Tamil Nadu Government Formation: तमिलनाडु में सरकार गठन को लेकर सियासी हलचल लगातार तेज होती जा रही है. TVK प्रमुख विजय एक बार फिर राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर से मिलने लोक भवन पहुंचे. 24 घंटे के भीतर यह उनकी दूसरी मुलाकात रही, जिससे राज्य की राजनीति में सस्पेंस और बढ़ गया है. कांग्रेस समर्थन के बाद फिर राज्यपाल से मुलाकात सूत्रों के मुताबिक, विजय ने 6 मई को कांग्रेस का समर्थन पत्र राज्यपाल को सौंपकर सरकार बनाने का दावा पेश किया था. हालांकि अभी तक राज्यपाल की ओर से कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है. इसी बीच विजय की दोबारा राज्यपाल से मुलाकात को बेहद अहम माना जा रहा है. माना जा रहा है कि सरकार गठन के लिए बहुमत जुटाने और आगे की रणनीति पर चर्चा हुई है. TVK विधायकों की अहम बैठक सरकार गठन को लेकर विजय ने 7 मई को TVK के निर्वाचित विधायकों की महत्वपूर्ण बैठक भी बुलायी है. इस बैठक में पार्टी आगे की रणनीति, समर्थन जुटाने और विधायक दल के नेता के चयन पर चर्चा कर सकती है. सूत्रों के अनुसार, TVK अपने विधायक दल के नेता के नाम पर भी औपचारिक मुहर लगा सकती है. बहुमत से अभी पीछे TVK 234 सदस्यीय तमिलनाडु विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 118 विधायकों का समर्थन जरूरी है. हालिया चुनाव में TVK ने 108 सीटों पर जीत हासिल की है, जिससे वह राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. हालांकि बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए पार्टी को अभी और समर्थन की जरूरत है. कांग्रेस के पांच विधायकों ने TVK को समर्थन देने की घोषणा की है, लेकिन इसके बावजूद आंकड़ा अभी भी बहुमत से नीचे माना जा रहा है. इसके अलावा विजय को अपनी जीती हुई दो सीटों में से एक सीट छोड़नी होगी, जिससे पार्टी की प्रभावी संख्या और प्रभावित हो सकती है. कांग्रेस ने DMK से तोड़ा साथ कांग्रेस ने बड़ा राजनीतिक कदम उठाते हुए विजय की पार्टी TVK को समर्थन देने का फैसला किया है. इसके साथ ही उसने अपने पुराने सहयोगी DMK से दूरी बना ली है. कांग्रेस सांसद ज्योतिमणि ने सरकार गठन में हो रही देरी पर नाराजगी जताते हुए कहा कि बहुमत परीक्षण का सही मंच विधानसभा है, न कि राजभवन. उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा राज्यपाल के माध्यम से राजनीति कर रही है और विजय को तुरंत सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए. राज्यपाल के फैसले पर टिकी नजर फिलहाल तमिलनाडु में सबकी नजर राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर के अगले कदम पर टिकी हुई है. राजनीतिक दल लगातार जोड़-तोड़ और समर्थन जुटाने में लगे हैं. अगर TVK आवश्यक समर्थन जुटाने में सफल रहती है, तो राज्य में पहली बार विजय के नेतृत्व में नई सरकार बनने का रास्ता साफ हो सकता है.
Tamil Nadu Government Formation: तमिलनाडु में नई सरकार के गठन को लेकर सियासी हलचल लगातार तेज होती जा रही है. TVK प्रमुख विजय के मुख्यमंत्री पद की शपथ को लेकर बना सस्पेंस अभी खत्म नहीं हुआ है. राज्यपाल विश्वनाथ आर्लेकर द्वारा बहुमत साबित करने के लिए 118 विधायकों के समर्थन पत्र मांगे जाने के बाद विजय का प्रस्तावित शपथग्रहण फिलहाल टल गया है. TVK ने सौंपा 112 विधायकों का समर्थन पत्र सूत्रों के मुताबिक, TVK ने कांग्रेस के 5 विधायकों के समर्थन सहित कुल 112 विधायकों का समर्थन पत्र राज्यपाल को सौंप दिया है. हालांकि सरकार बनाने के लिए 118 विधायकों का समर्थन जरूरी है, इसलिए अभी भी TVK बहुमत के आंकड़े से पीछे है. विजय दो विधानसभा सीटों से चुनाव जीते हैं, जिसके कारण पार्टी की प्रभावी संख्या 107 मानी जा रही है. बताया जा रहा है कि TVK फिलहाल VCK, PMK और वामपंथी दलों के साथ समर्थन को लेकर बातचीत कर रही है. राज्यपाल के रुख से बढ़ा राजनीतिक तनाव राज्यपाल विश्वनाथ आर्लेकर के अतिरिक्त समर्थन पत्र मांगने के बाद राजनीतिक विवाद भी शुरू हो गया है. कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि सबसे बड़ी पार्टी के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना राज्यपाल की संवैधानिक जिम्मेदारी है और विजय को अनावश्यक रूप से बहुमत साबित करने के लिए दबाव में डाला जा रहा है. सूत्रों के अनुसार, TVK ने अब इस पूरे मामले में कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेने का फैसला किया है. विजय की प्रोटोकॉल सुरक्षा वापस सरकार गठन में देरी के बीच राज्य सरकार ने विजय को दी गयी प्रोटोकॉल कॉन्वॉय सुरक्षा वापस ले ली है. हालांकि उनकी बेसिक पायलट सुरक्षा अभी जारी रहेगी. इस फैसले के बाद राजनीतिक चर्चाएं और तेज हो गयी हैं. AIADMK में टूट का खतरा, विधायक पहुंचे रिसॉर्ट इसी बीच AIADMK के भीतर भी हलचल तेज हो गयी है. पार्टी ने अपने कई विधायकों को पुडुचेरी के एक रिसॉर्ट में शिफ्ट कर दिया है. सूत्रों का कहना है कि ये विधायक सीवी षणमुगम गुट से जुड़े हैं. अब तक 28 विधायक रिसॉर्ट पहुंच चुके हैं, जबकि कुल 32 विधायकों के वहां पहुंचने की संभावना जतायी जा रही है. पार्टी को आशंका है कि सरकार गठन के दौरान विधायकों में टूट-फूट हो सकती है. 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी TVK हालिया विधानसभा चुनाव में विजय की पार्टी TVK ने 108 सीटें जीतकर तमिलनाडु की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सबको चौंका दिया. हालांकि पार्टी बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गयी. चुनाव परिणाम आने के बाद TVK विधायकों ने विजय को विधायक दल का नेता चुना था, जिसके बाद उन्होंने सरकार बनाने का दावा पेश किया. कांग्रेस पहले ही TVK को सशर्त समर्थन दे चुकी है, जबकि अन्य छोटे दलों और वामपंथी पार्टियों के भीतर अभी चर्चा जारी है. DMK की बैठक पर भी नजर आज DMK विधायक दल की बैठक भी होने जा रही है, जिसमें नेता प्रतिपक्ष के चयन और आगे की रणनीति पर चर्चा होगी. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले कुछ दिन तमिलनाडु की राजनीति के लिए बेहद अहम साबित हो सकते हैं.
चेन्नई/पुडुचेरी, 4 मई: दक्षिण भारत के सबसे अहम चुनावों में शामिल तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के शुरुआती रुझानों ने बड़ा सियासी उलटफेर कर दिया है। अभिनेता से नेता बने Vijay की पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) ने पहली ही बार में शानदार प्रदर्शन करते हुए रुझानों में बढ़त बना ली है। 234 सीटों वाले तमिलनाडु विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 118 है और अब तक सामने आए रुझानों में मुकाबला त्रिकोणीय होते-होते अब TVK के पक्ष में झुकता नजर आ रहा है। रुझानों में TVK नंबर-1 अब तक करीब 130 सीटों के रुझानों के अनुसार: TVK: 50 सीटों पर बढ़त AIADMK: 47 सीटों पर आगे DMK: 23 सीटों पर बढ़त इन आंकड़ों ने यह संकेत दे दिया है कि तमिलनाडु की राजनीति में इस बार बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। शुरुआत में AIADMK, फिर बदली तस्वीर मतगणना के शुरुआती घंटों में तस्वीर कुछ अलग थी। पहले 10 सीटों के रुझानों में AIADMK आगे दिखी 40 सीटों के रुझानों में TVK ने तेजी से बढ़त बनानी शुरू की 60 सीटों तक आते-आते AIADMK (23) और TVK (20) के बीच कांटे की टक्कर 100+ सीटों के रुझानों के बाद TVK ने बढ़त लेकर बाकी दलों को पीछे छोड़ दिया इससे साफ है कि जैसे-जैसे EVM के वोट खुल रहे हैं, रुझान TVK के पक्ष में मजबूत होते जा रहे हैं। विजय फैक्टर बना गेम चेंजर Vijay की लोकप्रियता इस चुनाव में सबसे बड़ा फैक्टर बनकर उभरी है। पहली बार चुनाव मैदान में उतरी उनकी पार्टी को शहरी और युवा मतदाताओं का खासा समर्थन मिलता दिख रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि TVK ने पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाई है, जिससे DMK और AIADMK दोनों को नुकसान हुआ है। DMK का दावा, लेकिन रुझान अलग DMK के नेताओं ने पहले ही पूर्ण बहुमत का दावा किया था और 130-140 सीटें जीतने की बात कही थी, लेकिन शुरुआती रुझान उनके दावे के उलट नजर आ रहे हैं। फिलहाल पार्टी तीसरे नंबर पर चल रही है, जो उसके लिए चिंता का विषय हो सकता है। पुडुचेरी में NDA की बढ़त बरकरार पुडुचेरी की 30 सीटों में बहुमत का आंकड़ा 16 है। यहां शुरुआती रुझानों में NDA गठबंधन बढ़त बनाए हुए है: All India N.R. Congress (AINRC): 2 सीटों पर आगे कांग्रेस: 1 सीट पर बढ़त यहां पहले से NDA की सरकार है और शुरुआती संकेत उसी की वापसी की ओर इशारा कर रहे हैं। मतदान और मतगणना की स्थिति तमिलनाडु में 23 अप्रैल को 85.10% मतदान दर्ज कुल 4.87 करोड़ मतदाताओं ने वोट डाले महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से ज्यादा रही पुडुचेरी में 89.87% मतदान हुआ तमिलनाडु के 62 और पुडुचेरी के 6 मतगणना केंद्रों पर कड़ी सुरक्षा के बीच गिनती जारी मतगणना तीन-स्तरीय सुरक्षा के बीच हो रही है और पहले पोस्टल बैलेट, फिर EVM वोटों की गिनती की जा रही है। क्या बदल जाएगी तमिलनाडु की राजनीति? तमिलनाडु की राजनीति दशकों से DMK और AIADMK के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन इस बार Tamilaga Vettri Kazhagam की एंट्री ने पूरा समीकरण बदल दिया है। अगर यही रुझान अंतिम नतीजों में बदलते हैं, तो यह राज्य की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव साबित हो सकता है, जहां एक नई पार्टी पहली बार में ही सत्ता के करीब पहुंच जाए।
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 से पहले सियासी माहौल गरमा गया है, लेकिन आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि सत्ताधारी Dravida Munnetra Kazhagam (DMK) और उसके सहयोगी दल बेहद मजबूत स्थिति में हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों और 2021 के विधानसभा चुनावों के आधार पर देखें तो विपक्ष फिलहाल काफी पीछे नजर आ रहा है। 223 सीटों का गणित: DMK गठबंधन की बड़ी बढ़त 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों के विधानसभा क्षेत्रों के विश्लेषण से पता चलता है कि DMK गठबंधन ने 234 में से 223 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की थी। यह आंकड़ा बहुमत के लिए जरूरी 118 सीटों के आंकड़े से बहुत आगे है, जो इस बात का संकेत है कि अगर यही ट्रेंड जारी रहा तो DMK को सत्ता में वापसी से रोकना विपक्ष के लिए बेहद मुश्किल होगा। वहीं, All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam (AIADMK) सिर्फ 8 सीटों पर बढ़त बना पाई, जबकि Pattali Makkal Katchi (PMK) को सिर्फ 3 सीटों पर बढ़त मिली। लोकसभा 2024 में ‘INDIA’ गठबंधन का दबदबा 2024 के लोकसभा चुनावों में DMK के नेतृत्व वाले ‘INDIA’ गठबंधन ने 39 में से 38 सीटों पर जीत दर्ज की। इस प्रदर्शन ने साफ कर दिया कि राज्य में सत्ताधारी गठबंधन की पकड़ मजबूत बनी हुई है। M. K. Stalin के नेतृत्व में DMK ने 22 सीटों पर चुनाव लड़ा और सभी जीतीं, साथ ही 125 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की। वोट शेयर बनाम सीटों की कहानी DMK: 26.93% वोट शेयर AIADMK: 20.46% वोट शेयर हालांकि वोट शेयर का अंतर ज्यादा बड़ा नहीं दिखता, लेकिन सीटों में यह अंतर बहुत बड़ा हो गया है। राज्य के 234 विधानसभा क्षेत्रों में से 52 में DMK को 50% से ज्यादा वोट मिले, जबकि AIADMK सिर्फ 1 सीट पर ही यह आंकड़ा छू पाई। करीबी मुकाबलों में भी DMK आगे जिन 26 लोकसभा सीटों पर जीत का अंतर 10,000 वोट से कम था, उनमें भी DMK गठबंधन ने 19 सीटों पर बढ़त बनाई, जबकि AIADMK सिर्फ 7 सीटों पर ही आगे रही। यह दर्शाता है कि कड़े मुकाबलों में भी सत्ताधारी गठबंधन का पलड़ा भारी रहा। विपक्ष के लिए चुनौती क्यों बढ़ी? AIADMK का 2024 लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन 2021 विधानसभा चुनाव के मुकाबले कमजोर रहा। जहां 2021 में उसने 66 सीटें जीती थीं, वहीं 2024 में उसे कई सीटों पर DMK, कांग्रेस और अन्य सहयोगी दलों से हार का सामना करना पड़ा। नए खिलाड़ी से बदलेगा खेल? इस बार चुनाव में अभिनेता से नेता बने Vijay की पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) भी मैदान में उतर रही है। TVK की एंट्री मुकाबले को दिलचस्प बना सकती है, लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या यह पार्टी विपक्ष को मजबूत करेगी या DMK के वोट बैंक में सेंध लगाएगी। मौजूदा आंकड़ों और चुनावी ट्रेंड को देखते हुए DMK गठबंधन स्पष्ट रूप से बढ़त में है। हालांकि, अंतिम नतीजे इस बात पर निर्भर करेंगे कि चुनावी मैदान में नए समीकरण कैसे बनते हैं और TVK जैसे नए खिलाड़ी कितना असर डालते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।