नई दिल्ली, एजेंसियां। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान रोहित शर्मा ने टीम के फील्डिंग कोच टी. दिलीप के विदाई के मौके पर भावुक संदेश साझा किया। पांच साल तक भारतीय टीम के साथ रहे दिलीप के योगदान को याद करते हुए रोहित ने उनकी जमकर तारीफ की और कहा कि उन्होंने टीम के साथ “जादू कर दिया”।
टी. दिलीप का भारतीय टीम के फील्डिंग कोच के रूप में करीब पांच साल का कार्यकाल समाप्त हो गया है। उनके कार्यकाल में भारतीय टीम की फील्डिंग में काफी सुधार देखने को मिला और उन्होंने खिलाड़ियों के बीच फिटनेस, कैचिंग और मैदान पर चुस्ती को लेकर विशेष संस्कृति विकसित की।
दिलीप ने विदाई संदेश में टीम के साथ बिताए समय और खिलाड़ियों के साथ जुड़ी यादों को साझा किया। उन्होंने विशेष रूप से टीम की चर्चित ‘फील्डिंग मेडल’ परंपरा को अपने कार्यकाल की खास याद बताया।
रोहित शर्मा ने सोशल मीडिया पर दिलीप के योगदान को याद करते हुए उनके लिए सम्मान और आभार जताया। उन्होंने दिलीप के काम की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने टीम के साथ “You created magic” यानी “आपने जादू कर दिया”।
रोहित के इस संदेश से दोनों के बीच मजबूत पेशेवर रिश्ते और टीम के लिए दिलीप के योगदान का अंदाजा लगाया जा सकता है।
टी. दिलीप के जाने के बाद भारतीय टीम के फील्डिंग कोच की जिम्मेदारी सुभदीप घोष को दी गई है। अब भारतीय टीम के नए कोचिंग सेटअप में घोष पर फील्डिंग के मजबूत स्तर को बनाए रखने की जिम्मेदारी होगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
मुंबई, एजेंसियां। भारतीय क्रिकेट टीम के कोचिंग स्टाफ में बड़ा बदलाव हुआ है। सुभदीप घोष को टीम इंडिया का नया फील्डिंग कोच नियुक्त किया गया है। वह टी. दिलीप की जगह यह जिम्मेदारी संभालेंगे। घोष के पास घरेलू क्रिकेट, आईपीएल, राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी और भारतीय महिला टीम के साथ काम करने का अनुभव है। घरेलू क्रिकेट में रहा शानदार अनुभव सुभदीप घोष ने अपने खेल के दिनों में असम और रेलवे का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने 1994 से 2005 के बीच 17 प्रथम श्रेणी और 17 लिस्ट-ए मुकाबले खेले। 34 मैचों के इस करियर में उन्होंने 623 रन बनाए और 16 कैच भी लपके। आईपीएल और एनसीए का भी अनुभव घोष आईपीएल में कोलकाता नाइट राइडर्स के सहयोगी स्टाफ का हिस्सा रह चुके हैं और 2014 में टीम के खिताबी अभियान से जुड़े थे। वह दिल्ली कैपिटल्स के फील्डिंग कोच के रूप में भी काम कर चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने बेंगलुरु स्थित राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी (NCA) में भी कोचिंग की है, जहां उन्होंने राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण के साथ काम किया। महिला टीम और अंडर-19 टीम के साथ भी काम सुभदीप घोष 2021 में भारतीय महिला टीम के फील्डिंग कोच बने थे। उन्होंने हरमनप्रीत कौर और स्मृति मंधाना जैसी खिलाड़ियों के साथ काम किया। 2026 में वह भारत की अंडर-19 विश्व कप विजेता टीम के फील्डिंग कोच भी रहे। श्रीलंका सीरीज से शुरू होगा नया कार्यकाल घोष का भारतीय पुरुष टीम के साथ नया कार्यकाल श्रीलंका के खिलाफ आगामी टेस्ट सीरीज से शुरू होगा। भारत और श्रीलंका के बीच दो टेस्ट मैचों की सीरीज 15 अगस्त से शुरू होनी है। नए फील्डिंग कोच के सामने टीम की मजबूत क्षेत्ररक्षण परंपरा को आगे बढ़ाने की चुनौती होगी।
Duleep Trophy 2026: भारतीय घरेलू क्रिकेट के प्रतिष्ठित टूर्नामेंट दलीप ट्रॉफी के 2026-27 सीजन के लिए सभी छह जोन की टीमें सामने आ गई हैं। इस बार टूर्नामेंट में कई ऐसे खिलाड़ी नजर आएंगे, जिनके पास अंतरराष्ट्रीय और आईपीएल क्रिकेट का अनुभव है। टूर्नामेंट का आयोजन बेंगलुरु स्थित बीसीसीआई सेंटर ऑफ एक्सिलेंस में किया जाना है। इस बार कप्तानी की जिम्मेदारी ईशान किशन, रजत पाटीदार, रुतुराज गायकवाड़ और तिलक वर्मा जैसे खिलाड़ियों को मिली है। सेंट्रल जोन की कमान रजत पाटीदार को और वेस्ट जोन की कप्तानी रुतुराज गायकवाड़ को सौंपी गई है। छह टीमों में दिखेगा युवा और अनुभवी खिलाड़ियों का मेल दलीप ट्रॉफी में इस बार छह जोन हिस्सा ले रहे हैं—नॉर्थ ईस्ट, नॉर्थ, ईस्ट, वेस्ट, सेंट्रल और साउथ जोन। टीमों में अनुभवी अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के साथ घरेलू क्रिकेट में उभर रहे युवा सितारों को भी जगह मिली है। ईस्ट जोन की कमान ईशान किशन को दी गई है, जबकि युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी को उपकप्तान बनाया गया है। ईस्ट की टीम में मोहम्मद शमी, मुकेश कुमार, कुमार कुशाग्र और अभिमन्यु ईश्वरन जैसे नाम भी शामिल हैं। सेंट्रल जोन रजत पाटीदार कप्तान और रिंकू सिंह उपकप्तान हैं। टीम में आर्यन जुयाल, सारांश जैन, हर्ष दुबे, यश ठाकुर और कुणाल सिंह राठौड़ जैसे खिलाड़ी शामिल हैं। पाटीदार के लिए यह टूर्नामेंट खास हो सकता है। पिछले सीजन में भी उन्होंने सेंट्रल जोन की कप्तानी की थी और टीम को खिताब दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। वेस्ट जोन रुतुराज गायकवाड़ टीम की अगुआई करेंगे, जबकि शम्स मुलानी उपकप्तान हैं। टीम में पृथ्वी शॉ, सरफराज खान, मुशीर खान, शार्दुल ठाकुर, तनुष कोटियन और तुषार देशपांडे जैसे चर्चित नाम हैं। साउथ जोन साउथ जोन की कप्तानी तिलक वर्मा करेंगे और रिकी भुई उपकप्तान हैं। टीम में करुण नायर, एन जगदीशन, श्रेयस गोपाल, आर स्मरण और एसके रशीद जैसे खिलाड़ी शामिल हैं। नॉर्थ जोन नॉर्थ जोन की कमान कन्हैया वधावन को दी गई है और आयुष बडोनी उपकप्तान हैं। टीम में अर्शदीप सिंह, अब्दुल समद, यश ढुल, निशांत सिंधु और अंशुल कंबोज जैसे खिलाड़ी शामिल हैं। नॉर्थ ईस्ट जोन नॉर्थ ईस्ट जोन की टीम में तेची नेरी, रॉबिन लिंबू, बिश्वोरजीत सिंह कोंथौजाम, इमलीवाती लेम्तुर, किशन लिंडोह और जोसेफ लाल थानखुमा समेत कई खिलाड़ी शामिल हैं। साउथ और सेंट्रल को सीधे सेमीफाइनल में जगह टूर्नामेंट का फॉर्मेट इस बार भी नॉकआउट आधारित है। साउथ और सेंट्रल जोन को पिछले संस्करण में फाइनल खेलने के कारण सीधे सेमीफाइनल में प्रवेश दिया गया है। वहीं क्वार्टर फाइनल में ईस्ट जोन का मुकाबला नॉर्थ ईस्ट जोन से और वेस्ट जोन का सामना नॉर्थ जोन से होगा। दोनों मुकाबलों के विजेता सेमीफाइनल में सेंट्रल और साउथ जोन से भिड़ेंगे। दलीप ट्रॉफी क्यों है अहम? दलीप ट्रॉफी भारतीय क्रिकेट में खिलाड़ियों के लिए घरेलू स्तर पर अपनी क्षमता साबित करने का बड़ा मंच है। खासतौर पर टेस्ट क्रिकेट के लिए टीम चयन की दौड़ में शामिल खिलाड़ियों के लिए यहां का प्रदर्शन महत्वपूर्ण हो सकता है। इस बार टूर्नामेंट में मोहम्मद शमी, रुतुराज गायकवाड़, सरफराज खान, रजत पाटीदार, तिलक वर्मा, ईशान किशन और अर्शदीप सिंह जैसे नामों की मौजूदगी इसे और दिलचस्प बना रही है। अब नजर इस बात पर होगी कि युवा खिलाड़ियों में से कौन अपनी छाप छोड़ता है और अनुभवी सितारों में से कौन घरेलू क्रिकेट में दमदार प्रदर्शन के जरिए चयनकर्ताओं का ध्यान खींचने में सफल रहता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। श्रीलंका के खिलाफ दो मैचों की टेस्ट सीरीज के लिए भारतीय टीम में शामिल किए गए जम्मू-कश्मीर के तेज गेंदबाज आकिब नबी अपने टेस्ट डेब्यू से महज एक कदम दूर हैं। जसप्रीत बुमराह के चोटिल होकर सीरीज से बाहर होने के बाद बीसीसीआई ने आकिब को टीम में शामिल किया। हालांकि अंतिम एकादश में उन्हें मौका मिलेगा या नहीं, इस पर फैसला मैच से पहले होगा। पिता पढ़ाई पर देना चाहते थे जोर आकिब नबी का क्रिकेट सफर आसान नहीं रहा। जब उन्हें किशोर अवस्था में बीसीसीआई के तेज गेंदबाजी शिविर में हिस्सा लेने का मौका मिला, तब वे 12वीं की बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। उनके पिता, जो एक सरकारी स्कूल में शिक्षक थे, चाहते थे कि बेटा पढ़ाई पर ध्यान दे और मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी करे। दोस्त ने बदली जिंदगी की दिशा आकिब के करीबी दोस्त और पूर्व क्लब कप्तान जुबैर डार ने उनके पिता को समझाया कि ऑस्ट्रेलिया के महान तेज गेंदबाज ग्लेन मैक्ग्रा से सीखने का मौका बार-बार नहीं मिलेगा। आखिरकार पिता मान गए और उन्होंने आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद आकिब को हवाई जहाज से चेन्नई भेजने की व्यवस्था की। यही फैसला आगे चलकर उनके क्रिकेट करियर का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन का मिला इनाम आकिब नबी ने घरेलू क्रिकेट में लगातार बेहतरीन प्रदर्शन किया, जिसके दम पर उन्हें भारतीय टेस्ट टीम में जगह मिली। वह करीब 13 साल बाद जम्मू-कश्मीर से भारतीय टेस्ट टीम में चुने जाने वाले पहले क्रिकेटर बने हैं। सादगी आज भी बरकरार जुबैर डार का कहना है कि सफलता और पहचान मिलने के बाद भी आकिब बिल्कुल नहीं बदले हैं। उनके अनुसार, आकिब आज भी बेहद सरल स्वभाव के हैं और अपने पुराने दोस्तों से पहले की तरह जुड़े हुए हैं। श्रीनगर से टीम इंडिया तक का सफर बारामूला के शीरी गांव के रहने वाले आकिब ने सीमित संसाधनों के बीच अपने क्रिकेट करियर की शुरुआत की। शुरुआती दिनों में कश्मीर में टर्फ विकेट की कमी के बावजूद उन्होंने कड़ी मेहनत जारी रखी। अब वह भारतीय टेस्ट टीम के साथ हैं और श्रीलंका के खिलाफ संभावित डेब्यू का इंतजार कर रहे हैं। यदि उन्हें अंतिम एकादश में मौका मिलता है, तो यह न सिर्फ उनके लिए, बल्कि जम्मू-कश्मीर क्रिकेट के लिए भी एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी।