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Alcohol Can Damage Your Digestive System

Alcohol Side Effects: मुंह से आंत तक शरीर के इन अंगों को नुकसान पहुंचा सकती है शराब, जानें कैसे बिगड़ती है सेहत

surbhi अगस्त 1, 2026 0
Alcohol can damage the digestive system from the mouth and throat to the stomach, intestines, pancreas and colon
Alcohol Side Effects on Digestive Health

अक्सर शराब के नुकसान की बात होती है तो सबसे पहले लिवर का नाम सामने आता है। लेकिन शराब का असर सिर्फ लिवर तक सीमित नहीं रहता। शराब पीने के बाद इसका संपर्क मुंह, गले और खाने की नली से होता है, जबकि इसके घटक और शरीर में बनने वाले विषैले पदार्थ पाचन तंत्र के दूसरे हिस्सों को भी प्रभावित कर सकते हैं।

National Institute on Alcohol Abuse and Alcoholism (NIAAA) के अनुसार, शराब का अत्यधिक या लंबे समय तक सेवन शरीर के कई अंगों और सिस्टम को प्रभावित कर सकता है। इसका संबंध गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सूजन और ब्लीडिंग, पैंक्रियाटाइटिस तथा कई तरह के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से भी है।

आइए समझते हैं कि शराब शरीर के पाचन तंत्र में किस तरह नुकसान पहुंचा सकती है।

मुंह और गले से शुरू हो सकता है नुकसान

शराब का संपर्क सबसे पहले मुंह और गले की अंदरूनी सतह से होता है। लंबे समय तक शराब का सेवन मुंह और गले की सेहत पर प्रतिकूल असर डाल सकता है।

National Cancer Institute के अनुसार शराब का सेवन मुंह, गले और स्वरयंत्र समेत कई हिस्सों के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से जुड़ा है। शराब की मात्रा बढ़ने के साथ कुछ कैंसर का जोखिम भी बढ़ता है।

शराब के साथ तंबाकू का सेवन स्थिति को और गंभीर बना सकता है। NCI के मुताबिक शराब और तंबाकू दोनों का इस्तेमाल करने वालों में मुंह, गले, स्वरयंत्र और एसोफैगस के कैंसर का जोखिम अकेले शराब या तंबाकू की तुलना में काफी अधिक हो सकता है।

खाने की नली पर भी पड़ सकता है असर

मुंह से शराब खाने की नली यानी एसोफैगस के रास्ते पेट तक पहुंचती है। शराब का सेवन गैस्ट्रोएसोफेजियल रिफ्लक्स डिजीज यानी GERD के बढ़े हुए जोखिम से जुड़ा है। इससे सीने में जलन और एसिड रिफ्लक्स जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

इससे भी गंभीर चिंता कैंसर के जोखिम को लेकर है। NCI के अनुसार शराब एसोफैगस कैंसर के जोखिम को बढ़ाने वाले ज्ञात कारकों में शामिल है। शराब की मात्रा बढ़ने पर जोखिम भी बढ़ सकता है।

पेट में बढ़ सकती है जलन और सूजन

शराब पेट और पूरे GI tract की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचा सकती है। NIAAA के अनुसार शराब पाचन तंत्र की epithelial lining को नुकसान पहुंचाने, सूजन बढ़ाने और GI bleeding से जुड़ी समस्याओं का कारण बन सकती है।

इसी वजह से कुछ लोगों में पेट की जलन, दर्द, उल्टी या पाचन संबंधी परेशानी देखने को मिल सकती है। शराब का सेवन GERD के जोखिम से भी जुड़ा है।

छोटी आंत और गट हेल्थ पर असर

शराब का असर छोटी आंत और आंतों की अंदरूनी सुरक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। NIAAA के अनुसार शराब intestinal barrier को प्रभावित कर सकती है और आंतों में मौजूद माइक्रोबायोटा की संरचना में बदलाव से जुड़ी है। इसे आम भाषा में गट हेल्थ बिगड़ना कहा जा सकता है।

लंबे समय तक अत्यधिक शराब का सेवन पाचन तंत्र में सूजन और पोषक तत्वों के इस्तेमाल से जुड़ी परेशानियों को बढ़ा सकता है। ऐसे में व्यक्ति के पोषण और सामान्य स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है।

पैंक्रियाज के लिए भी खतरनाक हो सकती है शराब

पैंक्रियाज पाचन एंजाइम और ब्लड शुगर को नियंत्रित करने वाले हार्मोन से जुड़ा महत्वपूर्ण अंग है। लंबे समय तक शराब का अत्यधिक सेवन पैंक्रियाटाइटिस यानी पैंक्रियाज में सूजन का कारण बन सकता है।

एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस अचानक शुरू हो सकता है, जबकि बार-बार होने वाली सूजन क्रोनिक पैंक्रियाटाइटिस में बदल सकती है। क्रोनिक पैंक्रियाटाइटिस से पाचन और ब्लड शुगर नियंत्रण जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

बड़ी आंत और कोलोरेक्टल कैंसर का जोखिम

शराब का संबंध कोलोरेक्टल यानी बड़ी आंत और मलाशय के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से भी पाया गया है। NCI के अनुसार मध्यम से अधिक मात्रा में शराब पीने वालों में कोलोरेक्टल कैंसर का जोखिम शराब न पीने वालों की तुलना में बढ़ सकता है।

यानी शराब का असर सिर्फ पेट या लिवर तक सीमित समझना सही नहीं है। इसके प्रभाव पाचन तंत्र के कई हिस्सों तक पहुंच सकते हैं।

शराब शरीर को नुकसान कैसे पहुंचाती है?

शराब शरीर में पहुंचने के बाद कई रासायनिक प्रक्रियाओं से गुजरती है। NIAAA के अनुसार शराब के metabolism के दौरान acetaldehyde नाम का एक विषैला और carcinogenic पदार्थ बनता है। यह DNA और कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है।

यही कारण है कि शराब से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम को केवल नशे या लिवर की समस्या तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए।

इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें

अगर शराब का सेवन करने वाले व्यक्ति को लगातार इनमें से कोई समस्या हो रही है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है:

  • लगातार पेट दर्द या जलन
  • बार-बार सीने में जलन या एसिड रिफ्लक्स
  • लगातार उल्टी
  • उल्टी या मल में खून
  • काला मल
  • बिना वजह वजन कम होना
  • लगातार कमजोरी या थकान
  • लंबे समय से दस्त या कब्ज
  • बार-बार पाचन संबंधी परेशानी

खास तौर पर खून की उल्टी, काला मल, तेज पेट दर्द या अचानक गंभीर कमजोरी जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तत्काल चिकित्सकीय मदद लेनी चाहिए।

शराब छोड़ने से क्या फायदा हो सकता है?

शराब का सेवन बंद करना स्वास्थ्य जोखिम कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। NCI के अनुसार शराब छोड़ने के बाद समय के साथ मुंह और एसोफैगस के कैंसर का जोखिम कम हो सकता है, हालांकि जोखिम को कभी-कभी सामान्य स्तर तक आने में वर्षों लग सकते हैं।

अगर कोई व्यक्ति लंबे समय से नियमित या ज्यादा मात्रा में शराब पी रहा है, तो अचानक बंद करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है, क्योंकि कुछ लोगों में withdrawal गंभीर हो सकता है।

 

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यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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Imposter Syndrome: सफलता के बाद भी खुद को अयोग्य समझते हैं? जानिए क्या है इम्पोस्टर सिंड्रोम

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Asthma patient managing breathing problems during rainy season amid humidity, mold, allergens and changing weather
Rainy Season Asthma: सिर्फ धूल नहीं, बारिश की बूंदें भी बढ़ा सकती हैं अस्थमा की परेशानी; जानें किन चीजों से रहें सावधान

बारिश का मौसम गर्मी से राहत जरूर देता है, लेकिन अस्थमा और एलर्जी से जूझ रहे लोगों के लिए यह मौसम कई बार मुश्किलें बढ़ा सकता है। बारिश के दौरान वातावरण में नमी बढ़ने, फंगस और एलर्जेन के संपर्क में आने तथा मौसम में अचानक बदलाव के कारण कुछ लोगों में सांस से जुड़ी तकलीफ बढ़ सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, अस्थमा के मरीजों को सिर्फ धूल और प्रदूषण से ही नहीं, बल्कि अपने व्यक्तिगत ट्रिगर्स से भी सावधान रहने की जरूरत होती है। बारिश के मौसम में घर के अंदर बिताया जाने वाला ज्यादा समय भी धूल, धूल-कण, पालतू जानवरों की रूसी और फफूंदी जैसे ट्रिगर्स के संपर्क को बढ़ा सकता है। बारिश में क्यों बढ़ सकती है सांस की परेशानी? मॉनसून के दौरान वातावरण में नमी बढ़ने से फफूंदी और अन्य एलर्जेन के पनपने की संभावना बढ़ सकती है। वहीं, तापमान और मौसम में बदलाव कुछ लोगों की सांस की नलियों को अधिक संवेदनशील बना सकता है। बारिश के दौरान घरों में नमी बढ़ने और पानी जमा होने से फंगस या मोल्ड की समस्या भी पैदा हो सकती है। इसके अलावा, घर के अंदर ज्यादा समय बिताने के कारण धूल-कण और पालतू जानवरों की रूसी जैसे एलर्जेन के संपर्क में आने की संभावना बढ़ सकती है। जिन लोगों को पहले से अस्थमा या एलर्जी है, उनमें ये कारक खांसी, सीने में जकड़न, सांस फूलने या घरघराहट जैसे लक्षणों को ट्रिगर कर सकते हैं। Thunderstorm Asthma क्या है? बारिश के साथ आने वाले तेज आंधी-तूफान यानी Thunderstorm भी कुछ लोगों के लिए परेशानी बढ़ा सकते हैं। इसे Thunderstorm Asthma कहा जाता है। इस दौरान हवा में मौजूद परागकण और अन्य एलर्जेन वातावरण में फैल सकते हैं और संवेदनशील लोगों में सांस से जुड़ी परेशानी बढ़ा सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में 2016 के एक बड़े Thunderstorm Asthma episode में बड़ी संख्या में लोगों को सांस लेने में गंभीर परेशानी हुई थी और अस्पतालों में मरीजों की संख्या अचानक बढ़ गई थी। इसलिए अस्थमा के मरीजों को मौसम विभाग की चेतावनियों और अपने डॉक्टर की सलाह को गंभीरता से लेना चाहिए, खासकर जब तेज आंधी-तूफान की संभावना हो। मॉनसून में किन लक्षणों को नजरअंदाज न करें? अस्थमा के मरीजों को बारिश के मौसम में अपने शरीर के संकेतों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। अगर सामान्य से ज्यादा खांसी हो, सांस लेने में परेशानी बढ़े, सीने में जकड़न महसूस हो या सांस लेते समय घरघराहट सुनाई दे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सर्दी-जुकाम और वायरल इंफेक्शन भी कुछ अस्थमा मरीजों में लक्षणों को बढ़ा सकते हैं। इसलिए लगातार बने रहने वाले या बढ़ते लक्षणों पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। बारिश में अस्थमा को कंट्रोल रखने के लिए क्या करें? अस्थमा को नियंत्रित रखने के लिए सबसे जरूरी है कि मरीज अपने डॉक्टर द्वारा बताए गए उपचार और दवाओं की योजना का पालन करें। डॉक्टर द्वारा निर्धारित इनहेलर और दवाएं समय पर लें। अपने व्यक्तिगत अस्थमा ट्रिगर्स की पहचान करें और उनसे बचने की कोशिश करें। घर में नमी और फफूंदी को बढ़ने न दें। घर की नियमित सफाई रखें और धूल जमा न होने दें। तेज आंधी-तूफान के दौरान बाहर जाने से बचें, खासकर अगर परागकण आपके लिए ट्रिगर हैं। बाहर निकलते समय अपनी व्यक्तिगत जरूरत के अनुसार मास्क का इस्तेमाल किया जा सकता है। धूम्रपान और धुएं से दूर रहें। ठंडी हवा या अन्य चीजों से अगर आपके लक्षण बढ़ते हैं, तो उनसे बचाव करें। पर्याप्त आराम और संतुलित खान-पान पर ध्यान दें। इनहेलर को लेकर लापरवाही न करें अस्थमा के मरीजों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डॉक्टर ने जो दवाएं या इनहेलर निर्धारित किए हैं, उन्हें अपनी मर्जी से बंद या कम नहीं करना चाहिए। दवा की खुराक में बदलाव डॉक्टर की सलाह से ही किया जाना चाहिए। अगर सांस फूलने की समस्या अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाए, बोलने या चलने में परेशानी हो, होंठ या चेहरा नीला पड़ने लगे या डॉक्टर द्वारा दिए गए रिलीवर उपचार से राहत न मिले, तो तत्काल चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है। बारिश में सिर्फ अस्थमा मरीज ही नहीं, एलर्जी वाले भी रहें सतर्क मॉनसून में बढ़ी नमी, फंगस, परागकण और वायरल संक्रमण कुछ लोगों में एलर्जी या सांस से जुड़ी समस्या बढ़ा सकते हैं। इसलिए अस्थमा और एलर्जी से पीड़ित लोगों को इस मौसम में अपने ट्रिगर्स पहचानकर सावधानी बरतनी चाहिए। हालांकि, हर व्यक्ति के ट्रिगर्स अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी एक चीज को सभी अस्थमा मरीजों के लिए सार्वभौमिक ट्रिगर मानने के बजाय अपने लक्षणों और डॉक्टर की सलाह के आधार पर सावधानी बरतना बेहतर है।  

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Nocturia
रात में बार-बार पेशाब आना हो सकता है गंभीर बीमारियों का संकेत, जानें नोक्ट्यूरिया के 5 बड़े कारण

नई दिल्ली, एजेंसियां। रात में एक-दो बार पेशाब के लिए उठना सामान्य हो सकता है, लेकिन यदि लगभग हर रात कई बार बाथरूम जाना पड़े तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। मेडिकल भाषा में इस स्थिति को नोक्ट्यूरिया (Nocturia) कहा जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह केवल नींद में खलल डालने वाली समस्या नहीं, बल्कि कई गंभीर बीमारियों का शुरुआती संकेत भी हो सकती है।   नोक्ट्यूरिया क्या है और क्यों है चिंता का विषय?   लगातार रात में पेशाब आने से नींद पूरी नहीं हो पाती, जिससे थकान, चिड़चिड़ापन, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी और लंबे समय में स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यदि यह समस्या लगातार बनी रहे तो डॉक्टर से सलाह लेकर इसकी वजह की जांच कराना जरूरी है। डायबिटीज बढ़ा सकती है रात में पेशाब की समस्या   डायबिटीज में रक्त में शुगर का स्तर बढ़ने पर किडनी अतिरिक्त शुगर को पेशाब के जरिए बाहर निकालती है। इस प्रक्रिया में अधिक पानी भी शरीर से निकलता है, जिससे बार-बार पेशाब आता है। यदि इसके साथ अधिक प्यास, भूख, थकान या वजन कम होने जैसे लक्षण हों तो ब्लड शुगर की जांच करानी चाहिए।   ओवरएक्टिव ब्लैडर भी हो सकता है कारण   ओवरएक्टिव ब्लैडर की स्थिति में मूत्राशय समय से पहले सिकुड़ने लगता है, जिससे बार-बार और अचानक पेशाब की इच्छा होती है। बढ़ती उम्र, मोटापा, नसों की समस्या या ब्लैडर की मांसपेशियों की कमजोरी इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं।   यूटीआई में भी बार-बार पेशाब आने की शिकायत   यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) के कारण भी रात में कई बार पेशाब आ सकता है। इसके साथ पेशाब में जलन, दर्द, दुर्गंध, धुंधला पेशाब या बुखार जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। समय पर इलाज न होने पर संक्रमण किडनी तक फैल सकता है।   किडनी की बीमारी का भी हो सकता है संकेत   किडनी शरीर से अतिरिक्त पानी और अपशिष्ट पदार्थ बाहर निकालने का काम करती है। यदि किडनी ठीक से काम नहीं कर रही हो तो पेशाब की आदतों में बदलाव आ सकता है। पैरों में सूजन, थकान, भूख कम लगना और हाई ब्लड प्रेशर जैसे लक्षण भी इसके साथ दिखाई दे सकते हैं। हाई ब्लड प्रेशर और दवाओं का असर भी जिम्मेदार   हाई ब्लड प्रेशर के इलाज में दी जाने वाली कुछ डाययूरेटिक दवाएं शरीर से अतिरिक्त पानी बाहर निकालती हैं। यदि इन्हें शाम या रात में लिया जाए तो रात में बार-बार पेशाब की जरूरत पड़ सकती है। लंबे समय तक अनियंत्रित हाई ब्लड प्रेशर भी किडनी को प्रभावित कर सकता है। लगातार समस्या होने पर डॉक्टर से करें संपर्क   विशेषज्ञों का कहना है कि यदि रात में बार-बार पेशाब आने की समस्या लंबे समय तक बनी रहे या इसके साथ अन्य लक्षण भी हों, तो स्वयं इलाज करने के बजाय चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए। समय पर पहचान और सही उपचार से कई गंभीर बीमारियों का खतरा कम किया जा सकता है।

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