मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच Strait of Hormuz एक बार फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है। अमेरिका द्वारा ईरान से जुड़े बंदरगाहों पर नाकेबंदी की घोषणा के बाद दुनिया भर के तेल बाजार में अनिश्चितता गहरा गई है। यह जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल और गैस का लगभग 20% परिवहन होता है।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती बयानबाजी और सैन्य चेतावनियों ने इस क्षेत्र को बेहद संवेदनशील बना दिया है। United States Central Command ने स्पष्ट किया है कि यह नाकेबंदी ईरानी बंदरगाहों में आने-जाने वाले जहाजों पर लागू होगी, हालांकि “न्यूट्रल ट्रांजिट” को रोका नहीं जाएगा।
सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला, जबकि मंगलवार को हल्की गिरावट दर्ज की गई। भारतीय समयानुसार सुबह करीब 8:30 बजे ब्रेंट क्रूड 1.24% गिरकर 98.13 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह नाकेबंदी पूरी तरह लागू होती है, तो तेल कीमतें 100 डॉलर के पार स्थिर हो सकती हैं, जिससे वैश्विक महंगाई पर दबाव बढ़ेगा।
अमेरिकी कदम के जवाब में Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) ने सख्त रुख अपनाते हुए चेतावनी दी है कि जलडमरूमध्य के पास आने वाले किसी भी विदेशी सैन्य जहाज को युद्धविराम का उल्लंघन माना जाएगा।
ईरान ने साफ किया है कि जरूरत पड़ने पर वह निर्णायक सैन्य कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगा।
तनाव के कारण होर्मुज मार्ग पर शिपिंग ट्रैफिक में भारी गिरावट दर्ज की गई है:
टैंकर कंपनियां जोखिम से बचने के लिए वैकल्पिक मार्ग तलाश रही हैं, जिससे सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ रहा है।
ईरान के तेल निर्यात पर असर पड़ना तय माना जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार:
साथ ही, लगभग 18 करोड़ बैरल तेल पहले से समुद्र में स्टोरेज के रूप में मौजूद है, जो आपूर्ति संकट को कुछ समय तक संभाल सकता है, लेकिन स्थिति लंबी खिंचने पर जोखिम बढ़ जाएगा।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर काफी निर्भर है। ऐसे में होर्मुज में किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर देश पर पड़ सकता है:
हालांकि हाल ही में अमेरिकी प्रतिबंधों में कुछ ढील के बाद भारत को ईरानी तेल आयात का मौका मिला था, लेकिन मौजूदा संकट इस सप्लाई को फिर से प्रभावित कर सकता है।
होर्मुज से गुजरने वाला अधिकांश तेल एशियाई देशों–खासकर चीन और भारत–को जाता है। ऐसे में यह संकट एशिया की अर्थव्यवस्थाओं पर सबसे ज्यादा असर डाल सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ हुई बैठक में ईरान के परमाणु और सैन्य कार्यक्रम से जुड़ी नई खुफिया जानकारी साझा की। रिपोर्टों के मुताबिक, इजरायल का दावा है कि ईरान अपनी सैन्य और परमाणु क्षमताओं को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, जिसके चलते नेतन्याहू ने ट्रंप के सामने कड़ा रुख अपनाने और जरूरत पड़ने पर सैन्य कार्रवाई का विकल्प खुला रखने की बात रखी। ईरान की गतिविधियों पर बढ़ी चिंता बैठक के दौरान नेतन्याहू ने कथित तौर पर ऐसी खुफिया जानकारी पेश की, जिसमें ईरान की मिसाइल और परमाणु गतिविधियों को लेकर नई आशंकाएं जताई गई हैं। इजरायल का मानना है कि यदि इन गतिविधियों पर समय रहते रोक नहीं लगी, तो क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से संकेत दिया कि वे किसी भी बड़े फैसले से पहले सभी उपलब्ध सूचनाओं की समीक्षा करना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की संवेदनशील जानकारी पहले सीधे उन्हें दी जानी चाहिए थी। सैन्य कार्रवाई और कूटनीति दोनों पर चर्चा बैठक में ईरान के खिलाफ संभावित रणनीति पर चर्चा हुई, जिसमें सैन्य विकल्पों के साथ-साथ कूटनीतिक प्रयासों पर भी विचार किया गया। अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि उसका उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है, लेकिन वह कूटनीतिक रास्ते को भी पूरी तरह बंद नहीं करना चाहता। पश्चिम एशिया में बढ़ सकता है तनाव विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान को लेकर अमेरिका और इजरायल का रुख और सख्त होता है, तो पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ सकता है। इस घटनाक्रम पर दुनिया के कई देशों की नजर बनी हुई है, क्योंकि इसका असर क्षेत्रीय सुरक्षा, तेल बाजार और वैश्विक कूटनीति पर पड़ सकता है।
टोक्यो, एजेंसियां। जापान में मंगलवार को 7.1 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप आने के बाद तटीय इलाकों में सुनामी का अलर्ट जारी किया गया। भूकंप के तेज झटके महसूस होते ही लोग घरों और दफ्तरों से बाहर निकल आए, जबकि प्रशासन ने एहतियात के तौर पर समुद्र किनारे रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी है। तटीय क्षेत्रों में जारी किया गया अलर्ट जापान मौसम एजेंसी के अनुसार, भूकंप का केंद्र समुद्र के भीतर था, जिसके कारण सुनामी की आशंका को देखते हुए कई तटीय क्षेत्रों में चेतावनी जारी की गई। प्रशासन ने मछुआरों और समुद्र में मौजूद नौकाओं को तुरंत सुरक्षित स्थानों पर लौटने के निर्देश दिए। रेल और अन्य सार्वजनिक परिवहन सेवाओं पर भी एहतियात के तौर पर कुछ समय के लिए असर पड़ा, जबकि आपदा प्रबंधन एजेंसियां लगातार हालात पर नजर बनाए हुए हैं। राहत और बचाव एजेंसियां अलर्ट पर भूकंप के बाद राहत एवं बचाव दलों को तुरंत सक्रिय कर दिया गया। प्रभावित इलाकों में इमारतों, सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचे का निरीक्षण किया जा रहा है ताकि किसी संभावित नुकसान का आकलन किया जा सके। प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे आधिकारिक निर्देशों का पालन करें और अफवाहों पर ध्यान न दें। भूकंप के बाद आफ्टरशॉक आने की संभावना को देखते हुए सतर्क रहने की सलाह भी दी गई है। जापान में भूकंप का खतरा हमेशा बना रहता है जापान दुनिया के सबसे अधिक भूकंप प्रभावित देशों में शामिल है। यह देश प्रशांत महासागर के 'रिंग ऑफ फायर' क्षेत्र में स्थित है, जहां टेक्टोनिक प्लेटों की गतिविधियां लगातार होती रहती हैं। इसी कारण यहां समय-समय पर शक्तिशाली भूकंप और सुनामी का खतरा बना रहता है। हालांकि, जापान की उन्नत आपदा प्रबंधन प्रणाली और प्रारंभिक चेतावनी तंत्र के कारण ऐसे प्राकृतिक संकटों से निपटने की तैयारियां पहले से की जाती हैं। फिलहाल अधिकारी स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए हैं और लोगों से सतर्क रहने की अपील कर रहे हैं।
Uganda Hunger Crisis: पूर्वी अफ्रीकी देश युगांडा में लंबे समय से पड़ रहे सूखे ने गंभीर मानवीय संकट खड़ा कर दिया है। पूर्वी युगांडा के करामोजा (Karamoja) क्षेत्र में बारिश नहीं होने और फसलें बर्बाद होने के कारण अब तक कम से कम 19 लोगों की भूख से मौत हो चुकी है। हालात बिगड़ने के बाद सरकार ने आपातकालीन खाद्य राहत अभियान शुरू किया है। अधिकारियों के अनुसार, करामोजा क्षेत्र में करीब 15 लाख लोग गंभीर खाद्य संकट और कुपोषण का सामना कर रहे हैं। सरकार ने अगले दो महीनों में 9,400 टन खाद्य सामग्री वितरित करने की योजना बनाई है। इसके लिए संसद द्वारा स्वीकृत 45 अरब युगांडाई शिलिंग के आपातकालीन फंड का इस्तेमाल किया जा रहा है। बारिश नहीं हुई, पूरी फसल बर्बाद करामोजा क्षेत्र में इस बार कई वर्षों का सबसे लंबा सूखा दर्ज किया गया है। अप्रैल में बुवाई के दौरान कुछ बारिश हुई थी, लेकिन उसके बाद पर्याप्त वर्षा नहीं होने से किसानों की लगभग पूरी फसल नष्ट हो गई। खेती पर निर्भर हजारों परिवारों के सामने अब रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। बच्चों का पेट भरने के लिए खदानों में काम करने को मजबूर महिलाएं मोरोटो शहर के पास रूपा गांव की रहने वाली 21 वर्षीय एंजेलिना नाकिरु बताती हैं कि फसल बर्बाद होने के बाद परिवार का पेट भरना बेहद मुश्किल हो गया है। वह रोज सुबह अन्य महिलाओं के साथ एक छोटी पिसाई मिल में काम करने जाती हैं, जहां पत्थरों को पीसकर सोना निकालने की प्रक्रिया के लिए अयस्क तैयार किया जाता है। इस कठिन और धूलभरे काम से उन्हें बहुत कम आमदनी होती है। नाकिरु कहती हैं, "अगर मैं यह काम नहीं करूं, तो मेरे बच्चे भूखे सो जाएंगे। कई दिन ऐसे भी आते हैं जब कोई कमाई नहीं होती और पूरा परिवार खाली पेट सोने को मजबूर होता है। लोग भूख से मर रहे हैं। सरकार को हमारी मदद करनी चाहिए।" लाखों परिवारों पर संकट यह कहानी सिर्फ एंजेलिना की नहीं, बल्कि करामोजा क्षेत्र के लाखों परिवारों की है। हजारों माताएं अपने बच्चों को दिन में एक वक्त का भोजन भी नहीं दे पा रही हैं। कुपोषण तेजी से बढ़ रहा है और बच्चों की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक बनी हुई है। पहले भी झेल चुका है भुखमरी का संकट युगांडा में यह पहली बार नहीं है जब भुखमरी ने इतनी बड़ी तबाही मचाई हो। युगांडा मानवाधिकार आयोग के अनुसार, वर्ष 2022 में भुखमरी के कारण 2,200 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। इसके बावजूद देश के कई हिस्सों में गरीबी, जलवायु परिवर्तन और खाद्य असुरक्षा जैसी समस्याएं अब भी बनी हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द पर्याप्त बारिश नहीं हुई और राहत कार्यों में तेजी नहीं लाई गई, तो आने वाले महीनों में करामोजा क्षेत्र में मानवीय संकट और गहरा सकता है। सरकार और अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसियां प्रभावित लोगों तक खाद्य सामग्री और जरूरी सहायता पहुंचाने में जुटी हैं।