सावन व्रत कथा के अध्याय-3 में सनत्कुमार भगवान शिव से श्रावण मास के व्रतों का विस्तार से वर्णन करने का आग्रह करते हैं। इसके जवाब में भगवान शिव नक्त व्रत, संकल्प, अभिषेक, लक्ष पूजा और उद्यापन सहित विभिन्न धार्मिक विधियों का महत्व बताते हैं।
कथा के अनुसार भगवान शिव बताते हैं कि जो व्यक्ति सावन के महीने में नियमपूर्वक नक्त व्रत करता है, उसे पूरे वर्ष नक्त व्रत करने के समान फल प्राप्त होता है।
नक्त व्रत में भोजन के समय को लेकर गृहस्थ और यति के लिए अलग-अलग नियम बताए गए हैं। गृहस्थ व्यक्ति रात्रि में नक्त भोजन करता है, जबकि यति के लिए सूर्यास्त के आसपास निर्धारित समय में भोजन का विधान बताया गया है।
संध्या काल को विशेष रूप से संयम और साधना का समय माना गया है। इस दौरान भोजन, निद्रा, मैथुन और स्वाध्याय जैसे कार्यों से विरत रहने की बात कही गई है।
कथा में यह भी कहा गया है कि व्यक्ति को अपनी स्थिति और अधिकार के अनुसार नक्त व्रत का पालन करना चाहिए।
धार्मिक मान्यता के अनुसार सावन में नक्त व्रत शुरू करने से पहले श्रद्धालु को संकल्प लेना चाहिए कि वह नियमित स्नान करेगा, ब्रह्मचर्य का पालन करेगा, निर्धारित समय पर नक्त भोजन करेगा, भूमि पर शयन करेगा और सभी प्राणियों के प्रति दया का भाव रखेगा।
कथा में भगवान शिव कहते हैं कि इस प्रकार नियमपूर्वक नक्त व्रत करने वाला व्यक्ति उन्हें अत्यंत प्रिय होता है।
सावन में भगवान शिव का अभिषेक करना विशेष पुण्यकारी माना गया है। कथा में प्रतिदिन रुद्र मंत्र के साथ अभिषेक करने का उल्लेख मिलता है। अतिरुद्र, महारुद्र अथवा रुद्र मंत्र के माध्यम से भगवान शिव का अभिषेक करने की बात कही गई है।
भगवान शिव को जलधारा प्रिय मानी गई है, इसलिए सावन में श्रद्धापूर्वक जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने की धार्मिक परंपरा विशेष महत्व रखती है।
सावन व्रत कथा में त्याग और दान को भी विशेष महत्व दिया गया है। मान्यता के अनुसार व्यक्ति को अपने लिए अत्यंत प्रिय किसी भोजन या सुख-सुविधा की वस्तु का संकल्पपूर्वक त्याग करके उसे योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान करना चाहिए।
कथा में कहा गया है कि सावन में किसी प्रिय वस्तु का त्याग करने से उसका पुण्यफल कई गुना बढ़ जाता है। सकाम भाव से किया गया त्याग मनोकामना पूर्ति और निष्काम भाव से किया गया त्याग आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम माना गया है।
सावन व्रत कथा में लक्ष पूजा का भी विस्तृत वर्णन मिलता है। अलग-अलग कामनाओं के लिए अलग-अलग पूजन सामग्री का उल्लेख किया गया है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार:
इसके अलावा रंगोली या रंगवल्ली के माध्यम से कमल, स्वस्तिक और चक्र जैसे शुभ प्रतीक बनाकर भगवान की पूजा करने की परंपरा का भी वर्णन मिलता है।
कथा में लक्ष पूजा के बाद विधिपूर्वक उद्यापन करने का विधान बताया गया है। इसके लिए मंडप का निर्माण, वेदिका की स्थापना और पुण्याहवाचन के बाद आचार्य का वरण करने की बात कही गई है।
रात्रि में गीत, वाद्य, नृत्य और वेद, शास्त्र तथा पुराणों के पाठ के साथ जागरण करने का विधान बताया गया है।
इसके बाद वेदिका पर शिवलिंग और चावल से कैलास का प्रतीक बनाने, पंचपल्लवयुक्त कलश स्थापित करने तथा उस पर भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित कर पूजा करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है।
पंचामृत, धूप, दीप और नैवेद्य से पूजा के बाद रात्रि जागरण किया जाता है। अगले दिन स्नान के बाद निर्धारित विधि से हवन और पूर्णाहुति की जाती है।
उद्यापन के बाद आचार्य और अन्य ब्राह्मणों का पूजन करके उन्हें दक्षिणा देने की बात कथा में कही गई है। जिस सामग्री से लक्ष पूजा की गई हो, उसके दान का भी विधान बताया गया है।
दीप पूजा करने वाले व्यक्ति के लिए दीपदान का उल्लेख मिलता है। इसके बाद भगवान शिव से अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगने और ब्राह्मणों को भोजन कराने की परंपरा बताई गई है।
कथा के अनुसार सावन महीने में श्रद्धा से किया गया त्याग और भगवान शिव की पूजा विशेष फल प्रदान करती है। किसी प्रिय वस्तु का त्याग करने पर उसके पुण्यफल में वृद्धि होने की मान्यता है।
रुद्राभिषेक, पंचामृत अभिषेक, भूमि पर शयन और ब्रह्मचर्य पालन को भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया गया है।
सावन व्रत कथा अध्याय-3 का मूल संदेश यही है कि भगवान शिव की आराधना केवल बाहरी पूजा तक सीमित नहीं है। संयम, त्याग, दया, अनुशासन, दान और श्रद्धा भी शिव भक्ति के महत्वपूर्ण अंग माने गए हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
सावन का महीना भगवान शिव की आराधना और भक्ति के लिए विशेष माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस पूरे महीने शिव पूजा, व्रत, अभिषेक, दान और कथा श्रवण का विशेष महत्व है। सावन सोमवार के साथ-साथ अलग-अलग व्रतों और उनकी विधियों का वर्णन भी धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। सावन व्रत कथा के चौथे अध्याय में भगवान शिव सनत्कुमार को धारण-पारण व्रत, मासोपवास और रुद्रवर्ती व्रत का महत्व बताते हैं। कथा में इन व्रतों की विधि, उद्यापन और उनसे जुड़े धार्मिक फलों का विस्तार से वर्णन किया गया है। क्या है धारण-पारण व्रत? भगवान शिव के अनुसार धारण-पारण व्रत की शुरुआत सावन की प्रतिपदा तिथि से की जाती है। सबसे पहले पुण्याहवाचन कराने के बाद भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए व्रत का संकल्प लिया जाता है। इस व्रत में एक दिन उपवास किया जाता है, जबकि अगले दिन पारण यानी भोजन किया जाता है। इसी क्रम को व्रत की निर्धारित अवधि तक जारी रखा जाता है। सावन मास समाप्त होने के बाद इस व्रत का उद्यापन करने का भी विधान बताया गया है। धारण-पारण व्रत के उद्यापन की विधि व्रत की समाप्ति पर सबसे पहले पुण्याहवाचन कराया जाता है। इसके बाद आचार्य और अन्य ब्राह्मणों का वरण किया जाता है। कथा के अनुसार पार्वती और भगवान शिव की स्वर्ण प्रतिमाओं को जल से भरे कलश पर स्थापित करके रात्रि में श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है। इसके बाद पुराण श्रवण आदि के साथ रात्रि जागरण किया जाता है। अगले दिन स्नान और पूजा के बाद विधिपूर्वक हवन किया जाता है। अलग-अलग मंत्रों के साथ तिल मिश्रित भात, घी मिश्रित भात और खीर की आहुति देने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद पूर्णाहुति की जाती है। अंत में ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है और आचार्य की पूजा की जाती है। कथा में इस प्रकार उद्यापन करने को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है। सावन में मासोपवास का क्या है महत्व? अध्याय-4 में भगवान शिव सावन में किए जाने वाले मासोपवास की विधि भी बताते हैं। प्रतिपदा के दिन प्रातःकाल इस व्रत का संकल्प लेने की बात कही गई है। स्त्री या पुरुष, दोनों को मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हुए व्रत करने का संदेश दिया गया है। व्रत के अंत में अमावस्या तिथि पर भगवान शिव की षोडशोपचार विधि से पूजा करने का उल्लेख है। इसके बाद अपनी सामर्थ्य के अनुसार वस्त्र, आभूषण आदि से ब्राह्मणों का पूजन, भोजन और सम्मान करने की परंपरा बताई गई है। रुद्रवर्ती व्रत क्या है? सावन व्रत कथा के इस अध्याय में रुद्रवर्ती व्रत को भी विशेष महत्व दिया गया है। कथा के अनुसार यह भगवान शिव को प्रसन्न करने वाला और अनेक धार्मिक फलों से जुड़ा व्रत माना गया है। इसके लिए कपास के 11 तंतुओं से विशेष बत्तियां बनाने का विधान बताया गया है। सावन के पहले दिन संकल्प लेकर पूरे महीने प्रतिदिन भगवान शिव की पूजा के बाद इन बत्तियों से नीराजन यानी आरती करने की बात कही गई है। कथा में अलग-अलग तरीके से एक लाख बत्तियों का नीराजन पूरा करने के विकल्पों का भी वर्णन मिलता है। घी में भिगोई हुई बत्तियों को भगवान शिव को प्रिय बताया गया है। पूजा के बाद कथा श्रवण करने का भी महत्व बताया गया है। रुद्रवर्ती व्रत से जुड़ी है सुगंधा की कथा रुद्रवर्ती व्रत के प्रभाव को समझाने के लिए कथा में उज्जयिनी नगरी की सुगंधा नामक एक स्त्री का प्रसंग आता है। कथा के अनुसार सुगंधा अपने जीवन में अनेक गलत कार्य कर चुकी थी। एक दिन क्षिप्रा नदी के तट पर पहुंचने पर उसने वहां तपस्या और पूजा में लीन ऋषियों को देखा। इसी दौरान उसकी नजर मुनि वसिष्ठ पर पड़ी। मुनि वसिष्ठ के दर्शन से उसके मन में वैराग्य और धर्म के प्रति रुचि जागी। उसने अपने किए कर्मों के लिए प्रायश्चित का मार्ग पूछा और अपने पापों से मुक्ति का उपाय जानना चाहा। मुनि वसिष्ठ ने उसे काशी जाकर भगवान शिव को प्रिय रुद्रवर्ती व्रत करने की सलाह दी। सुगंधा ने काशी में किया रुद्रवर्ती व्रत कथा के अनुसार सुगंधा अपने धन और साथियों के साथ काशी पहुंची और मुनि वसिष्ठ द्वारा बताए गए विधान के अनुसार रुद्रवर्ती व्रत किया। धार्मिक कथा में बताया गया है कि व्रत के प्रभाव से उसे परम गति प्राप्त हुई और वह भगवान शिव में विलीन हो गई। इस प्रसंग के माध्यम से कथा में यह संदेश दिया गया है कि श्रद्धा, प्रायश्चित और भक्ति के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन में आध्यात्मिक परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ सकता है। माणिक्य वर्तियों का भी बताया गया है महत्व इसके बाद कथा में माणिक्य वर्तियों के माहात्म्य का वर्णन आता है। इसमें भगवान शिव की विशेष कृपा और आध्यात्मिक फल प्राप्त होने की मान्यता बताई गई है। व्रत की पूर्णता के लिए उद्यापन की विधि भी बताई गई है। चांदी से बनी नंदी की प्रतिमा पर विराजमान भगवान शिव और माता पार्वती की स्वर्ण प्रतिमा को कलश पर स्थापित करके विधिपूर्वक पूजा करने का उल्लेख है। इसके बाद रात्रि जागरण किया जाता है। रुद्रवर्ती व्रत के उद्यापन में क्या करें? अगले दिन स्नान करके आचार्य और 11 ब्राह्मणों का वरण करने की बात कही गई है। इसके बाद रुद्रसूक्त, गायत्री मंत्र या मूल मंत्र के माध्यम से घी, खीर और बेलपत्रों से हवन करने का विधान बताया गया है। पूर्णाहुति के बाद आचार्य और अन्य ब्राह्मणों की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। इसके बाद 11 ब्राह्मणों को सपत्नीक भोजन कराने का उल्लेख मिलता है। अंत में व्रत से जुड़ी स्थापित सामग्री ब्राह्मण को दान करने की बात कही गई है। कथा में इसे अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है। सावन व्रत कथा अध्याय-4 का संदेश सावन व्रत कथा का चौथा अध्याय व्रत, संयम, पूजा, दान और प्रायश्चित के महत्व पर जोर देता है। धारण-पारण व्रत में उपवास और पारण की परंपरा, मासोपवास में आत्मसंयम और रुद्रवर्ती व्रत में भगवान शिव की आराधना को विशेष स्थान दिया गया है। सुगंधा की कथा के माध्यम से यह भी संदेश मिलता है कि मनुष्य अपने जीवन में गलतियों को स्वीकार करके सही मार्ग की ओर बढ़ सकता है। सावन का समय भक्ति के साथ-साथ आत्मचिंतन, संयम और सेवा का अवसर भी माना जाता है।
Sawan Vrat Katha Chapter 2: सावन का महीना भगवान शिव की भक्ति और साधना के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान शिवभक्त भगवान शिव का अभिषेक, पूजन, जप और व्रत करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है और इस महीने में श्रद्धा के साथ किए गए पूजा-पाठ और व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। सावन व्रत कथा के दूसरे अध्याय में भगवान शिव सनत्कुमार को इस महीने में किए जाने वाले व्रत, पूजा, जप, संयम और अलग-अलग तिथियों के धार्मिक महत्व के बारे में बताते हैं। साथ ही सप्ताह के अलग-अलग दिनों में किए जाने वाले व्रतों का भी उल्लेख मिलता है। सावन में व्रत और रुद्राभिषेक का महत्व कथा के अनुसार भगवान शिव सनत्कुमार से कहते हैं कि श्रावण मास में व्यक्ति को अपनी क्षमता और श्रद्धा के अनुसार नियमों का पालन करना चाहिए। पूरे महीने नियमित रूप से शिव पूजा और रुद्राभिषेक करने की परंपरा बताई गई है। धार्मिक मान्यता में इस महीने में भगवान शिव को फूल, फल, धान्य और बेलपत्र आदि अर्पित करने का विशेष महत्व बताया गया है। पंचामृत से अभिषेक, शिव मंत्रों का जाप, प्रदक्षिणा, नमस्कार और वेदों का पाठ भी सावन की साधना का हिस्सा माना गया है। कथा में संयमित जीवन जीने, सत्य बोलने, ब्रह्मचर्य का पालन करने और सात्विक भोजन करने पर भी जोर दिया गया है। फलाहार या हविष्य अन्न ग्रहण करने तथा भूमि पर सोने जैसी कठोर साधनाओं का भी उल्लेख मिलता है। हालांकि, आधुनिक समय में किसी भी कठिन व्रत या खान-पान के कठोर नियम को अपनाने से पहले अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना जरूरी है। सावन में शिव मंत्र और धार्मिक पाठ सावन मास में शिव के षडक्षर मंत्र और गायत्री मंत्र का जाप करने की बात कथा में कही गई है। भगवान शिव की प्रदक्षिणा, नमस्कार और वेद-पाठ को भी पुण्यकारी बताया गया है। पुरुषसूक्त के पाठ को विशेष फलदायी माना गया है। इसी तरह ग्रह यज्ञ, होम और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों को भी सावन में महत्वपूर्ण बताया गया है। कथा के अनुसार सावन ऐसा महीना है जो सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति चाहने वाले भक्तों के लिए कामना-सिद्धि और निष्काम साधना करने वालों के लिए मोक्ष की दिशा में सहायक माना गया है। सप्ताह के किस दिन कौन-सा व्रत? सावन व्रत कथा के दूसरे अध्याय में सप्ताह के अलग-अलग दिनों से जुड़े व्रतों का भी उल्लेख किया गया है। रविवार: सूर्य व्रत सोमवार: भगवान शिव की पूजा और नक्त भोजन मंगलवार: मंगलगौरी व्रत बुधवार: बुध से संबंधित व्रत गुरुवार: बृहस्पति व्रत शुक्रवार: जीवन्ती व्रत शनिवार: हनुमान और नृसिंह व्रत कथा में श्रावण के प्रथम सोमवार से शुरू होने वाले 'रोटक' नामक व्रत का भी उल्लेख मिलता है, जिसे इच्छित फल प्रदान करने वाला बताया गया है। सावन की तिथियों में कौन-से व्रत? सावन के शुक्ल पक्ष की अलग-अलग तिथियों के लिए कथा में कई व्रत और धार्मिक अनुष्ठानों का वर्णन मिलता है। द्वितीया: औदुम्बर व्रत तृतीया: गौरी व्रत चतुर्थी: दूर्वा गणपति या विनायकी चतुर्थी पंचमी: नाग पूजा षष्ठी: सूपौदन व्रत सप्तमी: शीतला व्रत अष्टमी/चतुर्दशी: देवी का पवित्रारोपण व्रत नवमी: नक्त व्रत दशमी: आशा व्रत एकादशी: दोनों पक्षों की एकादशी का विशेष महत्व शुक्ल द्वादशी: भगवान विष्णु का पवित्रारोपण व्रत पूर्णिमा: कई धार्मिक कर्मों और अनुष्ठानों का उल्लेख कथा में श्रावण कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्ट चतुर्थी और पंचमी को मानवकल्पादि व्रत का भी उल्लेख मिलता है। सावन में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का भी महत्व कथा के अनुसार श्रावण कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण के पूर्णावतार का उल्लेख मिलता है। इसलिए इस दिन व्रत और उत्सव मनाने की बात कही गई है। श्रावण अमावस्या को पिठोरा व्रत का उल्लेख मिलता है। इस दिन कुश ग्रहण और वृषभ पूजन की परंपरा भी कथा में बताई गई है। तिथि के अनुसार किस देवता की पूजा करें? कथा में शुक्ल पक्ष की तिथियों के अलग-अलग देवताओं का भी उल्लेख किया गया है। प्रतिपदा: अग्नि द्वितीया: ब्रह्मा तृतीया: गौरी चतुर्थी: गणपति पंचमी: नाग षष्ठी: कार्तिकेय सप्तमी: सूर्य अष्टमी: शिव नवमी: दुर्गा दशमी: यम एकादशी: विश्वेदेव द्वादशी: विष्णु त्रयोदशी: कामदेव चतुर्दशी: शिव पूर्णिमा: चंद्रमा अमावस्या: पितर धार्मिक मान्यता के अनुसार जिस तिथि के जो देवता माने गए हैं, उस दिन उनकी श्रद्धापूर्वक पूजा करनी चाहिए। अगस्त्य उदय और सूर्य पूजा का उल्लेख कथा में सावन मास के दौरान अगस्त्य के उदय से जुड़ी धार्मिक मान्यता का भी वर्णन किया गया है। इसमें अगस्त्य उदय से पहले अर्घ्य देने की परंपरा बताई गई है। सावन में सूर्य को 'गभस्ति' नाम से संबोधित करते हुए उनकी पूजा करने का भी उल्लेख मिलता है। इससे यह संकेत मिलता है कि सावन की धार्मिक साधना केवल शिव आराधना तक सीमित नहीं है, बल्कि इस दौरान विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा का भी विधान बताया गया है। सावन में किन चीजों का त्याग बताया गया है? कथा में चार महीनों से जुड़ी कुछ खाद्य वस्तुओं के त्याग की परंपरा बताई गई है। श्रावण: शाक का त्याग भाद्रपद: दही का त्याग आश्विन: दूध का त्याग कार्तिक: दाल का त्याग धार्मिक मान्यता के अनुसार यदि व्यक्ति चारों महीनों में इनका त्याग नहीं कर पाता, तो केवल सावन में बताए गए त्याग का पालन करने को भी विशेष महत्व दिया गया है। सावन में भगवान शिव और विष्णु की भक्ति कथा के अंत में भगवान शिव सनत्कुमार से कहते हैं कि श्रावण मास के व्रत और धार्मिक नियमों की पूरी महिमा का वर्णन करना संभव नहीं है। भगवान शिव और भगवान विष्णु की एकता पर भी जोर दिया गया है। धार्मिक दृष्टि से दोनों के बीच भेद न करने और भक्ति भाव से साधना करने का संदेश दिया गया है। इस प्रकार सावन व्रत कथा का दूसरा अध्याय व्रत, संयम, पूजा, जप, दान और श्रद्धा के माध्यम से आध्यात्मिक अनुशासन अपनाने का संदेश देता है।
देवघर। श्रावण माह की शुरुआत के साथ ही झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम और दुमका के बाबा बासुकीनाथ मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने लगी है। इसी बीच झारखंड सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए पूरे श्रावणी मेला 2026 के दौरान दोनों मंदिरों में VIP और आउट ऑफ टर्न दर्शन पर पूरी तरह रोक लगा दी है। इसका उद्देश्य आम श्रद्धालुओं को बिना किसी व्यवधान के सुगम और समान रूप से दर्शन का अवसर उपलब्ध कराना है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि श्रावण मेले के दौरान किसी भी व्यक्ति के लिए विशेष सिफारिश या प्राथमिकता के आधार पर दर्शन की अनुमति नहीं दी जाएगी। मंदिरों में श्रद्धालुओं की सुविधा और भीड़ प्रबंधन के लिए पहले से लागू अर्घा सिस्टम के माध्यम से जलार्पण की व्यवस्था संचालित रहेगी। एसीएस वंदना दादेल ने जारी किया आदेश कैबिनेट सचिवालय एवं निगरानी विभाग की अपर मुख्य सचिव वंदना दादेल ने इस संबंध में आधिकारिक पत्र जारी किया है। पत्र में कहा गया है कि बाबा बैद्यनाथ धाम देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और श्रावण माह में यहां देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। अधिकांश श्रद्धालु देवघर के साथ दुमका स्थित बाबा बासुकीनाथ मंदिर भी दर्शन के लिए जाते हैं। ऐसे में भीड़ प्रबंधन और श्रद्धालुओं की सुविधा को देखते हुए VIP और आउट ऑफ टर्न दर्शन की व्यवस्था पूरी तरह बंद रखने का निर्णय लिया गया है। सिफारिश भेजने से भी किया गया मना सरकार ने सभी मंत्रालयों, विभागों और संबंधित संस्थानों से अपील की है कि बाबा बैद्यनाथ धाम और बाबा बासुकीनाथ मंदिर में VIP दर्शन के लिए किसी भी प्रकार की अनुशंसा या अनुरोध राज्य सरकार अथवा जिला प्रशासन को न भेजें। यह आदेश भारत सरकार के कैबिनेट सचिव, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों, सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल तथा देश के सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भी भेजा गया है, ताकि श्रावणी मेले के दौरान VIP सिफारिशों पर पूरी तरह रोक सुनिश्चित की जा सके।