई और कहा कि मतभेदों का समाधान लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से होना चाहिए। हरिद्वार में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान बाबा रामदेव ने कहा कि शिक्षा मंत्री कौन होगा, इसका फैसला प्रदर्शनकारी नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री और संसद करती है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकार और नीतियों को लेकर असहमति जताने का अधिकार सभी को है, लेकिन इसके लिए संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान जरूरी है। 'ब्राह्मणवाद से आजादी' जैसे नारों पर जताई आपत्ति रामदेव ने आंदोलन के दौरान लगाए गए 'ब्राह्मणवाद से आजादी' और 'आरएसएस से आजादी' जैसे नारों का जिक्र करते हुए कहा कि किसी भी जाति, समुदाय या संगठन के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है और समाज को बांटने वाले नारों से बचना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से राष्ट्रवाद की भावना सीखी है तो इसमें आपत्ति की कोई बात नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार, समाज में सभी वर्गों के प्रति सम्मान का भाव होना चाहिए। 'Gen Z ने भारत की छवि खराब की' बाबा रामदेव ने कहा कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान कुछ युवाओं ने ऐसी भाषा और व्यवहार अपनाया, जिससे देश की छवि को नुकसान पहुंचा। उन्होंने कहा कि गाली-गलौज और अपमानजनक शब्द भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं हैं। भारत की परंपरा संवाद, सम्मान और मर्यादा की रही है। संवैधानिक तरीके से दूर हों मतभेद अपने संबोधन में रामदेव ने कहा कि नया भारत समानता और समावेश की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि आज महिलाएं भी वेद-पुराणों का अध्ययन कर रही हैं, यज्ञोपवीत धारण कर रही हैं और वैदिक परंपराओं में सक्रिय भागीदारी निभा रही हैं। उन्होंने कहा कि अलग-अलग धर्म और विचारधाराएं हो सकती हैं, लेकिन देश की एकता और सामाजिक सौहार्द सबसे महत्वपूर्ण हैं। यदि किसी मुद्दे पर मतभेद हैं, तो उन्हें लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए।
पटना, एजेंसियां। NEET पेपर लीक मामले को लेकर बिहार में हुए छात्र आंदोलनों के बाद राज्य सरकार ने प्रदर्शनकारियों को बड़ी राहत दी है। बिहार सरकार ने प्रदर्शन के दौरान दर्ज किए गए मामलों को वापस लेने और हिरासत में लिए गए युवाओं को रिहा करने का निर्णय लिया है। प्रदर्शनकारियों पर दर्ज FIR वापस लेने की प्रक्रिया शुरू बिहार सरकार ने कहा है कि NEET-UG परीक्षा में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में शामिल लोगों के खिलाफ दर्ज FIR, आपराधिक शिकायतों और अन्य कानूनी कार्रवाई को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। सरकार के इस फैसले के बाद उन छात्रों और युवाओं को राहत मिलने की उम्मीद है, जिन पर आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई की गई थी। बड़ी संख्या में युवाओं की हुई थी गिरफ्तारी NEET विवाद को लेकर बिहार में हुए प्रदर्शनों के दौरान कई जगहों पर तनाव की स्थिति बनी थी। रिपोर्ट्स के अनुसार बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया था और कुछ लोगों के खिलाफ पुलिस केस दर्ज किए गए थे। अब सरकार ने ऐसे मामलों की समीक्षा कर युवाओं को राहत देने का फैसला किया है। छात्रों की मांगों के बाद लिया गया फैसला छात्र संगठन लगातार मांग कर रहे थे कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले युवाओं पर दर्ज मुकदमे वापस लिए जाएं। सरकार के इस कदम को छात्रों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है। परीक्षा व्यवस्था सुधार पर भी उठी बहस NEET विवाद के बाद देशभर में परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और पेपर लीक रोकने के लिए सख्त कदम उठाने की मांग तेज हुई है। सरकार और संबंधित एजेंसियां परीक्षा सुधारों को लेकर कदम उठाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
पटना। बिहार की राजनीति में छात्र आंदोलन और बिहार बंद के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर सियासी घमासान जारी है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने एक बार फिर आंदोलन के दौरान कथित AK-47 फायरिंग मामले की न्यायिक जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और फायरिंग के आदेश देने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। फायरिंग मामले की न्यायिक जांच की मांग तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया कि आंदोलन के दौरान कथित तौर पर AK-47 का इस्तेमाल किया गया और इस मामले में केवल निचले स्तर के कर्मियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष न्यायिक जांच कराई जाए ताकि जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान हो सके। सरकार के 100 दिन पर उठाए सवाल तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार के 100 दिन पूरे होने पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार जनता को बताए कि इस अवधि में आम लोगों के हित में क्या प्रमुख कार्य किए गए। साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री और सरकार की कार्यशैली पर भी टिप्पणी की। छात्रों की गिरफ्तारी पर जताई नाराजगी आरजेडी नेता ने आरोप लगाया कि समझौते के बाद भी बड़ी संख्या में छात्रों को गिरफ्तार किया गया और उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज किए गए। उन्होंने कहा कि छात्रों पर दर्ज मामलों को वापस लिया जाना चाहिए और युवाओं के साथ सख्ती उचित नहीं है। सरकार पर लगाए वादाखिलाफी के आरोप तेजस्वी यादव ने भाजपा और राज्य सरकार पर चुनावी वादे पूरे नहीं करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि छात्रों, किसानों और महिलाओं से किए गए वादों को पूरा करने के बजाय सरकार विपक्ष और आंदोलनकारियों पर कार्रवाई करने में लगी है। वहीं, सरकार की ओर से इन आरोपों पर अलग रुख रखा गया है।
Houthis Attack Saudi Arabia: अमेरिका और ईरान के बीच सीधे सैन्य हमलों में फिलहाल कमी आई है, लेकिन पश्चिम एशिया में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सोमवार को यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के कई तेल ठिकानों पर ड्रोन हमला किया, जिससे क्षेत्र की सुरक्षा और वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर नई चिंताएं बढ़ गई हैं। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, हूती संगठन के सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी ने दावा किया कि यह हमला सऊदी अरब द्वारा यमन के हवाई क्षेत्र में ड्रोन भेजे जाने के जवाब में किया गया। उन्होंने कहा कि हमले का निशाना पूर्वी सऊदी अरब से लाल सागर के यनबू बंदरगाह तक कच्चा तेल पहुंचाने वाला महत्वपूर्ण पाइपलाइन नेटवर्क था। तेल सप्लाई पर बढ़ा खतरा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ते तनाव के कारण हाल के महीनों में सऊदी अरब इस पाइपलाइन के जरिए तेल निर्यात पर अधिक निर्भर हो गया है। ऐसे में इस नेटवर्क पर हमला वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस तरह के हमले जारी रहे तो अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। बाजार को राहत, लेकिन खतरा बरकरार अमेरिका और ईरान के बीच तनाव में अस्थायी कमी के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कुछ राहत देखने को मिली है। ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 6 प्रतिशत गिरकर 91 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई, जबकि शेयर बाजारों में भी निवेशकों का भरोसा लौटा है। हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि यदि हूती हमले तेज होते हैं या क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में फिर उछाल आ सकता है। अमेरिका-ईरान के बीच बातचीत की कोशिश इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच लगातार तीसरे दिन भी कोई सीधा सैन्य हमला नहीं हुआ। कतर, ओमान और पाकिस्तान दोनों देशों के बीच मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं ताकि वार्ता दोबारा शुरू हो सके। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिलहाल कूटनीतिक प्रयासों को मौका देने का फैसला किया है, जबकि ईरान ने भी अपने हमले रोकने की पुष्टि की है। समुद्री मार्गों पर बना हुआ है खतरा हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कुछ कम हुआ है, लेकिन क्षेत्र के अहम समुद्री मार्ग अब भी जोखिम में हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंदेब जैसे रणनीतिक समुद्री रास्तों पर जहाजों की आवाजाही पर लगातार नजर रखी जा रही है। हूती विद्रोही पहले भी लाल सागर में व्यापारिक जहाजों और सऊदी तेल टैंकरों को निशाना बनाने की धमकी दे चुके हैं, जिससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बना हुआ है।
बिहार के बाद अब असम सरकार ने भी छात्र आंदोलन से जुड़े प्रदर्शनकारियों को राहत देने का फैसला लिया है। सरकार ने संकेत दिए हैं कि आंदोलन के दौरान गिरफ्तार छात्रों को रिहा किया जाएगा और उनके खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब CJP (Cockroach Janta Party) ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा था कि यदि छात्रों पर दर्ज मुकदमे वापस नहीं लिए गए तो देशव्यापी आंदोलन फिर शुरू किया जाएगा। सरकार ने शुरू की कानूनी प्रक्रिया सूत्रों के मुताबिक, असम सरकार ने आंदोलन से जुड़े मामलों की समीक्षा शुरू कर दी है। जिन छात्रों और प्रदर्शनकारियों पर केवल विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने के आरोप हैं, उनके खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। साथ ही हिरासत में लिए गए छात्रों की रिहाई भी सुनिश्चित की जाएगी। CJP ने दी थी आंदोलन की चेतावनी CJP ने हाल ही में केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों को 24 घंटे का अल्टीमेटम देते हुए कहा था कि प्रदर्शनकारियों पर दर्ज सभी एफआईआर वापस ली जाएं और गिरफ्तार छात्रों को बिना शर्त रिहा किया जाए। संगठन ने चेतावनी दी थी कि मांगें नहीं मानी गईं तो जंतर-मंतर से फिर राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा। बिहार के बाद असम ने उठाया कदम इससे पहले बिहार सरकार ने भी छात्र प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने और गिरफ्तार छात्रों को रिहा करने का फैसला लिया था। अब असम सरकार के इसी तरह के फैसले को छात्र आंदोलन से जुड़े घटनाक्रम का अहम कदम माना जा रहा है। छात्र संगठनों ने फैसले का किया स्वागत सरकार के इस फैसले के बाद छात्र संगठनों और आंदोलन से जुड़े कई समूहों ने इसे सकारात्मक पहल बताया है। हालांकि उनका कहना है कि सभी मामलों की निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए और किसी भी निर्दोष छात्र पर भविष्य में कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। सरकार की ओर से मामले वापस लेने और रिहाई की प्रक्रिया को लेकर विस्तृत आदेश जल्द जारी किए जाने की संभावना है।
बिहार सरकार ने NEET परीक्षा को लेकर हुए छात्र आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों पर दर्ज सभी मुकदमे वापस लेने और गिरफ्तार छात्रों को रिहा करने का फैसला लिया है। सरकार के इस फैसले के बाद राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने प्रतिक्रिया देते हुए इसे जनता और विपक्ष के दबाव का परिणाम बताया। 'सरकार को अल्टीमेटम दिया था' तेजस्वी यादव ने कहा कि विपक्ष ने सरकार को सोमवार तक का समय दिया था और चेतावनी दी थी कि यदि छात्रों पर दर्ज मामले वापस नहीं लिए गए तो बड़ा आंदोलन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि सरकार आखिरकार जनता के दबाव के आगे झुक गई और अपना फैसला बदलना पड़ा। सीवान फायरिंग मामले में न्यायिक जांच की मांग तेजस्वी यादव ने सीवान में छात्र प्रदर्शन के दौरान कथित AK-47 से फायरिंग के मामले में न्यायिक जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि केवल एक कांस्टेबल का निलंबन पर्याप्त नहीं है, बल्कि जिले के एसपी और अन्य जिम्मेदार वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि गोली हवा में नहीं चलाई गई, बल्कि छात्रों को निशाना बनाया गया। साथ ही सवाल किया कि फायरिंग का आदेश किसने दिया और सरकार को इसकी जवाबदेही तय करनी चाहिए। सरकार पर लगाए गंभीर आरोप आरजेडी नेता ने राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि मौजूदा शासन बिहार को "पुलिसिया गुंडाराज" की ओर ले जा रहा है। उन्होंने सरकार के 100 दिन पूरे होने पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इस अवधि में राज्य को कोई बड़ी उपलब्धि नहीं मिली, जबकि अपराध और भ्रष्टाचार लगातार बढ़ रहे हैं। सीएम की पत्नी के निरीक्षण पर उठाए सवाल तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री की पत्नी द्वारा स्कूल और कॉलेजों के निरीक्षण को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि किस प्रोटोकॉल के तहत उन्हें सरकारी निरीक्षण करने की अनुमति दी गई और उनके साथ बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी क्यों तैनात किए गए। 'जनता नाराज हुई तो सरकार जाएगी' प्रेस वार्ता के दौरान तेजस्वी यादव ने कहा कि यदि जनता का असंतोष इसी तरह बढ़ता रहा तो इसका असर केंद्र और बिहार, दोनों की सरकारों पर पड़ेगा। उन्होंने दावा किया कि जनता सरकार के कामकाज से संतुष्ट नहीं है और आने वाले समय में इसका राजनीतिक असर देखने को मिल सकता है।
Mohammad Irfan Viral Video: दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए CJP (Cockroach Janta Party) आंदोलन के दौरान एक फेरीवाले मोहम्मद इरफान की बातें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गईं। लोकतंत्र, संविधान और मजदूरों के अधिकारों पर उनकी बेबाक राय ने लोगों का ध्यान खींचा। अब कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी उनसे मिलने उनके घर पहुंचे। फेरी लगाकर करते हैं गुजारा, Google Voice Search से सीखा संविधान करीब 35 वर्षीय मोहम्मद इरफान दिल्ली की एक झुग्गी बस्ती में रहते हैं और फेरी लगाकर अपना जीवनयापन करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, वह कभी स्कूल नहीं गए, लेकिन Google Voice Search के जरिए संविधान, लोकतंत्र और श्रमिकों के अधिकारों से जुड़ी जानकारी हासिल करते हैं। उनकी समझ और तर्कों ने CJP आंदोलन के दौरान लोगों को प्रभावित किया। राहुल गांधी ने की मुलाकात कांग्रेस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर राहुल गांधी और मोहम्मद इरफान की मुलाकात का वीडियो साझा किया। पोस्ट में कांग्रेस ने लिखा कि "मोहम्मद इरफान जैसे लाखों युवा ही देश की असली उम्मीद हैं—जिज्ञासु, संवेदनशील और अपने अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति सजग।" वीडियो में राहुल गांधी इरफान से बातचीत करते नजर आए। इस दौरान इलाके के लोगों ने भी उनका स्वागत किया। एक अन्य पोस्ट में कांग्रेस ने कहा कि इरफान जैसे युवाओं की आवाज देश के उन लाखों युवाओं की भावनाओं को सामने लाती है, जो रोजगार, शिक्षा और अवसरों को लेकर चिंतित हैं। पार्टी ने ऐसे युवाओं के साथ खड़े रहने का भरोसा भी जताया। भगत सिंह की कविताएं सुनाकर भी बटोरी सुर्खियां रिपोर्ट के अनुसार, बातचीत के दौरान मोहम्मद इरफान ने शहीद भगत सिंह की कविताओं की पंक्तियां भी सुनाईं। उनकी वैचारिक समझ और आत्मविश्वास ने कई लोगों को प्रभावित किया और सोशल मीडिया पर उनके वीडियो तेजी से वायरल होने लगे। CJP आंदोलन से मिली पहचान दिल्ली के जंतर-मंतर पर अभिजीत दिपके के नेतृत्व में हुए CJP आंदोलन के दौरान मोहम्मद इरफान ने एक इंटरव्यू दिया था। उसी इंटरव्यू के वायरल होने के बाद वह चर्चा में आ गए। अब उनकी कहानी सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चा का विषय बनी हुई है।
CJP Celebration Video: NEET-UG पेपर लीक आंदोलन के बाद सोशल मीडिया पर वायरल हुए जश्न के वीडियो को लेकर उठे विवाद के बीच कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने अपनी सफाई दी है। पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि वायरल वीडियो को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। उनके मुताबिक, यह कोई 5 स्टार होटल में आयोजित पार्टी नहीं, बल्कि 37 दिनों तक आंदोलन में जुटे वॉलंटियर्स के सम्मान और उनके अनुभव जानने के लिए आयोजित कार्यक्रम था। '5 स्टार होटल नहीं, बेसमेंट हॉल में हुआ कार्यक्रम' सौरव दास ने कहा कि जिस स्थान को सोशल मीडिया पर 5 स्टार होटल बताया जा रहा है, वह अधिकतम 2 या 3 स्टार श्रेणी का स्थल था। उन्होंने बताया कि पूरा कार्यक्रम एक बेसमेंट हॉल में आयोजित किया गया था, जहां आंदोलन से जुड़े स्वयंसेवक एकत्र हुए थे। 150 से 200 वॉलंटियर्स हुए शामिल CJP के अनुसार, कार्यक्रम में करीब 150 से 200 वॉलंटियर्स शामिल हुए थे, जिनमें से आधे से अधिक दूसरे राज्यों से आए थे और लगातार 37 दिनों तक आंदोलन का हिस्सा रहे। सौरव दास ने कहा कि कई स्वयंसेवक अपने-अपने घर लौटने वाले थे, इसलिए संगठन ने उनके सम्मान और अनुभव साझा करने के लिए यह आयोजन किया। उन्होंने दावा किया कि कार्यक्रम में पहले लंबा फीडबैक सेशन और चर्चा हुई, जिसमें आंदोलन की समीक्षा की गई। हालांकि सोशल मीडिया पर केवल डांस और जश्न वाले वीडियो वायरल हुए, जिससे पूरे कार्यक्रम की गलत तस्वीर पेश की गई। सरकार को दिया गया 24 घंटे का अल्टीमेटम बरकरार CJP ने साफ किया कि सरकार को दिया गया 24 घंटे का अल्टीमेटम अब भी लागू है। सौरव दास के मुताबिक, सरकार ने तीसरे दौर की बातचीत में प्रदर्शनकारियों पर दर्ज सभी FIR वापस लेने और भविष्य में कोई कार्रवाई नहीं करने का लिखित आश्वासन देने की बात कही थी। उन्होंने कहा कि यदि तय समय के भीतर लिखित आश्वासन नहीं मिला, तो CJP दिल्ली में एक और राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करने का ऐलान करेगी। बिहार फायरिंग और शिक्षा सुधार विधेयक पर भी उठाए सवाल सौरव दास ने बिहार के सीवान में प्रदर्शन के दौरान कथित AK-47 फायरिंग के मामले में रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) से सार्वजनिक माफी की मांग दोहराई। उन्होंने कहा कि केवल निलंबन पर्याप्त नहीं है, बल्कि पूरे मामले में जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। इसके अलावा उन्होंने संसद में पेश शिक्षा सुधार विधेयक पर व्यापक चर्चा की मांग की। उनका कहना है कि पेपर लीक, परीक्षा प्रणाली में सुधार और छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई जैसे मुद्दों पर संसद में गंभीर बहस होनी चाहिए, ताकि युवाओं का शिक्षा व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा मजबूत हो सके।
CJP Protest: NEET-UG पेपर लीक आंदोलन समाप्त होने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने केंद्र सरकार को एक बार फिर चेतावनी दी है। संगठन के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने कहा कि आंदोलन के दौरान छात्रों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी FIR तत्काल वापस ली जाएं, हिरासत में लिए गए छात्रों को रिहा किया जाए और भविष्य में किसी भी छात्र या स्वयंसेवक पर नया मामला दर्ज न किया जाए। उन्होंने कहा कि यदि सरकार ने अपने आश्वासन का पालन नहीं किया, तो CJP दोबारा जंतर-मंतर पर बड़े स्तर पर आंदोलन शुरू करेगा। सरकार के वादे का दिलाया याद आशुतोष रांका ने कहा कि जंतर-मंतर और देशभर में चले आंदोलन को समाप्त करने से पहले केंद्र सरकार ने भरोसा दिया था कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी। CJP का कहना है कि वह सरकार के इस वादे पर लगातार नजर बनाए हुए है और केंद्र के साथ-साथ बीजेपी और एनडीए शासित राज्यों से भी इसी आश्वासन का पालन करने की उम्मीद करता है। बिहार और पश्चिम बंगाल में कार्रवाई का आरोप CJP ने आरोप लगाया कि सरकार और पुलिस आंदोलन समाप्त होने के बाद हुए समझौते का पालन नहीं कर रही है। संगठन के मुताबिक बिहार और पश्चिम बंगाल में सैकड़ों छात्रों को गिरफ्तार किया गया, जबकि दिल्ली समेत कई राज्यों में छात्रों और स्वयंसेवकों को निगरानी और उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। CJP ने मांग की है कि सभी गिरफ्तार छात्रों को तुरंत रिहा किया जाए, दर्ज मुकदमे वापस लिए जाएं और भविष्य में किसी भी प्रदर्शनकारी के खिलाफ नई कार्रवाई न हो। छात्र संगठनों ने भी उठाई आवाज छात्र संगठन AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने भी सरकार से प्रदर्शनकारियों पर दर्ज सभी मामलों को वापस लेने की मांग की। उन्होंने कहा कि पेपर लीक के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर हत्या के प्रयास जैसी गंभीर धाराएं लगाना उचित नहीं है। उनका दावा है कि बिहार समेत कई राज्यों में अब भी बड़ी संख्या में छात्र जेल में बंद हैं। 'रेजिग्नेशन पार्टी' वीडियो पर विवाद आंदोलन समाप्त होने के बाद CJP एक नए विवाद में भी घिर गया। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में संगठन के कुछ नेता पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का जश्न मनाते और नाचते नजर आए। इस वीडियो को लेकर संगठन की आलोचना हुई। हालांकि CJP नेता सौरव दास ने सफाई देते हुए कहा कि नई पीढ़ी के आंदोलन का तरीका अलग है। उनके अनुसार, "युवा नाचते हुए भी अपनी बात रख सकते हैं। इससे आंदोलन की गंभीरता या उद्देश्य कम नहीं हो जाता।" फिलहाल CJP ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मामले वापस नहीं लिए गए और सरकार अपने वादे पर कायम नहीं रही, तो आने वाले दिनों में राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक बार फिर बड़ा आंदोलन देखने को मिल सकता है।
जंतर-मंतर पर 36 दिनों तक चले CJP (CJP) छात्र आंदोलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य नेताओं के खिलाफ सोशल मीडिया पर की गई कथित आपत्तिजनक और अभद्र टिप्पणियों को लेकर दिल्ली पुलिस कार्रवाई की तैयारी में है। पुलिस सूत्रों के अनुसार, सोशल मीडिया पर साझा किए गए पोस्ट, वीडियो और टिप्पणियों की समीक्षा की जा रही है। जांच पूरी होने के बाद संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को विवादित कंटेंट हटाने के लिए नोटिस भेजे जा सकते हैं। पोस्ट, वीडियो और कमेंट्स की हो रही जांच सूत्रों के मुताबिक, दिल्ली पुलिस की सोशल मीडिया मॉनिटरिंग टीम विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर आंदोलन से जुड़े कंटेंट की लगातार निगरानी कर रही है। पुलिस यह जांच कर रही है कि क्या किसी पोस्ट, वीडियो या टिप्पणी में कानून का उल्लंघन हुआ है या उससे सार्वजनिक व्यवस्था और शांति प्रभावित होने की आशंका है। पुलिस का कहना है कि जिन पोस्टों की प्रकृति अभद्र या आपत्तिजनक पाई जाएगी, उन्हें हटाने के लिए संबंधित सोशल मीडिया कंपनियों को औपचारिक नोटिस जारी किए जाएंगे। साथ ही आवश्यकता पड़ने पर आगे की कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है। डिजिटल आंदोलन की बनी नई पहचान 36 दिनों तक चला जंतर-मंतर का छात्र आंदोलन केवल अपनी मांगों की वजह से ही चर्चा में नहीं रहा, बल्कि विरोध प्रदर्शन के नए तरीकों को लेकर भी सुर्खियों में रहा। आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया इसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा। नेटवर्क संबंधी दिक्कतों के बावजूद छात्रों ने रील्स, लाइव स्ट्रीम, एक्स (पूर्व ट्विटर) पोस्ट, इंस्टाग्राम अपडेट और मीम्स के जरिए आंदोलन को लगातार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में बनाए रखा। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से आंदोलन से जुड़ी हर जानकारी तेजी से देशभर तक पहुंचती रही। सहयोग और अनुशासन की भी मिसाल आंदोलन के दौरान पारंपरिक चंदे की जगह ऑनलाइन सहयोग का नया मॉडल देखने को मिला। देश-विदेश से लोगों ने फूड डिलीवरी ऐप्स के जरिए प्रदर्शन स्थल पर भोजन, दवाइयां और अन्य जरूरी सामान भेजा। इन सामग्रियों के वितरण के लिए स्वयंसेवकों ने हेल्प डेस्क भी संचालित किए। भीषण गर्मी के बीच छात्र एक-दूसरे को पानी पिलाते, हाथ से पंखा झलते और मेडिकल सहायता उपलब्ध कराते नजर आए। बड़ी संख्या में छात्राओं की भागीदारी के बावजूद किसी छेड़छाड़ या महिला उत्पीड़न की शिकायत सामने नहीं आई, जिसे आंदोलन के सकारात्मक पहलुओं में गिना जा रहा है। आखिरी दिनों में उठे कुछ सवाल हालांकि आंदोलन के अंतिम चरण में कुछ ऐसी घटनाएं भी सामने आईं, जिन पर सवाल उठे। पुलिस और आयोजकों के अनुसार कुछ ऐसे लोग भी प्रदर्शन स्थल पर पहुंच गए, जिनका आंदोलन से सीधा संबंध नहीं था। फूड डिलीवरी पहुंचने पर खाने के पैकेटों को लेकर अव्यवस्था की घटनाएं भी सामने आईं। इसके अलावा, 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई के बाद ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों की व्यवस्थाओं को लेकर भी चर्चा हुई। आंदोलन के समापन और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद कुछ स्थानों पर हुई हिंसक घटनाओं ने भी आंदोलन की अनुशासित छवि पर सवाल खड़े किए। भाजपा नेताओं के परिवारों से भी मिले अलग-अलग संदेश इस आंदोलन के दौरान कुछ भाजपा नेताओं के परिवारों की प्रतिक्रियाएं भी चर्चा में रहीं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की बेटी दिविजा ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन को लोकतांत्रिक अधिकार बताते हुए परीक्षा सुधारों का समर्थन किया और हिंसा का विरोध किया। वहीं, असम के मंत्री केशव महंत की बेटी दिबिसा भी आंदोलन में शामिल हुईं। इस पर मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि किसी नेता के परिवार के सदस्य का अलग राजनीतिक दृष्टिकोण होना लोकतंत्र का हिस्सा है। भुवनेश्वर से भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी की बेटी अर्चिता ने भी छात्रों के समर्थन में सोशल मीडिया पर अपनी राय व्यक्त की थी। 36 दिन बाद समाप्त हुआ आंदोलन नीट पेपर लीक के विरोध में शुरू हुआ यह आंदोलन 36 दिनों तक जंतर-मंतर पर चला। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और सरकार की ओर से परीक्षा सुधारों को लेकर कई घोषणाओं के बाद आंदोलन समाप्त हुआ। इसी दौरान अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक ने भी सरकार के आश्वासन के बाद अपना अनशन समाप्त किया। अब आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया पर साझा किए गए कंटेंट को लेकर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई और संभावित नोटिसों पर सभी की नजर बनी हुई है।
Jantar Mantar Protest: दिल्ली के जंतर-मंतर सहित देश के विभिन्न हिस्सों में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सोमवार (27 जुलाई) को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह मंगलवार (28 जुलाई) को इस मामले से जुड़ी सभी याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करेगा। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में पूरे देश में विरोध-प्रदर्शनों से निपटने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure-SOP) तैयार करने पर विचार किया जाएगा। दिल्ली से बिहार तक के मामलों पर होगी संयुक्त सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष दिल्ली के जंतर-मंतर छात्र आंदोलन में पुलिस कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिकाओं का उल्लेख किया गया। इस दौरान वकीलों ने बताया कि बिहार समेत अन्य राज्यों में प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई से जुड़े मामले भी अदालत के समक्ष लाए गए हैं। याचिकाओं में दिल्ली के जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान हुए लाठीचार्ज के अलावा बिहार के सिवान में कथित तौर पर AK-47 के इस्तेमाल जैसे मामलों का भी जिक्र किया गया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी मामलों को एक साथ सूचीबद्ध कर संयुक्त सुनवाई करने का निर्देश दिया। पूरे देश के लिए SOP बनाने पर सुप्रीम कोर्ट का संकेत सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए पूरे देश में एक समान SOP की आवश्यकता पर विचार किया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि सभी राज्यों से जुड़े मामलों पर विचार करने के बाद यह देखा जाएगा कि भविष्य में ऐसे हालात से निपटने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए जा सकते हैं या नहीं। 'शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार' मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतंत्र का एक मूल अधिकार है और नागरिकों को इसके लिए उचित स्थान और अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल विरोध प्रदर्शन होने के आधार पर पुलिस की कठोर कार्रवाई या आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग को उचित नहीं ठहराया जा सकता। अदालत इस बात की भी जांच करेगी कि पुलिस द्वारा अपनाए गए कदम कानून और संविधान के अनुरूप थे या नहीं। पुलिसकर्मियों की सुरक्षा पर भी होगी सुनवाई सुनवाई के दौरान घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों की ओर से भी पक्ष रखा गया। उनके वकील ने अदालत को बताया कि प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने पुलिसकर्मियों पर हमला किया, जिससे कई जवान घायल हुए। उन्होंने मांग की कि अदालत पुलिसकर्मियों की सुरक्षा और उनके अधिकारों पर भी विचार करे। इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि "हर जीवन महत्वपूर्ण है।" उन्होंने कहा कि अदालत प्रदर्शनकारियों के अधिकारों के साथ-साथ ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों की सुरक्षा व्यवस्था और उनके संरक्षण से जुड़े पहलुओं की भी समीक्षा करेगी। मंगलवार को होगी अहम सुनवाई सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सभी संबंधित याचिकाओं को एक साथ सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। मंगलवार (28 जुलाई) को होने वाली सुनवाई में अदालत प्रदर्शनकारियों के अधिकार, पुलिस की जवाबदेही, कानून-व्यवस्था बनाए रखने की प्रक्रिया और भविष्य के लिए राष्ट्रीय स्तर पर SOP तैयार करने जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार करेगी। यह सुनवाई देशभर में विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई के लिए भविष्य की कानूनी रूपरेखा तय करने की दिशा में अहम मानी जा रही है।
Parliament Session 2026: लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने CJP के 'संसद चलो' मार्च के दौरान छात्रों पर हुई कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधा है। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक पत्र में सवाल उठाया कि 20 जुलाई को शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर बल प्रयोग का आदेश किसने दिया था। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक बल का इस्तेमाल किया गया और सरकार को इस पूरे घटनाक्रम पर जवाब देना चाहिए। राहुल गांधी ने गृह मंत्री से पूछे कई सवाल राहुल गांधी ने अपने पत्र में कहा कि 20 जुलाई को CJP के नेतृत्व में निकाले गए 'संसद चलो' मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के साथ कठोर व्यवहार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस कार्रवाई में कई छात्र और प्रदर्शनकारी घायल हुए। कांग्रेस सांसद के अनुसार, इस कार्रवाई में कुछ लोगों के हाथ, पैर और पसलियां टूट गईं। उन्होंने यह भी दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन जैसे घातक हथियारों का इस्तेमाल किया गया, जिससे कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए। 'अगर अमित शाह ने आदेश नहीं दिया तो किसने दिया?' राहुल गांधी ने अपने पत्र में कहा कि दिल्ली पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियां केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करती हैं। ऐसे में उन्होंने सवाल उठाया कि यदि छात्रों पर बल प्रयोग और कथित पैलेट गन के इस्तेमाल की मंजूरी गृह मंत्री अमित शाह ने नहीं दी, तो फिर इसकी अनुमति किस अधिकारी या एजेंसी ने दी। उन्होंने सरकार से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग भी की। 19 वर्षीय छात्र का किया जिक्र राहुल गांधी ने अपने पत्र में 19 वर्षीय छात्र साहिल लोचब का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि साहिल कथित तौर पर पैलेट गन की चपेट में आने से गंभीर रूप से घायल हुआ है और उसकी एक आंख की रोशनी जाने का खतरा है। राहुल गांधी ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों के साथ इस तरह का व्यवहार स्वीकार नहीं किया जा सकता। धर्मेंद्र प्रधान के बाद विपक्ष का अगला निशाना अमित शाह NEET-UG पेपर लीक विवाद और छात्रों के आंदोलन के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद विपक्ष अब गृह मंत्री अमित शाह को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है। कांग्रेस और INDIA गठबंधन का कहना है कि आंदोलन खत्म होने के बावजूद छात्रों पर हुई कथित पुलिस कार्रवाई का मुद्दा संसद और सड़क दोनों जगह उठाया जाएगा। विपक्ष का आरोप है कि सरकार को इस मामले में राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही तय करनी चाहिए। संसद में बढ़ सकता है राजनीतिक टकराव मानसून सत्र के दौरान NEET-UG पेपर लीक, परीक्षा सुधार, छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई और CJP मार्च का मुद्दा लगातार चर्चा में बना हुआ है। विपक्ष इन मामलों पर सरकार से विस्तृत जवाब और चर्चा की मांग कर रहा है, जबकि सरकार परीक्षा प्रणाली में सुधार और नए कानूनों के जरिए व्यवस्था मजबूत करने की बात कह रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में संसद के भीतर इन मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस और टकराव देखने को मिल सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।