Sawan 2026: सावन का महीना भगवान शिव की भक्ति और आराधना के लिए विशेष माना जाता है। सावन का सोमवार जितना महत्वपूर्ण माना जाता है, उतना ही धार्मिक महत्व सावन के मंगलवार का भी है। सावन के मंगलवार को मंगला गौरी व्रत रखने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत और माता गौरी की पूजा से वैवाहिक जीवन से जुड़ी परेशानियां दूर होने और विवाह में आ रही बाधाओं से मुक्ति मिलने की कामना की जाती है। इस बार 4 अगस्त 2026, सावन के पहले मंगलवार को कई शुभ योगों का संयोग बताया जा रहा है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग, रवि योग, गजकेसरी योग, हंस योग, गुरु आदित्य योग और भद्र राजयोग बनने की बात कही गई है। धार्मिक मान्यता है कि ऐसे शुभ संयोग में भगवान शिव, माता पार्वती और हनुमानजी की पूजा, मंत्र जाप और धार्मिक उपाय करना शुभ फलदायी हो सकता है। आइए जानते हैं सावन के पहले मंगलवार पर कौन-कौन से उपाय किए जा सकते हैं। सावन के पहले मंगलवार पर बन रहे हैं 7 शुभ योग 4 अगस्त को सावन के पहले मंगलवार के दिन सात शुभ योगों का संयोग बताया गया है। इनमें शामिल हैं: सर्वार्थ सिद्धि योग अमृत सिद्धि योग रवि योग गजकेसरी योग हंस योग गुरु आदित्य योग भद्र राजयोग ज्योतिषीय मान्यताओं में इन योगों को शुभ और मंगलकारी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस तरह के शुभ अवसर पर भगवान का स्मरण, पूजा-पाठ, मंत्र जाप और दान-पुण्य करने से सकारात्मक फल प्राप्त हो सकते हैं। भगवान शिव और माता पार्वती की करें पूजा सावन के पहले मंगलवार को भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा करने की परंपरा है। यदि संभव हो तो माता गौरी को श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें। मंगला गौरी की पूजा विशेष रूप से वैवाहिक सुख और दांपत्य जीवन से जुड़ी कामनाओं के लिए की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन माता पार्वती की आराधना करने से विवाह संबंधी बाधाओं को दूर करने और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना की जाती है। हनुमानजी को चोला चढ़ाएं सावन के पहले मंगलवार को हनुमानजी की पूजा करना भी शुभ माना जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, इस दिन हनुमानजी को चोला अर्पित किया जा सकता है। मान्यता है कि हनुमानजी की श्रद्धापूर्वक पूजा और चोला अर्पित करने से संकटों से मुक्ति और आर्थिक परेशानियों से राहत की कामना की जाती है। बजरंगबाण का करें पाठ इस दिन हनुमानजी के सामने श्रद्धापूर्वक बजरंगबाण का पाठ करने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इससे घर में सकारात्मक वातावरण बनाए रखने और नकारात्मकता से दूर रहने की कामना की जाती है। पाठ करते समय मन को शांत रखें और पूरी श्रद्धा के साथ हनुमानजी का ध्यान करें। विवाह में आ रही बाधाओं के लिए करें यह उपाय यदि विवाह में किसी प्रकार की बाधा आ रही है तो सावन के पहले मंगलवार को माता पार्वती की पूजा करना शुभ माना जाता है। इस दिन पार्वती चालीसा का पाठ किया जा सकता है। धार्मिक मान्यताओं में माता पार्वती को अखंड सौभाग्य और वैवाहिक सुख से जोड़ा जाता है। इसलिए मंगला गौरी की आराधना के दौरान सुखी वैवाहिक जीवन और विवाह संबंधी बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना की जाती है। शिवलिंग पर करें जलाभिषेक सावन में भगवान शिव का जलाभिषेक विशेष महत्व रखता है। सावन के पहले मंगलवार को भी शिवलिंग पर जल अर्पित कर भगवान शिव का ध्यान किया जा सकता है। इसके साथ ही हनुमानजी के सामने घी का दीपक जलाने की परंपरा भी बताई गई है। पूजा के दौरान श्रद्धा और शुद्ध भाव को विशेष महत्व दें। 21 बेलपत्र पर लिखें राम नाम सावन के मंगलवार को एक अन्य धार्मिक उपाय के रूप में 21 बेलपत्र लेकर उन पर चंदन से ‘राम’ नाम लिखकर शिवलिंग पर अर्पित करने की मान्यता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस उपाय से घर में सकारात्मक ऊर्जा और सुख-शांति की कामना की जाती है। इसे वास्तु संबंधी परेशानियों से मुक्ति की कामना से भी जोड़ा जाता है। सावन के पहले मंगलवार का धार्मिक महत्व सावन का पहला मंगलवार भगवान शिव के साथ माता पार्वती और हनुमानजी की आराधना के लिए विशेष अवसर माना जाता है। एक ओर जहां सावन शिव भक्ति का प्रमुख महीना है, वहीं मंगलवार को मंगला गौरी व्रत और हनुमानजी की पूजा की परंपरा इस दिन को और महत्वपूर्ण बनाती है। ऐसे में श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार पूजा, मंत्र जाप, व्रत, दान और सेवा जैसे धार्मिक कार्य कर सकते हैं।
रुद्राक्ष धारण करने के नियम: सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में रुद्राक्ष का संबंध भी भगवान शिव से जोड़ा जाता है। यही वजह है कि श्रावण मास में रुद्राक्ष धारण करना विशेष शुभ माना जाता है। हालांकि, धार्मिक परंपराओं के अनुसार रुद्राक्ष पहनने से पहले उसकी सही विधि और कुछ जरूरी नियमों का पालन करना चाहिए। ज्योतिष और वास्तु से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार रुद्राक्ष के अलग-अलग मुख और प्रकार बताए गए हैं और प्रत्येक का अपना अलग महत्व माना जाता है। मान्यता है कि विधि-विधान और श्रद्धा के साथ रुद्राक्ष धारण करने से सकारात्मकता बढ़ती है और मन को शांति मिल सकती है। सावन में रुद्राक्ष क्यों धारण किया जाता है? श्रावण मास को भगवान शिव का प्रिय महीना माना जाता है। धार्मिक कथाओं और शिवपुराण से जुड़ी मान्यताओं में रुद्राक्ष को भगवान शिव के आंसुओं से उत्पन्न बताया गया है। इसी वजह से रुद्राक्ष को शिवजी से विशेष रूप से जुड़ा हुआ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन में शिव आराधना और रुद्राक्ष धारण करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक लाभ मिल सकता है। इसे सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक शांति से भी जोड़ा जाता है। रुद्राक्ष के अलग-अलग मुख बताए गए हैं और उनके महत्व भी अलग माने जाते हैं। इनमें एक मुखी रुद्राक्ष को विशेष और शक्तिशाली माना जाता है। हालांकि, अलग-अलग रुद्राक्ष धारण करने की विधि और मंत्र भी अलग हो सकते हैं। रुद्राक्ष कैसे धारण करें? धार्मिक परंपरा के अनुसार सामान्य रूप से रुद्राक्ष धारण करने के लिए इन बातों का ध्यान रखा जाता है: सावन का महीना रुद्राक्ष धारण करने के लिए शुभ माना जाता है। सोमवार को भगवान शिव का दिन माना जाता है, इसलिए इस दिन रुद्राक्ष धारण करना विशेष शुभ माना जाता है। सोमवार को सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। रुद्राक्ष को गंगाजल से शुद्ध करने की परंपरा है। इसके बाद रुद्राक्ष को हाथ में लेकर भगवान शिव का ध्यान करें। ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का कम से कम 11 बार जाप करने की मान्यता है। श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार शिवजी से संबंधित अन्य मंत्र का भी जाप कर सकते हैं। इसके बाद रुद्राक्ष को धागे में पिरोकर गले या हाथ में धारण किया जा सकता है। ध्यान रखें कि अलग-अलग मुखी रुद्राक्ष के लिए अलग विधि, मंत्र और धारण करने के नियम बताए जाते हैं। रुद्राक्ष धारण करने के जरूरी नियम रुद्राक्ष को लेकर धार्मिक मान्यताओं में कुछ सावधानियां भी बताई गई हैं। यदि आप इसे धारण करते हैं तो इन बातों का ध्यान रखने की परंपरा है: 1. सोते समय रुद्राक्ष उतार दें मान्यता के अनुसार रात में सोते समय रुद्राक्ष उतार देना चाहिए। सुबह स्नान करने से पहले भी इसे अलग रखने की सलाह दी जाती है। 2. स्नान के बाद दोबारा धारण करें सुबह स्नान और पूजा-पाठ करने के बाद रुद्राक्ष को दोबारा धारण करने की परंपरा है। इसे धार्मिक रूप से रुद्राक्ष की पवित्रता बनाए रखने से जोड़ा जाता है। 3. किसी दूसरे व्यक्ति का रुद्राक्ष न पहनें मान्यताओं के अनुसार रुद्राक्ष व्यक्तिगत रूप से धारण किया जाना चाहिए। इसलिए किसी अन्य व्यक्ति का रुद्राक्ष अपने गले में पहनने से बचने की सलाह दी जाती है। इसी तरह अपना रुद्राक्ष भी किसी दूसरे व्यक्ति को पहनने के लिए न देने की परंपरा है। 4. सात्विक जीवनशैली अपनाएं धार्मिक मान्यताओं में रुद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति को मांस और मदिरा से दूर रहने तथा अनैतिक कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है। इसके पीछे सात्विक जीवनशैली और भगवान शिव के प्रति श्रद्धा को महत्व दिया जाता है। रुद्राक्ष धारण करते समय सबसे जरूरी बात रुद्राक्ष केवल एक धार्मिक आस्था से जुड़ी वस्तु नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के लिए भगवान शिव की भक्ति और आध्यात्मिक साधना का प्रतीक भी है। इसलिए इसे धारण करते समय श्रद्धा, स्वच्छता और अपनी धार्मिक परंपरा का ध्यान रखना महत्वपूर्ण माना जाता है। साथ ही, यह समझना जरूरी है कि रुद्राक्ष से जुड़े लाभ और प्रभाव मुख्य रूप से धार्मिक एवं आध्यात्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित चिकित्सा या स्वास्थ्य उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
रांची। सावन की पहली सोमवारी पर राजधानी रांची के शिवालयों में आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिला। ऐतिहासिक पहाड़ी मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। तड़के 3:30 बजे से ही भक्तों का मंदिर पहुंचना शुरू हो गया था। मंदिर परिसर "बोल बम", "हर-हर महादेव" और "जय बाबा भोले" के जयकारों से गूंज उठा। भगवान शिव के प्रिय सावन महीने में जलाभिषेक और पूजा-अर्चना के लिए हजारों श्रद्धालु पहाड़ी मंदिर पहुंचे। मंदिर प्रशासन ने सुबह 4 बजे से दर्शन और जलार्पण की व्यवस्था शुरू कर दी थी। भक्तों ने गंगाजल, बेलपत्र, धतूरा, दूध और फूल अर्पित कर बाबा भोलेनाथ का आशीर्वाद लिया। महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग कतार की व्यवस्था श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा को देखते हुए मंदिर परिसर में विशेष इंतजाम किए गए थे। महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग कतार बनाई गई। मुख्य गर्भगृह में जलार्पण के दौरान पहले महिलाओं को प्रवेश दिया गया, इसके बाद पुरुष श्रद्धालुओं ने पूजा की। जिला प्रशासन, पहाड़ी मंदिर विकास समिति और स्वयंसेवकों की टीम लगातार व्यवस्था संभालती रही। मंदिर में प्रवेश और निकास के लिए अलग-अलग मार्ग बनाए गए, जिससे भीड़ को नियंत्रित करने में मदद मिली। सुरक्षा के रहे पुख्ता इंतजाम सावन की पहली सोमवारी को देखते हुए प्रशासन पूरी तरह अलर्ट रहा। मंदिर परिसर और आसपास अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की गई। सीसीटीवी कैमरों से पूरे क्षेत्र की निगरानी की गई। महिला पुलिसकर्मियों और स्वयंसेवकों ने श्रद्धालुओं को कतारबद्ध रखने और सहायता पहुंचाने का काम किया। अन्य शिवालयों में भी उमड़ी भीड़ पहाड़ी मंदिर के अलावा रांची के महाकाल मंदिर समेत अन्य शिवालयों में भी विशेष पूजा-अर्चना हुई। कई मंदिरों में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए अर्घा सिस्टम के जरिए जलाभिषेक की व्यवस्था की गई, ताकि बड़ी संख्या में भक्त आसानी से भगवान शिव की पूजा कर सकें। सावन की पहली सोमवारी पर रांची में उमड़ी श्रद्धा और भक्ति ने एक बार फिर भगवान भोलेनाथ के प्रति भक्तों की अटूट आस्था को दर्शाया। हजारों श्रद्धालुओं ने जलाभिषेक कर सुख, शांति और समृद्धि की कामना की।
Nag Panchami 2026: सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इसी दौरान नाग देवता की पूजा से जुड़ी परंपराएं भी अलग-अलग क्षेत्रों में देखने को मिलती हैं। 3 अगस्त 2026 को सावन कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि है और बिहार, बंगाल, राजस्थान तथा ओडिशा समेत कुछ क्षेत्रों में इस दिन नाग पूजा की परंपरा का उल्लेख मिलता है। पंचांग के अनुसार 3 अगस्त को कृष्ण पक्ष पंचमी है। हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि उत्तर भारत में प्रचलित सावन शुक्ल पंचमी वाली नाग पंचमी 2026 में 17 अगस्त को पड़ रही है। इसलिए नाग पंचमी की तारीख क्षेत्र और पंचांग परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। नाग पंचमी के अवसर पर नाग देवता की पूजा, नाग-नागिन की आकृति बनाने, घर के मुख्य द्वार पर चित्र उकेरने और धान, धान का लावा, दूर्वा आदि अर्पित करने की परंपरा बताई जाती है। धार्मिक मान्यताओं में नाग पूजा को परिवार की सुख-समृद्धि और सर्प भय से मुक्ति की कामना से जोड़ा गया है। नाग पंचमी पर नाग पूजा क्यों की जाती है? हिंदू धार्मिक परंपरा में नाग देवताओं का संबंध भगवान शिव से भी माना जाता है। शिवजी के गले में नाग का विराजमान होना नागों के धार्मिक महत्व को दर्शाता है। इसी कारण सावन के दौरान नाग देवता की पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है। कई क्षेत्रों में नाग पंचमी के दिन मिट्टी या गोबर से नाग-नागिन की आकृतियां बनाई जाती हैं। घर के मुख्य द्वार पर नागों के चित्र बनाए जाते हैं और धान, धान का लावा, दूर्वा तथा अन्य पारंपरिक पूजन सामग्री से पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस पूजा से घर में सुख-समृद्धि आती है और सर्प या विषैले जीवों के भय से रक्षा होती है। नाग पंचमी की कथा: राजा जनमेजय और आस्तिक मुनि नाग पंचमी से जुड़ी एक प्रमुख धार्मिक कथा राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय और आस्तिक मुनि से संबंधित है। मान्यता के अनुसार, राजा परीक्षित की मृत्यु सर्पदंश से हुई थी। इसके बाद उनके पुत्र राजा जनमेजय ने नागों का अंत करने के उद्देश्य से एक विशाल नाग यज्ञ कराया। यज्ञ के दौरान बड़ी संख्या में नाग अग्नि में गिरने लगे। इसी समय आस्तिक मुनि ने यज्ञ को रोकने का प्रयास किया। धार्मिक कथा के अनुसार, उनके हस्तक्षेप के बाद नाग यज्ञ को रोक दिया गया और नागों की रक्षा हुई। कथा में आगे बताया जाता है कि नागों ने आस्तिक मुनि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए यह वरदान दिया कि सावन की पंचमी तिथि पर जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक नाग देवता की पूजा करेगा, उसके परिवार को नागवंश के भय से सुरक्षा मिलेगी। इसी कथा को नाग पंचमी की धार्मिक परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। नाग पंचमी पूजा की विधि नाग पंचमी के दिन श्रद्धालु सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। इसके बाद पूजा स्थल को साफ करके नाग देवता की प्रतिमा, तस्वीर या मिट्टी से बनाई गई नाग-नागिन की आकृति स्थापित की जाती है। पूजा में क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार धान, धान का लावा, दूर्वा, पुष्प और अन्य सामग्री अर्पित की जाती है। भगवान शिव की पूजा के साथ नाग देवता का स्मरण किया जाता है। पूजा के दौरान श्रद्धालु परिवार की सुख-शांति, आरोग्य और सुरक्षा की प्रार्थना करते हैं। महत्वपूर्ण सावधानी: जीवित सांपों को पकड़कर या उनके सामने सीधे दूध रखने की कोशिश न करें। सांपों को दूध पिलाना उनके लिए प्राकृतिक या आवश्यक आहार नहीं है और इससे उन्हें नुकसान हो सकता है। नाग पूजा के लिए प्रतिमा, चित्र या प्रतीकात्मक पूजा करना अधिक सुरक्षित है। नाग पंचमी का नाग गायत्री मंत्र नाग पूजा में नाग गायत्री मंत्र के जाप की परंपरा भी बताई जाती है: “ॐ नवकुलाय विद्महे विषदंताय धीमहि तन्नो सर्पः प्रचोदयात्।” धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस मंत्र का 108 बार जाप किया जा सकता है। कुछ परंपराओं में शिवलिंग पर विराजमान नाग देवता का ध्यान करते हुए इस मंत्र के साथ पूजा की जाती है। आस्तिक मुनि का मंत्र नाग पंचमी पर आस्तिक मुनि का स्मरण करने की भी परंपरा है। “ॐ आस्तिक मुनिभ्यो नमः।” मान्यता के अनुसार, इस मंत्र का जाप नाग देवता और आस्तिक मुनि के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए किया जाता है। कुछ परंपराओं में इसे घर के मुख्य द्वार से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान में भी इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, किसी मंत्र के जाप से वास्तविक रूप से सांपों का घर में प्रवेश रुकने का वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसे धार्मिक विश्वास के रूप में ही देखा जाना चाहिए। सर्प भय से मुक्ति के लिए मंत्र नाग पंचमी से जुड़ी परंपराओं में एक अन्य मंत्र का भी उल्लेख मिलता है: “सर्पापसर्प भद्रं ते गच्छ सर्प महाविष। जनमेजयस्य यज्ञान्ते आस्तीकवचनं स्मर॥” धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस मंत्र के जाप से सर्प भय से मुक्ति की प्रार्थना की जाती है और आस्तिक मुनि की कथा का स्मरण किया जाता है। नाग पंचमी और कालसर्प दोष ज्योतिषीय मान्यताओं में नाग पंचमी को कालसर्प दोष और नाग दोष से जुड़े धार्मिक उपायों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। जिन लोगों की कुंडली में ऐसे योग बताए जाते हैं, वे इस दिन भगवान शिव के साथ नाग देवता की पूजा करते हैं। हालांकि, कालसर्प दोष और उससे जुड़े प्रभाव ज्योतिषीय मान्यताओं का विषय हैं। इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित कारण या उपचार नहीं माना जाता। इसलिए पूजा को आस्था और धार्मिक परंपरा के रूप में ही देखना उचित है। नाग पंचमी पर दूध और धान का लावा चढ़ाने की मान्यता धार्मिक परंपराओं में नाग देवता को दूध और धान का लावा अर्पित करने का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि ऐसा करने से परिवार में सुख-समृद्धि आती है और नाग भय से सुरक्षा की कामना पूरी होती है। लेकिन पूजा के लिए जीवित सांप को दूध पिलाने के बजाय नाग देवता की प्रतिमा, तस्वीर या प्रतीकात्मक रूप से पूजन करना चाहिए। नाग पंचमी का धार्मिक महत्व नाग पंचमी केवल नाग देवता की पूजा का पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान की भावना से भी जुड़ा हुआ है। भारतीय धार्मिक परंपराओं में सांपों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है और भगवान शिव के साथ उनका संबंध विशेष रूप से देखा जाता है। इस पर्व का संदेश यह भी माना जा सकता है कि मनुष्य को प्रकृति और जीव-जंतुओं के साथ संतुलन बनाकर रहना चाहिए। नाग पंचमी पर क्या करें? स्नान के बाद श्रद्धापूर्वक नाग देवता की पूजा करें। भगवान शिव का जलाभिषेक और पूजन करें। नाग देवता की प्रतिमा या चित्र पर पारंपरिक पूजन सामग्री अर्पित करें। नाग गायत्री मंत्र या आस्तिक मुनि मंत्र का जाप करें। परिवार की सुख-शांति और सुरक्षा के लिए प्रार्थना करें। जरूरतमंदों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करें। जीवित सांपों को पकड़ने, छेड़ने या दूध पिलाने से बचें।
Ujjain Mahakal Bhasma Aarti: सावन माह के पहले सोमवार पर मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला। तड़के सुबह होने वाली विश्व प्रसिद्ध भस्म आरती में शामिल होने के लिए देशभर से हजारों श्रद्धालु मंदिर पहुंचे। भगवान महाकाल का विशेष श्रृंगार किया गया और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूरे विधि-विधान से भस्म आरती संपन्न हुई। इस दौरान पूरा मंदिर परिसर 'हर-हर महादेव' और 'जय श्री महाकाल' के जयघोष से गूंज उठा। तड़के सुबह शुरू हुई भस्म आरती सावन के पहले सोमवार को महाकाल मंदिर में सुबह ब्रह्म मुहूर्त में भस्म आरती का आयोजन किया गया। भगवान महाकाल का आकर्षक श्रृंगार किया गया और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ आरती संपन्न हुई। इस अलौकिक दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु रात से ही मंदिर परिसर में पहुंच गए थे। देशभर से पहुंचे श्रद्धालु सावन के पहले सोमवार के अवसर पर महाकाल के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का भारी हुजूम उमड़ा। मंदिर के बाहर लंबी-लंबी कतारें देखने को मिलीं। श्रद्धालुओं में भगवान महाकाल के दर्शन और भस्म आरती में शामिल होने को लेकर विशेष उत्साह दिखाई दिया। सुरक्षा और व्यवस्थाएं रहीं चाक-चौबंद श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन और मंदिर समिति ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए। मंदिर परिसर और आसपास अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया। दर्शन व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए बैरिकेडिंग, ट्रैफिक नियंत्रण और मेडिकल सुविधाओं की भी व्यवस्था की गई। महाकाल मंदिर का विशेष महत्व उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यहां भगवान शिव महाकाल स्वरूप में विराजमान हैं, जिन्हें काल और मृत्यु का भी स्वामी माना जाता है। देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु हर वर्ष महाकाल के दर्शन के लिए उज्जैन पहुंचते हैं। क्यों खास है भस्म आरती? महाकाल मंदिर की भस्म आरती दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यह आरती प्रतिदिन तड़के ब्रह्म मुहूर्त में होती है, जिसमें भगवान महाकाल का विशेष अभिषेक और श्रृंगार किया जाता है। सावन महीने में इस आरती का धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है, इसलिए इस दौरान श्रद्धालुओं की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक रहती है।
Sawan Somwar Bel Patra Ke Upay: सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित माना जाता है और इस दौरान पड़ने वाले सोमवार का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है। शिवभक्त इस दिन व्रत रखते हैं, शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं और भगवान भोलेनाथ को बेलपत्र अर्पित करते हैं। धार्मिक मान्यताओं में बेलपत्र को भगवान शिव का प्रिय माना गया है। इस बार सावन में चार सोमवार पड़ रहे हैं, जिनमें पहला सोमवार 3 अगस्त 2026 को है। मान्यता है कि सावन सोमवार के दिन शिव पूजा के साथ बेलपत्र से जुड़े कुछ पारंपरिक उपाय करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सकारात्मकता, सुख-शांति एवं समृद्धि के संयोग बन सकते हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, बेलपत्र से जुड़े कुछ उपाय अलग-अलग मनोकामनाओं के लिए किए जाते हैं। आइए जानते हैं सावन सोमवार पर बेलपत्र के कौन-कौन से उपाय किए जा सकते हैं। सुख-शांति और कालसर्प दोष के लिए बेलपत्र का उपाय सावन सोमवार के दिन स्नान आदि से निवृत्त होकर 108 बेलपत्र लें। इन पर सफेद चंदन से ‘ॐ नमः शिवाय’ या ‘श्रीराम’ लिखकर भगवान शिव को अर्पित करने की परंपरा बताई गई है। मान्यता के अनुसार, इस उपाय को सांसारिक सुख, मानसिक शांति और भगवान शिव की कृपा से जोड़कर देखा जाता है। कुंडली में कालसर्प दोष की स्थिति में भी इस उपाय को शुभ माना जाता है। हालांकि, कालसर्प दोष और उसके प्रभाव से जुड़ी मान्यताएं ज्योतिष पर आधारित हैं और इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित उपचार नहीं माना जाता। परिवार के आरोग्य के लिए करें यह उपाय यदि परिवार में कोई व्यक्ति लंबे समय से स्वास्थ्य संबंधी परेशानी से जूझ रहा है, तो सावन सोमवार पर बेलपत्र से जुड़ी यह पारंपरिक पूजा की जा सकती है। इसके लिए तांबे के पात्र में पीला चंदन मिला हुआ जल लें और उसमें 108 बेलपत्र डालें। इसके बाद शिवलिंग पर श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करते हुए भगवान शिव का ध्यान करें और ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस पूजा के माध्यम से भगवान शिव से परिवार के सदस्य के अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना की जाती है। ध्यान रखें: बीमारी की स्थिति में यह धार्मिक उपाय चिकित्सा उपचार का विकल्प नहीं है। स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर योग्य डॉक्टर की सलाह और उपचार जरूरी है। मंदिर न जा पाएं तो बेलपत्र के पेड़ के पास करें पूजा किसी कारण से यदि आप मंदिर नहीं जा सकते या आसपास शिवलिंग उपलब्ध नहीं है, तो बेलपत्र के पौधे या वृक्ष के पास भी पूजा करने की परंपरा बताई गई है। धार्मिक मान्यता है कि बेलपत्र के मूल स्थान में भगवान शिव का वास माना जाता है। ऐसे में बेलपत्र के वृक्ष के मूल में जल अर्पित करें। इसके बाद धूप, पुष्प आदि चढ़ाएं और दीपक जलाकर भगवान शिव का स्मरण करें। मान्यता के अनुसार, श्रद्धापूर्वक की गई इस पूजा से मन में सकारात्मकता और आध्यात्मिक शांति का भाव बढ़ सकता है। आर्थिक तंगी के लिए करें दान सावन में बेलपत्र को भगवान शिव से जुड़ा महत्वपूर्ण पूजन सामग्री माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति आर्थिक परेशानियों का सामना कर रहा है तो सावन सोमवार के दिन बेलपत्र के मूल स्थान के पास किसी जरूरतमंद या शिवभक्त को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दूध, घी और अन्न का दान किया जा सकता है। मान्यता है कि जरूरतमंद की सहायता और दान-पुण्य से घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मकता का वातावरण बनता है। सावन सोमवार पर बेलपत्र चढ़ाते समय रखें इन बातों का ध्यान भगवान शिव की पूजा में बेलपत्र अर्पित करने की परंपरा प्राचीन धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है। पूजा करते समय श्रद्धा और स्वच्छता का ध्यान रखना महत्वपूर्ण माना जाता है। बेलपत्र अर्पित करते समय भगवान शिव का ध्यान करें और अपनी मनोकामना के साथ-साथ परिवार के सुख, शांति और कल्याण की प्रार्थना करें। धार्मिक अनुष्ठानों में स्थानीय परंपरा और अपने परिवार की पूजा-पद्धति का भी सम्मान करें। सावन सोमवार 2026: आस्था के साथ सेवा का भी संदेश सावन सोमवार केवल पूजा और व्रत तक सीमित नहीं है। इस अवसर पर जरूरतमंदों की सहायता, अन्नदान और सेवा को भी धार्मिक परंपराओं में विशेष महत्व दिया गया है। इसलिए यदि आप बेलपत्र से जुड़े उपाय कर रहे हैं, तो अपनी क्षमता के अनुसार किसी जरूरतमंद की मदद करना भी इस दिन को सार्थक बना सकता है।
सावन का महीना भगवान शिव की आराधना और भक्ति के लिए विशेष माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस पूरे महीने शिव पूजा, व्रत, अभिषेक, दान और कथा श्रवण का विशेष महत्व है। सावन सोमवार के साथ-साथ अलग-अलग व्रतों और उनकी विधियों का वर्णन भी धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। सावन व्रत कथा के चौथे अध्याय में भगवान शिव सनत्कुमार को धारण-पारण व्रत, मासोपवास और रुद्रवर्ती व्रत का महत्व बताते हैं। कथा में इन व्रतों की विधि, उद्यापन और उनसे जुड़े धार्मिक फलों का विस्तार से वर्णन किया गया है। क्या है धारण-पारण व्रत? भगवान शिव के अनुसार धारण-पारण व्रत की शुरुआत सावन की प्रतिपदा तिथि से की जाती है। सबसे पहले पुण्याहवाचन कराने के बाद भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए व्रत का संकल्प लिया जाता है। इस व्रत में एक दिन उपवास किया जाता है, जबकि अगले दिन पारण यानी भोजन किया जाता है। इसी क्रम को व्रत की निर्धारित अवधि तक जारी रखा जाता है। सावन मास समाप्त होने के बाद इस व्रत का उद्यापन करने का भी विधान बताया गया है। धारण-पारण व्रत के उद्यापन की विधि व्रत की समाप्ति पर सबसे पहले पुण्याहवाचन कराया जाता है। इसके बाद आचार्य और अन्य ब्राह्मणों का वरण किया जाता है। कथा के अनुसार पार्वती और भगवान शिव की स्वर्ण प्रतिमाओं को जल से भरे कलश पर स्थापित करके रात्रि में श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है। इसके बाद पुराण श्रवण आदि के साथ रात्रि जागरण किया जाता है। अगले दिन स्नान और पूजा के बाद विधिपूर्वक हवन किया जाता है। अलग-अलग मंत्रों के साथ तिल मिश्रित भात, घी मिश्रित भात और खीर की आहुति देने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद पूर्णाहुति की जाती है। अंत में ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है और आचार्य की पूजा की जाती है। कथा में इस प्रकार उद्यापन करने को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है। सावन में मासोपवास का क्या है महत्व? अध्याय-4 में भगवान शिव सावन में किए जाने वाले मासोपवास की विधि भी बताते हैं। प्रतिपदा के दिन प्रातःकाल इस व्रत का संकल्प लेने की बात कही गई है। स्त्री या पुरुष, दोनों को मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हुए व्रत करने का संदेश दिया गया है। व्रत के अंत में अमावस्या तिथि पर भगवान शिव की षोडशोपचार विधि से पूजा करने का उल्लेख है। इसके बाद अपनी सामर्थ्य के अनुसार वस्त्र, आभूषण आदि से ब्राह्मणों का पूजन, भोजन और सम्मान करने की परंपरा बताई गई है। रुद्रवर्ती व्रत क्या है? सावन व्रत कथा के इस अध्याय में रुद्रवर्ती व्रत को भी विशेष महत्व दिया गया है। कथा के अनुसार यह भगवान शिव को प्रसन्न करने वाला और अनेक धार्मिक फलों से जुड़ा व्रत माना गया है। इसके लिए कपास के 11 तंतुओं से विशेष बत्तियां बनाने का विधान बताया गया है। सावन के पहले दिन संकल्प लेकर पूरे महीने प्रतिदिन भगवान शिव की पूजा के बाद इन बत्तियों से नीराजन यानी आरती करने की बात कही गई है। कथा में अलग-अलग तरीके से एक लाख बत्तियों का नीराजन पूरा करने के विकल्पों का भी वर्णन मिलता है। घी में भिगोई हुई बत्तियों को भगवान शिव को प्रिय बताया गया है। पूजा के बाद कथा श्रवण करने का भी महत्व बताया गया है। रुद्रवर्ती व्रत से जुड़ी है सुगंधा की कथा रुद्रवर्ती व्रत के प्रभाव को समझाने के लिए कथा में उज्जयिनी नगरी की सुगंधा नामक एक स्त्री का प्रसंग आता है। कथा के अनुसार सुगंधा अपने जीवन में अनेक गलत कार्य कर चुकी थी। एक दिन क्षिप्रा नदी के तट पर पहुंचने पर उसने वहां तपस्या और पूजा में लीन ऋषियों को देखा। इसी दौरान उसकी नजर मुनि वसिष्ठ पर पड़ी। मुनि वसिष्ठ के दर्शन से उसके मन में वैराग्य और धर्म के प्रति रुचि जागी। उसने अपने किए कर्मों के लिए प्रायश्चित का मार्ग पूछा और अपने पापों से मुक्ति का उपाय जानना चाहा। मुनि वसिष्ठ ने उसे काशी जाकर भगवान शिव को प्रिय रुद्रवर्ती व्रत करने की सलाह दी। सुगंधा ने काशी में किया रुद्रवर्ती व्रत कथा के अनुसार सुगंधा अपने धन और साथियों के साथ काशी पहुंची और मुनि वसिष्ठ द्वारा बताए गए विधान के अनुसार रुद्रवर्ती व्रत किया। धार्मिक कथा में बताया गया है कि व्रत के प्रभाव से उसे परम गति प्राप्त हुई और वह भगवान शिव में विलीन हो गई। इस प्रसंग के माध्यम से कथा में यह संदेश दिया गया है कि श्रद्धा, प्रायश्चित और भक्ति के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन में आध्यात्मिक परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ सकता है। माणिक्य वर्तियों का भी बताया गया है महत्व इसके बाद कथा में माणिक्य वर्तियों के माहात्म्य का वर्णन आता है। इसमें भगवान शिव की विशेष कृपा और आध्यात्मिक फल प्राप्त होने की मान्यता बताई गई है। व्रत की पूर्णता के लिए उद्यापन की विधि भी बताई गई है। चांदी से बनी नंदी की प्रतिमा पर विराजमान भगवान शिव और माता पार्वती की स्वर्ण प्रतिमा को कलश पर स्थापित करके विधिपूर्वक पूजा करने का उल्लेख है। इसके बाद रात्रि जागरण किया जाता है। रुद्रवर्ती व्रत के उद्यापन में क्या करें? अगले दिन स्नान करके आचार्य और 11 ब्राह्मणों का वरण करने की बात कही गई है। इसके बाद रुद्रसूक्त, गायत्री मंत्र या मूल मंत्र के माध्यम से घी, खीर और बेलपत्रों से हवन करने का विधान बताया गया है। पूर्णाहुति के बाद आचार्य और अन्य ब्राह्मणों की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। इसके बाद 11 ब्राह्मणों को सपत्नीक भोजन कराने का उल्लेख मिलता है। अंत में व्रत से जुड़ी स्थापित सामग्री ब्राह्मण को दान करने की बात कही गई है। कथा में इसे अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है। सावन व्रत कथा अध्याय-4 का संदेश सावन व्रत कथा का चौथा अध्याय व्रत, संयम, पूजा, दान और प्रायश्चित के महत्व पर जोर देता है। धारण-पारण व्रत में उपवास और पारण की परंपरा, मासोपवास में आत्मसंयम और रुद्रवर्ती व्रत में भगवान शिव की आराधना को विशेष स्थान दिया गया है। सुगंधा की कथा के माध्यम से यह भी संदेश मिलता है कि मनुष्य अपने जीवन में गलतियों को स्वीकार करके सही मार्ग की ओर बढ़ सकता है। सावन का समय भक्ति के साथ-साथ आत्मचिंतन, संयम और सेवा का अवसर भी माना जाता है।
पटना। बिहार पुलिस अधीनस्थ सेवा आयोग (BPSSC) ने बिहार पुलिस रेडियो (वायरलेस) में सहायक अवर निरीक्षक (तकनीकी) भर्ती 2026 की प्रारंभिक लिखित परीक्षा स्थगित कर दी है। यह परीक्षा 5 अगस्त 2026 को आयोजित होनी थी, लेकिन आयोग ने अपरिहार्य कारणों का हवाला देते हुए इसे फिलहाल टाल दिया है। जल्द जारी होगी नई परीक्षा तिथि आयोग ने अपने आधिकारिक नोटिस में कहा है कि परीक्षा की नई तिथि जल्द घोषित की जाएगी। अभ्यर्थियों को सलाह दी गई है कि वे नियमित रूप से BPSSC की आधिकारिक वेबसाइट पर नजर बनाए रखें, ताकि परीक्षा से जुड़ी किसी भी नई सूचना से अपडेट रह सकें। 22 पदों पर होनी है भर्ती इस भर्ती अभियान के तहत बिहार पुलिस रेडियो संगठन में सहायक अवर निरीक्षक (तकनीकी) के कुल 22 पद भरे जाएंगे। इनमें सामान्य वर्ग के लिए 8, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 2, अनुसूचित जाति (SC) के लिए 3, अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए 1, अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) के लिए 4, पिछड़ा वर्ग (BC) के लिए 3 और पिछड़ा वर्ग महिला (BC Female) के लिए 1 पद आरक्षित है। तीन चरणों में होगी चयन प्रक्रिया भर्ती प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी होगी। पहले चरण में प्रारंभिक लिखित परीक्षा आयोजित की जाएगी, जिसमें सामान्य ज्ञान और तकनीकी विषयों से 100 वस्तुनिष्ठ प्रश्न पूछे जाएंगे। इसके बाद मुख्य परीक्षा होगी, जिसमें सामान्य भाषा ज्ञान और तकनीकी विषय का पेपर शामिल रहेगा। अंतिम चरण में शारीरिक दक्षता परीक्षा (PET) आयोजित की जाएगी, जिसमें दौड़, लंबी कूद, ऊंची कूद और गोला फेंक जैसी गतिविधियां शामिल होंगी। शारीरिक मानकों का रखना होगा ध्यान भर्ती के लिए पुरुष अभ्यर्थियों की न्यूनतम ऊंचाई सामान्य एवं पिछड़ा वर्ग के लिए 165 सेंटीमीटर तथा SC/ST और अत्यंत पिछड़ा वर्ग के लिए 160 सेंटीमीटर निर्धारित है। महिला अभ्यर्थियों के लिए न्यूनतम ऊंचाई 155 सेंटीमीटर और न्यूनतम वजन 48 किलोग्राम रखा गया है। पुरुष उम्मीदवारों के लिए निर्धारित सीने का माप भी अनिवार्य होगा। आयोग ने अभ्यर्थियों से अपील की है कि वे नई परीक्षा तिथि घोषित होने तक आधिकारिक सूचनाओं पर ही भरोसा करें और किसी भी अफवाह से बचें।
सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस पवित्र महीने में श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान शिव की पूजा, व्रत और अभिषेक करने से भक्त को पुण्य और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है। सावन व्रत महात्म्य में अलग-अलग व्रतों, पूजा विधियों और उनके महत्व का विस्तार से वर्णन मिलता है। सावन व्रत कथा के अध्याय-3 में सनत्कुमार भगवान शिव से श्रावण मास के व्रतों का विस्तार से वर्णन करने का आग्रह करते हैं। इसके जवाब में भगवान शिव नक्त व्रत, संकल्प, अभिषेक, लक्ष पूजा और उद्यापन सहित विभिन्न धार्मिक विधियों का महत्व बताते हैं। नक्त व्रत क्या है और इसका क्या महत्व है? कथा के अनुसार भगवान शिव बताते हैं कि जो व्यक्ति सावन के महीने में नियमपूर्वक नक्त व्रत करता है, उसे पूरे वर्ष नक्त व्रत करने के समान फल प्राप्त होता है। नक्त व्रत में भोजन के समय को लेकर गृहस्थ और यति के लिए अलग-अलग नियम बताए गए हैं। गृहस्थ व्यक्ति रात्रि में नक्त भोजन करता है, जबकि यति के लिए सूर्यास्त के आसपास निर्धारित समय में भोजन का विधान बताया गया है। संध्या काल को विशेष रूप से संयम और साधना का समय माना गया है। इस दौरान भोजन, निद्रा, मैथुन और स्वाध्याय जैसे कार्यों से विरत रहने की बात कही गई है। कथा में यह भी कहा गया है कि व्यक्ति को अपनी स्थिति और अधिकार के अनुसार नक्त व्रत का पालन करना चाहिए। सावन में व्रत के लिए करें संकल्प धार्मिक मान्यता के अनुसार सावन में नक्त व्रत शुरू करने से पहले श्रद्धालु को संकल्प लेना चाहिए कि वह नियमित स्नान करेगा, ब्रह्मचर्य का पालन करेगा, निर्धारित समय पर नक्त भोजन करेगा, भूमि पर शयन करेगा और सभी प्राणियों के प्रति दया का भाव रखेगा। कथा में भगवान शिव कहते हैं कि इस प्रकार नियमपूर्वक नक्त व्रत करने वाला व्यक्ति उन्हें अत्यंत प्रिय होता है। सावन में रुद्राभिषेक का विशेष महत्व सावन में भगवान शिव का अभिषेक करना विशेष पुण्यकारी माना गया है। कथा में प्रतिदिन रुद्र मंत्र के साथ अभिषेक करने का उल्लेख मिलता है। अतिरुद्र, महारुद्र अथवा रुद्र मंत्र के माध्यम से भगवान शिव का अभिषेक करने की बात कही गई है। भगवान शिव को जलधारा प्रिय मानी गई है, इसलिए सावन में श्रद्धापूर्वक जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने की धार्मिक परंपरा विशेष महत्व रखती है। प्रिय वस्तु का त्याग और दान सावन व्रत कथा में त्याग और दान को भी विशेष महत्व दिया गया है। मान्यता के अनुसार व्यक्ति को अपने लिए अत्यंत प्रिय किसी भोजन या सुख-सुविधा की वस्तु का संकल्पपूर्वक त्याग करके उसे योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान करना चाहिए। कथा में कहा गया है कि सावन में किसी प्रिय वस्तु का त्याग करने से उसका पुण्यफल कई गुना बढ़ जाता है। सकाम भाव से किया गया त्याग मनोकामना पूर्ति और निष्काम भाव से किया गया त्याग आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम माना गया है। लक्ष पूजा का क्या है विधान? सावन व्रत कथा में लक्ष पूजा का भी विस्तृत वर्णन मिलता है। अलग-अलग कामनाओं के लिए अलग-अलग पूजन सामग्री का उल्लेख किया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार: शांति और समृद्धि की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को बड़ी संख्या में बेलपत्र या दूर्वा से शिव पूजा करनी चाहिए। आयु की कामना के लिए चंपा के पुष्पों से पूजा का विधान बताया गया है। विद्या की कामना रखने वालों के लिए मल्लिका या चमेली के पुष्पों से पूजा का उल्लेख है। शिव और विष्णु की प्रसन्नता के लिए तुलसी दल अर्पित करने की बात कही गई है। संतान की कामना के लिए विशेष पत्तियों से शिव और विष्णु पूजन का उल्लेख मिलता है। बुरे सपनों की शांति के लिए धान्य से पूजा करना शुभ बताया गया है। इसके अलावा रंगोली या रंगवल्ली के माध्यम से कमल, स्वस्तिक और चक्र जैसे शुभ प्रतीक बनाकर भगवान की पूजा करने की परंपरा का भी वर्णन मिलता है। लक्ष पूजा के बाद कैसे करें उद्यापन? कथा में लक्ष पूजा के बाद विधिपूर्वक उद्यापन करने का विधान बताया गया है। इसके लिए मंडप का निर्माण, वेदिका की स्थापना और पुण्याहवाचन के बाद आचार्य का वरण करने की बात कही गई है। रात्रि में गीत, वाद्य, नृत्य और वेद, शास्त्र तथा पुराणों के पाठ के साथ जागरण करने का विधान बताया गया है। इसके बाद वेदिका पर शिवलिंग और चावल से कैलास का प्रतीक बनाने, पंचपल्लवयुक्त कलश स्थापित करने तथा उस पर भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित कर पूजा करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। पंचामृत, धूप, दीप और नैवेद्य से पूजा के बाद रात्रि जागरण किया जाता है। अगले दिन स्नान के बाद निर्धारित विधि से हवन और पूर्णाहुति की जाती है। ब्राह्मण पूजन और दान का महत्व उद्यापन के बाद आचार्य और अन्य ब्राह्मणों का पूजन करके उन्हें दक्षिणा देने की बात कथा में कही गई है। जिस सामग्री से लक्ष पूजा की गई हो, उसके दान का भी विधान बताया गया है। दीप पूजा करने वाले व्यक्ति के लिए दीपदान का उल्लेख मिलता है। इसके बाद भगवान शिव से अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगने और ब्राह्मणों को भोजन कराने की परंपरा बताई गई है। सावन में त्याग और पूजा से मिलता है विशेष फल कथा के अनुसार सावन महीने में श्रद्धा से किया गया त्याग और भगवान शिव की पूजा विशेष फल प्रदान करती है। किसी प्रिय वस्तु का त्याग करने पर उसके पुण्यफल में वृद्धि होने की मान्यता है। रुद्राभिषेक, पंचामृत अभिषेक, भूमि पर शयन और ब्रह्मचर्य पालन को भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया गया है। सावन व्रत कथा अध्याय-3 का मूल संदेश यही है कि भगवान शिव की आराधना केवल बाहरी पूजा तक सीमित नहीं है। संयम, त्याग, दया, अनुशासन, दान और श्रद्धा भी शिव भक्ति के महत्वपूर्ण अंग माने गए हैं।
Sawan Vrat Katha Chapter 2: सावन का महीना भगवान शिव की भक्ति और साधना के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान शिवभक्त भगवान शिव का अभिषेक, पूजन, जप और व्रत करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है और इस महीने में श्रद्धा के साथ किए गए पूजा-पाठ और व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। सावन व्रत कथा के दूसरे अध्याय में भगवान शिव सनत्कुमार को इस महीने में किए जाने वाले व्रत, पूजा, जप, संयम और अलग-अलग तिथियों के धार्मिक महत्व के बारे में बताते हैं। साथ ही सप्ताह के अलग-अलग दिनों में किए जाने वाले व्रतों का भी उल्लेख मिलता है। सावन में व्रत और रुद्राभिषेक का महत्व कथा के अनुसार भगवान शिव सनत्कुमार से कहते हैं कि श्रावण मास में व्यक्ति को अपनी क्षमता और श्रद्धा के अनुसार नियमों का पालन करना चाहिए। पूरे महीने नियमित रूप से शिव पूजा और रुद्राभिषेक करने की परंपरा बताई गई है। धार्मिक मान्यता में इस महीने में भगवान शिव को फूल, फल, धान्य और बेलपत्र आदि अर्पित करने का विशेष महत्व बताया गया है। पंचामृत से अभिषेक, शिव मंत्रों का जाप, प्रदक्षिणा, नमस्कार और वेदों का पाठ भी सावन की साधना का हिस्सा माना गया है। कथा में संयमित जीवन जीने, सत्य बोलने, ब्रह्मचर्य का पालन करने और सात्विक भोजन करने पर भी जोर दिया गया है। फलाहार या हविष्य अन्न ग्रहण करने तथा भूमि पर सोने जैसी कठोर साधनाओं का भी उल्लेख मिलता है। हालांकि, आधुनिक समय में किसी भी कठिन व्रत या खान-पान के कठोर नियम को अपनाने से पहले अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना जरूरी है। सावन में शिव मंत्र और धार्मिक पाठ सावन मास में शिव के षडक्षर मंत्र और गायत्री मंत्र का जाप करने की बात कथा में कही गई है। भगवान शिव की प्रदक्षिणा, नमस्कार और वेद-पाठ को भी पुण्यकारी बताया गया है। पुरुषसूक्त के पाठ को विशेष फलदायी माना गया है। इसी तरह ग्रह यज्ञ, होम और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों को भी सावन में महत्वपूर्ण बताया गया है। कथा के अनुसार सावन ऐसा महीना है जो सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति चाहने वाले भक्तों के लिए कामना-सिद्धि और निष्काम साधना करने वालों के लिए मोक्ष की दिशा में सहायक माना गया है। सप्ताह के किस दिन कौन-सा व्रत? सावन व्रत कथा के दूसरे अध्याय में सप्ताह के अलग-अलग दिनों से जुड़े व्रतों का भी उल्लेख किया गया है। रविवार: सूर्य व्रत सोमवार: भगवान शिव की पूजा और नक्त भोजन मंगलवार: मंगलगौरी व्रत बुधवार: बुध से संबंधित व्रत गुरुवार: बृहस्पति व्रत शुक्रवार: जीवन्ती व्रत शनिवार: हनुमान और नृसिंह व्रत कथा में श्रावण के प्रथम सोमवार से शुरू होने वाले 'रोटक' नामक व्रत का भी उल्लेख मिलता है, जिसे इच्छित फल प्रदान करने वाला बताया गया है। सावन की तिथियों में कौन-से व्रत? सावन के शुक्ल पक्ष की अलग-अलग तिथियों के लिए कथा में कई व्रत और धार्मिक अनुष्ठानों का वर्णन मिलता है। द्वितीया: औदुम्बर व्रत तृतीया: गौरी व्रत चतुर्थी: दूर्वा गणपति या विनायकी चतुर्थी पंचमी: नाग पूजा षष्ठी: सूपौदन व्रत सप्तमी: शीतला व्रत अष्टमी/चतुर्दशी: देवी का पवित्रारोपण व्रत नवमी: नक्त व्रत दशमी: आशा व्रत एकादशी: दोनों पक्षों की एकादशी का विशेष महत्व शुक्ल द्वादशी: भगवान विष्णु का पवित्रारोपण व्रत पूर्णिमा: कई धार्मिक कर्मों और अनुष्ठानों का उल्लेख कथा में श्रावण कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्ट चतुर्थी और पंचमी को मानवकल्पादि व्रत का भी उल्लेख मिलता है। सावन में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का भी महत्व कथा के अनुसार श्रावण कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण के पूर्णावतार का उल्लेख मिलता है। इसलिए इस दिन व्रत और उत्सव मनाने की बात कही गई है। श्रावण अमावस्या को पिठोरा व्रत का उल्लेख मिलता है। इस दिन कुश ग्रहण और वृषभ पूजन की परंपरा भी कथा में बताई गई है। तिथि के अनुसार किस देवता की पूजा करें? कथा में शुक्ल पक्ष की तिथियों के अलग-अलग देवताओं का भी उल्लेख किया गया है। प्रतिपदा: अग्नि द्वितीया: ब्रह्मा तृतीया: गौरी चतुर्थी: गणपति पंचमी: नाग षष्ठी: कार्तिकेय सप्तमी: सूर्य अष्टमी: शिव नवमी: दुर्गा दशमी: यम एकादशी: विश्वेदेव द्वादशी: विष्णु त्रयोदशी: कामदेव चतुर्दशी: शिव पूर्णिमा: चंद्रमा अमावस्या: पितर धार्मिक मान्यता के अनुसार जिस तिथि के जो देवता माने गए हैं, उस दिन उनकी श्रद्धापूर्वक पूजा करनी चाहिए। अगस्त्य उदय और सूर्य पूजा का उल्लेख कथा में सावन मास के दौरान अगस्त्य के उदय से जुड़ी धार्मिक मान्यता का भी वर्णन किया गया है। इसमें अगस्त्य उदय से पहले अर्घ्य देने की परंपरा बताई गई है। सावन में सूर्य को 'गभस्ति' नाम से संबोधित करते हुए उनकी पूजा करने का भी उल्लेख मिलता है। इससे यह संकेत मिलता है कि सावन की धार्मिक साधना केवल शिव आराधना तक सीमित नहीं है, बल्कि इस दौरान विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा का भी विधान बताया गया है। सावन में किन चीजों का त्याग बताया गया है? कथा में चार महीनों से जुड़ी कुछ खाद्य वस्तुओं के त्याग की परंपरा बताई गई है। श्रावण: शाक का त्याग भाद्रपद: दही का त्याग आश्विन: दूध का त्याग कार्तिक: दाल का त्याग धार्मिक मान्यता के अनुसार यदि व्यक्ति चारों महीनों में इनका त्याग नहीं कर पाता, तो केवल सावन में बताए गए त्याग का पालन करने को भी विशेष महत्व दिया गया है। सावन में भगवान शिव और विष्णु की भक्ति कथा के अंत में भगवान शिव सनत्कुमार से कहते हैं कि श्रावण मास के व्रत और धार्मिक नियमों की पूरी महिमा का वर्णन करना संभव नहीं है। भगवान शिव और भगवान विष्णु की एकता पर भी जोर दिया गया है। धार्मिक दृष्टि से दोनों के बीच भेद न करने और भक्ति भाव से साधना करने का संदेश दिया गया है। इस प्रकार सावन व्रत कथा का दूसरा अध्याय व्रत, संयम, पूजा, जप, दान और श्रद्धा के माध्यम से आध्यात्मिक अनुशासन अपनाने का संदेश देता है।
Sawan Vrat Katha Chapter 1: हिंदू धर्म में सावन मास को भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष और पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि इस महीने में व्रत, जप, तप, पूजा और भगवान शिव का ध्यान करने से भक्तों को उनकी कृपा प्राप्त होती है। सावन में सोमवार व्रत का विशेष महत्व बताया गया है, लेकिन धार्मिक ग्रंथों में इस पूरे महीने को ही व्रत और धर्म-कर्म के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। सावन व्रत कथा के प्रथम अध्याय में ऋषि शौनक और सूतजी के संवाद से कथा की शुरुआत होती है। ऋषि शौनक सूतजी से ऐसे मास के बारे में जानना चाहते हैं जो सभी महीनों में श्रेष्ठ हो और जिसमें किए गए धार्मिक कार्यों का विशेष फल प्राप्त होता हो। शौनक ऋषियों ने सूतजी से पूछा प्रश्न ऋषि शौनक ने सूतजी से कहा कि उन्होंने उनसे अनेक पवित्र महीनों और उनसे जुड़े धर्म-कर्म का महत्व सुना है। अब उनकी इच्छा ऐसे महीने के बारे में जानने की है जो सभी महीनों में सबसे श्रेष्ठ हो और भगवान को अत्यंत प्रिय हो। ऋषियों ने आग्रह किया कि यदि ऐसा कोई महीना है जिसमें किए गए व्रत, पूजा और धार्मिक कर्मों का फल अन्य समय की तुलना में अधिक माना जाता है, तो उसके बारे में विस्तार से बताया जाए। सूतजी ऋषियों की श्रद्धा और जिज्ञासा से प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि सच्चे श्रोता में श्रद्धा, विनम्रता, पवित्रता, स्थिर मन, भक्ति, ज्ञान सुनने की इच्छा और अहंकार से दूर रहने जैसे गुण होने चाहिए। उन्होंने ऋषियों में इन सभी गुणों को देखकर उन्हें सावन मास की महिमा सुनाने का निर्णय लिया। सनत्कुमार ने भगवान शिव से पूछा सावन का महत्व कथा में आगे बताया गया है कि एक समय सनत्कुमार ने भगवान शिव से धर्म और व्रतों के विषय में जानने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने भगवान शिव से पूछा कि बारह महीनों में ऐसा कौन-सा महीना है जो उन्हें सबसे अधिक प्रिय है और जिसमें किए गए धार्मिक कर्मों का विशेष फल प्राप्त होता है। सनत्कुमार ने भगवान शिव से यह भी जानना चाहा कि उस महीने में कौन-कौन से व्रत करने चाहिए, उनकी विधि क्या है, कौन व्यक्ति उन्हें कर सकता है और उनसे क्या फल प्राप्त होता है। उन्होंने व्रत के पूजन, जागरण, उद्यापन और संबंधित देवताओं की पूजा के बारे में भी विस्तार से बताने का आग्रह किया। भगवान शिव ने बताया श्रावण मास का महत्व सनत्कुमार के प्रश्न पर भगवान शिव ने कहा कि बारह महीनों में श्रावण मास उन्हें अत्यंत प्रिय है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस महीने की महिमा सुनना और इसका स्मरण करना भी पुण्यकारी माना गया है। श्रावण मास का नाम इसके धार्मिक और नक्षत्र संबंधी महत्व से भी जोड़ा जाता है। इस महीने की पूर्णिमा श्रवण नक्षत्र से संबंधित मानी जाती है। इसी कारण इसे श्रावण कहा गया है। इसकी पवित्रता और निर्मलता के कारण इसे 'नभा' नाम से भी संबोधित किया गया है। सभी व्रतों और धर्म-कर्म के लिए विशेष माना गया है सावन भगवान शिव ने सावन की महिमा बताते हुए कहा कि इस महीने में अनेक प्रकार के व्रत और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं में सावन को ऐसा महीना माना गया है जिसमें लगभग हर तिथि किसी न किसी व्रत या धार्मिक कर्म से जुड़ी हो सकती है। मान्यता के अनुसार, जो लोग अपनी मनोकामना, धन, ज्ञान, भक्ति या मोक्ष की इच्छा रखते हैं, वे इस महीने में अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार व्रत एवं धार्मिक अनुष्ठान कर सकते हैं। सावन को केवल किसी एक वर्ग के लिए सीमित नहीं माना गया है। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम से जुड़े लोग भी अपनी परंपरा और क्षमता के अनुसार इस महीने में धार्मिक साधना कर सकते हैं। सनत्कुमार ने मांगी सावन के व्रतों की पूरी जानकारी भगवान शिव की बात सुनकर सनत्कुमार ने उनसे सावन मास में किए जाने वाले सभी व्रतों की विस्तृत जानकारी देने का अनुरोध किया। उन्होंने पूछा कि किस तिथि और किस दिन कौन-सा व्रत करना चाहिए, व्रत का अधिकारी कौन है, उसकी पूजा विधि क्या है और उससे क्या फल प्राप्त होता है। उन्होंने व्रत के उद्यापन, पूजन स्थान, जागरण, देवता, पूजा सामग्री और उचित समय के बारे में भी विस्तार से बताने की प्रार्थना की। सनत्कुमार ने भगवान शिव से यह भी पूछा कि सावन मास उन्हें इतना प्रिय क्यों है, इस महीने की पवित्रता का कारण क्या है, इस महीने में भगवान का कौन-सा अवतार हुआ और इसे अन्य महीनों से श्रेष्ठ क्यों माना जाता है। भगवान शिव की महिमा का किया वर्णन सनत्कुमार ने भगवान शिव की महिमा का वर्णन करते हुए उन्हें कल्याणकारी और पापों का नाश करने वाला बताया। उन्होंने भगवान शिव को 'शिव' और 'हर' जैसे नामों से संबोधित किया। उन्होंने कहा कि भगवान शिव की महिमा इतनी व्यापक है कि एक सामान्य मनुष्य अनेक जन्मों में भी उनके प्रभाव और स्वरूप का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकता। सनत्कुमार ने भगवान शिव के स्वरूप और उनके विभिन्न धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके स्वरूप में अन्य देव शक्तियों का भी समावेश माना गया है। उन्होंने भगवान शिव की सर्वोच्चता, वैराग्य और त्याग के प्रतीक रूप में उनके श्मशान और पर्वत पर निवास का भी वर्णन किया। समुद्र मंथन और भगवान शिव का त्याग सनत्कुमार ने भगवान शिव की महिमा का वर्णन करते हुए समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष का भी उल्लेख किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार जब विष के कारण सृष्टि पर संकट आया, तब भगवान शिव ने उसे अपने कंठ में धारण कर लिया। इसी त्याग और लोककल्याण की भावना के कारण भगवान शिव को नीलकंठ के नाम से भी जाना जाता है। कथा में भगवान शिव के उस स्वरूप को याद किया गया है जो संसार की रक्षा के लिए विष तक को अपने भीतर धारण करने में समर्थ रहा। सनत्कुमार अंत में भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं कि वे सावन मास के सभी व्रत, उनके नियम, पूजा विधि, फल और धार्मिक महत्व के बारे में विस्तार से बताएं, ताकि इससे लोगों का कल्याण हो सके। सावन व्रत कथा अध्याय-1 का मुख्य संदेश: सावन मास को भगवान शिव की भक्ति, साधना, व्रत, जप और धार्मिक अनुशासन के लिए विशेष माना गया है। इस महीने की धार्मिक परंपराएं श्रद्धा, संयम, सेवा और आत्मिक साधना पर जोर देती हैं।
नई दिल्ली: भगवान शिव को समर्पित सावन का महीना हिंदू धर्म में सबसे पवित्र और शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस महीने श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई शिव आराधना से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं, जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। वर्ष 2026 में सावन मास के दौरान चार सोमवार व्रत पड़ रहे हैं, जिनका धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन के प्रत्येक सोमवार पर विशेष पूजा और कुछ खास सामग्री अर्पित करने से विभिन्न ग्रहों की शुभता बढ़ती है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आने की मान्यता है। सावन सोमवार का धार्मिक महत्व सावन का प्रत्येक सोमवार भगवान शिव की विशेष आराधना के लिए समर्पित होता है। इस दिन व्रत रखने, शिवलिंग का जलाभिषेक करने और "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जप करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है। कहा जाता है कि— अविवाहित युवाओं को योग्य जीवनसाथी मिलने का आशीर्वाद मिलता है। विवाहित दंपतियों के वैवाहिक जीवन में प्रेम और विश्वास बढ़ता है। परिवार में सुख, शांति और समृद्धि आती है। नकारात्मक ऊर्जा और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। सावन 2026 के चार सोमवार की तिथियां पहला सावन सोमवार: 3 अगस्त 2026 दूसरा सावन सोमवार: 10 अगस्त 2026 तीसरा सावन सोमवार: 17 अगस्त 2026 चौथा सावन सोमवार: 24 अगस्त 2026 चारों सोमवार पर ग्रहों को मजबूत करने के उपाय पहला सोमवार – 3 अगस्त 2026 शिवलिंग पर दूध और चावल अर्पित करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इससे शुक्र और चंद्र ग्रह की शुभता बढ़ती है तथा मानसिक शांति और पारिवारिक सुख की प्राप्ति होती है। दूसरा सोमवार – 10 अगस्त 2026 भगवान शिव को लाल मसूर की दाल और गुड़ अर्पित करें। मान्यता है कि इससे आर्थिक परेशानियां कम होती हैं और कर्ज से राहत मिलने का आशीर्वाद प्राप्त होता है। तीसरा सोमवार – 17 अगस्त 2026 इस दिन हरी मूंग और गेहूं अर्पित करें। माना जाता है कि इससे बुध और सूर्य ग्रह मजबूत होते हैं तथा बुद्धि, आत्मविश्वास और कार्यक्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है। चौथा सोमवार – 24 अगस्त 2026 शिवलिंग पर अरहर या चने की दाल अर्पित करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार इससे गुरु ग्रह की शुभता बढ़ती है और भाग्योदय के योग मजबूत होते हैं। सावन में शिवलिंग जलाभिषेक की सही विधि सावन सोमवार के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान शिव का विधिपूर्वक अभिषेक करें। पूजा के दौरान— शुद्ध जल और गंगाजल अर्पित करें। दूध, दही, शहद, घी और शक्कर से पंचामृत अभिषेक करें। अंत में पुनः शुद्ध जल चढ़ाएं। बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी पत्र, सफेद पुष्प और भस्म अर्पित करें। "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जप करें। शिव चालीसा का पाठ करें। कपूर से आरती कर फल या मिठाई का भोग लगाएं। धार्मिक मान्यता धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन के चारों सोमवार श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत एवं पूजा करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। इससे आध्यात्मिक उन्नति, मानसिक शांति, पारिवारिक सुख और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होने की मान्यता है। हालांकि, ग्रहों पर प्रभाव और अन्य धार्मिक मान्यताएं आस्था पर आधारित हैं।
Aaj Ka Suvichar Inspirational Thoughts: जीवन में सच्ची खुशी केवल धन, वैभव और सुविधाओं से नहीं मिलती, बल्कि त्याग, संतोष और निस्वार्थ सेवा की भावना से प्राप्त होती है। भगवान शिव का जीवन हमें यही संदेश देता है कि जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखकर दूसरों के हित के लिए कार्य करता है, वही वास्तविक अर्थों में समृद्ध और सफल होता है। आज का सुविचार "त्याग से बड़ा कोई आभूषण नहीं और संतोष से बड़ी कोई संपत्ति नहीं।" यह सुविचार हमें याद दिलाता है कि जीवन का सबसे बड़ा धन बाहरी ऐश्वर्य नहीं, बल्कि मन की शांति और संतोष है। इच्छाओं का अंत कभी नहीं होता, लेकिन संतोष मनुष्य को हर परिस्थिति में सुखी रहने की शक्ति देता है। भगवान शिव से मिलती है त्याग और संतोष की प्रेरणा भगवान शिव को देवों के देव महादेव कहा जाता है। उनका जीवन सादगी, त्याग और करुणा का प्रतीक है। वे कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं। उनके शरीर पर भस्म, गले में सर्प, जटाओं में मां गंगा और मस्तक पर चंद्रमा विराजमान हैं। यह स्वरूप बताता है कि महानता बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि विचारों और कर्मों में होती है। समुद्र मंथन के दौरान जब हलाहल विष निकला, तब उसके प्रभाव से पूरी सृष्टि संकट में पड़ गई। न देवता और न ही असुर उस विष को स्वीकार करने का साहस जुटा सके। ऐसे समय में भगवान शिव ने बिना किसी स्वार्थ के संपूर्ण सृष्टि की रक्षा के लिए स्वयं विष का पान किया। यही त्याग, करुणा और निस्वार्थ सेवा का सर्वोच्च उदाहरण है। जीवन की सीख जीवन में केवल पाने की इच्छा ही सुख नहीं देती, बल्कि कई बार कुछ छोड़ देने से भी मन को सच्ची शांति मिलती है। संतोषी व्यक्ति सीमित संसाधनों में भी प्रसन्न रहता है, जबकि असीमित इच्छाएं रखने वाला व्यक्ति अपार संपत्ति मिलने के बाद भी संतुष्ट नहीं हो पाता। भगवान शिव का जीवन हमें सिखाता है कि इंसान की पहचान उसके महंगे वस्त्र, धन या पद से नहीं, बल्कि उसके विचार, व्यवहार और कर्मों से होती है। आज का सफलता मंत्र आज किसी एक अनावश्यक इच्छा को टालने का प्रयास करें। जो कुछ आपके पास है, उसके लिए ईश्वर का धन्यवाद करें। बिना किसी अपेक्षा के किसी जरूरतमंद की सहायता करें। कुछ समय ध्यान या आत्मचिंतन में बिताकर अपने मन को शांत रखें। आज का संदेश भगवान शिव का जीवन हमें बताता है कि वास्तविक समृद्धि अधिक पाने में नहीं, बल्कि जो मिला है उसका सम्मान करने में है। त्याग मनुष्य को स्वार्थ से मुक्त करता है और संतोष उसे भीतर से समृद्ध बनाता है। जब मन इच्छाओं पर नियंत्रण पा लेता है, तब जीवन में सुख, शांति और आत्मिक संतुलन स्वतः आने लगता है।
आजकल बदलती जीवनशैली, कम पानी पीने की आदत और असंतुलित खानपान के कारण पथरी (स्टोन) की समस्या तेजी से बढ़ रही है। कई बार लोगों को पेट या कमर में तेज दर्द होता है, लेकिन वे इसे गैस या अपच समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। जबकि यह किडनी स्टोन या गॉलब्लैडर स्टोन का संकेत भी हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, समय पर सही पहचान और इलाज से गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि दोनों तरह की पथरी में क्या अंतर होता है और इनके लक्षण कैसे अलग-अलग होते हैं। किडनी स्टोन और गॉलब्लैडर स्टोन में क्या अंतर है? किडनी स्टोन मूत्र तंत्र (यूरिनरी सिस्टम) से जुड़ी समस्या है। यह तब बनती है जब पेशाब में मौजूद कैल्शियम, यूरिक एसिड या अन्य खनिज मिलकर कठोर कण बना लेते हैं। वहीं गॉलब्लैडर स्टोन पाचन तंत्र से जुड़ी समस्या है। यह पित्ताशय (गॉलब्लैडर) में बनती है और आमतौर पर कोलेस्ट्रॉल या बिलीरुबिन जैसे तत्वों के जमने से विकसित होती है। कई मामलों में दोनों प्रकार की पथरी लंबे समय तक बिना किसी लक्षण के भी रह सकती है। परेशानी तब शुरू होती है जब पथरी रास्ता रोकने लगती है। दर्द से कैसे करें पहचान? किडनी स्टोन के लक्षण कमर या पीठ के एक तरफ अचानक तेज दर्द होना। दर्द का पेट के निचले हिस्से या जांघ तक फैलना। दर्द का रुक-रुक कर तेज होना। पेशाब के दौरान दर्द या जलन महसूस होना। मतली या उल्टी की शिकायत होना। कुछ मामलों में पेशाब में खून भी आ सकता है। गॉलब्लैडर स्टोन के लक्षण दाईं ओर ऊपरी पेट या पसलियों के नीचे तेज दर्द। तला-भुना या ज्यादा वसायुक्त भोजन खाने के बाद दर्द बढ़ना। दर्द कई घंटों तक बना रह सकता है। मतली और उल्टी की समस्या। यदि पथरी पित्त नली में फंस जाए तो बुखार और पीलिया जैसी स्थिति भी हो सकती है। किन लोगों में अधिक होता है पथरी का खतरा? कुछ आदतें और स्वास्थ्य स्थितियां स्टोन बनने का जोखिम बढ़ा सकती हैं, जैसे- दिनभर पर्याप्त पानी न पीना। अधिक नमक और प्रोसेस्ड फूड का सेवन। मोटापा या बढ़ता वजन। नियमित शारीरिक गतिविधि की कमी। परिवार में पहले किसी को किडनी स्टोन होने का इतिहास। असंतुलित खानपान और खराब जीवनशैली। कब डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें? यदि पेट, कमर या पसलियों के नीचे लगातार तेज दर्द हो, पेशाब में खून आए, तेज बुखार, पीलिया या बार-बार उल्टी जैसी समस्या हो, तो बिना देरी किए डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। अल्ट्रासाउंड, यूरिन टेस्ट और अन्य जांचों के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि पथरी किडनी में है या गॉलब्लैडर में। समय पर पहचान और उचित उपचार से अधिकांश मरीज बिना किसी गंभीर जटिलता के स्वस्थ हो सकते हैं। नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी भी प्रकार के लक्षण दिखाई देने पर स्वयं इलाज करने के बजाय योग्य डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें।
रांची। भगवान शिव की आराधना का पवित्र महीना सावन इस वर्ष 30 जुलाई से शुरू होकर 28 अगस्त तक चलेगा। हिंदू धर्म में सावन को शिव भक्ति का सबसे शुभ समय माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और महामृत्युंजय मंत्र के जाप के माध्यम से भगवान भोलेनाथ की आराधना करते हैं। इस वर्ष सावन में चार सोमवार पड़ रहे हैं, जिन्हें विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। राजधानी रांची के प्रमुख शिव मंदिरों में भी सावन को लेकर विशेष तैयारियां शुरू हो गई हैं और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। पहाड़ी मंदिर में उमड़ेगी श्रद्धालुओं की भीड़ रातू रोड स्थित पहाड़ी मंदिर रांची के सबसे प्रसिद्ध शिवालयों में से एक है। लगभग 350 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को करीब 400 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। सावन की प्रत्येक सोमवारी को यहां विशेष जलाभिषेक, श्रृंगार और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। ऊंचाई पर स्थित होने के कारण यहां से रांची शहर का मनमोहक दृश्य भी दिखाई देता है। सुरेश्वर धाम और शिव शक्ति धाम में भी विशेष आयोजन चुटिया स्थित सुरेश्वर धाम मंदिर अपने 108 फीट ऊंचे विशाल शिवलिंग के लिए प्रसिद्ध है। सावन के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक कर सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति की कामना करते हैं। वहीं, चिरौंदी स्थित शिव शक्ति धाम प्राकृतिक वातावरण और आध्यात्मिक शांति के लिए जाना जाता है। यहां सावन के दौरान भगवान शिव और मां शक्ति की विशेष पूजा-अर्चना होती है। आस्था और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बनेंगे शिवालय सावन महीने में रांची के ये शिव मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ आध्यात्मिक ऊर्जा और शांति का भी प्रमुख केंद्र बन जाते हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि इस पवित्र माह में भगवान शिव की सच्चे मन से पूजा करने और इन शिवालयों के दर्शन करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा जीवन में सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसी कारण हर वर्ष सावन में इन मंदिरों में हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।
हिंदू धर्म और ज्योतिष शास्त्र में पितृ दोष को पूर्वजों की असंतुष्टि या उनसे जुड़े कर्मों के प्रभाव के रूप में माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में पितृ दोष हो या पूर्वजों का उचित सम्मान एवं श्राद्ध कर्म न किया जाए, तो परिवार को विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, इन मान्यताओं का वैज्ञानिक आधार उपलब्ध नहीं है और इन्हें आस्था एवं धार्मिक परंपराओं के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए। पितृ दोष के संभावित संकेत धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि किसी परिवार में लगातार कुछ विशेष समस्याएं बनी रहती हैं, तो उन्हें पितृ दोष के संकेत माना जाता है। 1. परिवार में लगातार कलह यदि घर में बिना किसी ठोस कारण के बार-बार विवाद, तनाव और मनमुटाव की स्थिति बनी रहती है, तो इसे पितृ दोष का एक संकेत माना जाता है। 2. आर्थिक परेशानियां और कर्ज मान्यता है कि कड़ी मेहनत के बावजूद आर्थिक स्थिति में सुधार न होना, लगातार कर्ज बढ़ना या धन संबंधी समस्याएं बने रहना भी पितृ दोष से जोड़ा जाता है। 3. विवाह में बाधाएं यदि विवाह में लगातार रुकावटें आ रही हों या वैवाहिक जीवन में सुख-शांति की कमी महसूस हो रही हो, तो ज्योतिष शास्त्र में इसे भी पितृ दोष का संभावित संकेत बताया गया है। 4. लंबे समय तक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बार-बार बीमारी होना या लंबे समय तक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बने रहना भी कुछ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ दोष से जुड़ा माना जाता है। 5. कार्यों में बार-बार असफलता यदि बनते हुए काम अचानक बिगड़ जाएं या लगातार प्रयासों के बावजूद सफलता न मिले, तो इसे भी पितृ दोष का संकेत माना जाता है। 6. सपनों में पूर्वज दिखाई देना धार्मिक मान्यता है कि यदि सपनों में बार-बार पूर्वज दिखाई दें, वे भोजन मांगते नजर आएं या बार-बार सांप दिखाई दे, तो इसे भी पितृ दोष का संकेत माना जाता है। पितृ दोष से मुक्ति के लिए बताए गए धार्मिक उपाय ज्योतिष शास्त्र में पितृ दोष से राहत पाने के लिए कुछ पारंपरिक उपाय बताए गए हैं। प्रतिदिन स्नान के बाद जल में काले तिल मिलाकर पितरों को अर्पित करने की मान्यता है। भगवान शिव का जल और काले तिल से अभिषेक कर मंत्रों का जाप करना भी शुभ माना जाता है। पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और दान-पुण्य करने की भी धार्मिक परंपरा है। जरूरतमंद लोगों को भोजन और वस्त्र दान करने को भी पूर्वजों की कृपा प्राप्त करने का माध्यम माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं को विवेक के साथ अपनाएं पितृ दोष से जुड़ी मान्यताएं हिंदू धार्मिक परंपराओं और ज्योतिष शास्त्र पर आधारित हैं। इन्हें वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यदि जीवन में आर्थिक, स्वास्थ्य या पारिवारिक समस्याएं हैं, तो उनके व्यावहारिक और विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए समाधान भी अपनाना आवश्यक है।
12 जुलाई को रखा जाएगा रवि प्रदोष व्रत, प्रदोष काल में करें भगवान शिव की पूजा Pradosh Vrat 2026: हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को यह व्रत रखा जाता है। जुलाई 2026 का पहला प्रदोष व्रत 12 जुलाई, रविवार को पड़ रहा है। रविवार के दिन होने के कारण इसे रवि प्रदोष व्रत या भानु प्रदोष व्रत कहा जाएगा। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करने और व्रत रखने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं तथा सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। प्रदोष व्रत 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रदोष व्रत की पूजा सूर्यास्त के समय यानी प्रदोष काल में करना सबसे शुभ माना जाता है। त्रयोदशी तिथि प्रारंभ: 12 जुलाई 2026, सुबह 02:04 बजे त्रयोदशी तिथि समाप्त: 12 जुलाई 2026, रात 10:29 बजे प्रदोष काल पूजा मुहूर्त: शाम 07:22 बजे से रात 09:24 बजे तक प्रदोष व्रत की पूजा विधि प्रदोष व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें तथा भगवान शिव के समक्ष दीपक प्रज्वलित करें। दिनभर श्रद्धा के साथ व्रत रखें। अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार निराहार या फलाहार रह सकते हैं। इस दौरान "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जप करना शुभ माना जाता है। शाम को प्रदोष काल से पहले स्नान कर पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें। इसके बाद उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके भगवान शिव की पूजा आरंभ करें। शिवलिंग का पंचामृत से अभिषेक करें और फिर चंदन, बेलपत्र, धतूरा, भांग, सफेद पुष्प तथा अक्षत अर्पित करें। इसके बाद भगवान शिव को फल और मिठाई का भोग लगाएं। अंत में शिव चालीसा और प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें तथा कपूर या दीपक से भगवान शिव की आरती करें। पूजा पूर्ण होने के बाद प्रसाद वितरित करें और विधि अनुसार व्रत का पारण करें। रवि प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रवि प्रदोष व्रत रखने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। कहा जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से कुंडली में सूर्य ग्रह की स्थिति मजबूत होती है और व्यक्ति के जीवन से अनेक बाधाएं दूर होती हैं। मान्यता यह भी है कि इस व्रत के पुण्य प्रभाव से पितृ दोष का प्रभाव कम होता है तथा यश, सम्मान, सुख-समृद्धि और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। नोट: व्रत, पूजा और शुभ मुहूर्त से जुड़ी मान्यताएं धार्मिक विश्वासों और पंचांग पर आधारित हैं। श्रद्धालु स्थानीय परंपरा या अपने पुरोहित की सलाह के अनुसार भी पूजा कर सकते हैं।
हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। जब अमावस्या सोमवार के दिन पड़ती है, तो उसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है। इस वर्ष सोमवती अमावस्या का महत्व और भी बढ़ गया है, क्योंकि इसका संयोग अधिक मास के साथ बन रहा है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, ऐसा दुर्लभ योग करीब 30 वर्षों बाद बना है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन किए गए स्नान, दान और पूजा-पाठ से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन में सुख-समृद्धि तथा सकारात्मकता का संचार होता है। आइए जानते हैं सोमवती अमावस्या के दिन किए जाने वाले कुछ महत्वपूर्ण उपाय। 1. पीपल के वृक्ष की पूजा करें ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सोमवती अमावस्या पर पीपल के वृक्ष की पूजा करना शुभ माना जाता है। पीपल की जड़ में जल में थोड़ा दूध मिलाकर अर्पित करें। एक दीपक जलाएं और पितरों का स्मरण करें। यदि पितृ दोष की समस्या हो तो काले तिल भी अर्पित करें। मान्यता है कि इससे पितरों की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। 2. तुलसी पूजा और श्रीहरि मंत्र का जाप अधिक मास भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। ऐसे में इस दिन तुलसी पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। तुलसी को जल अर्पित करें। धूप और दीप प्रज्वलित करें। सुहागिन महिलाएं श्रृंगार सामग्री अर्पित कर सकती हैं। "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का 108 बार जाप करते हुए तुलसी की परिक्रमा करें। मान्यता है कि इससे नौकरी और व्यापार में उन्नति के मार्ग खुलते हैं। 3. भगवान शिव का अभिषेक करें सोमवार भगवान शिव का प्रिय दिन माना जाता है। इस दिन शिवलिंग पर— जल, दूध, शहद, घी, शक्कर से अभिषेक करें और बेलपत्र अर्पित करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इससे भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और चंद्रमा की स्थिति मजबूत होने का आशीर्वाद मिलता है। 4. स्नान और दान का करें विशेष महत्व सोमवती अमावस्या पर पवित्र नदी में स्नान और दान को अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। अपने सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंद लोगों को— मौसमी फल, सात प्रकार के अनाज, काले तिल, भोजन सामग्री का दान किया जा सकता है। ऐसी मान्यता है कि इससे आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और घर में अन्न की कमी नहीं रहती। 5. पितरों के लिए खीर का भोग लगाएं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितरों को दूध और चावल से बनी वस्तुएं प्रिय होती हैं। दूध और चावल से बनी खीर का पितरों को भोग लगाएं। ब्राह्मणों को खीर खिलाने का भी विशेष महत्व बताया गया है। कहा जाता है कि इससे पितृ दोष शांत होता है और पुण्य फल की प्राप्ति होती है। ध्यान देने योग्य बात ये सभी उपाय धार्मिक और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में इनके पालन के तरीके भिन्न हो सकते हैं।
रक्तबीज के आतंक से कांप उठे थे तीनों लोक हिंदू धर्म में काली को आदिशक्ति का सबसे उग्र और शक्तिशाली स्वरूप माना जाता है। वह दुष्ट शक्तियों के विनाश और धर्म की रक्षा के लिए जानी जाती हैं। उनकी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा रक्तबीज नामक राक्षस के वध और उसके बाद शांत हुए उनके प्रचंड क्रोध से जुड़ी है। मान्यता है कि रक्तबीज ने कठोर तपस्या करके भगवान ब्रह्मा से ऐसा वरदान प्राप्त किया था कि उसके रक्त की हर बूंद से उसके जैसा ही एक नया दैत्य पैदा हो जाता था। इस वरदान के बल पर उसने देवताओं, ऋषियों और समस्त प्राणियों को परेशान करना शुरू कर दिया। देवताओं की पुकार पर प्रकट हुईं महाकाली जब देवता रक्तबीज का सामना करने में असफल हो गए, तब उन्होंने आदिशक्ति से सहायता की प्रार्थना की। देवताओं की विनती सुनकर देवी दुर्गा ने अपना विकराल और उग्र स्वरूप धारण किया, जिसे महाकाली कहा जाता है। महाकाली का स्वरूप अत्यंत भयावह बताया गया है। उनके हाथों में अस्त्र-शस्त्र, गले में मुंडमाला और बाहर निकली हुई लंबी जिह्वा उनके रौद्र रूप का प्रतीक मानी जाती है। हालांकि यह रूप दुष्टों के लिए विनाशकारी और भक्तों के लिए रक्षक माना जाता है। कैसे हुआ रक्तबीज का अंत? युद्ध के दौरान जब भी रक्तबीज घायल होता, उसके शरीर से गिरने वाली रक्त की बूंदों से हजारों नए राक्षस पैदा हो जाते। इससे युद्ध लगातार कठिन होता जा रहा था। तब महाकाली ने अपनी विशाल जिह्वा फैला दी और रक्तबीज के शरीर से निकलने वाले रक्त को धरती पर गिरने से पहले ही ग्रहण करना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप रक्त की एक भी बूंद भूमि पर नहीं गिर सकी और नए राक्षसों का जन्म रुक गया। अंततः मां काली ने रक्तबीज का वध कर तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्त कराया। रक्तबीज वध के बाद भी शांत नहीं हुआ क्रोध रक्तबीज के संहार के बाद भी मां काली का रौद्र रूप शांत नहीं हुआ। उनका क्रोध इतना प्रचंड था कि संपूर्ण सृष्टि संकट में पड़ गई। देवताओं को भय होने लगा कि यदि यह क्रोध जारी रहा तो ब्रह्मांड का संतुलन बिगड़ सकता है। तब सभी देवता सहायता के लिए भगवान शिव के पास पहुंचे। जब भगवान शिव मां काली के चरणों में लेट गए देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान शिव ने मां काली को शांत करने का प्रयास किया, लेकिन उनका क्रोध कम नहीं हुआ। आखिरकार भगवान शिव स्वयं मां काली के मार्ग में लेट गए। युद्ध के उन्माद में आगे बढ़ती मां काली का पैर जैसे ही शिवजी के वक्षस्थल पर पड़ा, वे अचानक ठहर गईं। अपने आराध्य पति को अपने चरणों के नीचे देखकर उन्हें अपनी स्थिति का एहसास हुआ। उसी क्षण उनका क्रोध शांत हो गया और उन्होंने अपना उग्र रूप त्याग दिया। इसी घटना के कारण मां काली की कई प्रतिमाओं में उन्हें भगवान शिव के ऊपर खड़े हुए दिखाया जाता है। क्या संदेश देती है यह कथा? यह पौराणिक कथा केवल एक धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि शक्ति और संतुलन का प्रतीक भी मानी जाती है। मां काली धर्म की रक्षा के लिए आवश्यक शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं, जबकि भगवान शिव उस शक्ति के नियंत्रण और संतुलन का। यह कथा बताती है कि शक्ति चाहे कितनी भी महान क्यों न हो, उसका संयम और संतुलन भी उतना ही आवश्यक है। नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित है। विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में कथा के विवरण में कुछ भिन्नताएं मिल सकती हैं।
Masik Shivratri हिंदू धर्म में बेहद पवित्र और फलदायी पर्व माना जाता है। हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाने वाली यह शिवरात्रि भगवान Shiva की आराधना के लिए विशेष मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत, पूजा और दान करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। माना जाता है कि मासिक शिवरात्रि भगवान शिव और शक्ति के दिव्य मिलन का प्रतीक है। यही कारण है कि इस दिन श्रद्धा और सच्चे मन से की गई पूजा और दान का विशेष महत्व बताया गया है। मई 2026 में कब है मासिक शिवरात्रि? पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 15 मई 2026 को सुबह 8 बजकर 31 मिनट से शुरू होगी और 16 मई को सुबह 5 बजकर 11 मिनट तक रहेगी। निशिता काल को ध्यान में रखते हुए मासिक शिवरात्रि का व्रत और पूजा 15 मई, शुक्रवार को किया जाएगा। इस दिन शिव भक्त उपवास रखकर भगवान शिव का अभिषेक और रात्रि पूजा करते हैं। दूध और सफेद वस्तुओं का दान मासिक शिवरात्रि पर दूध, दही, चावल, मिश्री और सफेद वस्त्रों का दान बेहद शुभ माना जाता है। सफेद रंग को शांति, पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इन वस्तुओं का दान करने से मानसिक तनाव कम होता है और भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। अन्न और भोजन का दान इस दिन गरीब और जरूरतमंद लोगों को भोजन, फल और अन्न दान करना पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि भूखे लोगों को भोजन कराने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कहा जाता है कि भगवान शिव ऐसे दान से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। तिल और घी का दान काले तिल और घी का दान भी मासिक शिवरात्रि पर विशेष महत्व रखता है। शिव मंदिर में घी का दीपक जलाना और तिल का दान करना जीवन की नकारात्मकता और बाधाओं को दूर करने वाला माना जाता है। धार्मिक विश्वास है कि इससे जीवन में शांति और स्थिरता आती है। वस्त्र और जरूरत की चीजों का दान जरूरतमंद लोगों को कपड़े, कंबल और दैनिक उपयोग की वस्तुएं दान करने से पुण्य फल प्राप्त होता है। मान्यता है कि ऐसा करने से जीवन में सकारात्मकता, सुख और संतोष बढ़ता है। धार्मिक दृष्टि से दान को केवल पुण्य का माध्यम नहीं बल्कि मानव सेवा का भी प्रतीक माना गया है। धार्मिक मान्यता मान्यता है कि मासिक शिवरात्रि पर श्रद्धा और सच्चे मन से किया गया दान भगवान शिव को प्रसन्न करता है। इससे व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का आगमन होता है। इस दिन शिव पूजा के साथ दान-पुण्य करने को विशेष फलदायी माना गया है।
हिंदू धर्म में Shiva की आराधना के लिए प्रदोष व्रत बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह व्रत हर महीने की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है और प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) में पूजा का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि इस समय भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्तों के सभी कष्टों का निवारण करते हैं। मई 2026 का महीना शिव भक्तों के लिए खास है, क्योंकि इस बार दोनों प्रदोष व्रत गुरुवार के दिन पड़ रहे हैं, जिससे Guru Pradosh Vrat का शुभ संयोग बन रहा है। यह संयोग विशेष रूप से ज्ञान, सौभाग्य और सफलता देने वाला माना जाता है। मई 2026 प्रदोष व्रत की तिथियां पहला प्रदोष व्रत – 14 मई 2026 (गुरु प्रदोष) पक्ष: ज्येष्ठ माह, कृष्ण पक्ष त्रयोदशी तिथि प्रारंभ: 14 मई, सुबह 11:20 बजे त्रयोदशी तिथि समाप्त: 15 मई, सुबह 08:31 बजे इस दिन शाम के समय प्रदोष काल में पूजा करना सबसे फलदायी रहेगा। दूसरा प्रदोष व्रत – 28 मई 2026 (गुरु प्रदोष) पक्ष: ज्येष्ठ माह, शुक्ल पक्ष त्रयोदशी तिथि प्रारंभ: 28 मई, सुबह 07:56 बजे त्रयोदशी तिथि समाप्त: 29 मई, सुबह 09:50 बजे इस दिन भी सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में पूजा का विशेष महत्व है। प्रदोष व्रत का महत्व शास्त्रों के अनुसार, प्रदोष व्रत के दिन Shiva कैलाश पर्वत पर आनंदित होकर नृत्य करते हैं। इस समय की गई पूजा और उपासना कई गुना अधिक फल देती है। गुरु प्रदोष व्रत के लाभ: शत्रुओं पर विजय जीवन में सुख-शांति ज्ञान और बुद्धि में वृद्धि करियर और कार्यों में सफलता पूजा विधि (सरल तरीके से) अगर आप प्रदोष व्रत रख रहे हैं, तो इस विधि से पूजा कर सकते हैं: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें दिनभर फलाहार या व्रत रखें शाम को प्रदोष काल में शिव मंदिर जाएं या घर पर पूजा करें शिवलिंग का पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से अभिषेक करें बेलपत्र, धतूरा, अक्षत और सफेद फूल अर्पित करें शिव चालीसा और प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें अंत में आरती करें
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।