वाराणसी, एजेंसियां। संसद परिसर में राम मंदिर के चंदे से जुड़े कथित गबन को लेकर विपक्षी सांसदों की ओर से किए गए स्किट पर विवाद बढ़ गया है। वाराणसी पुलिस ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, निर्दलीय सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव और समाजवादी पार्टी के सांसद अवधेश प्रसाद के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है। पुलिस के अनुसार, मामला धार्मिक भावनाएं आहत करने और सनातन धर्म का कथित अपमान करने से जुड़ी शिकायत पर दर्ज किया गया है। संसद परिसर में किया गया था स्किट यह मामला शुक्रवार को संसद परिसर में हुए विपक्षी सांसदों के प्रदर्शन से जुड़ा है। राहुल गांधी, पप्पू यादव, अवधेश प्रसाद और अन्य विपक्षी सांसदों ने अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी के मुद्दे को उठाने के लिए नुक्कड़ नाटक जैसी प्रस्तुति की थी। विपक्ष की ओर से इस प्रदर्शन के जरिए राम मंदिर के चंदे से जुड़े आरोपों और सरकार की कार्रवाई पर सवाल उठाने की कोशिश की गई थी। धार्मिक भावनाएं आहत करने का आरोप वाराणसी पुलिस के मुताबिक, शिकायत में आरोप लगाया गया कि प्रदर्शन के दौरान की गई प्रस्तुति से सनातन धर्म का अपमान और धार्मिक भावनाएं आहत हुईं। यह शिकायत पातालपुरी पीठाधीश्वर जगद्गुरु बालक देवाचार्य की ओर से साधु-संतों के प्रतिनिधित्व में दी गई थी। इसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया। FIR में राहुल गांधी, पप्पू यादव और अवधेश प्रसाद के नाम शामिल हैं। मामले की जांच अब पुलिस की ओर से की जा रही है। भाजपा ने भी की कार्रवाई की मांग स्किट को लेकर भाजपा नेताओं ने भी विरोध जताया है। भाजपा सांसद बांसुरी स्वराज समेत पार्टी नेताओं ने दिल्ली में पुलिस से शिकायत कर कार्रवाई की मांग की। भाजपा ने प्रदर्शन को धार्मिक आस्था और संसद की गरिमा से जोड़ते हुए विपक्ष पर निशाना साधा। वहीं विपक्षी पक्ष की ओर से इस प्रदर्शन को राम मंदिर चंदे से जुड़े कथित अनियमितताओं के खिलाफ राजनीतिक विरोध के तौर पर पेश किया गया है। इस पूरे मामले को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। FIR के बाद बढ़ा राजनीतिक विवाद वाराणसी में FIR दर्ज होने के बाद यह मामला संसद के भीतर हुए विरोध प्रदर्शन से आगे बढ़कर राजनीतिक और कानूनी विवाद में बदल गया है। अब पुलिस जांच में यह स्पष्ट किया जाएगा कि प्रदर्शन के दौरान लगाए गए आरोप और प्रस्तुति से जुड़े घटनाक्रम में किन लोगों की भूमिका थी और किन कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई आगे बढ़ेगी।
52 एकड़ में फैलेगा प्रोजेक्ट, भारतीय संस्कृति और रामायण से जुड़ी जानकारी का होगा केंद्र अयोध्या, एजेंसियां। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट और अयोध्या विकास से जुड़ी योजनाओं के तहत राम मंदिर परिसर क्षेत्र में एक भव्य टेंपल म्यूजियम बनाने की योजना को आगे बढ़ाया गया है। इस प्रोजेक्ट पर करीब 750 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। म्यूजियम में भगवान श्रीराम के जीवन, रामायण, भारतीय संस्कृति और धार्मिक विरासत से जुड़ी जानकारियां आधुनिक तकनीक के माध्यम से प्रदर्शित की जाएंगी। 52 एकड़ जमीन पर बनेगा आधुनिक म्यूजियम रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित टेंपल म्यूजियम लगभग 52 एकड़ क्षेत्र में विकसित किया जाएगा। इसके लिए जमीन को लंबी अवधि की लीज पर लेने की प्रक्रिया पूरी की गई है। म्यूजियम को इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक भारतीय संस्कृति और रामायण के विभिन्न पहलुओं को समझ सकें। दान और प्रशासन व्यवस्था को मजबूत करने पर भी जोर राम मंदिर ट्रस्ट की बैठकों में मंदिर की प्रशासनिक व्यवस्था, सुरक्षा, चढ़ावे की निगरानी और भविष्य की योजनाओं को लेकर भी चर्चा हुई है। ट्रस्ट मंदिर प्रबंधन को और अधिक पारदर्शी व व्यवस्थित बनाने की दिशा में काम कर रहा है। अयोध्या को धार्मिक पर्यटन का बड़ा केंद्र बनाने की तैयारी राम मंदिर निर्माण के बाद अयोध्या में श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। टेंपल म्यूजियम जैसी योजनाओं का उद्देश्य अयोध्या को विश्वस्तरीय धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करना है।
लखनऊ, एजेंसियां। अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी मामले की जांच तेज हो गई है और अब इस हाई-प्रोफाइल प्रकरण में राम मंदिर ट्रस्ट के पूर्व सदस्य डॉ. अनिल मिश्रा की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई है। पुलिस ने मामले में गिरफ्तार सभी आठ आरोपियों से पूछताछ पूरी कर ली है। उनके बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि चोरी की घटनाओं में प्रशासनिक लापरवाही या अन्य स्तर पर किसी की जिम्मेदारी बनती है या नहीं। सूत्रों के अनुसार, विवेचना पूरी होने के बाद डॉ. अनिल मिश्रा के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किए जाने की संभावना जताई जा रही है। जांच के दौरान जांच के दौरान सामने आया कि डॉ. अनिल मिश्रा के पास मंदिर के गणना कक्ष की जिम्मेदारी थी। आरोप है कि शिकायतें मिलने के बावजूद समय पर आवश्यक कार्रवाई नहीं की गई, जिससे चोरी की घटनाओं को रोकने में विफलता रही। जांच एजेंसियां इस पहलू की भी पड़ताल कर रही हैं कि सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था में कहीं कोई गंभीर चूक तो नहीं हुई। इस मामले में पहले ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय का एक पत्र भी चर्चा में आया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि चढ़ावे की गणना के लिए तैयार स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) में बिना अनुमति बदलाव किया गया और आवश्यक हस्ताक्षर प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी। पुलिस पूछताछ में क्या निकला ? पुलिस पूछताछ में छह आरोपियों ने कथित तौर पर चढ़ावा चोरी में अपनी संलिप्तता स्वीकार की है, जबकि दो आरोपी स्वयं को निर्दोष बता रहे हैं। जांच के दौरान कुछ सोना-चांदी और नकदी भी बरामद किए जाने की जानकारी सामने आई है। साथ ही, मुख्य आरोपी बताए जा रहे राम शंकर यादव उर्फ टिन्नू की संपत्तियों और उसके प्रभाव क्षेत्र की भी जांच की जा रही है। जांच एजेंसियों का मानना है कि यदि सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी प्रणाली अधिक प्रभावी होती, तो इस तरह की घटनाओं को रोका जा सकता था। मामले में एसआईटी अपनी रिपोर्ट संबंधित न्यायिक प्रक्रिया के तहत प्रस्तुत कर चुकी है और आगे की कार्रवाई जांच के निष्कर्षों तथा अदालत की प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
मुंबई, एजेंसियां। सप्ताह के पहले कारोबारी दिन भारतीय शेयर बाजार में गिरावट दर्ज की गई। सोमवार को बीएसई सेंसेक्स 443 अंक फिसलकर 77,709 के स्तर पर बंद हुआ, जबकि एनएसई निफ्टी 96 अंक टूटकर 24,239 पर आ गया। पूरे दिन के कारोबार में निवेशकों ने खासकर प्राइवेट बैंक, ऑटोमोबाइल और आईटी शेयरों में बिकवाली की, जबकि सरकारी बैंक और फार्मा सेक्टर के शेयरों में सीमित खरीदारी देखने को मिली। बाजार पर सबसे अधिक दबाव निजी बैंकिंग शेयरों से आया। पहली तिमाही (Q1) के वित्तीय नतीजों के बाद HDFC बैंक, एक्सिस बैंक और कोटक महिंद्रा बैंक जैसे प्रमुख शेयरों में कमजोरी रही। इसके साथ ही ऑटो और आईटी सेक्टर में भी मुनाफावसूली देखने को मिली, जिससे प्रमुख सूचकांक लाल निशान में बंद हुए। वैश्विक बाजारों के कमजोर संकेतों का भी घरेलू बाजार पर असर पड़ा। एशियाई बाजारों में जापान का निक्केई और दक्षिण कोरिया का कोस्पी भारी गिरावट के साथ बंद हुए, जबकि हांगकांग के हैंगसेंग में तेजी दर्ज की गई। वहीं, पिछले कारोबारी सत्र में अमेरिकी बाजारों में भी गिरावट रही, जिससे निवेशकों का भरोसा प्रभावित हुआ। विशेषज्ञों के अनुसार विशेषज्ञों के अनुसार, बाजार में गिरावट के पीछे कई प्रमुख कारण रहे। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव, ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचना, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की लगातार बिकवाली और अमेरिकी 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी ने निवेशकों की चिंता बढ़ाई। इन परिस्थितियों में निवेशकों ने जोखिम वाले निवेश से दूरी बनानी शुरू कर दी। गौरतलब है कि इससे पहले शुक्रवार को बाजार में जोरदार तेजी देखने को मिली थी। उस दिन सेंसेक्स 964 अंक चढ़कर 78,151 पर और निफ्टी 261 अंक की बढ़त के साथ 24,334 पर बंद हुआ था। हालांकि, सोमवार को वैश्विक और घरेलू कारकों के दबाव ने बाजार की दिशा बदल दी। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में वैश्विक आर्थिक घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर निवेशकों की नजर बनी रहेगी।
लखनऊ, एजेंसियां। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच कांग्रेस ने अपनी चुनावी रणनीति को लेकर बड़ा संकेत दिया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने स्पष्ट कहा है कि कांग्रेस आगामी यूपी चुनाव में राम मंदिर को चुनावी मुद्दा नहीं बनाएगी। उन्होंने कहा कि राम मंदिर करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा विषय है और इसे राजनीतिक लाभ-हानि के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। विकास और जनसरोकार के मुद्दों पर रहेगा फोकस सलमान खुर्शीद ने कहा कि कांग्रेस का ध्यान रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर रहेगा। उन्होंने कहा कि पार्टी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करती है, लेकिन चुनाव विकास और जनता की वास्तविक समस्याओं के आधार पर लड़ा जाएगा। कांग्रेस का मानना है कि मतदाताओं के सामने रोजमर्रा के मुद्दों को प्रमुखता से रखा जाना चाहिए। राम मंदिर पर सियासत से दूरी का संकेत कांग्रेस नेता ने कहा कि राम मंदिर का मुद्दा अब न्यायिक प्रक्रिया और निर्माण के बाद एक अलग चरण में पहुंच चुका है। ऐसे में इसे चुनावी हथियार बनाने के बजाय जनता के जीवन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए। उनके इस बयान को उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले कांग्रेस की बदली हुई राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
अयोध्या, एजेंसियां। राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के मामले में जांच तेज होने के बीच श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी का एक वीडियो चर्चा में है। एबीपी न्यूज से बातचीत के दौरान जिम्मेदारी से जुड़े सवाल पूछे जाने पर वह नाराज हो गए। इस दौरान उनके समर्थकों और सुरक्षाकर्मियों ने पत्रकार का माइक हटाने और इंटरव्यू रोकने की भी कोशिश की। हालांकि बाद में स्थिति सामान्य होने पर कोषाध्यक्ष ने सवालों का जवाब दिया। जिम्मेदारी स्वीकार की, लेकिन गिनती से किया किनारा संवाददाता ने जब गोविंद देव गिरी से पूछा कि बतौर कोषाध्यक्ष क्या इस पूरे मामले में उनकी भी जिम्मेदारी बनती है, तो उन्होंने कहा कि ट्रस्ट के हर सदस्य की जिम्मेदारी होती है और उनकी भी जिम्मेदारी है। हालांकि इस्तीफे के सवाल पर उन्होंने साफ इनकार करते हुए कहा कि उनका दानपात्र (हुंडी) में होने वाली नकदी की गिनती से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि उनकी जिम्मेदारी केवल ट्रस्ट के खातों में आने वाले धन का लेखा-जोखा रखने तक सीमित है। चोरी मामले में अब तक दो इस्तीफे और आठ गिरफ्तारियां राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने के बाद अब तक दो लोगों ने इस्तीफा दिया है, जबकि पुलिस आठ आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है। मामले की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट भी सौंप चुका है और जांच आगे बढ़ रही है। अखिलेश यादव की पोस्ट के बाद सामने आया था मामला यह मामला उस समय सुर्खियों में आया था जब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर चढ़ावा चोरी का मुद्दा उठाया था। शुरुआत में ट्रस्ट ने आरोपों से इनकार किया था, लेकिन बाद में चोरी की पुष्टि होने पर एसआईटी जांच गठित की गई। जांच के दौरान ट्रस्ट के तत्कालीन महासचिव चंपत राय और सदस्य अनिल मिश्रा से भी पूछताछ की गई। फिलहाल पुलिस और एसआईटी पूरे मामले की जांच कर रही है।
अयोध्या, एजेंसियां। राम मंदिर दान में कथित गड़बड़ी के मामले की जांच लगातार तेज हो रही है। अयोध्या पुलिस ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय से लगभग दो घंटे तक पूछताछ की। पुलिस ने दान प्राप्त करने, उसकी गिनती और बैंक में जमा करने की पूरी प्रक्रिया से जुड़े सवाल पूछे गये। जांच एजेंसियां अब ट्रस्ट के अन्य पूर्व पदाधिकारियों से भी पूछताछ की तैयारी कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल सुनवाई से किया इनकार इस मामले में सीबीआई जांच की मांग वाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि इस समय मामले को तत्काल सूचीबद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि याचिका नियमित प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ेगी। सभी आठ आरोपी न्यायिक हिरासत में दान में कथित हेराफेरी के मामले में गिरफ्तार सभी आठ आरोपी न्यायिक हिरासत में हैं। पुलिस वित्तीय लेन-देन, बैंक रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और अन्य दस्तावेजों की जांच कर रही है। साथ ही आरोपियों की आय और संपत्ति का भी मिलान किया जा रहा है। राजनीतिक विवाद भी तेज मामले को लेकर राजनीतिक हलचल भी बढ़ गई है। कांग्रेस का प्रतिनिधिमंडल आज अयोध्या पहुंचने वाला था, लेकिन पार्टी ने आरोप लगाया कि प्रदेश अध्यक्ष अजय राय समेत कई नेताओं को पुलिस ने उनके आवास पर रोक दिया। वहीं प्रशासन ने इसे सुरक्षा कारणों का हवाला दिया है।
अयोध्या, एजेंसियां। राम मंदिर में दान राशि के कथित गबन मामले ने नया मोड़ ले लिया है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने मामले की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। सूत्रों के अनुसार दोनों ने जांच पूरी होने तक ट्रस्ट की निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखने के उद्देश्य से यह फैसला लिया। इस घटनाक्रम के बाद देशभर में इस मामले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। SIT की प्राथमिक रिपोर्ट के बाद दर्ज हुई FIR राम मंदिर दान राशि में कथित अनियमितताओं की जांच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने 14 जून को तीन सदस्यीय विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया था। एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट मिलने के बाद 25 जून की रात भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। एफआईआर में अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, अविनाश शुक्ला, टिन्नू यादव, मनीष यादव सहित आठ लोगों के नाम शामिल हैं। पुलिस ने सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर आगे की जांच शुरू कर दी है। 7 करोड़ रुपये से अधिक के दुरुपयोग का आरोप यह मामला तब सामने आया जब अयोध्या के पूर्व विधायक पवन पांडेय ने आरोप लगाया कि राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाई गई करीब 7 से 7.5 करोड़ रुपये की दान राशि का दुरुपयोग किया गया। आरोप सामने आने के बाद स्वयं ट्रस्ट ने सरकार से निष्पक्ष जांच कराने का अनुरोध किया था, जिसके बाद एसआईटी का गठन किया गया। सरकार और विपक्ष आमने-सामने मामले को लेकर विपक्ष लगातार सरकार पर सवाल उठा रहा है। वहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विपक्ष से इस मुद्दे का राजनीतिक लाभ नहीं उठाने की अपील करते हुए कहा कि दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई होगी। फिलहाल पुलिस और एसआईटी पूरे मामले की विस्तृत जांच में जुटी हैं तथा वित्तीय लेनदेन और संबंधित दस्तावेजों की गहन पड़ताल की जा रही है।
नई दिल्ली: अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए प्राप्त चंदे में कथित अनियमितताओं की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (SIT) को लेकर आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री Arvind Kejriwal ने गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि SIT के पास कोई वास्तविक कानूनी अधिकार नहीं है और इसका गठन कथित रूप से मामले में शामिल लोगों को बचाने के उद्देश्य से किया गया है। केजरीवाल की यह प्रतिक्रिया उस समय आई है जब SIT ने अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार को सौंप दी है। ‘SIT के पास न समन का अधिकार, न गिरफ्तारी का’ मीडिया से बातचीत के दौरान केजरीवाल ने कहा कि यदि मामले में अब तक कोई प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं हुई है, तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि SIT का गठन किस कानूनी प्रावधान के तहत किया गया है। उन्होंने कहा, “SIT किसी को समन नहीं भेज सकती, किसी की गिरफ्तारी नहीं कर सकती और न ही छापेमारी कर सकती है। ऐसे में यह जांच समिति आखिर किस अधिकार के तहत काम कर रही है?” AAP प्रमुख ने आरोप लगाया कि जांच का इस्तेमाल वास्तविक मुद्दे से ध्यान हटाने और कथित दोषियों के खिलाफ कार्रवाई को टालने के लिए किया जा रहा है। 2021 की जांच का दिया हवाला केजरीवाल ने वर्ष 2021 में अयोध्या भूमि खरीद मामले को याद करते हुए कहा कि उस समय भी इसी तरह की जांच समिति बनाई गई थी, लेकिन उसका कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया। उन्होंने कहा, “तब भी SIT बनाई गई थी, लेकिन न कोई FIR दर्ज हुई और न ही किसी जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई हुई। आज उस जांच का कोई उल्लेख तक नहीं करता। मुझे आशंका है कि वर्तमान SIT का भी वही हश्र होगा।” ‘छोटे अधिकारियों पर फोकस, बड़े नामों को बचाया जा रहा’ AAP नेता ने दावा किया कि मौजूदा जांच का फोकस निचले स्तर के अधिकारियों तक सीमित दिखाई देता है, जबकि निर्णय लेने वाले प्रभावशाली लोगों तक जांच पहुंचती नजर नहीं आ रही। उन्होंने कहा कि यदि सरकार वास्तव में सच सामने लाना चाहती है, तो जांच को उन लोगों तक पहुंचना चाहिए जिन्होंने कथित तौर पर बड़े फैसले लिए और पूरे मामले को प्रभावित किया। CBI और ED जांच की मांग केजरीवाल ने यह भी सवाल उठाया कि यदि सरकार निष्पक्ष जांच चाहती है, तो मामला केंद्रीय एजेंसियों को क्यों नहीं सौंपा गया। उन्होंने कहा, “अगर सच्चाई सामने लाने की मंशा है, तो जांच Central Bureau of Investigation (CBI) या Enforcement Directorate (ED) जैसी एजेंसियों को सौंपी जानी चाहिए। अब तक FIR दर्ज न होना भी कई सवाल खड़े करता है।” श्रद्धालुओं के सवालों का जवाब जरूरी केजरीवाल ने कहा कि राम मंदिर से करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी हुई है और ऐसे में चंदे से जुड़े आरोपों की पारदर्शी जांच होना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म के अनुयायी और मंदिर निर्माण में योगदान देने वाले श्रद्धालु यह जानना चाहते हैं कि उनके द्वारा दिए गए धन का उपयोग किस प्रकार किया गया और आरोपों की सच्चाई क्या है। क्या है मामला? राम मंदिर निर्माण के लिए जुटाए गए चंदे और उससे जुड़े वित्तीय लेन-देन को लेकर हाल के दिनों में कई सवाल उठे हैं। इन्हीं आरोपों की जांच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने SIT का गठन किया है। हालांकि, जांच अभी शुरुआती चरण में है और सरकार की ओर से इस संबंध में विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है। फिलहाल, SIT की वैधता और जांच की दिशा को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है, जबकि विपक्ष पारदर्शी और स्वतंत्र जांच की मांग कर रहा है।
प्रयागराज/अयोध्या: अयोध्या के राम मंदिर में दान पेटी से कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट में दायर जनहित याचिका (PIL) के जरिए पूरे प्रकरण की केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच और राम मंदिर ट्रस्ट के वित्तीय लेन-देन का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) से ऑडिट कराने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता और अधिवक्ता मोहित अशोक ने सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) की निष्पक्षता और कानूनी वैधता पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि इतने संवेदनशील और गंभीर मामले में SIT जांच के नाम पर केवल "लीपापोती" की जा रही है। विजिलेंस विभाग को सौंपा गया था ज्ञापन एएनआई के अनुसार, अधिवक्ता मोहित अशोक ने बताया कि उन्होंने 8 जून को उत्तर प्रदेश विजिलेंस विभाग के प्रधान सचिव को ज्ञापन सौंपकर राम मंदिर ट्रस्ट और दान पेटी में कथित चोरी की CBI जांच कराने की मांग की थी। उन्होंने कहा कि इसके बाद 9 जून को राम मंदिर ट्रस्ट के वरिष्ठ सदस्य नृपेंद्र मिश्र की अध्यक्षता में बैठक हुई। इस दौरान यह जानकारी सामने आई कि मामले की जांच के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की अध्यक्षता में एक जांच समिति गठित की जा सकती है। इसी बीच उन्होंने 12 जून को इलाहाबाद हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर दी। SIT जांच की वैधता पर सवाल मोहित अशोक ने आरोप लगाया कि याचिका दाखिल होने के बाद राम मंदिर ट्रस्ट ने जल्दबाजी में राज्य सरकार से संपर्क कर SIT जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि SIT के गठन का कोई स्पष्ट कानूनी आधार नहीं है। उनके अनुसार, आम नागरिकों के लिए यह भी स्पष्ट नहीं है कि यदि उनके पास कोई दस्तावेजी साक्ष्य हैं, तो उन्हें SIT के समक्ष कैसे प्रस्तुत किया जाए। उन्होंने कहा, "SIT के गठन, उसकी कार्यप्रणाली और जवाबदेही को लेकर कई गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।" जांच रिपोर्ट में देरी पर उठे सवाल याचिकाकर्ता ने दावा किया कि SIT की रिपोर्ट सात दिनों के भीतर आने की बात कही गई थी, लेकिन तय समय बीत जाने के बावजूद अब तक कोई अंतिम रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है। इससे जांच की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। CBI जांच और CAG ऑडिट की मांग इलाहाबाद हाई कोर्ट में दायर याचिका में मांग की गई है कि: राम मंदिर ट्रस्ट के गठन से अब तक हुए सभी वित्तीय लेन-देन का CAG द्वारा विशेष ऑडिट कराया जाए। दान पेटी में कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं की CBI जांच कराई जाए। जांच रिपोर्ट सार्वजनिक कर पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए। बढ़ सकता है राजनीतिक और कानूनी विवाद राम मंदिर देश की आस्था और करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं से जुड़ा मुद्दा है। ऐसे में दान राशि और वित्तीय प्रबंधन को लेकर उठे सवालों ने मामले को राजनीतिक और कानूनी रूप से और संवेदनशील बना दिया है। अब सभी की नजर इलाहाबाद हाई कोर्ट की आगामी सुनवाई और राज्य सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई है।
अयोध्या, एजेंसियां। राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी को लेकर चल रहे विवाद के बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहली बार सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी है। शुक्रवार को अयोध्या दौरे के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि मामले की निष्पक्ष जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि जांच पूरी पारदर्शिता के साथ होगी और सच सामने लाया जाएगा। "दूध का दूध, पानी का पानी करेगी SIT" जनसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि राम मंदिर ट्रस्ट के अनुरोध पर राज्य सरकार ने एसआईटी का गठन किया है। उन्होंने कहा कि जांच एजेंसी तथ्यों के आधार पर काम करेगी और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होगी। योगी ने कहा, "SIT दूध का दूध और पानी का पानी करेगी।" श्रद्धालुओं की भावनाओं का रखें सम्मान मुख्यमंत्री ने सभी राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और संबंधित पक्षों से अपील की कि वे मामले पर बिना तथ्य के बयानबाजी न करें। उन्होंने कहा कि राम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, इसलिए ऐसी कोई टिप्पणी नहीं होनी चाहिए जिससे भक्तों की धार्मिक भावनाएं आहत हों। विपक्ष पर साधा निशाना अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने समाजवादी पार्टी पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि जो लोग आज रामभक्तों की चिंता करने का दावा कर रहे हैं, वही अतीत में कारसेवकों पर गोली चलाने के लिए जिम्मेदार थे। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली सरकारों में विकास कार्यों की अनदेखी हुई, जबकि वर्तमान सरकार धार्मिक स्थलों के विकास, गरीबों के कल्याण और महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए लगातार काम कर रही है। वीरांगनाओं के सम्मान का भी किया उल्लेख योगी आदित्यनाथ ने स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगनाओं झलकारी बाई, अवंतीबाई और ऊदा देवी पासी का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी स्मृति में विशेष पहल की गई है। उन्होंने बताया कि इन वीरांगनाओं के नाम पर पीएसी की तीन महिला बटालियन बनाई गई हैं, जिनमें केवल महिला अभ्यर्थियों की भर्ती की जाती है। मुख्यमंत्री ने दोहराया कि राम मंदिर से जुड़े विवाद की जांच निष्पक्ष होगी और सरकार पारदर्शिता के साथ न्याय सुनिश्चित करेगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।