नई दिल्ली, एजेंसियां। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) में बड़ी संख्या में पद खाली होने का मामला सामने आया है। संसद की प्राक्कलन समिति (Committee on Estimates) ने अपनी रिपोर्ट में NCERT में 1,596 पद रिक्त होने पर चिंता जताई है। समिति ने इन रिक्तियों को जल्द से जल्द भरने के लिए समयबद्ध और तेज भर्ती प्रक्रिया अपनाने की जरूरत बताई है। रिपोर्ट 12 अगस्त 2026 को लोकसभा में पेश की गई थी।
रिपोर्ट के अनुसार NCERT में 1,596 पद खाली हैं, जो संस्थान की स्वीकृत पद संख्या का आधे से अधिक हिस्सा है। इसमें अकादमिक, शिक्षण और प्रशासनिक स्तर के पद शामिल हैं। इतनी बड़ी संख्या में रिक्तियां होने से NCERT के कामकाज और शिक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यों पर दबाव बढ़ने की चिंता जताई गई है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि NCERT देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तक और शैक्षणिक सामग्री तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
संसदीय समिति ने कहा कि NCERT में खाली पदों को भरने के लिए पहले भी समयबद्ध भर्ती की सिफारिश की जा चुकी है, लेकिन बड़ी संख्या में पद अब भी खाली हैं। समिति ने सभी रिक्तियों और बैकलॉग पदों को मिशन मोड में भरने की जरूरत बताई है।
समिति की पिछली सिफारिशों में भी स्थायी पदों पर भर्ती पूरी करने पर जोर दिया गया था। इससे साफ है कि रिक्तियों का मुद्दा नया नहीं है और लंबे समय से भर्ती प्रक्रिया में तेजी लाने की मांग होती रही है।
संसदीय समिति ने NCERT से सभी रिक्तियों, जिसमें बैकलॉग पद भी शामिल हैं, को मिशन मोड में भरने और 2026 के अंत तक प्रक्रिया पूरी करने की दिशा में काम करने को कहा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
भागलपुर, एजेंसियां। बिहार के भागलपुर से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में पटना हाईकोर्ट ने कॉलेजों के शिक्षकों का विश्वविद्यालय विभागों में स्थानांतरण करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे नियमों के अनुरूप नहीं माना है। अदालत के फैसले से संबंधित शिक्षकों की नियुक्ति, पदस्थापन और विश्वविद्यालयों में उनके स्थानांतरण को लेकर स्थिति महत्वपूर्ण हो गई है। कॉलेज शिक्षकों के स्थानांतरण पर उठे सवाल मामला तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (TMBU) से जुड़ा है। कॉलेजों में कार्यरत शिक्षकों को विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर विभागों में स्थानांतरित किए जाने को लेकर विवाद अदालत तक पहुंचा था। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि कॉलेज और विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर विभागों में शिक्षकों की नियुक्ति एवं सेवा संबंधी व्यवस्था अलग है। ऐसे में केवल प्रशासनिक आदेश के आधार पर कॉलेज शिक्षकों को विश्वविद्यालय विभागों में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने नियमों का दिया हवाला मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने संबंधित सेवा नियमों और विश्वविद्यालय की वैधानिक व्यवस्था को ध्यान में रखा। कोर्ट ने माना कि कॉलेज से विश्वविद्यालय विभाग में इस तरह का स्थानांतरण वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं था। फैसले के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन के उन आदेशों पर असर पड़ सकता है, जिनके तहत कॉलेजों के शिक्षकों को विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर विभागों में भेजा गया था। विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने नई चुनौती हाईकोर्ट के फैसले के बाद तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय प्रशासन को शिक्षकों के पदस्थापन से जुड़े मामलों की समीक्षा करनी पड़ सकती है। संबंधित शिक्षकों की वर्तमान स्थिति और आगे की कार्रवाई अदालत के आदेश के अनुपालन में तय की जाएगी। इस फैसले का असर विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों में शिक्षकों की उपलब्धता और कॉलेजों में शिक्षण व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण फैसला कॉलेज और विश्वविद्यालय विभागों में शिक्षकों की नियुक्ति एवं स्थानांतरण से जुड़े नियम लंबे समय से उच्च शिक्षा प्रशासन का महत्वपूर्ण विषय रहे हैं। हाईकोर्ट का यह फैसला विश्वविद्यालयों को सेवा नियमों और वैधानिक प्रक्रिया के अनुसार ही शिक्षकों की नियुक्ति या पदस्थापन करने का संदेश देता है। हालांकि, किसी शिक्षक की व्यक्तिगत सेवा स्थिति पर अंतिम प्रभाव अदालत के आदेश की विस्तृत शर्तों और विश्वविद्यालय द्वारा किए जाने वाले अनुपालन से स्पष्ट होगा।
नई दिल्ली, एजेंसियां। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने कक्षा 12वीं की सप्लीमेंट्री/कंपार्टमेंट परीक्षा 2026 का रिजल्ट जारी कर दिया है। बोर्ड ने परिणाम 12 अगस्त 2026 को घोषित किया। परीक्षा में कंपार्टमेंट श्रेणी के 53.08 प्रतिशत विद्यार्थी सफल हुए हैं। 2.75 लाख से ज्यादा विद्यार्थियों ने दी परीक्षा इस साल कक्षा 12वीं की सप्लीमेंट्री परीक्षा के लिए कुल 2,91,576 विद्यार्थियों ने योग्यता हासिल की थी। इनमें से 2,75,287 विद्यार्थियों ने परीक्षा दी। परीक्षा में कंपार्टमेंट के साथ-साथ कुछ विद्यार्थियों ने अपने अंकों में सुधार के लिए भी हिस्सा लिया था। कंपार्टमेंट श्रेणी में इस बार 53.08 प्रतिशत विद्यार्थियों ने सफलता हासिल की, यानी पिछले साल की तुलना में पास प्रतिशत में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। DigiLocker से भी डाउनलोड कर सकते हैं रिजल्ट CBSE 12वीं सप्लीमेंट्री रिजल्ट विद्यार्थी DigiLocker के जरिए भी देख और डाउनलोड कर सकते हैं। इसके अलावा परिणाम से संबंधित ऑनलाइन सेवाओं के माध्यम से मार्कशीट प्राप्त की जा सकती है। रिजल्ट चेक करने के लिए विद्यार्थियों को अपने जरूरी परीक्षा विवरण दर्ज करने होंगे। डिजिटल मार्कशीट का इस्तेमाल आगे की पढ़ाई और प्रवेश प्रक्रिया में किया जा सकता है। फेल विद्यार्थियों को मिला दूसरा मौका सप्लीमेंट्री परीक्षा का उद्देश्य उन विद्यार्थियों को दोबारा अवसर देना है, जो मुख्य परीक्षा में किसी विषय में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाए थे। इसके अलावा नियमों के तहत कुछ विद्यार्थी अपने प्रदर्शन में सुधार के लिए भी इस परीक्षा में शामिल हुए। इस परिणाम के बाद सफल विद्यार्थियों के लिए आगे की पढ़ाई और कॉलेज प्रवेश का रास्ता आसान होगा। वहीं जिन विद्यार्थियों को परिणाम से संबंधित कोई आपत्ति है, उनके लिए CBSE की ओर से आगे की प्रक्रिया और समयसीमा की जानकारी जारी की जा सकती है। कैसे चेक करें CBSE 12वीं सप्लीमेंट्री रिजल्ट? विद्यार्थी अपना परिणाम ऑनलाइन चेक करने के लिए: CBSE के परिणाम पोर्टल पर जाएं। कक्षा 12वीं सप्लीमेंट्री रिजल्ट के लिंक पर क्लिक करें। मांगी गई जानकारी दर्ज करें। सबमिट करने के बाद स्क्रीन पर परिणाम दिखाई देगा। रिजल्ट डाउनलोड करके भविष्य के लिए सुरक्षित रख लें।
नई दिल्ली, एजेंसियां। दिल्ली के सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में बच्चों को मिलने वाले मिड-डे मील यानी पीएम-पोषण के मेन्यू में बदलाव किया गया है। अब बच्चों को जल्द ही इडली-सांभर भी परोसा जाएगा। शिक्षा निदेशालय ने स्कूलों और भोजन उपलब्ध कराने वाली एजेंसियों को 24 अगस्त तक जरूरी तैयारियां पूरी करने का निर्देश दिया है। कई व्यंजनों में किया गया बदलाव संशोधित मेन्यू में इडली-सांभर को शामिल करने के साथ कुछ पुराने व्यंजनों में भी बदलाव किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक रागी हलवा की जगह गेहूं का आटा और चना मसाला, जबकि सब्जियों वाली दलिया की जगह ज्वार और बाजरा आधारित विकल्प शामिल किए गए हैं। 24 अगस्त तक तैयारी पूरी करने का निर्देश शिक्षा निदेशालय ने स्कूलों, केंद्रीकृत रसोई और संबंधित एजेंसियों को नए मेन्यू के अनुसार भोजन तैयार करने की व्यवस्था करने को कहा है। भोजन की गुणवत्ता, पोषण और खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन भी सुनिश्चित करना होगा।