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Russia Anti-Starlink Weapon

Anti-Starlink Weapon: रूस का नया इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, 500 KM ऊपर सैटेलाइट को कर सकता है निशाना; जानिए Volna Kupol Garant की पूरी कहानी

surbhi अगस्त 4, 2026 0
Russia’s reported Volna Kupol Garant electronic warfare system targeting Starlink satellite communications in orbit
Russia Volna Kupol Garant Anti-Starlink System

Russia Anti-Starlink Weapon: रूस ने कथित तौर पर ऐसा नया इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम विकसित किया है, जिसे Starlink सैटेलाइट नेटवर्क को बाधित करने के लिए डिजाइन किया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, Volna Kupol Garant नाम का यह सिस्टम जमीन पर मौजूद Starlink टर्मिनल्स को सीधे निशाना बनाने के बजाय अंतरिक्ष में करीब 500 किलोमीटर की ऊंचाई पर मौजूद सैटेलाइट्स के संचार सिग्नल को प्रभावित करने की कोशिश करता है।

इस दावे ने इसलिए भी ध्यान खींचा है क्योंकि Starlink नेटवर्क आधुनिक संचार व्यवस्था के साथ-साथ यूक्रेन युद्ध में सैन्य संचार के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। ऐसे में सैटेलाइट संचार को बाधित करने वाली किसी तकनीक का विकास रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट्स में इस सिस्टम की वास्तविक युद्धक क्षमता और बड़े पैमाने पर इसके प्रभाव को लेकर अभी कई सवाल मौजूद हैं।

जमीन पर टर्मिनल नहीं, सीधे सैटेलाइट पर निशाना

आमतौर पर सैटेलाइट इंटरनेट को बाधित करने के लिए जमीन पर मौजूद टर्मिनल या उसके आसपास के रेडियो लिंक को निशाना बनाया जा सकता है। लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक Volna Kupol Garant का तरीका अलग है।

बताया गया है कि यह सिस्टम शक्तिशाली रेडियो सिग्नल के जरिए अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट के रिसीविंग एंटेना को प्रभावित करने का प्रयास करता है। इसका उद्देश्य सैटेलाइट और जमीन के बीच संचार को बाधित करना है, जिससे संबंधित क्षेत्र में Starlink की इंटरनेट और संचार सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।

रिपोर्ट्स में करीब 20 किलोमीटर के क्षेत्र में सेवा बाधित होने का दावा किया गया है। हालांकि, इस दायरे और सिस्टम की वास्तविक प्रभावशीलता की स्वतंत्र पुष्टि अभी स्पष्ट नहीं है।

Volna Kupol Garant कैसे काम करता है?

रिपोर्ट के अनुसार, इस सिस्टम में इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग के लिए नैरो-बीम हाई-फ्रीक्वेंसी रेडियो सिग्नल और फेज्ड-एरे एंटेना जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है।

इसका मूल उद्देश्य सैटेलाइट के संचार रिसेप्शन को इतना प्रभावित करना है कि सिग्नल अस्थिर हो जाएं और संबंधित क्षेत्र में Starlink कनेक्टिविटी बाधित हो।

रिपोर्ट्स में Starlink के कई डेटा ट्रांसमिशन बैंड्स को प्रभावित करने की क्षमता का भी दावा किया गया है। हालांकि, इस तरह के तकनीकी दावों को स्वतंत्र परीक्षण और विश्वसनीय सार्वजनिक डेटा के बिना अंतिम निष्कर्ष के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी।

छह मॉड्यूल वाला बताया जा रहा है सिस्टम

Volna Kupol Garant को कथित तौर पर मॉड्यूलर डिजाइन के साथ तैयार किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इसके ढांचे में छह ट्रेलर-माउंटेड मॉड्यूल शामिल हैं और इनमें ऐसे एंटेना लगाए गए हैं जिन्हें अलग-अलग स्थानों से संचालित किया जा सकता है।

इस तरह की संरचना का एक संभावित फायदा यह हो सकता है कि सिस्टम को जरूरत के अनुसार अलग-अलग जगहों पर तैनात किया जा सके। लेकिन बड़े आकार और सक्रिय एंटेना के कारण इसकी मौजूदगी को इलेक्ट्रॉनिक निगरानी प्रणालियों से छिपाना चुनौतीपूर्ण भी हो सकता है।

रूस के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह तकनीक?

Starlink जैसी सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं पारंपरिक संचार नेटवर्क के बाधित होने की स्थिति में भी कनेक्टिविटी उपलब्ध करा सकती हैं। इसी वजह से आधुनिक युद्ध में सैटेलाइट संचार का रणनीतिक महत्व लगातार बढ़ रहा है।

अगर किसी देश के पास सैटेलाइट इंटरनेट नेटवर्क को बाधित करने की प्रभावी क्षमता विकसित हो जाती है, तो इसका असर केवल इंटरनेट सेवा तक सीमित नहीं रह सकता। संचार, निगरानी और युद्धक्षेत्र में सूचनाओं के आदान-प्रदान पर भी इसका रणनीतिक प्रभाव पड़ सकता है।

यही वजह है कि रूस की कथित एंटी-Starlink क्षमता को अमेरिका और यूक्रेन के लिए भी गंभीर रणनीतिक चिंता के तौर पर देखा जा रहा है।

सिस्टम की कमजोरियां भी कम नहीं

इस तकनीक की अपनी सीमाएं भी बताई जा रही हैं। बड़े आकार के उपकरण और लगातार सक्रिय रहने वाले एंटेना इसे इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस के लिए अपेक्षाकृत आसानी से पहचाने जाने वाला लक्ष्य बना सकते हैं।

इसके अलावा, किसी सिस्टम के कागज पर मौजूद तकनीकी दावे और वास्तविक युद्धक्षेत्र में उसकी क्षमता अलग-अलग हो सकती है। फिलहाल इस सिस्टम के युद्ध में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल और उसकी वास्तविक प्रभावशीलता को लेकर सार्वजनिक रूप से पर्याप्त स्वतंत्र प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

क्या Starlink के लिए बढ़ सकता है खतरा?

रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध ने सैटेलाइट इंटरनेट को आधुनिक संघर्ष का महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया है। ऐसे में Starlink जैसे नेटवर्क को बाधित करने वाली इलेक्ट्रॉनिक युद्ध तकनीकों का विकास भविष्य के युद्धों की दिशा को प्रभावित कर सकता है।

लेकिन यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि सैटेलाइट इंटरनेट नेटवर्क केवल एक तकनीक पर निर्भर नहीं होते। नेटवर्क में मौजूद सैटेलाइट्स, ग्राउंड सिस्टम और सॉफ्टवेयर स्तर पर किए जाने वाले बदलाव किसी भी जैमिंग प्रयास के प्रभाव को कम करने में भूमिका निभा सकते हैं।

इसलिए Volna Kupol Garant को फिलहाल एक संभावित एंटी-Starlink इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली के रूप में देखना अधिक उचित होगा, न कि Starlink को पूरी तरह निष्क्रिय कर देने वाले सिद्ध हथियार के तौर पर।

 

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लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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Electrochromic Coating: AC-हीटर की बिजली खपत घटाएगी स्मार्ट कोटिंग, मौसम के हिसाब से बदलेंगी दीवारें और खिड़कियां

नई दिल्ली: बढ़ती गर्मी, बदलता मौसम और लगातार बढ़ती बिजली की मांग के बीच घरों और दफ्तरों को आरामदायक तापमान पर बनाए रखना बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। खासकर गर्मियों में एयर कंडीशनर और सर्दियों में हीटर का इस्तेमाल बिजली की खपत और बिल दोनों बढ़ा देता है। इसी समस्या को कम करने के लिए वैज्ञानिक ऐसी स्मार्ट इलेक्ट्रोक्रोमिक कोटिंग पर काम कर रहे हैं, जो मौसम के हिसाब से इमारत की सतहों के व्यवहार को बदल सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह तकनीक दीवारों, छतों और खिड़कियों पर इस्तेमाल की जा सकती है। इसका उद्देश्य गर्म मौसम में सूरज की गर्मी को बाहर रखना और ठंड के दौरान इमारत के भीतर गर्माहट बनाए रखने में मदद करना है। खास बात यह है कि कोटिंग का मोड बदलने के लिए बहुत कम बिजली की जरूरत होती है, जो पारंपरिक AC या हीटर की ऊर्जा खपत की तुलना में काफी कम हो सकती है। क्या है स्मार्ट इलेक्ट्रोक्रोमिक कोटिंग? स्मार्ट इलेक्ट्रोक्रोमिक कोटिंग एक एडवांस्ड सामग्री तकनीक है, जिसे इमारतों की बाहरी सतहों और खिड़कियों पर लगाया जा सकता है। यह बाहरी मौसम के अनुसार अपने तापीय व्यवहार को बदलने में सक्षम होती है। गर्मियों में इसका इस्तेमाल सूर्य की किरणों और गर्मी को अधिक मात्रा में रिफ्लेक्ट करने के लिए किया जा सकता है। इससे इमारत के अंदर गर्मी का प्रवेश कम करने में मदद मिलती है। वहीं ठंड के मौसम में यही तकनीक गर्मी को बनाए रखने में सहायता कर सकती है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि भवन के तापमान को नियंत्रित करने का कुछ काम कोटिंग खुद संभाल सकती है, जिससे AC और हीटर पर निर्भरता घट सकती है। कैसे काम करती है यह तकनीक? रिपोर्ट के अनुसार, इस स्मार्ट कोटिंग में बेहद पतले ग्राफीन और कॉपर-बिस्मथ जैसे पदार्थों का इस्तेमाल किया गया है। इलेक्ट्रिक कंट्रोल के जरिए कोटिंग के अलग-अलग मोड बदले जा सकते हैं। इसके काम करने को आसान भाषा में इस तरह समझा जा सकता है: गर्म मौसम में कूलिंग मोड: कोटिंग सूर्य की गर्मी को रिफ्लेक्ट करने में मदद करती है, जिससे इमारत अपेक्षाकृत ठंडी रह सकती है। ठंड के मौसम में हीटिंग मोड: यह इमारत में गर्मी बनाए रखने में मदद करती है, जिससे अंदर का तापमान बढ़ाने में सहायता मिल सकती है। कम बिजली की जरूरत: मोड बदलने के लिए थोड़ी मात्रा में बिजली की आवश्यकता होती है। पावर कट के दौरान भी प्रभाव: रिपोर्ट के अनुसार, बिजली बंद होने के बाद कोटिंग आखिरी सेट किए गए मोड में काम करना जारी रख सकती है। लैब और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की छत पर किए गए परीक्षणों में इस तकनीक ने इमारत के तापमान को आसपास की हवा की तुलना में लगभग 1 डिग्री तक कम करने की क्षमता दिखाई। वहीं हीटिंग मोड में तापमान को 33 डिग्री तक बढ़ाने की क्षमता का भी उल्लेख किया गया है। AC और हीटर की खपत कितनी घट सकती है? इस तकनीक को लेकर किए गए कंप्यूटर सिमुलेशन में ऊर्जा बचत की संभावनाओं का अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ परिस्थितियों में स्मार्ट कोटिंग के इस्तेमाल से AC और हीटिंग सिस्टम की ऊर्जा खपत में औसतन 73.69 MBtu तक की कमी का अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट में इसे लगभग 21,600 यूनिट बिजली के बराबर बताया गया है। इसके अलावा, कम ऊर्जा खपत का सीधा फायदा पर्यावरण को भी हो सकता है। अनुमान के मुताबिक, प्रत्येक इमारत सालाना करीब 4,063 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन से बच सकती है। हालांकि, इन आंकड़ों को वास्तविक परिस्थितियों में लागू करने से पहले यह समझना जरूरी है कि ऊर्जा बचत इमारत की डिजाइन, स्थानीय मौसम, आकार, सामग्री और इस्तेमाल के तरीके जैसे कई कारकों पर निर्भर करेगी। सिर्फ बिजली बिल ही नहीं, पर्यावरण को भी फायदा इमारतों में ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है और इसका एक बड़ा हिस्सा तापमान नियंत्रित करने में खर्च होता है। अगर बाहरी सतहें और खिड़कियां खुद ही गर्मी के आदान-प्रदान को नियंत्रित करने में मदद करें, तो HVAC सिस्टम पर दबाव कम किया जा सकता है। इसका संभावित फायदा तीन स्तरों पर हो सकता है: AC और हीटर के इस्तेमाल में कमी बिजली की खपत और ऊर्जा लागत में संभावित बचत कार्बन उत्सर्जन कम करने में मदद यानी यह तकनीक सिर्फ घरों को ठंडा या गर्म रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य की ऊर्जा-कुशल इमारतों के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। क्या यह AC और हीटर को पूरी तरह खत्म कर देगी? फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। स्मार्ट इलेक्ट्रोक्रोमिक कोटिंग को AC या हीटर का सीधा विकल्प नहीं, बल्कि उनकी ऊर्जा जरूरत कम करने वाली सहायक तकनीक के तौर पर देखना ज्यादा उचित है। बहुत ज्यादा गर्मी या अत्यधिक ठंड वाले इलाकों में पारंपरिक HVAC सिस्टम की जरूरत बनी रह सकती है। हालांकि, अगर भवन की सतहें पहले से ही तापमान नियंत्रण में मदद करेंगी, तो AC या हीटर को कम मेहनत करनी पड़ सकती है। बाजार में आने से पहले कई चुनौतियां तकनीक की संभावनाएं आकर्षक हैं, लेकिन इसे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने से पहले कई चुनौतियों का समाधान जरूरी है। वैज्ञानिकों के सामने प्रमुख सवाल हैं कि इस कोटिंग को बड़े स्तर पर कम लागत में कैसे बनाया जाए, यह कितने वर्षों तक प्रभावी रहेगी और अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों में इसका प्रदर्शन कितना स्थिर रहेगा। खासकर बेहद ठंडे क्षेत्रों में इसकी हीटिंग क्षमता को और बेहतर बनाने की जरूरत बताई जा रही है। इसके अलावा वास्तविक इमारतों में लंबे समय तक परीक्षण के बाद ही इसकी व्यावसायिक उपयोगिता का सही आकलन किया जा सकेगा। भविष्य की इमारतों के लिए क्यों अहम है यह तकनीक? भविष्य में घर और दफ्तर सिर्फ बिजली से चलने वाले AC, हीटर और अन्य उपकरणों पर निर्भर नहीं रहेंगे। बिल्डिंग की दीवारें, छतें और खिड़कियां भी ऊर्जा प्रबंधन का हिस्सा बन सकती हैं। स्मार्ट इलेक्ट्रोक्रोमिक कोटिंग इसी दिशा में एक संभावित कदम है। अगर इसे टिकाऊ, किफायती और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिए तैयार किया जाता है, तो यह ऊर्जा की मांग कम करने और पर्यावरण पर दबाव घटाने में उपयोगी साबित हो सकती है। फिलहाल यह तकनीक विकास और परीक्षण के चरण में है, लेकिन इसकी क्षमता यह संकेत जरूर देती है कि आने वाले समय में इमारतें सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि खुद तापमान नियंत्रित करने वाली स्मार्ट संरचनाएं भी बन सकती हैं।  

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क्रिप्टो कंपनी Bitquery के पूर्व CEO पर $5 मिलियन से ज्यादा गबन का आरोप, 194 वित्तीय रिकॉर्ड मिटाने का भी दावा

न्यूयॉर्क, एजेंसियां। क्रिप्टोकरेंसी डेटा कंपनी Bitquery के पूर्व CEO और सह-संस्थापक डायोनिसियोस “डीन” कराकित्सोस पर कंपनी के 5 मिलियन डॉलर से अधिक धन के कथित गबन का आरोप लगा है। कंपनी ने मैनहट्टन सुप्रीम कोर्ट में दायर मुकदमे में दावा किया है कि कराकित्सोस ने कई वर्षों के दौरान कंपनी के पैसे अपने और सहयोगियों से जुड़े खातों में ट्रांसफर किए।   कंपनी के पैसों को निजी खातों में भेजने का आरोप   Bitquery के मुकदमे के मुताबिक, कराकित्सोस के पास कंपनी के बैंक खातों पर व्यापक नियंत्रण था। आरोप है कि उन्होंने कंपनी के धन को अपने निजी खातों और उनसे जुड़े व्यावसायिक संस्थानों में भेजा। कंपनी का दावा है कि यह कथित वित्तीय गड़बड़ी करीब 2022 से शुरू हुई, जब निवेशकों ने Bitquery में लगभग 8 मिलियन डॉलर का निवेश किया था।   इस्तीफे से पहले 194 रिकॉर्ड मिटाने का दावा   मुकदमे में Bitquery ने आरोप लगाया है कि कराकित्सोस ने अक्टूबर 2025 में कंपनी से इस्तीफा देने से कुछ समय पहले उसके QuickBooks अकाउंटिंग सिस्टम से 194 खर्च और बिल संबंधी रिकॉर्ड डिलीट किए। कंपनी का दावा है कि इन रिकॉर्ड में कथित तौर पर कंपनी के बैंक खातों से हुए उन लेनदेन की जानकारी थी, जिन्हें कराकित्सोस और उनसे जुड़े संस्थानों से जोड़ा गया है।   कंपनी ने मांगी रकम की वापसी   Bitquery ने अदालत से कथित तौर पर गबन की गई कम से कम 5 मिलियन डॉलर की रकम वापस दिलाने की मांग की है। कंपनी ने इसके साथ कानूनी खर्च और अन्य नुकसान की भरपाई की मांग भी की है। कंपनी का यह भी आरोप है कि कराकित्सोस के पास अभी भी कुछ बैंकिंग क्रेडेंशियल्स का नियंत्रण है। उनके जाने के बाद अलेक्सी स्टडनेव को कंपनी का CEO नियुक्त किया गया।   पूर्व CEO ने आरोपों से किया इनकार   कराकित्सोस ने अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि वह आरोपों से पूरी तरह असहमत हैं और कानूनी प्रक्रिया के जरिए अपना पक्ष रखेंगे। फिलहाल यह मामला अदालत में है और कंपनी द्वारा लगाए गए आरोपों की अंतिम कानूनी पुष्टि होना बाकी है।

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