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Families of Injured Delhi Cops Seek Justice

CJP प्रदर्शन में घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों का दर्द: ACP की पत्नी बोलीं- खून से सनी वर्दी में लौटे पति को देख टूट गई थी

kalpana जुलाई 31, 2026 0
Family members of Delhi Police personnel injured during the CJP protest address a press conference
Families of Injured Delhi Police Personnel Demand Justice After CJP Protest Violence

20 जुलाई को दिल्ली में CJP के नेतृत्व में हुए प्रदर्शन के दौरान घायल हुए दिल्ली पुलिसकर्मियों के परिजनों ने शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी पीड़ा साझा की। परिवारों ने कहा कि ड्यूटी के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों को न्याय मिलना चाहिए और हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

'खून से सनी वर्दी में घर लौटे थे मेरे पति'

प्रेस कॉन्फ्रेंस में घायल एक ACP की पत्नी ने कहा कि 20 जुलाई की रात उनके पति गंभीर रूप से घायल होकर घर लौटे थे। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने अपने पति को खून से सनी वर्दी में देखा तो वह पल पूरे परिवार के लिए बेहद दर्दनाक था।

उन्होंने कहा कि वह अपनी दो साल की बेटी और अन्य पुलिसकर्मियों के परिवारों के साथ इसलिए सामने आई हैं ताकि लोग ड्यूटी के दौरान पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों की पीड़ा को समझ सकें।

SI की बेटी बोली- पिता की वर्दी खून से लथपथ थी

घायल एक सब-इंस्पेक्टर (SI) की बेटी ने बताया कि उनके पिता पहले भारतीय नौसेना में मरीन कमांडो रह चुके हैं और 15 वर्षों तक देश की सेवा करने के बाद दिल्ली पुलिस में शामिल हुए।

उन्होंने कहा कि प्रदर्शन के दौरान उनके पिता जंतर-मंतर पर बैरिकेड्स के पास तैनात थे। परिवार के मुताबिक, 25 जुलाई को भीड़ ने उनके पिता के साथ मारपीट की, जिसके बाद उन्हें गंभीर हालत में RML अस्पताल ले जाया गया। वहां वे करीब चार घंटे तक बेहोश रहे।

बेटी ने कहा कि रात में जब उनके पिता घर पहुंचे तो उनकी वर्दी खून से सनी हुई थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सोशल मीडिया पर उनके पिता को ही दोषी ठहराया गया, जिससे परिवार को गहरा मानसिक आघात पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट में न्याय की मांग

परिजनों ने बताया कि उन्होंने अन्य घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है और मामले में निष्पक्ष जांच तथा न्याय की मांग की है।

'हिंसा करने वालों पर हो कड़ी कार्रवाई'

प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद एक अन्य पुलिसकर्मी के परिजन ने कहा कि प्रदर्शन में केवल छात्र ही नहीं, बल्कि कुछ असामाजिक और उपद्रवी तत्व भी शामिल थे। उनका आरोप है कि इन्हीं लोगों ने हिंसा को बढ़ावा दिया और संसद की गरिमा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की।

उन्होंने मांग की कि हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, जबकि जिन छात्रों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उनकी जांच पूरी होने के बाद उन्हें उचित राहत दी जाए।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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Public Examinations Bill
संसद में 'Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Amendment Bill, 2026' पास

पेपर लीक और संगठित परीक्षा घोटालों पर होगी कड़ी कार्रवाई, संसद के दोनों सदनों से विधेयक को मिली मंजूरी   नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद ने Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Amendment Bill, 2026 को पारित कर दिया है। राज्यसभा से मंजूरी मिलने के बाद यह विधेयक संसद के दोनों सदनों से पास हो गया। इस संशोधन का उद्देश्य सरकारी भर्ती और अन्य सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक, संगठित नकल और परीक्षा माफिया पर सख्त कार्रवाई करना है।   कड़े दंड का प्रावधान   संशोधित कानून के तहत पेपर लीक, प्रश्नपत्र चोरी, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से नकल और संगठित परीक्षा धोखाधड़ी जैसे अपराधों पर पहले से अधिक कड़ी सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया है। सरकार का कहना है कि इससे भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ेगी तथा लाखों अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा होगी।   सदन में तीखी बहस   राज्यसभा में विधेयक पर चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस हुई। विपक्ष ने हाल के वर्षों में हुए विभिन्न पेपर लीक मामलों को लेकर सरकार से जवाब मांगा, जबकि सरकार ने कहा कि नया कानून परीक्षा माफिया के खिलाफ प्रभावी हथियार साबित होगा। बहस के दौरान विपक्ष के कुछ सदस्यों ने वॉकआउट भी किया।   सरकार का 'जीरो टॉलरेंस' संदेश   विधेयक पारित होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सरकार परीक्षा प्रणाली में गड़बड़ी करने वालों के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' की नीति पर काम कर रही है। उन्होंने कहा कि नया कानून युवाओं के भविष्य की रक्षा करेगा और ईमानदार अभ्यर्थियों को निष्पक्ष अवसर सुनिश्चित करेगा।

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Karnataka Bandh Warning: कावेरी जल विवाद फिर गरमाया, तमिलनाडु को पानी छोड़ने के विरोध में बंद की चेतावनी

कावेरी नदी के जल बंटवारे को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच वर्षों पुराना विवाद एक बार फिर तेज हो गया है. तमिलनाडु को कावेरी का पानी छोड़ने के आदेश के विरोध में कर्नाटक में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं. कई किसान संगठनों और कन्नड़ समर्थक संगठनों ने राज्य सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और मांग की है कि तमिलनाडु को पानी न छोड़ा जाए. प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो पूरे कर्नाटक में बंद का आह्वान किया जाएगा. रामनगर में प्रदर्शन, सरकार के खिलाफ नारेबाजी रामनगर में कन्नड़ रक्षा वेदिके (KRV) के प्रवीण शेट्टी गुट ने जुलूस निकालकर जोरदार प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों ने कावेरी जल नियंत्रण समिति (CWRC) के आदेश को अवैज्ञानिक बताते हुए इसे तत्काल वापस लेने की मांग की. उनका कहना है कि राज्य के जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं है और ऐसे में तमिलनाडु को पानी छोड़ना कर्नाटक के किसानों के साथ अन्याय होगा. किसानों में बढ़ा आक्रोश कावेरी जल छोड़ने के फैसले के खिलाफ मांड्या और मैसूरु समेत कावेरी बेसिन के कई इलाकों में किसान सड़कों पर उतर आए हैं. गुरुवार से विभिन्न स्थानों पर सड़क जाम और विरोध प्रदर्शन किए गए. किसानों का कहना है कि राज्य में बारिश सामान्य से कम हुई है और जलाशयों में जलस्तर चिंता का विषय बना हुआ है. ऐसे में पहले कर्नाटक की सिंचाई और पेयजल जरूरतों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. CWMA के फैसले के बाद बढ़ा विवाद विवाद तब और गहरा गया जब कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) ने कर्नाटक की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें तमिलनाडु को पानी छोड़ने की समय-सीमा आगे बढ़ाने की मांग की गई थी. इसके बाद राज्य में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए और कई संगठनों ने सरकार पर किसानों के हितों की अनदेखी करने का आरोप लगाया. बीजेपी ने साधा सरकार पर निशाना कर्नाटक बीजेपी अध्यक्ष बी.वाई. विजयेंद्र ने शिवमोग्गा में मीडिया से बातचीत करते हुए राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला. उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार कावेरी बेसिन के किसानों के हितों की रक्षा करने में पूरी तरह विफल रही है. विजयेंद्र ने आरोप लगाया कि सरकार कर्नाटक के किसानों के साथ मजबूती से खड़े होने के बजाय तमिलनाडु के हितों को प्राथमिकता देती दिखाई दे रही है. 3 अगस्त की बैठक पर टिकी नजर इस बीच 3 अगस्त को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के कर्नाटक दौरे का कार्यक्रम प्रस्तावित है. इस दौरान उनकी कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के साथ कावेरी जल बंटवारे के मुद्दे पर विस्तृत चर्चा होने की संभावना है. माना जा रहा है कि दोनों राज्यों के बीच बातचीत से विवाद का कोई समाधान निकल सकता है. क्यों बार-बार उठता है कावेरी विवाद? कावेरी नदी का पानी कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के लिए महत्वपूर्ण है. सामान्य मानसून के दौरान जल बंटवारे को लेकर विवाद अपेक्षाकृत कम रहता है, लेकिन बारिश कम होने या जलाशयों का स्तर घटने पर यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक रूप से बेहद संवेदनशील बन जाता है. हर वर्ष मानसून के दौरान दोनों राज्यों के बीच पानी छोड़ने को लेकर तनाव देखने को मिलता है.  

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Singer Abhijeet Bhattacharya's Instagram post sparks online debate over claims about India's education history
अभिजीत भट्टाचार्य के इंस्टा पोस्ट पर छिड़ी बहस, लिखा- '1947 से शुरू हुआ जिहाद', शिक्षा मंत्रियों की सूची की शेयर

Abhijeet Bhattacharya Instagram Post: बॉलीवुड गायक अभिजीत भट्टाचार्य के एक इंस्टाग्राम पोस्ट ने सोशल मीडिया पर नई बहस छेड़ दी है। अभिजीत ने अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट पर 1947 से 1977 तक भारत के शिक्षा मंत्रियों की तस्वीरों और उनके कथित कार्यकाल की एक सूची साझा की। इस पोस्ट के साथ उन्होंने कैप्शन में लिखा, "Jih#d began from 1947..." और इसके साथ #VandeMataram, #JaiShreeRam तथा #HarHarMahadev जैसे हैशटैग भी जोड़े। पोस्ट सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। पोस्ट में क्या लिखा गया? अभिजीत भट्टाचार्य द्वारा साझा की गई पोस्ट में दावा किया गया है कि आजादी के बाद भारत की शिक्षा व्यवस्था को एक विशेष सोच के तहत संचालित किया गया। पोस्ट में सवाल उठाया गया कि बाबर, हुमायूं और अकबर को इतिहास में "महान" क्यों बताया गया, जबकि भारतीय सभ्यता, संस्कृति और कई ऐतिहासिक तथ्यों को कथित तौर पर नजरअंदाज किया गया। पोस्ट में लोगों से "जागो, सोचो और सच्चाई को पहचानो" जैसी अपील भी की गई है। पोस्ट में किन शिक्षा मंत्रियों का किया गया जिक्र? पोस्ट में 1947 से 1977 तक के शिक्षा मंत्रियों की एक सूची भी साझा की गई है। इसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद, हुमायूं कबीर, एम.सी. छागला (मो. करीम छागला के रूप में उल्लेख), फखरुद्दीन अली अहमद, प्रो. सैयद नूरुल हसन समेत कई नाम शामिल किए गए हैं। पोस्ट में इन नेताओं के कार्यकाल भी दर्शाए गए हैं। हालांकि, पोस्ट में दी गई सूची और कार्यकाल को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों और सरकारी रिकॉर्ड में शिक्षा मंत्रियों के कार्यकाल इससे अलग बताए गए हैं। कई नाम और तिथियां आधिकारिक दस्तावेजों से मेल नहीं खातीं। इसलिए पोस्ट में किए गए दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इतिहास और शिक्षा व्यवस्था पर लगाए गए आरोप पोस्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि स्वतंत्रता के बाद इतिहास की पुस्तकों में कुछ शासकों को महिमामंडित किया गया, जबकि भारतीय परंपरा, संस्कृति और कई ऐतिहासिक घटनाओं को पर्याप्त महत्व नहीं मिला। इसमें शिक्षा के राजनीतिकरण, इतिहास को एक विशेष दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से दूर करने जैसे दावे भी किए गए हैं। हालांकि, ये सभी दावे सोशल मीडिया पोस्ट में व्यक्त विचार हैं। इनकी पुष्टि किसी आधिकारिक सरकारी दस्तावेज या स्वतंत्र ऐतिहासिक अध्ययन से नहीं हुई है। इतिहासकारों और विशेषज्ञों के बीच इन विषयों पर लंबे समय से अलग-अलग मत रहे हैं। सोशल मीडिया पर तेज हुई बहस अभिजीत भट्टाचार्य का यह पोस्ट वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर समर्थन और विरोध दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ यूजर्स ने उनके विचारों का समर्थन किया, जबकि कई लोगों ने पोस्ट में किए गए दावों की तथ्यात्मकता पर सवाल उठाए। फिलहाल अभिजीत भट्टाचार्य ने इस पोस्ट को लेकर कोई अतिरिक्त स्पष्टीकरण या बयान जारी नहीं किया है।  

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