नई दिल्ली, एजेंसियां। क्रेडिट कार्ड का भुगतान समय पर नहीं करने वाले ग्राहकों के लिए बैंकों की सख्ती एक बार फिर चर्चा में है। हाल ही में HDFC Bank के एक मामले में सिर्फ 46 पैसे के बकाये पर ₹1,200 की पेनल्टी लगाए जाने की घटना सोशल मीडिया पर सामने आई। हालांकि यह एक व्यक्तिगत मामला है और संबंधित पोस्ट बाद में हटा दी गई, लेकिन इसने क्रेडिट कार्ड के लेट पेमेंट चार्ज को लेकर बहस तेज कर दी है। बकाया रकम छोटी हो, भुगतान जरूरी क्रेडिट कार्ड धारकों को केवल बड़ी रकम ही नहीं, बल्कि पूरी बकाया राशि समय पर चुकाने पर ध्यान देना चाहिए। थोड़ी रकम भी बकाया रहने पर बैंक के नियमों के अनुसार लेट पेमेंट शुल्क और अन्य संबंधित शुल्क लग सकते हैं। RBI के नियमों के तहत ऐसे शुल्क देय तारीख के बाद बकाया राशि पर लगाए जाने चाहिए, पूरी बिल राशि पर नहीं। 2027 से तीन दिन की राहत का नया नियम RBI ने क्रेडिट कार्ड खातों को लेकर एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है। 1 अप्रैल 2027 से किसी खाते को ‘past due’ मानने या लेट पेमेंट पेनल्टी लगाने के लिए भुगतान देय तारीख के बाद तीन दिन से अधिक बकाया रहना जरूरी होगा। यानी केवल एक-दो दिन की देरी पर इस नियम के तहत पेनल्टी नहीं लगाई जा सकेगी। बैंकों के चार्ज में भी बदलाव इस बीच कुछ बैंक अपने क्रेडिट कार्ड शुल्क में बदलाव कर रहे हैं। उदाहरण के लिए Axis Bank 28 अगस्त 2026 से लेट पेमेंट शुल्क की संरचना में बदलाव करने जा रहा है, जिसमें ₹50,000 से अधिक बकाया वाले कार्डधारकों पर नए शुल्क लागू होंगे। ग्राहकों को क्या सावधानी रखनी चाहिए क्रेडिट कार्ड धारकों को हर महीने बिल की अंतिम तारीख और कुल भुगतान राशि जरूर जांचनी चाहिए। केवल ‘Minimum Amount Due’ चुकाने से पूरा बिल साफ नहीं होता और शेष राशि पर ब्याज लग सकता है। साथ ही किसी शुल्क में बदलाव होने पर बैंक को ग्राहक को पहले से इसकी जानकारी देनी होती है।
मुंबई, एजेंसियां। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले दबाव में बना हुआ है। 19 अगस्त 2026 को रुपया 95.7525 प्रति डॉलर पर बंद हुआ, जबकि पिछले सत्र में यह 95.68 पर था। यह जुलाई के बाद रुपये का सबसे कमजोर बंद स्तर है। कच्चा तेल 92 डॉलर के करीब पहुंचा रुपये पर सबसे बड़ा दबाव कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से आ रहा है। ब्रेंट क्रूड लगातार चार कारोबारी सत्रों में बढ़कर करीब 91.87 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अनिश्चितता और अमेरिका-ईरान तनाव ने तेल आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं। 96 रुपये प्रति डॉलर का स्तर बना अहम बाजार में अब 96 रुपये प्रति डॉलर का स्तर मनोवैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कारोबारियों के मुताबिक यदि रुपये पर दबाव बढ़ता है तो यह स्तर टूट सकता है। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक की संभावित डॉलर बिक्री ने रुपये की गिरावट को सीमित करने में मदद की है। महंगे तेल से बढ़ सकता है आयात बिल भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल बढ़ता है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ सकती है और रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। ऊंची तेल कीमतें महंगाई के लिए भी जोखिम बढ़ाती हैं। RBI की हालिया MPC बैठक के मिनट्स में भी तेल कीमतों को महंगाई के प्रमुख जोखिमों में गिना गया है। RBI की नजर रुपये और तेल दोनों पर रुपये में तेज गिरावट रोकने के लिए RBI के बाजार में हस्तक्षेप की संभावना बनी हुई है। विश्लेषकों के अनुसार आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमत, डॉलर की मांग, पश्चिम एशिया की स्थिति और RBI का रुख रुपये की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक होंगे।
मुंबई, एजेंसियां। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की अगस्त मौद्रिक नीति समिति (MPC) बैठक के जारी मिनट्स में महंगाई बढ़ने के जोखिम को लेकर सदस्यों की चिंता सामने आई है। MPC ने भले ही रेपो दर को 5.25% पर स्थिर रखने का फैसला किया था, लेकिन मिनट्स से संकेत मिला है कि यदि खाद्य, ईंधन और कच्चे तेल की कीमतों का दबाव बढ़ता है तो आने वाले महीनों में मौद्रिक नीति को सख्त किया जा सकता है। महंगाई बढ़ी तो दरों में बढ़ोतरी संभव RBI की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता समेत कुछ सदस्यों ने संकेत दिया कि मौजूदा महंगाई परिदृश्य में ब्याज दरों में और कटौती की गुंजाइश सीमित है। अगर महंगाई के दबाव में तेजी आती है और यह व्यापक रूप लेता है तो 2026 की तीसरी तिमाही में दर बढ़ाने का विकल्प खुला रह सकता है। कच्चा तेल और खाद्य कीमतें बनी चिंता MPC सदस्यों ने पश्चिम एशिया के तनाव, कच्चे तेल की अस्थिर कीमतों और खाद्य वस्तुओं की कीमतों को महंगाई के लिए प्रमुख जोखिम बताया। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी चेतावनी दी कि अगर खाद्य, ईंधन और इनपुट लागत में बढ़ोतरी व्यापक होती है तो महंगाई पर दूसरा दौर का असर देखने को मिल सकता है। रेपो रेट फिलहाल 5.25% पर बरकरार अगस्त की बैठक में MPC के सभी छह सदस्यों ने रेपो रेट 5.25% पर बनाए रखने के पक्ष में मतदान किया था। समिति ने अपना रुख ‘न्यूट्रल’ रखा है। FY2026-27 के लिए RBI ने महंगाई का अनुमान करीब 5% और आर्थिक विकास दर का अनुमान 6.7% रखा है। बाजार की नजर अगली MPC बैठक पर मिनट्स में दिखी सख्त भाषा के बाद बाजार की नजर अब आगामी आंकड़ों और RBI के अगले कदम पर है। SBI Research ने अगस्त के मिनट्स को पिछले एक साल में सबसे ज्यादा ‘हॉकिश’ संकेत वाला बताया है, हालांकि कुछ विश्लेषकों का मानना है कि RBI तत्काल दर बढ़ाने के बजाय कुछ समय तक महंगाई के आंकड़ों पर नजर रख सकता है।
मुंबई, एजेंसियां। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) को HDFC Bank में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 9.99% तक करने की मंजूरी दे दी है। HDFC Bank ने 19 अगस्त को स्टॉक एक्सचेंजों को दी जानकारी में बताया कि RBI ने LIC के आवेदन के आधार पर यह अनुमति दी है। खबर सामने आने के बाद 20 अगस्त को शुरुआती कारोबार में HDFC Bank के शेयर में 1% से ज्यादा की तेजी देखी गई। अभी LIC के पास कितनी हिस्सेदारी 14 अगस्त 2026 की उपलब्ध जानकारी के अनुसार LIC के पास HDFC Bank की 4.11% हिस्सेदारी है। नई मंजूरी के बाद LIC अपनी हिस्सेदारी करीब 5.88 प्रतिशत अंक तक बढ़ा सकती है और अधिकतम 9.99% तक पहुंच सकती है। किन शर्तों के साथ मिली मंजूरी RBI की मंजूरी बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949, RBI के 2025 के शेयर अधिग्रहण संबंधी दिशा-निर्देश, FEMA और SEBI के नियमों समेत लागू कानूनों के पालन के अधीन है। LIC को इन सभी नियामकीय शर्तों का पालन करना होगा। HDFC Bank के शेयर पर दिखा असर RBI की मंजूरी की खबर से HDFC Bank का शेयर बाजार में चर्चा में आ गया। गुरुवार के शुरुआती कारोबार में शेयर 1% से अधिक चढ़ा। निवेशकों की नजर अब इस बात पर रहेगी कि LIC वास्तव में अतिरिक्त हिस्सेदारी कब और किस कीमत पर खरीदती है। HDFC Bank के तिमाही नतीजे भी मजबूत HDFC Bank ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 19,059 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ दर्ज किया, जो पिछले साल की समान तिमाही के मुकाबले करीब 5% अधिक है। बैंक का शुद्ध ब्याज आय (NII) भी 7% बढ़कर 33,530 करोड़ रुपये रही।
मुंबई, एजेंसियां। कोटक महिंद्रा बैंक ने अपने पहले डॉलर बॉन्ड इश्यू के जरिए 650 मिलियन डॉलर जुटाए हैं। बैंक ने पांच साल की अवधि वाले इन बॉन्ड की कीमत अमेरिकी ट्रेजरी के मुकाबले 108 बेसिस पॉइंट के प्रीमियम पर तय की है। इश्यू को एशिया और यूरोप के निवेशकों से मजबूत प्रतिक्रिया मिली। 650 मिलियन डॉलर का फंड जुटाया कोटक महिंद्रा बैंक ने पांच साल की अवधि वाले सीनियर नोट्स जारी कर 650 मिलियन डॉलर जुटाए। इन बॉन्ड पर कूपन दर 5.478 प्रतिशत तय की गई है। यह बैंक का अंतरराष्ट्रीय डॉलर बॉन्ड बाजार में पहला प्रवेश है। 2.1 अरब डॉलर की मिली बोलियां बॉन्ड इश्यू को निवेशकों से करीब 2.1 अरब डॉलर की बोलियां मिलीं। मजबूत मांग के कारण बैंक शुरुआती मूल्य संकेत की तुलना में बेहतर दर पर फंड जुटाने में सफल रहा। निवेशकों में एसेट मैनेजर और पेंशन फंड जैसे संस्थागत निवेशक भी शामिल रहे। RBI की स्वैप सुविधा का मिला फायदा कोटक का यह कदम ऐसे समय आया है जब भारतीय बैंक RBI की विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधा का लाभ उठाकर डॉलर में फंड जुटा रहे हैं। RBI ने इस सुविधा को पहले तय समय से एक महीने पहले 31 अगस्त 2026 को बंद करने का फैसला किया है। इसी वजह से कई बैंक जल्द से जल्द विदेशी बॉन्ड बाजार में उतर रहे हैं। फंड का इस्तेमाल सामान्य कारोबारी जरूरतों में बैंक के अनुसार बॉन्ड से प्राप्त राशि का इस्तेमाल फंडिंग स्रोतों में विविधता लाने और सामान्य कॉर्पोरेट उद्देश्यों के लिए किया जाएगा। कोटक समेत भारतीय बैंकों की विदेशी बाजार से फंड जुटाने की गतिविधियां इस साल तेजी से बढ़ी हैं।
मुंबई, एजेंसियां। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकिंग प्रणाली में मौजूद अतिरिक्त तरलता को नियंत्रित करने के लिए ₹1.5 लाख करोड़ तक की overnight Variable Rate Reverse Repo (VRRR) नीलामी का ऐलान किया है। यह नीलामी 18 अगस्त 2026 को आयोजित की जा रही है। RBI ने मौजूदा और आगे की तरलता परिस्थितियों की समीक्षा के बाद यह कदम उठाया है। 9:30 से 10 बजे तक होगी नीलामी RBI के मुताबिक नीलामी 18 अगस्त को सुबह 9:30 बजे से 10 बजे के बीच होगी। यह एक दिन की अवधि वाली overnight VRRR सुविधा है, यानी बैंकों द्वारा RBI के पास रखी गई राशि अगले दिन बैंकिंग प्रणाली में वापस आ जाएगी। VRRR से क्या करता है RBI? VRRR का इस्तेमाल RBI बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त नकदी को अस्थायी रूप से सोखने के लिए करता है। इसमें बैंक अपनी अतिरिक्त धनराशि RBI के पास रखते हैं और बदले में उन्हें ब्याज मिलता है। इससे बाजार में उपलब्ध अतिरिक्त तरलता घटती है और अल्पकालिक ब्याज दरों को नियंत्रित करने में RBI को मदद मिलती है। इसे रेपो नीलामी का उल्टा समझ सकते हैं—रेपो के जरिए RBI बैंकों को पैसा देता है, जबकि VRRR में बैंक अपना अतिरिक्त पैसा RBI के पास रखते हैं। ₹1.5 लाख करोड़ की पूरी रकम लेना जरूरी नहीं यह ध्यान रखना जरूरी है कि ₹1.5 लाख करोड़ अधिकतम अधिसूचित राशि है, इसका मतलब यह नहीं है कि RBI अनिवार्य रूप से पूरी ₹1.5 लाख करोड़ राशि सोखेगा। वास्तविक रकम बैंकों की बोलियों और उस समय की तरलता स्थिति पर निर्भर करेगी। इससे पहले 11 अगस्त को RBI ने ₹1 लाख करोड़ की overnight VRRR नीलामी की थी, जिसमें एक दिन के लिए अतिरिक्त बैंकिंग तरलता को सोखने की व्यवस्था की गई थी। बाजार पर क्या असर पड़ेगा? VRRR से बैंकिंग सिस्टम की अतिरिक्त नकदी कुछ समय के लिए RBI के पास चली जाती है। इसका उद्देश्य मनी मार्केट में ब्याज दरों को व्यवस्थित रखना और अतिरिक्त तरलता को नियंत्रित करना है। हालांकि, यह कदम अपने आप में मौद्रिक नीति को सख्त करने का संकेत नहीं माना जाना चाहिए; VRRR मुख्य रूप से RBI का liquidity management tool है।
मुंबई, एजेंसियां। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने गैर-निवासी भारतीयों (NRI) से विदेशी मुद्रा जुटाने में बैंकों की मदद करने वाली FCNR(B) डिपॉजिट से जुड़ी विशेष विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधा को तय समय से एक महीने पहले बंद करने का फैसला किया है। यह सुविधा अब 30 सितंबर 2026 के बजाय 31 अगस्त 2026 तक ही उपलब्ध रहेगी। RBI का यह फैसला ऐसे समय आया है जब इस योजना के जरिए उम्मीद से कहीं ज्यादा विदेशी मुद्रा भारत में आ चुकी है। 52.3 अरब डॉलर की FCNR(B) राशि जुटी RBI की इस विशेष व्यवस्था के तहत बैंकों ने अब तक करीब 52.3 अरब डॉलर यानी लगभग ₹4.9 लाख करोड़ की FCNR(B) जमा जुटाई है। इसके अलावा बाहरी वाणिज्यिक उधारी (ECB) और अन्य विदेशी मुद्रा उधारी से भी करीब 4.5 अरब डॉलर का अतिरिक्त प्रवाह आया है। कुल मिलाकर इस पैकेज से 50 अरब डॉलर से अधिक विदेशी मुद्रा भारत में आई है। इससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने और रुपये पर दबाव कम करने में मदद मिली। RBI की पहल के बाद देश का विदेशी मुद्रा भंडार 700 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच गया। आखिर एक महीने पहले क्यों बंद की गई सुविधा? इस सुविधा को मूल रूप से 30 सितंबर तक चलाने की योजना थी। लेकिन RBI को उम्मीद से काफी ज्यादा विदेशी मुद्रा प्राप्त हो गई। Reuters के अनुसार, केंद्रीय बैंक को अब इस सुविधा को आगे जारी रखने से सीमित अतिरिक्त लाभ दिखाई दे रहा है। साथ ही बहुत ज्यादा विदेशी मुद्रा प्रवाह से घरेलू बाजार में अतिरिक्त तरलता, बाहरी देनदारियों और भविष्य में जमा राशि की परिपक्वता से जुड़े जोखिमों को लेकर भी चिंता बढ़ सकती है। बैंकों को अब जल्दी जुटानी होगी डॉलर फंडिंग RBI के फैसले का सीधा असर उन बैंकों पर पड़ा है जो FCNR(B) जमा के जरिए डॉलर जुटा रहे थे। कई भारतीय बैंक अब इस विंडो के बंद होने से पहले तेजी से विदेशी मुद्रा जुटाने की तैयारी कर रहे हैं। Reuters के मुताबिक ICICI Bank और HDFC Bank करीब 1.5-1.5 अरब डॉलर जुटाने की योजना बना रहे हैं। Axis Bank, YES Bank, RBL Bank और Kotak Mahindra Bank भी विदेशी बाजार से फंड जुटाने की तैयारी में हैं। रुपये पर क्या होगा असर? RBI का यह कदम ऐसे समय आया है जब कच्चे तेल की कीमत 91 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचने के कारण रुपये पर पहले से दबाव है। 18 अगस्त को रुपये के 95.68-95.72 प्रति डॉलर के आसपास कमजोर खुलने का अनुमान लगाया गया था। विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधा को जल्दी बंद करने के फैसले ने भी बाजार में रुपये को लेकर चिंता बढ़ाई है।
मुंबई, एजेंसियां। भारतीय शेयर बाजार में गुरुवार को उतार-चढ़ाव भरा कारोबार रहा। कारोबारी सत्र के अंत में BSE सेंसेक्स 113.61 अंक यानी 0.15% की बढ़त के साथ 78,079.96 पर बंद हुआ, जबकि NSE निफ्टी 50 38.10 अंक यानी 0.16% गिरकर 24,395.85 पर बंद हुआ। गुरुवार को डेरिवेटिव एक्सपायरी के कारण बाजार में खासा उतार-चढ़ाव देखने को मिला। निफ्टी में गिरावट, सेंसेक्स मामूली बढ़त के साथ बंद दिनभर के कारोबार में बाजार को स्पष्ट दिशा नहीं मिल सकी। सेंसेक्स ने जहां अंत में बढ़त बनाए रखी, वहीं निफ्टी 24,400 के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे बंद हुआ। बाजार में इंडेक्सों के बीच यह अंतर कारोबारी सत्र की अस्थिरता को दिखाता है। कच्चे तेल की कीमत और वैश्विक तनाव का असर निवेशकों की नजर लगातार मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव और करीब 88 डॉलर प्रति बैरल के आसपास चल रहे कच्चे तेल पर रही। महंगे तेल से भारत के महंगाई और राजकोषीय स्थिति पर दबाव बढ़ने की आशंका ने बाजार की धारणा को प्रभावित किया। बैंकिंग शेयरों पर दबाव बैंकिंग और वित्तीय शेयरों में करीब 0.4% की गिरावट दर्ज की गई। RBI की प्रस्तावित लोन-प्राइसिंग व्यवस्था में बदलाव को लेकर बाजार में यह चिंता बनी हुई है कि इससे बैंकों की प्राइसिंग क्षमता और मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है। वहीं, टाटा मोटर्स के शेयर करीब 3.9% चढ़े, क्योंकि कंपनी के तिमाही नतीजों और भविष्य की मांग को लेकर सकारात्मक संकेत मिले।
नई दिल्ली। देश में महंगाई का दबाव जुलाई में बढ़ता नजर आया है। सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक जुलाई 2026 में खुदरा महंगाई दर (CPI) बढ़कर 4.45 प्रतिशत हो गई, जबकि जून में यह 4.38 प्रतिशत थी। खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी इसका प्रमुख कारण रही। खासतौर पर प्याज, लहसुन और अदरक के दामों में तेज वृद्धि ने घरेलू बजट पर दबाव बढ़ाया है। खाद्य महंगाई भी बढ़ी जुलाई में खाद्य महंगाई दर 5.52 प्रतिशत रही, जो जून के 5.32 प्रतिशत से अधिक है। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महंगाई 5.79 प्रतिशत रही, जबकि शहरी इलाकों में यह 5.05 प्रतिशत दर्ज की गई। महंगाई में बढ़ोतरी के बावजूद जुलाई का आंकड़ा अर्थशास्त्रियों के करीब 4.50 प्रतिशत के अनुमान से थोड़ा नीचे रहा। प्याज, लहसुन और अदरक के दामों ने बढ़ाई चिंता रसोई में सबसे ज्यादा असर कुछ चुनिंदा सब्जियों और मसालों की कीमतों में देखने को मिला। प्याज की महंगाई जून के 4.73 प्रतिशत से बढ़कर जुलाई में 22.54 प्रतिशत हो गई। लहसुन की महंगाई 17.93 प्रतिशत से बढ़कर 35.36 प्रतिशत पहुंच गई। वहीं अदरक की महंगाई दर 83.62 प्रतिशत के बेहद ऊंचे स्तर पर पहुंच गई, जो जून में 50.41 प्रतिशत थी। इन जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेज उछाल से आम परिवारों के मासिक रसोई बजट पर सीधा असर पड़ा है। कुछ सब्जियों से मिली राहत महंगाई की तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं रही। कुछ सब्जियों की कीमतों में गिरावट भी दर्ज की गई। आलू की कीमतों में सालाना आधार पर 16.56 प्रतिशत की गिरावट रही। इसके अलावा भिंडी में 5.52 प्रतिशत, मटर में 5.27 प्रतिशत और टमाटर में 4.59 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। रसोई के बाहर भी बढ़ी महंगाई महंगाई का दबाव सिर्फ खाद्य पदार्थों तक सीमित नहीं रहा। जुलाई में परिवहन से जुड़ी महंगाई बढ़कर 4.43 प्रतिशत रही। व्यक्तिगत देखभाल और विविध सेवाओं की महंगाई दर 14.77 प्रतिशत तक पहुंच गई। वहीं होटल और रेस्टोरेंट सेवाओं में महंगाई 7.72 प्रतिशत रही। कपड़े और जूते-चप्पल 3.38 प्रतिशत, शिक्षा 3.64 प्रतिशत, मकान किराया 2.22 प्रतिशत और स्वास्थ्य सेवाओं में 1.34 प्रतिशत की महंगाई दर्ज की गई। RBI के 4% लक्ष्य से ऊपर महंगाई जुलाई की 4.45 प्रतिशत खुदरा महंगाई दर RBI के 4 प्रतिशत लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। हालांकि यह 2 से 6 प्रतिशत के निर्धारित सहिष्णुता दायरे के भीतर है। RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अपने महंगाई अनुमान में भी बदलाव किया है। केंद्रीय बैंक को उम्मीद है कि वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और सप्लाई में सुधार से आगे कीमतों पर कुछ दबाव कम हो सकता है। आने वाले महीनों में भी रह सकता है दबाव RBI के अनुमानों के अनुसार महंगाई में आने वाले महीनों में कुछ और बढ़ोतरी हो सकती है। दूसरी तिमाही के लिए महंगाई का अनुमान 4.7 प्रतिशत रखा गया है, जबकि तीसरी तिमाही में यह 5.9 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। चौथी तिमाही में इसके घटकर करीब 5.5 प्रतिशत आने की संभावना जताई गई है। ऐसे में आने वाले महीनों में खाद्य वस्तुओं की कीमतें, मौसम, सप्लाई और कच्चे तेल का रुझान महंगाई की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।
मुंबई, एजेंसियां। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बैंकिंग क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती भूमिका को लेकर बड़ा बयान दिया है। FIBAC 2026 में बोलते हुए उन्होंने कहा कि AI आने वाले समय में बैंकिंग और खासकर लोन देने की प्रक्रिया में वही बदलाव ला सकता है, जो UPI ने डिजिटल भुगतान में किया है। AI से लोन देने की प्रक्रिया होगी तेज RBI गवर्नर के मुताबिक AI बैंकिंग में क्रेडिट आकलन और लोन वितरण को ज्यादा तेज और सटीक बना सकता है। बैंक ग्राहक के लेनदेन, भुगतान व्यवहार और अन्य उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण कर यह बेहतर तरीके से समझ सकेंगे कि कौन-सा ग्राहक कर्ज के लिए योग्य है। इससे ऐसे छोटे कारोबारी और ग्राहक भी औपचारिक बैंकिंग क्रेडिट तक पहुंच सकते हैं, जो पारंपरिक व्यवस्था में पर्याप्त दस्तावेज या संपार्श्विक के अभाव में पीछे रह जाते हैं। फ्रॉड डिटेक्शन में AI की बड़ी भूमिका AI का दूसरा बड़ा इस्तेमाल धोखाधड़ी की पहचान में होगा। AI बड़ी मात्रा में लेनदेन का विश्लेषण करके असामान्य गतिविधियों और संदिग्ध पैटर्न को तेजी से पहचान सकता है। इससे बैंक संभावित फ्रॉड वाले लेनदेन पर समय रहते कार्रवाई कर सकेंगे। AI का इस्तेमाल जोखिम प्रबंधन और अनुपालन में भी किया जा सकता है, जिससे बैंकों को संभावित जोखिमों की पहचान और निगरानी में मदद मिलेगी। वित्तीय समावेशन को मिल सकता है बढ़ावा RBI गवर्नर ने AI को वित्तीय समावेशन के लिए भी महत्वपूर्ण बताया। तकनीक की मदद से बैंक ग्रामीण क्षेत्रों, छोटे कारोबारियों और कम सेवा पाने वाले वर्गों तक बैंकिंग एवं क्रेडिट सेवाएं ज्यादा प्रभावी ढंग से पहुंचा सकते हैं। इसका मतलब है कि AI का फायदा केवल बड़े शहरों और बड़े ग्राहकों तक सीमित रखने के बजाय किसानों, MSME और छोटे कारोबारियों तक पहुंचाने पर जोर रहेगा। AI के साथ मानव निगरानी भी जरूरी मल्होत्रा ने बैंकों को AI अपनाने के साथ जवाबदेही और मानव निगरानी बनाए रखने की चेतावनी भी दी। उनका कहना है कि किसी AI सिस्टम के फैसले के लिए जिम्मेदारी तकनीक या उसके विक्रेता पर डालना उचित नहीं होगा। साइबर सुरक्षा, एल्गोरिदम में पक्षपात और गलत फैसलों जैसे जोखिमों को ध्यान में रखते हुए AI का जिम्मेदारी से इस्तेमाल जरूरी है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारत में सोने के बदले कर्ज लेने की मांग तेजी से बढ़ रही है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के अनुसार, जून 2026 में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) का गोल्ड लोन पोर्टफोलियो सालाना आधार पर 69.3% बढ़कर करीब ₹3.41 लाख करोड़ पहुंच गया। यह सभी प्रमुख ऋण श्रेणियों में सबसे तेज वृद्धि में से एक रही। सोने की कीमतों ने बढ़ाई कर्ज लेने की क्षमता गोल्ड लोन में तेज वृद्धि के पीछे सोने की ऊंची कीमतें भी एक महत्वपूर्ण कारण मानी जा रही हैं। सोने की कीमत बढ़ने से ग्राहकों के पास मौजूद आभूषणों के बदले अधिक रकम उधार लेने की क्षमता बढ़ी है। इसके अलावा, गोल्ड लोन में कर्ज के बदले सोना गिरवी रखा जाता है, जिससे यह वित्तीय संस्थानों के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित ऋण उत्पाद माना जाता है। आर्थिक जरूरतों के लिए तेजी से पैसा उपलब्ध होने के कारण भी इसकी मांग बढ़ी है। NBFC और बैंकों के बीच बढ़ी प्रतिस्पर्धा गोल्ड लोन बाजार में NBFC की मजबूत मौजूदगी के बीच अब बैंक भी अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। कई बैंक अधिक गोल्ड लोन ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए शाखाओं में गोल्ड मूल्यांकन विशेषज्ञ, आधुनिक जांच उपकरण और डिजिटल लोन प्रक्रिया को मजबूत कर रहे हैं। इस बढ़ती प्रतिस्पर्धा से ग्राहकों को तेज प्रोसेसिंग और अलग-अलग ऋण विकल्प मिलने की संभावना है। RBI के नियमों के बीच भी तेजी गोल्ड लोन कारोबार में नियामकीय बदलावों के बावजूद NBFC के पोर्टफोलियो में करीब 70% की सालाना वृद्धि दर्ज की गई है। RBI ने गोल्ड लोन से जुड़े नियमों को सख्त किया है, खासकर लोन की संरचना और पुनर्भुगतान से जुड़े प्रावधानों को लेकर। इसके बावजूद जून 2026 तक गोल्ड लोन की मांग मजबूत बनी रही। यह संकेत देता है कि तुरंत और संपार्श्विक आधारित कर्ज की जरूरत भारतीय उपभोक्ताओं और छोटे कारोबारियों के बीच लगातार बनी हुई है। आगे भी मांग मजबूत रहने की उम्मीद विशेषज्ञों के अनुसार, यदि सोने की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं और लोगों को त्वरित नकदी की जरूरत रहती है तो गोल्ड लोन बाजार में वृद्धि जारी रह सकती है। हालांकि, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और RBI के नियमों के कारण NBFC और बैंकों के लिए जोखिम प्रबंधन और ऋण की गुणवत्ता बनाए रखना भी महत्वपूर्ण होगा। जून 2026 के आंकड़े फिलहाल यह दिखाते हैं कि गोल्ड लोन भारतीय खुदरा ऋण बाजार के सबसे तेजी से बढ़ने वाले क्षेत्रों में शामिल हो गया है।
मुंबई, एजेंसियां। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नए ड्राफ्ट प्रस्ताव से गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) के शेयरों पर दबाव बढ़ गया। खास तौर पर Bajaj Finance और Bajaj Finserv के शेयरों में शुक्रवार को तेज गिरावट दर्ज की गई। बाजार रिपोर्टों के मुताबिक Bajaj Finance का शेयर करीब 5.9% और Bajaj Finserv का शेयर करीब 4.2% तक गिरा। दोनों कंपनियों के संयुक्त बाजार पूंजीकरण में करीब ₹55,000 करोड़ की कमी आई। RBI के प्रस्ताव में क्या है? RBI ने NBFC के लिए जारी किए गए ड्राफ्ट नियमों में revolving credit facilities को सीमित करने का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत सामान्य NBFC को मुख्य रूप से term loan देने तक सीमित किया जा सकता है। हालांकि, RBI से क्रेडिट कार्ड जारी करने की अनुमति प्राप्त NBFC इस प्रस्तावित प्रतिबंध से बाहर रह सकती हैं। Revolving credit में ग्राहक को एक तय क्रेडिट सीमा उपलब्ध रहती है, जिसमें वह जरूरत के अनुसार राशि का इस्तेमाल, भुगतान और फिर उपलब्ध सीमा के भीतर दोबारा उधार ले सकता है। ऐसे उत्पादों पर निर्भर NBFC के कारोबार मॉडल पर नए नियमों का असर पड़ सकता है। Bajaj Finance पर क्यों पड़ा ज्यादा असर? Bajaj Finance के कारोबार में फ्लेक्सी लोन और अन्य दोबारा इस्तेमाल की जा सकने वाली क्रेडिट सुविधाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। प्रस्ताव लागू होने की स्थिति में कंपनी को अपने कुछ मौजूदा उत्पादों और क्रेडिट मॉडल में बदलाव करना पड़ सकता है। इसी संभावित असर को लेकर निवेशकों में चिंता बढ़ी और Bajaj Finance के शेयर में तेज बिकवाली देखने को मिली। बाजार विश्लेषकों ने भी कंपनी के कुछ क्रेडिट उत्पादों और भविष्य की वृद्धि पर संभावित प्रभाव को लेकर सावधानी बरती है। Bajaj Finserv भी बिकवाली की चपेट में Bajaj Finance में गिरावट का असर उसकी पैरेंट कंपनी Bajaj Finserv के शेयर पर भी दिखाई दिया। शुक्रवार को Bajaj Finserv करीब 4.18% गिरकर ₹2,001.90 पर बंद हुआ।बाजार में चिंता सिर्फ इन दो कंपनियों तक सीमित नहीं रही। RBI के प्रस्ताव से उन NBFC पर भी दबाव की आशंका जताई जा रही है जिनके कारोबार में फ्लेक्सी लोन, क्रेडिट लाइन और इसी तरह के उत्पादों की महत्वपूर्ण भूमिका है। अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ यह ध्यान रखना जरूरी है कि RBI का यह अभी ड्राफ्ट प्रस्ताव है, अंतिम नियम नहीं। केंद्रीय बैंक ने प्रस्तावित बदलावों पर संबंधित पक्षों से प्रतिक्रिया मांगी है। इसलिए आगे नियमों में बदलाव, छूट या अन्य प्रावधान शामिल किए जा सकते हैं। फिलहाल निवेशकों की नजर RBI की अंतिम अधिसूचना और प्रस्ताव पर मिलने वाली प्रतिक्रियाओं पर है। अंतिम नियम आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि Bajaj Finance और अन्य NBFC के कारोबार पर इसका वास्तविक प्रभाव कितना पड़ेगा।
मुंबई, एजेंसियां। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के मुताबिक, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) द्वारा दिए गए कर्ज में जून 2026 में सालाना आधार पर 14.4% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। NBFC का कुल क्रेडिट पोर्टफोलियो जून के अंत तक बढ़कर करीब ₹57.8 लाख करोड़ हो गया। एक साल पहले जून 2025 में NBFC क्रेडिट की वृद्धि दर 11.1% थी। खुदरा कर्ज से मिली मजबूती RBI के आंकड़ों के अनुसार जून में NBFC क्षेत्र की क्रेडिट ग्रोथ में रिटेल लोन की महत्वपूर्ण भूमिका रही। व्यक्तिगत ऋण और अन्य खुदरा कर्ज की मांग बढ़ने से NBFC के कुल ऋण कारोबार को मजबूती मिली। इससे संकेत मिलता है कि बैंकिंग क्षेत्र के साथ-साथ NBFC भी घरेलू कर्ज की बढ़ती मांग को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। एक साल में बढ़ी क्रेडिट ग्रोथ जून 2025 में NBFC क्रेडिट ग्रोथ 11.1% थी, जो जून 2026 में बढ़कर 14.4% हो गई। यानी एक साल के दौरान NBFC के कर्ज कारोबार की वृद्धि दर में 3.3 प्रतिशत अंक की तेजी आई। NBFC सेक्टर के लिए सकारात्मक संकेत NBFC के कर्ज में तेज वृद्धि को वित्तीय क्षेत्र में ऋण मांग की मजबूती के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। खासकर खुदरा ऋण में लगातार मांग से कंपनियों के कारोबार को समर्थन मिल रहा है। हालांकि, तेज क्रेडिट वृद्धि के साथ कर्ज की गुणवत्ता, डिफॉल्ट जोखिम और उधारकर्ताओं की भुगतान क्षमता पर नजर रखना भी जरूरी है। आने वाले महीनों में NBFC क्षेत्र की वृद्धि कितनी टिकाऊ रहती है, यह महत्वपूर्ण होगा।
मुंबई, एजेंसियां। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों के Priority Sector Lending (PSL) नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। नए फैसले के तहत 8 जून से 30 सितंबर 2026 के बीच जुटाई गई पात्र FCNR(B) और NRE जमा के आधार पर दिए गए कुछ कर्ज को बैंकों के Adjusted Net Bank Credit (ANBC) की गणना से बाहर रखा जाएगा। इसका मतलब है कि इन कर्जों को अनिवार्य प्राथमिकता क्षेत्र ऋण लक्ष्य की गणना में शामिल नहीं किया जाएगा। NRI जमा बढ़ाने पर RBI का जोर RBI के इस कदम का प्रमुख उद्देश्य बैंकों को विदेशी मुद्रा में आने वाली NRI जमा बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करना माना जा रहा है। FCNR(B) और NRE खाते अनिवासी भारतीयों के लिए भारत में धन रखने के प्रमुख माध्यम हैं। नए प्रावधान से बैंकों को इन जमा के आधार पर कर्ज देने में अधिक लचीलापन मिलेगा। ऐसे कर्ज PSL लक्ष्य की गणना में शामिल नहीं होने के कारण बैंकों पर प्राथमिकता क्षेत्र में अतिरिक्त कर्ज देने का दबाव भी कम होगा। बैंकिंग क्षेत्र को क्या फायदा? RBI के इस बदलाव से बैंकों के लिए विदेशी मुद्रा जमा जुटाने और उसके आधार पर ऋण देने की प्रक्रिया अधिक आकर्षक हो सकती है। इससे बैंकिंग प्रणाली में विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है। हालांकि, यह राहत सभी प्रकार के NRI जमा या सभी कर्जों पर लागू नहीं है। RBI ने इसके लिए पात्र जमा और निर्धारित अवधि जैसी शर्तें रखी हैं। PSL नियमों में बदलाव का असर Priority Sector Lending के तहत बैंकों को कृषि, MSME, कमजोर वर्ग और अन्य प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में निर्धारित मात्रा में कर्ज देना होता है। RBI का नया प्रावधान कुछ विशेष NRI जमा-आधारित कर्ज को इस गणना से अलग करता है। इस फैसले से बैंकों को अपनी बैलेंस शीट और ऋण वितरण रणनीति को बेहतर तरीके से प्रबंधित करने में मदद मिल सकती है।
मुंबई, एजेंसियां। Tata Group की होल्डिंग कंपनी Tata Sons की संभावित शेयर बाजार लिस्टिंग को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने Tata Sons को Upper Layer NBFC की श्रेणी में बनाए रखा है। इस फैसले से कंपनी की लिस्टिंग को लेकर नियामकीय दबाव बरकरार है, हालांकि फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि Tata Sons की लिस्टिंग निश्चित हो गई है। RBI की निगरानी में Tata Sons RBI ने Tata Sons को उसके बड़े परिसंपत्ति आकार के कारण कड़ी नियामकीय निगरानी वाली Upper Layer NBFC श्रेणी में रखा है। रिपोर्ट के अनुसार, Tata Sons की परिसंपत्तियां ₹10 लाख करोड़ से अधिक हैं, जिसके कारण कंपनी पर अतिरिक्त नियामकीय निगरानी लागू होती है। Tata Sons पहले ही अपनी NBFC स्थिति से बाहर निकलने के लिए आवेदन कर चुकी है और अपने कर्ज का भुगतान भी कर चुकी है। लेकिन RBI की ओर से आवेदन पर अंतिम निर्णय नहीं होने के कारण कंपनी की स्थिति अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुई है। लिस्टिंग को लेकर क्यों बढ़ी चर्चा? Upper Layer NBFC के लिए शेयर बाजार में लिस्टिंग से जुड़ी नियामकीय शर्तें लागू होती हैं। ऐसे में Tata Sons को इस श्रेणी में बनाए रखने से कंपनी की संभावित लिस्टिंग को लेकर दबाव बना हुआ है। हालांकि, RBI ने फिलहाल यह स्पष्ट नहीं किया है कि NBFC से बाहर निकलने का आवेदन लंबित रहने के दौरान लिस्टिंग की समयसीमा किस तरह लागू होगी। इसलिए इसे लिस्टिंग की अनिवार्यता का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। Tata Group और निवेशकों की नजर Tata Sons में Tata Trusts की बड़ी हिस्सेदारी है। कंपनी के सार्वजनिक होने की स्थिति में शेयर बाजार के निवेशकों को Tata Group की कई प्रमुख कंपनियों में अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी वाली इस होल्डिंग कंपनी में निवेश का अवसर मिल सकता है。 फिलहाल Tata Sons की लिस्टिंग को लेकर RBI के अगले कदम और कंपनी की NBFC से बाहर निकलने की प्रक्रिया पर बाजार की नजर बनी हुई है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारत में डिजिटल भुगतान के सबसे बड़े माध्यम UPI को लेकर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) फिर चर्चा में है। ₹2,000 से अधिक के कुछ डिजिटल UPI लेनदेन पर MDR लागू करने की संभावना को लेकर वित्तीय और भुगतान क्षेत्र में बहस तेज हुई है। हालांकि, सरकार या भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से ऐसा कोई अंतिम फैसला घोषित नहीं किया गया है, जिसके तहत ₹2,000 से ऊपर के सभी UPI भुगतानों पर MDR अनिवार्य हो। MDR को लेकर क्यों हो रही चर्चा UPI लेनदेन पर MDR लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। फिलहाल सामान्य बैंक खाते से किए जाने वाले UPI भुगतानों पर ग्राहकों और व्यापारियों से MDR नहीं लिया जाता। सरकार ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए इस व्यवस्था को बनाए रखा है। हालांकि, भुगतान कंपनियों और वित्तीय क्षेत्र से जुड़े पक्षों का कहना है कि UPI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ भुगतान के बुनियादी ढांचे, तकनीकी व्यवस्था और संचालन की लागत भी बढ़ रही है। ऐसे में लंबे समय तक शून्य MDR व्यवस्था को लेकर आर्थिक मॉडल पर सवाल उठते रहे हैं। ₹2,000 की सीमा को लेकर क्या है प्रस्ताव चर्चा के मुताबिक, एक संभावित व्यवस्था में ₹2,000 से अधिक के कुछ UPI लेनदेन पर MDR लगाने का विकल्प देखा जा सकता है। इसका उद्देश्य छोटे मूल्य के डिजिटल भुगतान को प्रभावित किए बिना बड़े लेनदेन से भुगतान प्रणाली की लागत का कुछ हिस्सा हासिल करना हो सकता है। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ₹2,000 की सीमा को लेकर अभी कोई अंतिम आधिकारिक नियम लागू नहीं हुआ है। इसलिए इस स्तर पर इसे प्रस्ताव या चर्चा के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। आम ग्राहकों और कारोबारियों पर क्या होगा असर अगर भविष्य में MDR से जुड़ा कोई नया नियम लागू होता है तो उसका असर व्यापारियों, भुगतान सेवा प्रदाताओं और UPI के जरिए बड़े मूल्य के लेनदेन पर पड़ सकता है। हालांकि, MDR का भुगतान ग्राहक करेगा या व्यापारी, इसकी व्यवस्था किसी अंतिम नीति में ही स्पष्ट होगी। छोटे दुकानदारों और कम मूल्य के UPI भुगतान को सुरक्षित रखने के लिए किसी भी संभावित व्यवस्था में अलग-अलग लेनदेन सीमा और श्रेणियां तय की जा सकती हैं। अंतिम फैसले का इंतजार UPI भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। ऐसे में MDR से जुड़ा कोई भी बदलाव सीधे करोड़ों डिजिटल भुगतानकर्ताओं और व्यापारियों को प्रभावित कर सकता है। फिलहाल ₹2,000 से अधिक के सभी UPI भुगतानों पर MDR लागू होने की खबर को अंतिम निर्णय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। सरकार और RBI की आधिकारिक घोषणा के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि MDR में कोई बदलाव किया जाता है या मौजूदा शून्य-MDR व्यवस्था जारी रहती है।
नई दिल्ली: UPI भुगतान पर संभावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) या शुल्क लगाने की चर्चा के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि डिजिटल भुगतान प्रणाली को मजबूत और टिकाऊ बनाए रखने के लिए उसकी लागत किसी न किसी को वहन करनी ही पड़ती है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि फिलहाल इस मुद्दे पर कोई अंतिम राय बनाना जल्दबाजी होगी और RBI का पूरा ध्यान भुगतान अवसंरचना (Payment Infrastructure) को और मजबूत करने पर है। हाल ही में केंद्र सरकार ने संसद में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स कानून में संशोधन से जुड़ा एक विधेयक पेश किया है। इस प्रस्ताव के बाद यह अटकलें तेज हो गई हैं कि सरकार भविष्य में 2,000 रुपये से अधिक के UPI कारोबारी लेनदेन पर मर्चेंट फीस लगाने की अनुमति दे सकती है। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह शुल्क 0.25% से 0.40% तक हो सकता है, हालांकि सरकार ने अभी तक इस पर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है। क्या बोले RBI गवर्नर? मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के बाद मीडिया से बातचीत में संजय मल्होत्रा ने कहा कि इस समय शुल्क लागू करने पर चर्चा करना जल्दबाजी होगी। उन्होंने कहा कि UPI जैसी सार्वजनिक डिजिटल सेवा को लगातार बेहतर बनाने और उसकी क्षमता बढ़ाने के लिए निवेश जरूरी है। उन्होंने कहा कि भले ही शुल्क सीधे तौर पर ग्राहकों से न लिया जाए, लेकिन इसकी लागत किसी न किसी रूप में पहले से ही पूरी अर्थव्यवस्था वहन कर रही है। उनके अनुसार, उपभोक्ता अप्रत्यक्ष रूप से इस खर्च का हिस्सा बनते हैं, भले ही उन्हें यह सीधे दिखाई न दे। सरकार की योजना क्या है? संसद में पेश संशोधन विधेयक में उस कानूनी प्रावधान को बदलने का प्रस्ताव है, जो अब तक UPI ट्रांजैक्शन पर किसी भी प्रकार की मर्चेंट फीस लगाने पर रोक लगाता था। माना जा रहा है कि सरकार बड़े मूल्य के कारोबारी UPI भुगतान पर MDR की अनुमति देने पर विचार कर सकती है। अगर ऐसा होता है, तो शुल्क सीधे ग्राहकों पर नहीं बल्कि व्यापारियों (Merchants) पर लागू होगा। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि व्यापारी भविष्य में इस अतिरिक्त लागत का असर उत्पादों और सेवाओं की कीमतों में जोड़ सकते हैं। UPI के विस्तार पर रहेगा फोकस RBI गवर्नर ने कहा कि केंद्रीय बैंक का लक्ष्य देश में UPI के उपयोग को लगातार बढ़ाना है। उन्होंने बताया कि RBI रोजाना करीब 80 करोड़ UPI ट्रांजैक्शन का लक्ष्य लेकर चल रहा है। ऐसे में किसी भी शुल्क संबंधी निर्णय से पहले यह देखना जरूरी होगा कि उसका डिजिटल भुगतान अपनाने की गति पर क्या प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि UPI के निरंतर विकास, नई तकनीक और सुरक्षित भुगतान व्यवस्था के लिए स्थायी राजस्व स्रोत (Revenue Model) की आवश्यकता है, ताकि इस डिजिटल इकोसिस्टम में निवेश जारी रह सके। फिलहाल क्या बदलेगा? अभी UPI भुगतान पर किसी नए शुल्क की घोषणा नहीं हुई है। सरकार ने केवल कानून में संशोधन का प्रस्ताव रखा है और RBI ने भी स्पष्ट किया है कि इस समय किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। इसलिए फिलहाल आम उपभोक्ताओं के लिए UPI भुगतान पहले की तरह ही जारी रहेगा।
नई दिल्ली, एजेंसियां। ऑनलाइन साइबर फ्रॉड और ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे मामलों पर सख्ती दिखाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को म्यूल अकाउंट्स और साइबर अपराध से जुड़े बैंक खातों से निपटने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने का निर्देश दिया है। अदालत ने RBI को यह SOP चार सप्ताह के भीतर तैयार कर प्रसारित करने को कहा है। म्यूल अकाउंट्स पर बनेगी एक समान प्रक्रिया म्यूल अकाउंट ऐसे बैंक खातों को कहा जाता है जिनका इस्तेमाल साइबर अपराध से हासिल रकम को प्राप्त करने, आगे भेजने या उसकी पहचान छिपाने के लिए किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश ऐसे खातों की पहचान और उनसे जुड़े मामलों में बैंकों तथा जांच एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। डिजिटल अरेस्ट मामलों पर भी सुप्रीम कोर्ट सख्त सुप्रीम कोर्ट ने साइबर फ्रॉड और डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों से निपटने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट का जोर साइबर अपराध की शिकायतों पर तेजी से कार्रवाई, पीड़ितों की मदद और ठगी की रकम की जल्द रिकवरी पर है। बैंकों और जांच एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल पर जोर कोर्ट के निर्देशों का उद्देश्य साइबर ठगी की रकम को एक खाते से दूसरे खाते में भेजकर छिपाने की प्रक्रिया पर रोक लगाना है। इसके लिए बैंकिंग सिस्टम, पुलिस और साइबर अपराध से जुड़ी एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने और कार्रवाई की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के इस कदम से साइबर फ्रॉड के मामलों में संदिग्ध खातों की पहचान, रकम को रोकने और पीड़ितों तक धन वापस पहुंचाने की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने की उम्मीद है।
RBI की मौद्रिक नीति पर आज फैसला, रेपो रेट को लेकर बाजार की नजर MPC बैठक पर मुंबई, एजेंसियां। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) आज अपनी द्विमासिक बैठक के फैसले का ऐलान करेगी। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा मौद्रिक नीति का फैसला पेश करेंगे। बाजार की सबसे ज्यादा नजर इस बात पर है कि केंद्रीय बैंक रेपो रेट में कोई बदलाव करता है या उसे मौजूदा स्तर पर बरकरार रखता है। 5.25 फीसदी रेपो रेट पर टिकी नजर जून की पिछली MPC बैठक में RBI ने रेपो रेट को 5.25 फीसदी पर बरकरार रखा था। इस बार भी अर्थशास्त्रियों और बाजार विशेषज्ञों के बीच दर को मौजूदा स्तर पर बनाए रखने की उम्मीद मजबूत है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, 72 में से 68 अर्थशास्त्रियों ने दरों में बदलाव नहीं होने का अनुमान जताया है। फिलहाल बाजार का फोकस केवल रेपो रेट पर नहीं है, बल्कि RBI के महंगाई और आर्थिक विकास के अनुमान तथा आगे की मौद्रिक नीति को लेकर गवर्नर के संकेतों पर भी रहेगा। महंगाई और आर्थिक विकास पर RBI का रुख अहम मौद्रिक नीति के फैसले में महंगाई और आर्थिक विकास दोनों महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। हाल के महीनों में महंगाई के मोर्चे पर स्थिति में सुधार के संकेत मिले हैं, जबकि घरेलू आर्थिक गतिविधियां भी मजबूत बनी हुई हैं। ऐसे में RBI के सामने विकास को समर्थन देने और महंगाई पर नियंत्रण बनाए रखने के बीच संतुलन कायम रखने की चुनौती है। इसके अलावा कच्चे तेल की कीमतों, वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम और मानसून से जुड़े जोखिमों पर भी केंद्रीय बैंक की नजर रहेगी। लोन और EMI पर भी पड़ेगा असर अगर RBI रेपो रेट में बदलाव करता है तो इसका असर बैंकों की उधारी लागत पर पड़ सकता है। खासतौर पर रेपो रेट से जुड़े होम लोन और अन्य फ्लोटिंग रेट वाले कर्ज की ब्याज दरों और EMI पर इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है। वहीं, दरों को स्थिर रखने पर तत्काल EMI में बदलाव की संभावना कम रहेगी। अब सभी की नजर RBI के आधिकारिक फैसले और गवर्नर संजय मल्होत्रा के बयान पर है। इससे आने वाले महीनों में ब्याज दरों की दिशा और बाजार की चाल को लेकर महत्वपूर्ण संकेत मिल सकते हैं।
नई दिल्ली: देश में डिजिटल पेमेंट का इस्तेमाल तेजी से बढ़ने के साथ ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामले भी चिंता बढ़ा रहे हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए UPI और दूसरे डिजिटल पेमेंट सिस्टम में बदलाव पर विचार किया जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से धोखाधड़ी वाले लेनदेन को रोकने के लिए पेमेंट में देरी का प्रस्ताव सामने आया है, वहीं बैंकों ने इसका एक वैकल्पिक तरीका सुझाया है। बैंकों का मानना है कि हर डिजिटल पेमेंट को एक घंटे तक रोकने से लोगों के लिए परेशानी बढ़ सकती है और डिजिटल लेनदेन की रफ्तार प्रभावित हो सकती है। इसके बजाय संदिग्ध लेनदेन पर यूजर को तुरंत ‘Yes’ या ‘No’ का विकल्प दिया जा सकता है। क्या है बैंकों का नया सुझाव? रिपोर्ट के मुताबिक, बैंक पेमेंट ऐप में एक अतिरिक्त सुरक्षा जांच जोड़ने का सुझाव दे रहे हैं। अगर सिस्टम को किसी लेनदेन में असामान्य गतिविधि नजर आती है, तो यूजर की स्क्रीन पर एक संदेश दिखाई दे सकता है। यूजर से पूछा जाएगा कि क्या वह वास्तव में यह भुगतान करना चाहता है। Yes चुनने पर: भुगतान तुरंत पूरा हो सकता है। No चुनने पर: लेनदेन रद्द हो जाएगा। कोई जवाब नहीं देने पर: भुगतान को एक घंटे तक रोका जा सकता है और उसके बाद रकम लाभार्थी के खाते में पहुंच सकती है। इस व्यवस्था का मकसद यह है कि संदिग्ध भुगतान में यूजर को दोबारा सोचने और गलती रोकने का मौका मिले, जबकि सामान्य और जरूरी भुगतान बिना अनावश्यक देरी के पूरे होते रहें। हर UPI Payment पर नहीं आएगा ऐसा अलर्ट बैंकों का सुझाव है कि यह सुरक्षा संदेश हर लेनदेन के दौरान दिखाना व्यावहारिक नहीं होगा। इससे डिजिटल भुगतान का अनुभव धीमा और परेशान करने वाला हो सकता है। इसके बजाय सिस्टम केवल संदिग्ध या असामान्य लेनदेन की पहचान करके अलर्ट दिखा सकता है। उदाहरण के लिए: देर रात असामान्य समय पर किया गया भुगतान किसी नए व्यक्ति को पहली बार पैसे भेजना हाल ही में खोले गए बैंक खाते में रकम भेजना लेनदेन की राशि सामान्य पैटर्न से काफी अधिक होना इस तरह जोखिम वाले भुगतान पर अतिरिक्त सुरक्षा और सामान्य भुगतान में तेजी, दोनों को बनाए रखने की कोशिश की जा सकती है। 10 हजार रुपये की सीमा बढ़ाने का भी सुझाव कुछ बैंकों ने कथित तौर पर ऐसी सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी 10,000 रुपये की सीमा बढ़ाकर 20,000 या 25,000 रुपये करने का सुझाव भी दिया है। हालांकि, यह बदलाव लागू होगा या नहीं और अंतिम सीमा क्या होगी, इस पर अभी कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है। किन लेनदेन पर लागू हो सकता है नियम? फिलहाल इस तरह की व्यवस्था को मुख्य रूप से P2P यानी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को किए जाने वाले भुगतान के लिए विचार किया जा रहा है। दुकानों और कारोबारियों को किए जाने वाले P2M यानी Person-to-Merchant भुगतान को इससे अलग रखने का सुझाव है। हालांकि, कई छोटे दुकानदार अपने करंट अकाउंट के बजाय सेविंग अकाउंट से जुड़े QR कोड के जरिए भुगतान स्वीकार करते हैं। ऐसे मामलों में नियमों का असर कैसे होगा, यह भी महत्वपूर्ण सवाल है। RBI क्यों चाहता है पेमेंट में देरी? RBI की चिंता मुख्य रूप से उन मामलों को लेकर है, जहां साइबर अपराधी फोन कॉल, धमकी, डर या किसी दूसरे तरीके से लोगों से तुरंत पैसा ट्रांसफर करा लेते हैं। अगर रकम तुरंत दूसरे खाते में क्रेडिट होने के बजाय कुछ समय के लिए रोकी जाती है, तो पीड़ित व्यक्ति को ठगी का एहसास होने पर कार्रवाई करने का अतिरिक्त समय मिल सकता है। हालांकि, बैंकों को आशंका है कि अगर प्रत्येक डिजिटल भुगतान में लंबी देरी होने लगी तो लोगों को परेशानी होगी। इससे डिजिटल भुगतान की सुविधा और भरोसे पर असर पड़ सकता है और कुछ लोग दोबारा नकद लेनदेन की ओर लौट सकते हैं। डिजिटल फ्रॉड के आंकड़े बढ़ा रहे चिंता ऑनलाइन धोखाधड़ी के बढ़ते आंकड़े इस पूरी बहस को और महत्वपूर्ण बनाते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, डिजिटल फ्रॉड के मामले 2021 में करीब 2.6 लाख से बढ़कर 2025 में लगभग 28 लाख तक पहुंच गए। इसी अवधि में धोखाधड़ी से जुड़ी रकम भी 551 करोड़ रुपये से बढ़कर करीब 22,931 करोड़ रुपये बताई गई है। ये आंकड़े बताते हैं कि डिजिटल पेमेंट की सुरक्षा को मजबूत करना अब सिर्फ बैंकिंग सेक्टर की नहीं, बल्कि करोड़ों यूजर्स की जरूरत बन चुका है। सुरक्षा और रफ्तार के बीच संतुलन सबसे बड़ी चुनौती UPI ने भारत में भुगतान को बेहद आसान और तेज बनाया है। ऐसे में किसी भी नए सुरक्षा नियम के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि फ्रॉड रोकने के साथ डिजिटल पेमेंट की रफ्तार और सुविधा भी बरकरार रहे। ‘Yes/No’ आधारित अलर्ट सिस्टम इसी संतुलन की दिशा में एक संभावित रास्ता हो सकता है। हालांकि, यह अभी बैंकों का सुझाव है और अंतिम नियम लागू होने से पहले RBI तथा संबंधित संस्थाओं की ओर से स्पष्ट दिशा-निर्देश जरूरी होंगे।
मुंबई, एजेंसियां। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की विशेष विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधा को बड़ी सफलता मिली है। 31 जुलाई 2026 तक इस योजना के तहत कुल 40.81 अरब डॉलर से अधिक की विदेशी मुद्रा जुटाई गई है। RBI के आंकड़ों के मुताबिक, इसमें सबसे बड़ा योगदान विदेशी मुद्रा अनिवासी बैंक (FCNR-B) जमा का रहा है। FCNR(B) जमा से आए 36.72 अरब डॉलर RBI की विशेष सुविधा के तहत जुटाई गई विदेशी मुद्रा में FCNR(B) जमा से करीब 36.72 अरब डॉलर आए हैं। यह कुल जुटाव का 90 फीसदी से अधिक है। इसके अलावा विदेशी मुद्रा में बाहरी वाणिज्यिक उधारी और अन्य माध्यमों से भी रकम जुटाई गई है। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि RBI ने विदेशी मुद्रा भंडार और देश की बाहरी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने के लिए इस विशेष सुविधा को शुरू किया था। जून में शुरू हुई थी विशेष सुविधा RBI की यह रियायती स्वैप सुविधा 8 जून 2026 से लागू हुई थी। इसका उद्देश्य बैंकों को विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए प्रोत्साहित करना और देश में डॉलर के प्रवाह को बढ़ाना है। जुलाई के अंत तक इस योजना के तहत विदेशी मुद्रा जुटाव 40 अरब डॉलर के स्तर को पार कर गया। विदेशी मुद्रा भंडार को मिलेगा सहारा विदेशी मुद्रा का यह मजबूत प्रवाह भारत की बाहरी वित्तीय स्थिति और विदेशी मुद्रा भंडार को सहारा दे सकता है। इससे वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच देश की बाहरी भुगतान क्षमता को मजबूत करने में मदद मिल सकती है। RBI की इस पहल में बैंकों की मजबूत भागीदारी को विदेशी मुद्रा जुटाने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आगे भी इस सुविधा के जरिए विदेशी मुद्रा प्रवाह पर बाजार की नजर बनी रहेगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।