मुंबई, एजेंसियां। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बैंकिंग क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती भूमिका को लेकर बड़ा बयान दिया है। FIBAC 2026 में बोलते हुए उन्होंने कहा कि AI आने वाले समय में बैंकिंग और खासकर लोन देने की प्रक्रिया में वही बदलाव ला सकता है, जो UPI ने डिजिटल भुगतान में किया है।
RBI गवर्नर के मुताबिक AI बैंकिंग में क्रेडिट आकलन और लोन वितरण को ज्यादा तेज और सटीक बना सकता है। बैंक ग्राहक के लेनदेन, भुगतान व्यवहार और अन्य उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण कर यह बेहतर तरीके से समझ सकेंगे कि कौन-सा ग्राहक कर्ज के लिए योग्य है।
इससे ऐसे छोटे कारोबारी और ग्राहक भी औपचारिक बैंकिंग क्रेडिट तक पहुंच सकते हैं, जो पारंपरिक व्यवस्था में पर्याप्त दस्तावेज या संपार्श्विक के अभाव में पीछे रह जाते हैं।
AI का दूसरा बड़ा इस्तेमाल धोखाधड़ी की पहचान में होगा। AI बड़ी मात्रा में लेनदेन का विश्लेषण करके असामान्य गतिविधियों और संदिग्ध पैटर्न को तेजी से पहचान सकता है। इससे बैंक संभावित फ्रॉड वाले लेनदेन पर समय रहते कार्रवाई कर सकेंगे। AI का इस्तेमाल जोखिम प्रबंधन और अनुपालन में भी किया जा सकता है, जिससे बैंकों को संभावित जोखिमों की पहचान और निगरानी में मदद मिलेगी।
RBI गवर्नर ने AI को वित्तीय समावेशन के लिए भी महत्वपूर्ण बताया। तकनीक की मदद से बैंक ग्रामीण क्षेत्रों, छोटे कारोबारियों और कम सेवा पाने वाले वर्गों तक बैंकिंग एवं क्रेडिट सेवाएं ज्यादा प्रभावी ढंग से पहुंचा सकते हैं।
इसका मतलब है कि AI का फायदा केवल बड़े शहरों और बड़े ग्राहकों तक सीमित रखने के बजाय किसानों, MSME और छोटे कारोबारियों तक पहुंचाने पर जोर रहेगा।
मल्होत्रा ने बैंकों को AI अपनाने के साथ जवाबदेही और मानव निगरानी बनाए रखने की चेतावनी भी दी। उनका कहना है कि किसी AI सिस्टम के फैसले के लिए जिम्मेदारी तकनीक या उसके विक्रेता पर डालना उचित नहीं होगा। साइबर सुरक्षा, एल्गोरिदम में पक्षपात और गलत फैसलों जैसे जोखिमों को ध्यान में रखते हुए AI का जिम्मेदारी से इस्तेमाल जरूरी है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली। देश में महंगाई का दबाव जुलाई में बढ़ता नजर आया है। सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक जुलाई 2026 में खुदरा महंगाई दर (CPI) बढ़कर 4.45 प्रतिशत हो गई, जबकि जून में यह 4.38 प्रतिशत थी। खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी इसका प्रमुख कारण रही। खासतौर पर प्याज, लहसुन और अदरक के दामों में तेज वृद्धि ने घरेलू बजट पर दबाव बढ़ाया है। खाद्य महंगाई भी बढ़ी जुलाई में खाद्य महंगाई दर 5.52 प्रतिशत रही, जो जून के 5.32 प्रतिशत से अधिक है। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महंगाई 5.79 प्रतिशत रही, जबकि शहरी इलाकों में यह 5.05 प्रतिशत दर्ज की गई। महंगाई में बढ़ोतरी के बावजूद जुलाई का आंकड़ा अर्थशास्त्रियों के करीब 4.50 प्रतिशत के अनुमान से थोड़ा नीचे रहा। प्याज, लहसुन और अदरक के दामों ने बढ़ाई चिंता रसोई में सबसे ज्यादा असर कुछ चुनिंदा सब्जियों और मसालों की कीमतों में देखने को मिला। प्याज की महंगाई जून के 4.73 प्रतिशत से बढ़कर जुलाई में 22.54 प्रतिशत हो गई। लहसुन की महंगाई 17.93 प्रतिशत से बढ़कर 35.36 प्रतिशत पहुंच गई। वहीं अदरक की महंगाई दर 83.62 प्रतिशत के बेहद ऊंचे स्तर पर पहुंच गई, जो जून में 50.41 प्रतिशत थी। इन जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेज उछाल से आम परिवारों के मासिक रसोई बजट पर सीधा असर पड़ा है। कुछ सब्जियों से मिली राहत महंगाई की तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं रही। कुछ सब्जियों की कीमतों में गिरावट भी दर्ज की गई। आलू की कीमतों में सालाना आधार पर 16.56 प्रतिशत की गिरावट रही। इसके अलावा भिंडी में 5.52 प्रतिशत, मटर में 5.27 प्रतिशत और टमाटर में 4.59 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। रसोई के बाहर भी बढ़ी महंगाई महंगाई का दबाव सिर्फ खाद्य पदार्थों तक सीमित नहीं रहा। जुलाई में परिवहन से जुड़ी महंगाई बढ़कर 4.43 प्रतिशत रही। व्यक्तिगत देखभाल और विविध सेवाओं की महंगाई दर 14.77 प्रतिशत तक पहुंच गई। वहीं होटल और रेस्टोरेंट सेवाओं में महंगाई 7.72 प्रतिशत रही। कपड़े और जूते-चप्पल 3.38 प्रतिशत, शिक्षा 3.64 प्रतिशत, मकान किराया 2.22 प्रतिशत और स्वास्थ्य सेवाओं में 1.34 प्रतिशत की महंगाई दर्ज की गई। RBI के 4% लक्ष्य से ऊपर महंगाई जुलाई की 4.45 प्रतिशत खुदरा महंगाई दर RBI के 4 प्रतिशत लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। हालांकि यह 2 से 6 प्रतिशत के निर्धारित सहिष्णुता दायरे के भीतर है। RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अपने महंगाई अनुमान में भी बदलाव किया है। केंद्रीय बैंक को उम्मीद है कि वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और सप्लाई में सुधार से आगे कीमतों पर कुछ दबाव कम हो सकता है। आने वाले महीनों में भी रह सकता है दबाव RBI के अनुमानों के अनुसार महंगाई में आने वाले महीनों में कुछ और बढ़ोतरी हो सकती है। दूसरी तिमाही के लिए महंगाई का अनुमान 4.7 प्रतिशत रखा गया है, जबकि तीसरी तिमाही में यह 5.9 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। चौथी तिमाही में इसके घटकर करीब 5.5 प्रतिशत आने की संभावना जताई गई है। ऐसे में आने वाले महीनों में खाद्य वस्तुओं की कीमतें, मौसम, सप्लाई और कच्चे तेल का रुझान महंगाई की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।
मुंबई, एजेंसियां। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेजी देखने को मिल रही है। 12 अगस्त 2026 को ब्रेंट क्रूड करीब 90 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया। बुधवार को ब्रेंट क्रूड वायदा करीब 89.63 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था, जबकि अमेरिकी WTI भी करीब 84 डॉलर के आसपास रहा। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर चिंता तेल की कीमतों में तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह मध्य-पूर्व में जारी तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के दोबारा खुलने को लेकर अनिश्चितता बताई जा रही है। इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। यहां किसी भी तरह की बाधा से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका रहती है। भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता? भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा होने से देश का आयात बिल बढ़ सकता है और रुपये पर दबाव आ सकता है। बुधवार को कारोबार की शुरुआत में भी रुपये पर क्रूड की बढ़ती कीमतों का असर देखा गया। महंगे कच्चे तेल का असर आगे चलकर महंगाई, परिवहन लागत, विमानन, पेंट, रसायन और अन्य तेल-आधारित उद्योगों पर भी पड़ सकता है। शेयर बाजार पर भी पड़ा असर क्रूड के 90 डॉलर के करीब पहुंचने से भारतीय शेयर बाजार के निवेशकों की चिंता बढ़ी है। महंगे तेल से भारत के व्यापार घाटे और कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ने की आशंका के कारण सेंसेक्स और निफ्टी पर भी दबाव देखने को मिला। अगर कच्चा तेल लंबे समय तक 90 डॉलर के आसपास बना रहता है, तो बाजार की नजर अब रुपये की चाल, महंगाई और पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर रहेगी।
मुंबई, एजेंसियां। ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स और टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म Shiprocket का IPO आज, 12 अगस्त 2026, को सब्सक्रिप्शन के लिए खुल गया है। कंपनी ने शेयर का प्राइस बैंड ₹92 से ₹97 प्रति शेयर तय किया है। निवेशक इस इश्यू में 14 अगस्त तक बोली लगा सकेंगे। ₹1,617 करोड़ से ज्यादा का है IPO Shiprocket IPO का कुल आकार करीब ₹1,617.5 करोड़ है। इसमें लगभग ₹885.5 करोड़ का फ्रेश इश्यू और करीब ₹732 करोड़ का ऑफर फॉर सेल (OFS) शामिल है। कंपनी ने IPO खुलने से पहले एंकर निवेशकों से करीब ₹727.41 करोड़ जुटाए हैं। रिटेल निवेशकों के लिए कितना पैसा चाहिए? IPO में न्यूनतम लॉट 154 शेयरों का है। ऊपरी प्राइस बैंड ₹97 के हिसाब से एक लॉट के लिए न्यूनतम निवेश करीब ₹14,938 होगा। कंपनी के शेयरों की BSE और NSE पर लिस्टिंग प्रस्तावित है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक लिस्टिंग 19 अगस्त को होने की संभावना है। IPO से मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल Shiprocket फ्रेश इश्यू से जुटाई रकम का इस्तेमाल मुख्य रूप से टेक्नोलॉजी और प्लेटफॉर्म के विस्तार, कर्ज चुकाने तथा सामान्य कॉरपोरेट जरूरतों के लिए करेगी। कंपनी का कारोबार खास तौर पर ई-कॉमर्स कारोबारियों, MSME और D2C ब्रांड्स को लॉजिस्टिक्स एवं अन्य डिजिटल सेवाएं उपलब्ध कराने पर केंद्रित है। निवेशकों के लिए अहम बात Shiprocket का कारोबार तेजी से बढ़ा है और FY26 में कंपनी की आय करीब ₹2,077 करोड़ रही, लेकिन कंपनी अभी भी शुद्ध घाटे में है। इसलिए IPO में निवेश करने वालों को कंपनी की ग्रोथ के साथ-साथ मुनाफे में आने की क्षमता और जोखिमों को भी ध्यान में रखना चाहिए।