स्वास्थ्य

Easy Yoga Poses to Improve Flexibility at Home

घर पर करें ये आसान Yoga Poses, शरीर की जकड़न होगी दूर और बढ़ेगी Flexibility

surbhi मई 22, 2026 0
Beginners practicing easy yoga poses at home to improve flexibility and reduce body stiffness naturally
Easy Yoga Poses for Flexibility at Home

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में घंटों कुर्सी पर बैठना, लैपटॉप और मोबाइल स्क्रीन पर झुके रहना और शारीरिक गतिविधियों की कमी हमारे शरीर को धीरे-धीरे अकड़ा हुआ बना देती है। कमर दर्द, कंधों में जकड़न, टाइट हैमस्ट्रिंग और खराब पोश्चर जैसी समस्याएं अब बेहद आम हो चुकी हैं। ऐसे में योग न केवल शरीर को लचीला बनाने में मदद करता है, बल्कि मानसिक तनाव को कम करने और शरीर की मूवमेंट को बेहतर बनाने में भी कारगर साबित होता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, Flexibility का मतलब सिर्फ स्प्लिट्स करना या कठिन योगासन करना नहीं है। असली उद्देश्य है रोजमर्रा की जिंदगी में शरीर को बिना दर्द और जकड़न के आसानी से मूव कर पाना। नियमित योग अभ्यास से शरीर की Mobility बेहतर होती है, यानी जोड़ों और मांसपेशियों की मूवमेंट अधिक सहज हो जाती है।

वेलनेस एक्सपर्ट्स का कहना है कि शुरुआत करने वालों को योग को किसी प्रतियोगिता की तरह नहीं लेना चाहिए। शरीर को जबरदस्ती स्ट्रेच करने के बजाय धीरे-धीरे कंट्रोल्ड मूवमेंट पर ध्यान देना जरूरी है।

शरीर में जकड़न क्यों होती है?

लंबे समय तक बैठे रहने से हिप फ्लेक्सर्स टाइट हो जाते हैं। लगातार स्क्रीन देखने से गर्दन और कंधों पर दबाव बढ़ता है और पोश्चर बिगड़ता है। वहीं, एक्सरसाइज और स्ट्रेचिंग की कमी जोड़ों की मूवमेंट को सीमित कर देती है। यही वजह है कि आजकल Flexibility और Mobility दोनों पर एक साथ काम करने की सलाह दी जाती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, शुरुआती लोगों में सबसे ज्यादा जकड़न इन हिस्सों में देखने को मिलती है:

  • Hips
  • Hamstrings
  • Shoulders
  • Spine
  • Ankles

इन हिस्सों की जकड़न के कारण आगे झुकना, बैठना, स्क्वाट करना और लंबे समय तक चलना तक मुश्किल हो सकता है।

Yoga करने का सही समय क्या है?

योग करने का कोई एक तय समय नहीं है। यह आपकी दिनचर्या और शरीर की जरूरत पर निर्भर करता है।

  • सुबह योग करने से शरीर की stiffness कम होती है और एनर्जी मिलती है।
  • शाम को योग करने से दिनभर की थकान और तनाव कम होता है।
  • Workout के after stretching करने से muscles ज्यादा effectively खुलती हैं क्योंकि शरीर पहले से warm होता है।

Beginners के लिए 5 आसान Yoga Poses

1. Cat-Cow Pose

यह pose spine को gently activate करता है और लंबे समय तक बैठने से हुई stiffness को कम करने में मदद करता है।

कैसे करें:

  • हाथों और घुटनों के बल आएं।
  • सांस अंदर लेते हुए पेट नीचे करें और छाती ऊपर उठाएं।
  • सांस छोड़ते हुए पीठ को गोल करें और ठुड्डी अंदर की ओर लाएं।
  • इसे 8–10 बार धीरे-धीरे दोहराएं।

2. Downward Facing Dog

यह pose shoulders, calves, hamstrings और spine को stretch करता है।

कैसे करें:

  • हाथ और पैरों के बल शरीर को उल्टे V आकार में उठाएं।
  • घुटनों को थोड़ा मोड़कर रखें।
  • Spine को लंबा करने पर फोकस करें।

Beginner Tip:
अगर heels जमीन तक नहीं पहुंचतीं तो चिंता न करें। शुरुआत में knees bend रखना बिल्कुल ठीक है।

3. Low Lunge

यह pose लंबे समय तक बैठने से tight हुए hips और lower back को खोलने में मदद करता है।

कैसे करें:

  • एक पैर आगे रखें और दूसरा घुटना जमीन पर टिकाएं।
  • Front knee को ankle के ऊपर रखें।
  • धीरे-धीरे hips को आगे की तरफ ले जाएं।
  • 20–30 सेकंड तक hold करें।

4. Cobra Pose

यह pose chest और shoulders खोलता है, posture सुधारता है और spine को मजबूत बनाता है।

कैसे करें:

  • पेट के बल लेट जाएं।
  • हथेलियों को ribs के पास रखें।
  • सांस लेते हुए धीरे-धीरे chest उठाएं।
  • कंधों को relaxed रखें।

Beginner Tip:
हाथों पर ज्यादा जोर देने के बजाय back muscles का इस्तेमाल करें।

5. Child’s Pose

यह pose शरीर और दिमाग दोनों को रिलैक्स करता है और recovery में मदद करता है।

कैसे करें:

  • घुटनों के बल बैठें।
  • शरीर को आगे की ओर झुकाएं।
  • माथे को जमीन या cushion पर टिकाएं।
  • 6–10 गहरी सांसों तक इसी स्थिति में रहें।

Beginners को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

विशेषज्ञों के अनुसार, सबसे बड़ी गलती है शरीर को जरूरत से ज्यादा push करना। Yoga कभी भी दर्द देने वाला नहीं होना चाहिए।

इन गलतियों से बचें:

  • जबरदस्ती deep stretch करना
  • Joints को lock करना
  • Bounce करते हुए stretch करना
  • बिना तैयारी के difficult backbends और inversions करना

अगर कोई pose blocked महसूस हो तो शरीर को force करने के बजाय modifications का इस्तेमाल करें।

कितनी बार Yoga करना चाहिए?

विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे sessions से ज्यादा जरूरी है consistency। रोज सिर्फ 10–15 मिनट योग करने से भी शरीर की flexibility, posture और mobility में बड़ा बदलाव आ सकता है।

अगर समय हो तो 45–60 मिनट का complete session जिसमें breathing exercises और relaxation शामिल हों, और भी बेहतर माना जाता है।

योग की शुरुआत करने के लिए आपको सिर्फ थोड़ा-सा खाली स्थान, एक योग मैट और नियमित अभ्यास की जरूरत है। धीरे-धीरे शरीर खुद बेहतर तरीके से respond करने लगता है।

 

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यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Surbhi

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नई दिल्ली, एजेंसियां। स्मार्टफोन, लैपटॉप और अन्य डिजिटल उपकरण आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। पढ़ाई, नौकरी, बैंकिंग, खरीदारी और मनोरंजन जैसे अधिकांश काम अब स्क्रीन के जरिए ही पूरे होते हैं। ऐसे में बढ़ते स्क्रीन टाइम को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं। हालांकि उनका कहना है कि समस्या स्क्रीन नहीं, बल्कि उसका जरूरत से ज्यादा और गलत तरीके से इस्तेमाल है।   संतुलित उपयोग है सबसे बेहतर उपाय   विशेषज्ञों के अनुसार, मोबाइल, लैपटॉप या टीवी का इस्तेमाल पूरी तरह बंद करना न तो व्यावहारिक है और न ही जरूरी। जरूरी यह है कि स्क्रीन का उपयोग संतुलित तरीके से किया जाए और गैर-जरूरी स्क्रीन टाइम को कम किया जाए।   बढ़ता स्क्रीन टाइम क्यों है नुकसानदायक?   स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि लंबे समय तक लगातार स्क्रीन देखने से आंखों में सूखापन, जलन, धुंधलापन और सिरदर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसके अलावा एक ही मुद्रा में लंबे समय तक बैठे रहने से गर्दन, कंधे और कमर दर्द की शिकायत भी बढ़ सकती है।   स्क्रीन पर अधिक समय बिताने से शारीरिक गतिविधियां कम हो जाती हैं, जिससे मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर और टाइप-2 डायबिटीज जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। वहीं देर रात तक मोबाइल इस्तेमाल करने से नींद की गुणवत्ता प्रभावित होती है, जिसका असर अगले दिन ऊर्जा, एकाग्रता और कार्यक्षमता पर पड़ता है।   20-20-20 नियम अपनाने की सलाह   विशेषज्ञ आंखों को आराम देने के लिए 20-20-20 नियम अपनाने की सलाह देते हैं। इसके तहत हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए लगभग 20 फीट दूर किसी वस्तु को देखना चाहिए। इससे आंखों पर पड़ने वाला तनाव कम होता है।   इन आदतों से कम होगा जोखिम   स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि भोजन करते समय, परिवार के साथ समय बिताते समय और सोने से कम से कम एक घंटे पहले स्क्रीन से दूरी बनाना लाभदायक होता है। नियमित ब्रेक लेना, शारीरिक गतिविधियां बढ़ाना और डिजिटल उपकरणों का सीमित एवं जरूरत के अनुसार उपयोग करना ही स्क्रीन टाइम से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है।

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डेंगू वैक्सीन को मिली मंजूरी! भारत में कब शुरू होगा टीकाकरण, जानें सरकार की पूरी तैयारी

Dengue Vaccine India: भारत में डेंगू की रोकथाम को लेकर एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। देश में डेंगू से बचाव के लिए पहली वैक्सीन को नियामकीय मंजूरी मिल गई है। हर साल मानसून और उसके बाद डेंगू के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी होती है, जिससे लाखों लोग प्रभावित होते हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि यह वैक्सीन भविष्य में डेंगू के गंभीर मामलों और अस्पताल में भर्ती होने के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। हालांकि, वैक्सीन को मंजूरी मिलने के बाद भी आम लोगों तक इसकी पहुंच सुनिश्चित करने के लिए उत्पादन, गुणवत्ता परीक्षण, वितरण व्यवस्था और सरकारी दिशा-निर्देश जैसी कई प्रक्रियाएं पूरी की जानी बाकी हैं। इसलिए सार्वजनिक स्तर पर टीकाकरण शुरू होने में अभी कुछ समय लग सकता है। क्यों जरूरी है डेंगू वैक्सीन? डेंगू मच्छरों से फैलने वाली एक वायरल बीमारी है, जो तेज बुखार, सिरदर्द, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द, प्लेटलेट्स की कमी और गंभीर मामलों में जानलेवा जटिलताओं का कारण बन सकती है। हर साल देश के कई राज्यों में डेंगू के मामलों के कारण स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। ऐसे में प्रभावी वैक्सीन संक्रमण की गंभीरता कम करने और अस्पताल में भर्ती होने के मामलों को घटाने में मददगार साबित हो सकती है। कब शुरू हो सकता है टीकाकरण? विशेषज्ञों के अनुसार, मंजूरी मिलने के बाद वैक्सीन के बड़े स्तर पर उत्पादन, सप्लाई चेन तैयार करने और सरकारी वितरण प्रणाली को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। यदि सभी प्रक्रियाएं तय समय पर पूरी होती हैं, तो 2027 की पहली छमाही के दौरान निजी अस्पतालों और अधिकृत स्वास्थ्य केंद्रों में इसकी उपलब्धता शुरू होने की संभावना है। वहीं, इसे राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में कब शामिल किया जाएगा, इस पर अंतिम निर्णय केंद्र सरकार और संबंधित स्वास्थ्य एजेंसियों द्वारा लिया जाएगा। वैक्सीन कितनी प्रभावी मानी गई है? उपलब्ध क्लीनिकल ट्रायल के आंकड़ों के अनुसार, यह वैक्सीन पुष्ट डेंगू मामलों के खिलाफ लगभग 80 प्रतिशत तक प्रभावी पाई गई है, जबकि डेंगू के कारण अस्पताल में भर्ती होने के जोखिम को करीब 90 प्रतिशत तक कम करने की क्षमता दिखाई है। हालांकि, यह 100 प्रतिशत सुरक्षा की गारंटी नहीं देती, इसलिए मच्छरों से बचाव के उपाय आगे भी जरूरी रहेंगे। किन लोगों को मिल सकती है प्राथमिकता? यदि सरकार चरणबद्ध तरीके से टीकाकरण अभियान शुरू करती है, तो शुरुआती चरण में इन लोगों को प्राथमिकता मिल सकती है— डेंगू प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोग बार-बार डेंगू प्रकोप वाले राज्यों के निवासी 4 से 60 वर्ष आयु वर्ग के पात्र व्यक्ति उच्च जोखिम वाले समूह स्वास्थ्यकर्मी और फ्रंटलाइन वर्कर्स (यदि सरकारी नीति में शामिल किए जाएं) अंतिम पात्रता और दिशा-निर्देश सरकार द्वारा जारी आधिकारिक गाइडलाइन के अनुसार तय किए जाएंगे। सरकार की क्या होगी भूमिका? डेंगू वैक्सीन को सुरक्षित और प्रभावी तरीके से लोगों तक पहुंचाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाएंगी। वैक्सीन की गुणवत्ता और सुरक्षा की निगरानी चरणबद्ध टीकाकरण रणनीति तैयार करना जरूरत पड़ने पर सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में शामिल करने पर निर्णय लेना राज्यों के साथ मिलकर वितरण और आपूर्ति सुनिश्चित करना लोगों को जागरूक करने के लिए व्यापक अभियान चलाना लोगों को क्या होंगे फायदे? गंभीर डेंगू का खतरा कम हो सकता है। अस्पताल में भर्ती होने की संभावना घट सकती है। डेंगू से होने वाली जटिलताओं का जोखिम कम किया जा सकता है। स्वास्थ्य व्यवस्था पर मौसमी दबाव कम करने में मदद मिल सकती है। डेंगू प्रभावित क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा और बेहतर हो सकती है। वैक्सीन के बाद भी बचाव क्यों जरूरी रहेगा? विशेषज्ञों के अनुसार, वैक्सीन डेंगू से सुरक्षा का एक मजबूत माध्यम है, लेकिन यह मच्छरों के प्रजनन को नहीं रोकती। इसलिए बचाव के लिए ये उपाय अपनाना जरूरी रहेगा— घर और आसपास पानी जमा न होने दें। पूरी बाजू के कपड़े पहनें। मच्छरदानी और मच्छर भगाने वाले रिपेलेंट का इस्तेमाल करें। तेज बुखार, शरीर दर्द या सिरदर्द होने पर तुरंत जांच कराएं। बिना डॉक्टर की सलाह के दवाएं लेने से बचें। ध्यान रखें :- डेंगू वैक्सीन को मंजूरी मिलना भारत के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन आम लोगों के लिए इसकी उपलब्धता, कीमत, टीकाकरण की शुरुआत और राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल किए जाने का अंतिम फैसला सरकार और संबंधित स्वास्थ्य एजेंसियों की आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगा। तब तक डेंगू से बचाव के लिए मच्छरों से सुरक्षा और साफ-सफाई के उपाय सबसे प्रभावी बचाव बने रहेंगे।

anmol जुलाई 25, 2026 0
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Menopause Bone Health: मेनोपॉज के बाद क्यों कमजोर होने लगती हैं महिलाओं की हड्डियां? इन 5 आदतों से घटेगा ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा

Menopause Bone Health Tips: मेनोपॉज महिलाओं के जीवन का एक स्वाभाविक चरण है, लेकिन इसके साथ होने वाले हार्मोनल बदलाव शरीर पर कई तरह के प्रभाव डालते हैं। सबसे अधिक असर हड्डियों की मजबूती पर पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार मेनोपॉज के बाद एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर तेजी से घटता है, जिससे हड्डियों की घनत्व (Bone Density) कम होने लगती है और ऑस्टियोपोरोसिस यानी हड्डियों के कमजोर व खोखले होने का खतरा बढ़ जाता है। अगर समय रहते इस स्थिति पर ध्यान न दिया जाए तो मामूली चोट या हल्की गिरावट भी गंभीर फ्रैक्चर का कारण बन सकती है। हालांकि सही खानपान, नियमित व्यायाम और समय पर जांच कराकर इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। मेनोपॉज के बाद हड्डियां क्यों कमजोर होती हैं? महिलाओं में आमतौर पर 45 से 55 वर्ष की उम्र के बीच मेनोपॉज शुरू होता है। इस दौरान शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर तेजी से कम हो जाता है। यह हार्मोन हड्डियों को मजबूत बनाए रखने और उनके टूटने की प्रक्रिया को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विशेषज्ञों के अनुसार मेनोपॉज के बाद शुरुआती 5 से 10 वर्षों में महिलाओं की बोन मिनरल डेंसिटी तेजी से घट सकती है, जिससे फ्रैक्चर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। कमजोर हड्डियों के शुरुआती संकेत यदि मेनोपॉज के बाद ये लक्षण दिखाई दें तो इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए— लगातार कमर या पीठ में दर्द उम्र बढ़ने के साथ लंबाई कम होना मामूली चोट या गिरने पर हड्डी टूट जाना झुककर चलने की समस्या शरीर में कमजोरी और संतुलन बनाए रखने में कठिनाई किन कारणों से बढ़ता है जोखिम? विशेषज्ञों के अनुसार निम्न कारण हड्डियों को तेजी से कमजोर बना सकते हैं— एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी कैल्शियम और विटामिन D की कमी शारीरिक गतिविधि या व्यायाम का अभाव धूम्रपान और शराब का सेवन परिवार में ऑस्टियोपोरोसिस का इतिहास बढ़ती उम्र के कारण हड्डियों का धीरे-धीरे कमजोर होना मेनोपॉज के बाद हड्डियों को मजबूत रखने के 5 जरूरी उपाय 1. कैल्शियम से भरपूर आहार लें दूध, दही, पनीर, रागी, तिल और हरी पत्तेदार सब्जियां कैल्शियम के अच्छे स्रोत हैं। इन्हें रोजाना भोजन में शामिल करें। 2. विटामिन D की कमी न होने दें सुबह की धूप लेने के साथ विटामिन D युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करें। इससे शरीर कैल्शियम को बेहतर तरीके से अवशोषित कर पाता है। 3. रोजाना व्यायाम करें तेज चलना, योग, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और सीढ़ियां चढ़ना जैसी गतिविधियां हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद करती हैं। 4. पर्याप्त प्रोटीन लें प्रोटीन हड्डियों और मांसपेशियों दोनों के लिए जरूरी है। संतुलित मात्रा में दाल, अंडा, दूध, सोया और अन्य प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करें। 5. समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराएं विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार जरूरत पड़ने पर बोन मिनरल डेंसिटी (BMD) टेस्ट कराएं। इससे ऑस्टियोपोरोसिस की शुरुआती पहचान संभव हो सकती है और समय रहते इलाज शुरू किया जा सकता है। लक्षणों को नजरअंदाज न करें मेनोपॉज के बाद कमर दर्द, बार-बार फ्रैक्चर या झुकी हुई पीठ जैसे संकेतों को सामान्य उम्र का असर मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त कैल्शियम और विटामिन D के साथ समय पर मेडिकल जांच महिलाओं की हड्डियों को लंबे समय तक स्वस्थ और मजबूत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।  

surbhi जुलाई 24, 2026 0
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