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मेडिकल जांच के बाद इमरान खान अदियाला जेल लौटे

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इमरान खान को निजी अस्पताल ले जाया गया, मेडिकल जांच के बाद जेल लौटे

ranjan kumar tiwari अगस्त 21, 2026 0
इमरान खान को मेडिकल जांच के लिए निजी अस्पताल ले जाने की तस्वीर
इमरान खान की मेडिकल जांच के बाद अदियाला जेल वापसी

इस्लामाबाद, एजेंसियां। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 21 अगस्त 2026 को अदियाला जेल से इस्लामाबाद के शिफा इंटरनेशनल अस्पताल ले जाया गया। अदालत ने उनकी बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए विशेषज्ञों के मेडिकल बोर्ड से जांच और उपचार कराने का निर्देश दिया था।

 

आंखों की समस्या को लेकर जताई गई थी चिंता

 

इमरान खान के परिवार और उनकी पार्टी PTI की ओर से लंबे समय से उनकी स्वास्थ्य स्थिति को लेकर चिंता जताई जा रही थी। खास तौर पर उनकी दाहिनी आंख की रोशनी में गंभीर कमी की बात सामने आई थी। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जांच के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों के साथ उनके निजी चिकित्सक को भी मेडिकल बोर्ड में शामिल करने का निर्देश दिया।

 

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पुनर्विचार मांगा

 

इमरान को निजी अस्पताल भेजने के फैसले के बाद पाकिस्तान सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी। सरकार ने अदालत के आदेश को लेकर आपत्ति जताते हुए इसे वापस लेने या संशोधित करने की मांग की थी।

 

मेडिकल जांच के बाद वापस अदियाला जेल पहुंचे

 

ताजा अपडेट के मुताबिक, इमरान खान को शिफा इंटरनेशनल अस्पताल में मेडिकल जांच के बाद शुक्रवार को वापस अदियाला जेल भेज दिया गया। डॉक्टरों ने जांच के बाद उन्हें जेल में रखना सुरक्षित बताया। यानी उनका अस्पताल में रहना स्थायी इलाज के लिए नहीं, बल्कि अदालत के निर्देश पर मेडिकल जांच और मूल्यांकन के लिए था।

 

परिवार से मुलाकात और संपर्क की भी अनुमति

 

सुप्रीम कोर्ट ने इमरान खान के परिवार को उनसे नियमित रूप से मिलने की सुविधा देने और उनके बेटों से फोन पर संपर्क की व्यवस्था करने के भी निर्देश दिए हैं। अदालत का हस्तक्षेप उनकी स्वास्थ्य स्थिति और जेल में चिकित्सा सुविधाओं को लेकर चल रहे विवाद के बीच आया।

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हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर बांग्लादेश के निर्वाचित राष्ट्रपति
मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर बने बांग्लादेश के 23वें राष्ट्रपति, 255 वोटों से दर्ज की जीत

ढाका, एजेंसियां। बांग्लादेश में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के वरिष्ठ नेता मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर को देश का 23वां राष्ट्रपति चुना गया है। 20 अगस्त 2026 को संसद में हुए राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने 255 वोट हासिल किए, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी और विपक्षी उम्मीदवार कर्नल (रिटायर्ड) ओली अहमद को 88 वोट मिले। चुनाव आयोग ने परिणाम की आधिकारिक घोषणा कर दी है।   35 साल बाद हुआ मुकाबले वाला राष्ट्रपति चुनाव     बांग्लादेश में आमतौर पर राष्ट्रपति का चुनाव सर्वसम्मति या निर्विरोध तरीके से होता रहा है। लेकिन इस बार 35 साल बाद पहली बार मुकाबले वाला राष्ट्रपति चुनाव हुआ। संसद के 349 पात्र सदस्यों में से 343 ने मतदान किया।     ओली अहमद को 88 वोट मिले     मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर का मुकाबला लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता ओली अहमद से था, जिन्हें जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलों के विपक्षी गठबंधन ने उम्मीदवार बनाया था। आलमगीर ने 167 वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की।     21 अगस्त को लेंगे राष्ट्रपति पद की शपथ     चुनाव आयोग ने आधिकारिक गजट जारी कर मिर्जा फखरुल को निर्वाचित राष्ट्रपति घोषित कर दिया है। उनका शपथ ग्रहण 21 अगस्त की शाम बंगभवन के दरबार हॉल में होने की संभावना है। प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने भी उन्हें जीत पर बधाई दी है।     BNP के वरिष्ठ नेता से देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक     78 वर्षीय मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर लंबे समय से BNP के प्रमुख नेताओं में शामिल रहे हैं और 2016 से पार्टी के महासचिव थे। राष्ट्रपति बनने के बाद वह देश के संवैधानिक प्रमुख और सशस्त्र बलों के कमांडर-इन-चीफ की भूमिका संभालेंगे।  

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अमेरिका की ईरान पर कड़े प्रतिबंधों की चेतावनी और चीन से सहयोग की अपील
अमेरिका ने ईरान पर ‘अब तक के सबसे कड़े प्रतिबंध’ लगाने की चेतावनी दी, चीन से सहयोग की अपील

वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक दबाव और बढ़ाने की तैयारी कर ली है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि वॉशिंगटन ईरान के खिलाफ “इतिहास के सबसे कड़े प्रतिबंध” लागू करेगा। यह बयान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के अभियान की घोषणा के एक दिन बाद आया है।   चीन से भी सहयोग करने की अपील   अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों के साथ-साथ चीन से भी ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने में सहयोग करने की अपील की है। चीन ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, इसलिए अमेरिकी रणनीति में बीजिंग की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।   ईरान की अर्थव्यवस्था पर बढ़ेगा दबाव   बेसेंट के अनुसार नए प्रतिबंधों का उद्देश्य ईरान की आय के प्रमुख स्रोतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नेटवर्क पर दबाव बढ़ाना है। अमेरिका का मानना है कि मजबूत आर्थिक दबाव से ईरान पर सैन्य कार्रवाई के बजाय बातचीत की दिशा में आगे बढ़ने का दबाव बनाया जा सकता है। नए प्रतिबंधों का विस्तृत खाका अगले सप्ताह सामने आने की उम्मीद है।   चीन ने अमेरिकी दबाव को किया खारिज   अमेरिका की अपील पर चीन ने फिलहाल सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी है। बीजिंग ने अमेरिकी ‘आर्थिक युद्ध’ की आलोचना करते हुए कहा है कि अतिरिक्त प्रतिबंध मौजूदा विवाद का समाधान नहीं करेंगे और कूटनीतिक रास्ते को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।   होरमुज जलडमरूमध्य भी बना बड़ा मुद्दा   अमेरिका की रणनीति में होरमुज जलडमरूमध्य भी महत्वपूर्ण है। यह वैश्विक तेल आपूर्ति का प्रमुख समुद्री मार्ग है। वॉशिंगटन चाहता है कि चीन समेत अन्य देश ईरान पर दबाव डालें और इस मार्ग से अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही सामान्य कराने में सहयोग करें।

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