भुवनेश्वर, एजेंसियां। पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने Gen Z यानी नई युवा पीढ़ी की बढ़ती भूमिका को लेकर बड़ा बयान दिया है। भुवनेश्वर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि Gen Z ऐसी ताकत है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने युवाओं की आकांक्षाओं और उनके संकल्प को देश के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण बताया।
धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि देश के युवाओं की महत्वाकांक्षाएं और उनका दृढ़ संकल्प बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ युवाओं की भूमिका और उनकी आकांक्षाओं से जुड़े इस दृष्टिकोण को साझा किया है।
उनकी टिप्पणी ऐसे समय आई है जब भारत में Gen Z की सामाजिक और राजनीतिक भागीदारी को लेकर चर्चा तेज है। हाल के महीनों में युवा आंदोलन और डिजिटल माध्यमों से युवाओं की सक्रियता ने भी इस पीढ़ी की भूमिका को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाया है।
प्रधान के बयान को शिक्षा व्यवस्था में नई पीढ़ी की जरूरतों और आकांक्षाओं को अधिक महत्व देने की व्यापक बहस से भी जोड़कर देखा जा रहा है। आज के युवा डिजिटल तकनीक, AI, रोजगार और कौशल आधारित शिक्षा को लेकर पहले की तुलना में अलग अपेक्षाएं रखते हैं।
नई शिक्षा नीति के तहत भी कौशल, बहुविषयक शिक्षा और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है। ऐसे में Gen Z की बदलती जरूरतों के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था को विकसित करना महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है।
यहां यह तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है कि धर्मेंद्र प्रधान अब केंद्रीय शिक्षा मंत्री नहीं हैं। उन्होंने 25 जुलाई 2026 को शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। इसके बाद प्रल्हाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारत में शिक्षा पर सरकारी खर्च को लेकर UNESCO की 2026 SDG 4 Scorecard रिपोर्ट में महत्वपूर्ण आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में शिक्षा पर होने वाला सार्वजनिक खर्च कुल सरकारी खर्च का 14.2% है, जो UNESCO के 15% न्यूनतम बेंचमार्क से कम है। 2015 में भारत में शिक्षा की हिस्सेदारी कुल सरकारी खर्च में 15.7% थी। GDP के 4% बेंचमार्क से ऊपर भारत रिपोर्ट में भारत की स्थिति का दूसरा पहलू भी सामने आया है। शिक्षा पर सरकारी खर्च GDP का करीब 4.1% है। यह UNESCO के Education 2030 Framework में बताए गए कम से कम 4% GDP के बेंचमार्क से थोड़ा ऊपर है। यानी भारत एक वित्तीय मानक पूरा करता है, लेकिन दूसरे में 15% की सीमा से नीचे है। UNESCO के अनुसार 4% GDP और 15% कुल सार्वजनिक खर्च को शिक्षा वित्तपोषण के न्यूनतम अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क के रूप में देखा जाता है। दोनों को अलग-अलग संकेतक माना जाता है और देशों की आर्थिक संरचना के अनुसार इनके परिणाम अलग हो सकते हैं। 2015 के मुकाबले शिक्षा की हिस्सेदारी घटी UNESCO के आंकड़ों के मुताबिक भारत के कुल सरकारी खर्च में शिक्षा की हिस्सेदारी 2015 के 15.7% से घटकर 2024 में 14.2% रह गई। यानी इस अवधि में शिक्षा की हिस्सेदारी में लगभग 1.5 प्रतिशत अंक की कमी आई है। यह आंकड़ा शिक्षा क्षेत्र में सरकारी निवेश की प्राथमिकता को लेकर चर्चा बढ़ा सकता है। खास तौर पर स्कूलों, शिक्षकों, डिजिटल सुविधाओं, उच्च शिक्षा और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में बढ़ती जरूरतों के बीच शिक्षा वित्तपोषण महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। दिल्ली सरकार ने प्राइवेट यूनिवर्सिटी से जुड़ा नया विधेयक मंजूर कर लिया है। प्रस्तावित दिल्ली प्राइवेट यूनिवर्सिटीज बिल के तहत राजधानी में स्थापित होने वाली निजी विश्वविद्यालयों में हर पाठ्यक्रम की 25% सीटें दिल्ली के छात्रों के लिए आरक्षित रखने का प्रावधान किया गया है। विधेयक को अब दिल्ली विधानसभा में पेश किया जाएगा। दिल्ली के छात्रों को मिलेगा 25% सीटों का लाभ प्रस्तावित कानून का सबसे बड़ा प्रावधान स्थानीय छात्रों के लिए सीटों का आरक्षण है। इसके तहत निजी विश्वविद्यालयों के प्रत्येक पाठ्यक्रम में 25% सीटें दिल्ली के छात्रों के लिए निर्धारित करने का प्रस्ताव है। सरकार का उद्देश्य दिल्ली के विद्यार्थियों को राजधानी में ही उच्च शिक्षा के अधिक अवसर उपलब्ध कराना है। निजी और विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए रास्ता साफ प्रस्तावित विधेयक दिल्ली में निजी और विदेशी विश्वविद्यालयों की स्थापना का रास्ता आसान करने के साथ-साथ उनके लिए एक नियामक ढांचा तैयार करेगा। इससे विश्वविद्यालयों के संचालन, प्रशासन और जवाबदेही से जुड़े नियमों को व्यवस्थित करने की कोशिश की जाएगी। इसके अलावा प्रस्ताव में विश्वविद्यालयों को उनकी परिचालन और विकास संबंधी जरूरतों के अनुसार फीस संरचना तय करने की व्यवस्था भी शामिल है। विधानसभा में पेश होगा विधेयक दिल्ली कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद अब विधेयक को विधानसभा में पेश किए जाने की तैयारी है। कानून बनने के बाद दिल्ली में निजी विश्वविद्यालयों के संचालन और स्थानीय छात्रों के लिए सीटों के प्रावधान को नया कानूनी आधार मिलेगा। सरकार का कहना है कि इस पहल से दिल्ली के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा के अवसर बढ़ेंगे और उन्हें पढ़ाई के लिए दूसरे राज्यों या विदेश जाने की जरूरत कम हो सकती है।
नोएडा: प्राइवेट स्कूलों की मनमानी फीस बढ़ोतरी पर गौतम बुद्ध नगर जिला प्रशासन ने सख्त कार्रवाई की है। 2026-27 शैक्षणिक सत्र के लिए निर्धारित सीमा से अधिक फीस बढ़ाने या फीस संबंधी नियमों का उल्लंघन करने वाले सात निजी स्कूलों पर ₹1-1 लाख का जुर्माना लगाया गया है। यह फैसला जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम की अध्यक्षता में हुई जिला फीस रेगुलेटरी कमेटी की बैठक में लिया गया। कमेटी ने निजी स्कूलों की प्रस्तावित फीस बढ़ोतरी और फीस स्ट्रक्चर की समीक्षा करने के बाद नियमों के उल्लंघन की पुष्टि की। 6 स्कूलों ने तय सीमा से ज्यादा बढ़ाई फीस जिला प्रशासन के अनुसार, समीक्षा में सामने आया कि छह स्कूलों ने 2026-27 सत्र के लिए निर्धारित 7.23 प्रतिशत की अधिकतम सीमा से ज्यादा फीस बढ़ाई थी। वहीं, नोएडा के सेक्टर-21 स्थित एक अन्य स्कूल पर कंपोजिट फीस के अलावा अलग से वार्षिक शुल्क लेने का मामला सामने आया। इसके साथ ही स्कूल ने 2025-26 सत्र का फीस स्ट्रक्चर अपनी वेबसाइट पर भी उपलब्ध नहीं कराया था। कमेटी ने इन मामलों को संबंधित कानून के तहत पहली बार किए गए उल्लंघन के तौर पर माना। इसके बाद सभी सात स्कूलों पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया। 45 स्कूलों को पहले जारी हुआ था नोटिस प्रशासन ने बताया कि फीस नियमों के उल्लंघन को लेकर कार्रवाई अचानक नहीं की गई। तय सीमा से ज्यादा फीस बढ़ाने वाले 45 स्कूलों को पहले नोटिस जारी किए गए थे। इन स्कूलों को नियमों का पालन करने और फीस संबंधी अनियमितताओं को सुधारने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, नोटिस के बाद भी सात स्कूल निर्धारित नियमों के मुताबिक सुधार नहीं कर पाए। इसके बाद जिला फीस रेगुलेटरी कमेटी ने उनके खिलाफ जुर्माने की कार्रवाई की। प्राइवेट स्कूल मनमाने तरीके से नहीं बढ़ा सकते फीस जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि उत्तर प्रदेश सेल्फ-फाइनांस्ड इंडिपेंडेंट स्कूल्स (फी रेगुलेशन) एक्ट के तहत निजी स्कूलों को निर्धारित नियमों का पालन करना जरूरी है। स्कूल प्रशासन अपनी मर्जी से तय सीमा से अधिक फीस नहीं बढ़ा सकता और न ही नियमों के विपरीत अतिरिक्त शुल्क वसूल सकता है। फीस स्ट्रक्चर से जुड़ी जानकारी और निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन करना भी जरूरी है। आगे भी जारी रहेगी निगरानी जिला प्रशासन ने कहा है कि निजी स्कूलों की फीस वृद्धि पर निगरानी जारी रहेगी। अगर भविष्य में कोई स्कूल निर्धारित नियमों का उल्लंघन करता पाया जाता है, तो उसके खिलाफ कड़ी कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई की जा सकती है। फीस में लगातार बढ़ोतरी से परेशान अभिभावकों के लिए प्रशासन की यह कार्रवाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्कूलों को फीस रेगुलेशन से जुड़े नियमों का पालन करने का स्पष्ट संदेश गया है।