मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच Iran ने साफ कर दिया है कि वह United States के साथ बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन किसी भी तरह के दबाव को बर्दाश्त नहीं करेगा।
Islamabad में हुई ईरान-अमेरिका शांति वार्ता भले ही बेनतीजा रही, लेकिन संवाद की संभावनाएं खत्म नहीं हुई हैं।
भारत में ईरान के राजदूत Mohammad Fattahali ने कहा:
ईरान ने अमेरिका की इन शर्तों को मानने से इनकार किया:
तेहरान का कहना है कि ये मांगें उसकी राष्ट्रीय संप्रभुता के खिलाफ हैं।
फताअली ने संकेत दिया कि:
वहीं, अमेरिकी उपराष्ट्रपति J. D. Vance ने पहले कहा था कि वाशिंगटन को ईरान से यह गारंटी चाहिए कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा।
ईरान ने एक बार फिर Strait of Hormuz पर अपना दावा दोहराया।
राजदूत के मुताबिक:
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की नाकेबंदी वाली चेतावनी पर ईरान ने कड़ा जवाब दिया।
फताअली ने कहा:
वहीं, रिवोल्यूशनरी गार्ड के पूर्व कमांडर Mohsen Rezaei ने कहा कि:
United States Central Command (CENTCOM) ने पहले ही साफ किया है:
ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम लंबे समय से अमेरिका और Israel के साथ तनाव की जड़ रहा है।
ईरान के इस रुख से साफ है कि:
अब दुनिया की नजर इस बात पर है कि क्या दोनों देश बातचीत से समाधान निकालेंगे या तनाव और बढ़ेगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
US Asylum Rule: अमेरिका ने शरण (Asylum) मांगने वाले प्रवासियों के लिए नई व्यवस्था लागू कर दी है। मंगलवार से प्रभावी हुए इस नियम के तहत, कुछ मामलों में अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा (USCIS) शरण मांगने वालों का इंटरव्यू लिए बिना ही उनके आवेदन सीधे इमिग्रेशन कोर्ट भेज सकेगी। अमेरिकी सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य लंबित मामलों का तेजी से निपटारा करना, शरण प्रणाली के दुरुपयोग को रोकना और वास्तविक जरूरतमंद लोगों को जल्द न्याय दिलाना है। फिलहाल USCIS के पास करीब 14 लाख (1.4 मिलियन) शरण आवेदन लंबित हैं। सरकार का मानना है कि नई प्रक्रिया लागू होने से इन मामलों के निपटारे की रफ्तार तेज होगी और आव्रजन व्यवस्था अधिक प्रभावी बन सकेगी। क्या है नया नियम? अब तक अमेरिका में रह रहे वे लोग, जिनके खिलाफ निष्कासन (Removal) की कार्रवाई नहीं चल रही होती थी और जो अफर्मेटिव असाइलम (Affirmative Asylum) के लिए आवेदन करते थे, उनका पहले USCIS अधिकारी इंटरव्यू लेते थे। यदि आवेदन खारिज हो जाता था, तब मामला इमिग्रेशन कोर्ट में जाता था, जहां दोबारा पूरी सुनवाई होती थी। नए नियम के तहत USCIS कुछ मामलों में इंटरव्यू किए बिना ही आवेदन सीधे इमिग्रेशन जज के पास भेज सकेगी। इससे एक अतिरिक्त प्रक्रिया खत्म होगी और मामलों के निपटारे में लगने वाला समय कम होने की उम्मीद है। किन लोगों पर पड़ेगा असर? यह बदलाव केवल अफर्मेटिव असाइलम के मामलों पर लागू होगा। जिन लोगों के खिलाफ पहले से निष्कासन की कार्रवाई चल रही है और जो अदालत में डिफेंसिव असाइलम (Defensive Asylum) का दावा करते हैं, उनकी प्रक्रिया में कोई बदलाव नहीं किया गया है। सरकार ने बदलाव की क्या वजह बताई? USCIS के निदेशक जोसेफ एडलो ने कहा कि अमेरिका की शरण प्रणाली उन लोगों की सुरक्षा के लिए बनाई गई है, जिन्हें अपने देश में उत्पीड़न या जान का खतरा है। उनके मुताबिक, नया नियम यह सुनिश्चित करेगा कि सरकारी संसाधनों का उपयोग वास्तविक शरणार्थियों के मामलों के निपटारे में हो, न कि उन लोगों के लिए जो व्यवस्था का गलत फायदा उठाकर प्रक्रिया को लंबा खींचने की कोशिश करते हैं। वहीं, अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) के जनरल काउंसल जेम्स पर्सिवल ने कहा कि लंबे समय से कुछ लोग शरण व्यवस्था का इस्तेमाल केवल अमेरिका में रहने का समय बढ़ाने और वर्क परमिट हासिल करने के लिए कर रहे थे। उनका कहना है कि मामलों में जानबूझकर देरी करना प्रभावी आव्रजन व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। हर साल 1.32 लाख से ज्यादा मामलों पर पड़ेगा असर गृह सुरक्षा विभाग के अनुमान के अनुसार, नए नियम के लागू होने के बाद हर साल लगभग 1.32 लाख से अधिक शरण आवेदन सीधे USCIS से इमिग्रेशन कोर्ट भेजे जा सकते हैं। यह संख्या USCIS के लंबित मामलों का लगभग 31 प्रतिशत है। सरकार का कहना है कि इस बदलाव से न केवल लंबित मामलों का बोझ कम होगा, बल्कि वास्तविक शरणार्थियों के मामलों पर अधिक तेजी से फैसला लिया जा सकेगा। हालांकि, मानवाधिकार संगठनों और आव्रजन विशेषज्ञों का मानना है कि बिना इंटरव्यू आवेदन सीधे अदालत भेजने की व्यवस्था से कुछ आवेदकों के लिए अपनी बात रखने का शुरुआती अवसर सीमित हो सकता है। ऐसे में इस नए नियम के प्रभाव पर आने वाले समय में करीबी नजर रहेगी।
Houthis Attack Saudi Arabia: अमेरिका और ईरान के बीच सीधे सैन्य हमलों में फिलहाल कमी आई है, लेकिन पश्चिम एशिया में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सोमवार को यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के कई तेल ठिकानों पर ड्रोन हमला किया, जिससे क्षेत्र की सुरक्षा और वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर नई चिंताएं बढ़ गई हैं। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, हूती संगठन के सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी ने दावा किया कि यह हमला सऊदी अरब द्वारा यमन के हवाई क्षेत्र में ड्रोन भेजे जाने के जवाब में किया गया। उन्होंने कहा कि हमले का निशाना पूर्वी सऊदी अरब से लाल सागर के यनबू बंदरगाह तक कच्चा तेल पहुंचाने वाला महत्वपूर्ण पाइपलाइन नेटवर्क था। तेल सप्लाई पर बढ़ा खतरा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ते तनाव के कारण हाल के महीनों में सऊदी अरब इस पाइपलाइन के जरिए तेल निर्यात पर अधिक निर्भर हो गया है। ऐसे में इस नेटवर्क पर हमला वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस तरह के हमले जारी रहे तो अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। बाजार को राहत, लेकिन खतरा बरकरार अमेरिका और ईरान के बीच तनाव में अस्थायी कमी के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कुछ राहत देखने को मिली है। ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 6 प्रतिशत गिरकर 91 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई, जबकि शेयर बाजारों में भी निवेशकों का भरोसा लौटा है। हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि यदि हूती हमले तेज होते हैं या क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में फिर उछाल आ सकता है। अमेरिका-ईरान के बीच बातचीत की कोशिश इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच लगातार तीसरे दिन भी कोई सीधा सैन्य हमला नहीं हुआ। कतर, ओमान और पाकिस्तान दोनों देशों के बीच मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं ताकि वार्ता दोबारा शुरू हो सके। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिलहाल कूटनीतिक प्रयासों को मौका देने का फैसला किया है, जबकि ईरान ने भी अपने हमले रोकने की पुष्टि की है। समुद्री मार्गों पर बना हुआ है खतरा हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कुछ कम हुआ है, लेकिन क्षेत्र के अहम समुद्री मार्ग अब भी जोखिम में हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंदेब जैसे रणनीतिक समुद्री रास्तों पर जहाजों की आवाजाही पर लगातार नजर रखी जा रही है। हूती विद्रोही पहले भी लाल सागर में व्यापारिक जहाजों और सऊदी तेल टैंकरों को निशाना बनाने की धमकी दे चुके हैं, जिससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बना हुआ है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मंगलवार को व्हाइट हाउस में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से अलग-अलग मुलाकात करेंगे। इन बैठकों में यूक्रेन युद्ध, ईरान, मध्य पूर्व की सुरक्षा, लेबनान की स्थिति और क्षेत्रीय शांति प्रयासों पर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है। नेतन्याहू के साथ ईरान और अब्राहम समझौते पर फोकस व्हाइट हाउस में ट्रंप और नेतन्याहू की बैठक का मुख्य एजेंडा ईरान से जुड़े सुरक्षा हालात, लेबनान के साथ चल रही वार्ताएं और अब्राहम समझौतों (Abraham Accords) को आगे बढ़ाना होगा। वॉशिंगटन रवाना होने से पहले नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल की सुरक्षा मजबूत करना और क्षेत्र में शांति का विस्तार उनकी यात्रा की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में दोनों नेताओं की यह आठवीं आमने-सामने की मुलाकात होगी। जेलेंस्की से यूक्रेन युद्ध खत्म करने पर चर्चा ट्रंप की दूसरी महत्वपूर्ण बैठक यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के साथ होगी। व्हाइट हाउस के अधिकारियों के अनुसार, दोनों नेता रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के संभावित समाधान और शांति प्रक्रिया पर चर्चा करेंगे। ट्रंप पहले भी युद्ध जल्द खत्म कराने की इच्छा जता चुके हैं। रूस और ईरान को लेकर भी होगी बातचीत हाल ही में जेलेंस्की ने आरोप लगाया था कि रूस, ईरान को अमेरिकी सैन्य ठिकानों से जुड़ी खुफिया जानकारी उपलब्ध करा रहा है। हालांकि ट्रंप ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि यदि ऐसी कोई जानकारी सामने आती है तो वह इस विषय पर सीधे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बात करेंगे। ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका की कार्रवाई के बाद ईरान पहले की तुलना में कमजोर स्थिति में है। उत्तर कोरिया की भूमिका पर भी नजर जेलेंस्की ने यह भी दावा किया है कि रूस, उत्तर कोरिया के करीब 30 हजार सैनिकों का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रहा है। माना जा रहा है कि इस मुद्दे पर भी दोनों नेताओं के बीच चर्चा हो सकती है। लिंडसे ग्राहम के अंतिम संस्कार में भी हो सकते हैं शामिल बैठकों के बाद ट्रंप, जेलेंस्की और नेतन्याहू अमेरिका के दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम के अंतिम संस्कार में भी शामिल हो सकते हैं। यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच इन बैठकों को अमेरिकी विदेश नीति और वैश्विक कूटनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।