National Institute on Alcohol Abuse and Alcoholism (NIAAA) के अनुसार, शराब का अत्यधिक या लंबे समय तक सेवन शरीर के कई अंगों और सिस्टम को प्रभावित कर सकता है। इसका संबंध गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सूजन और ब्लीडिंग, पैंक्रियाटाइटिस तथा कई तरह के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से भी है।
आइए समझते हैं कि शराब शरीर के पाचन तंत्र में किस तरह नुकसान पहुंचा सकती है।
शराब का संपर्क सबसे पहले मुंह और गले की अंदरूनी सतह से होता है। लंबे समय तक शराब का सेवन मुंह और गले की सेहत पर प्रतिकूल असर डाल सकता है।
National Cancer Institute के अनुसार शराब का सेवन मुंह, गले और स्वरयंत्र समेत कई हिस्सों के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से जुड़ा है। शराब की मात्रा बढ़ने के साथ कुछ कैंसर का जोखिम भी बढ़ता है।
शराब के साथ तंबाकू का सेवन स्थिति को और गंभीर बना सकता है। NCI के मुताबिक शराब और तंबाकू दोनों का इस्तेमाल करने वालों में मुंह, गले, स्वरयंत्र और एसोफैगस के कैंसर का जोखिम अकेले शराब या तंबाकू की तुलना में काफी अधिक हो सकता है।
मुंह से शराब खाने की नली यानी एसोफैगस के रास्ते पेट तक पहुंचती है। शराब का सेवन गैस्ट्रोएसोफेजियल रिफ्लक्स डिजीज यानी GERD के बढ़े हुए जोखिम से जुड़ा है। इससे सीने में जलन और एसिड रिफ्लक्स जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
इससे भी गंभीर चिंता कैंसर के जोखिम को लेकर है। NCI के अनुसार शराब एसोफैगस कैंसर के जोखिम को बढ़ाने वाले ज्ञात कारकों में शामिल है। शराब की मात्रा बढ़ने पर जोखिम भी बढ़ सकता है।
शराब पेट और पूरे GI tract की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचा सकती है। NIAAA के अनुसार शराब पाचन तंत्र की epithelial lining को नुकसान पहुंचाने, सूजन बढ़ाने और GI bleeding से जुड़ी समस्याओं का कारण बन सकती है।
इसी वजह से कुछ लोगों में पेट की जलन, दर्द, उल्टी या पाचन संबंधी परेशानी देखने को मिल सकती है। शराब का सेवन GERD के जोखिम से भी जुड़ा है।
शराब का असर छोटी आंत और आंतों की अंदरूनी सुरक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। NIAAA के अनुसार शराब intestinal barrier को प्रभावित कर सकती है और आंतों में मौजूद माइक्रोबायोटा की संरचना में बदलाव से जुड़ी है। इसे आम भाषा में गट हेल्थ बिगड़ना कहा जा सकता है।
लंबे समय तक अत्यधिक शराब का सेवन पाचन तंत्र में सूजन और पोषक तत्वों के इस्तेमाल से जुड़ी परेशानियों को बढ़ा सकता है। ऐसे में व्यक्ति के पोषण और सामान्य स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है।
पैंक्रियाज पाचन एंजाइम और ब्लड शुगर को नियंत्रित करने वाले हार्मोन से जुड़ा महत्वपूर्ण अंग है। लंबे समय तक शराब का अत्यधिक सेवन पैंक्रियाटाइटिस यानी पैंक्रियाज में सूजन का कारण बन सकता है।
एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस अचानक शुरू हो सकता है, जबकि बार-बार होने वाली सूजन क्रोनिक पैंक्रियाटाइटिस में बदल सकती है। क्रोनिक पैंक्रियाटाइटिस से पाचन और ब्लड शुगर नियंत्रण जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
शराब का संबंध कोलोरेक्टल यानी बड़ी आंत और मलाशय के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से भी पाया गया है। NCI के अनुसार मध्यम से अधिक मात्रा में शराब पीने वालों में कोलोरेक्टल कैंसर का जोखिम शराब न पीने वालों की तुलना में बढ़ सकता है।
यानी शराब का असर सिर्फ पेट या लिवर तक सीमित समझना सही नहीं है। इसके प्रभाव पाचन तंत्र के कई हिस्सों तक पहुंच सकते हैं।
शराब शरीर में पहुंचने के बाद कई रासायनिक प्रक्रियाओं से गुजरती है। NIAAA के अनुसार शराब के metabolism के दौरान acetaldehyde नाम का एक विषैला और carcinogenic पदार्थ बनता है। यह DNA और कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है।
यही कारण है कि शराब से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम को केवल नशे या लिवर की समस्या तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए।
अगर शराब का सेवन करने वाले व्यक्ति को लगातार इनमें से कोई समस्या हो रही है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है:
खास तौर पर खून की उल्टी, काला मल, तेज पेट दर्द या अचानक गंभीर कमजोरी जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तत्काल चिकित्सकीय मदद लेनी चाहिए।
शराब का सेवन बंद करना स्वास्थ्य जोखिम कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। NCI के अनुसार शराब छोड़ने के बाद समय के साथ मुंह और एसोफैगस के कैंसर का जोखिम कम हो सकता है, हालांकि जोखिम को कभी-कभी सामान्य स्तर तक आने में वर्षों लग सकते हैं।
अगर कोई व्यक्ति लंबे समय से नियमित या ज्यादा मात्रा में शराब पी रहा है, तो अचानक बंद करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है, क्योंकि कुछ लोगों में withdrawal गंभीर हो सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। कई लोग जीवन में बड़ी सफलता हासिल करने के बाद भी खुद को उसका हकदार नहीं मानते। उन्हें लगता है कि उनकी उपलब्धियां मेहनत या प्रतिभा की वजह से नहीं, बल्कि किस्मत या दूसरों की मदद से मिली हैं। अगर आपके मन में भी बार-बार ऐसे विचार आते हैं, तो यह इम्पोस्टर सिंड्रोम (Imposter Syndrome) का संकेत हो सकता है। यह कोई मानसिक बीमारी नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है, जो आत्मविश्वास, करियर, पढ़ाई और रिश्तों पर गहरा असर डाल सकती है। क्या है इम्पोस्टर सिंड्रोम? इम्पोस्टर सिंड्रोम ऐसी मानसिक स्थिति है, जिसमें व्यक्ति अपनी उपलब्धियों के बावजूद खुद को योग्य नहीं मानता। उसे हमेशा यह डर बना रहता है कि एक दिन लोग उसकी 'असलियत' जान जाएंगे और उसे अयोग्य समझेंगे। यह समस्या किसी भी उम्र के लोगों में हो सकती है, चाहे वे छात्र हों, नौकरीपेशा, डॉक्टर, इंजीनियर, कलाकार, उद्यमी या किसी भी क्षेत्र के सफल व्यक्ति। इन संकेतों से करें पहचान इस स्थिति से जूझ रहे लोग अक्सर अपनी सफलता का श्रेय खुद को नहीं देते, लगातार दूसरों से तुलना करते हैं और हर काम में पूर्णता (परफेक्शन) की उम्मीद रखते हैं। तारीफ मिलने पर असहज महसूस करना, छोटी-सी गलती पर खुद को असफल मान लेना, नई जिम्मेदारियों से डरना और हर समय अपनी कमियां उजागर होने का डर भी इसके प्रमुख लक्षण हैं। किन कारणों से बढ़ती है यह समस्या? विशेषज्ञों के अनुसार, इम्पोस्टर सिंड्रोम के पीछे कई मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण हो सकते हैं। बचपन में लगातार तुलना होना, केवल बेहतरीन प्रदर्शन पर ही सराहना मिलना, परफेक्शन की आदत, नई नौकरी या प्रमोशन जैसी परिस्थितियां और सोशल मीडिया पर दूसरों की सफलता से खुद की तुलना करना इस समस्या को बढ़ा सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है असर अगर यह भावना लंबे समय तक बनी रहे, तो व्यक्ति तनाव, चिंता, आत्मविश्वास में कमी और बर्नआउट जैसी समस्याओं का शिकार हो सकता है। कुछ लोग खुद को साबित करने के लिए जरूरत से ज्यादा काम करने लगते हैं, जबकि कई लोग असफलता के डर से नए अवसरों से दूर रहने लगते हैं। कैसे पाएं इम्पोस्टर सिंड्रोम से राहत? विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अपनी छोटी-बड़ी उपलब्धियों को स्वीकार करें और उन्हें लिखकर रखें। नकारात्मक विचार आने पर खुद से पूछें कि क्या उसके पीछे कोई ठोस प्रमाण है। दूसरों से तुलना करने के बजाय अपनी प्रगति पर ध्यान दें और गलतियों को सीखने का अवसर मानें। अपनी भावनाएं किसी भरोसेमंद दोस्त, परिवार के सदस्य, मेंटर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से साझा करने से भी मदद मिल सकती है। कब लें विशेषज्ञ की सलाह? यदि खुद को अयोग्य समझने की भावना लंबे समय तक बनी रहे और इसका असर आपके काम, पढ़ाई, रिश्तों या रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार तनाव, चिंता, उदासी या आत्मविश्वास में गंभीर कमी महसूस होने पर मनोवैज्ञानिक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर विकल्प हो सकता है। समय पर सही सहायता मिलने से इस स्थिति से बाहर निकलना आसान हो सकता है।
बारिश का मौसम गर्मी से राहत जरूर देता है, लेकिन अस्थमा और एलर्जी से जूझ रहे लोगों के लिए यह मौसम कई बार मुश्किलें बढ़ा सकता है। बारिश के दौरान वातावरण में नमी बढ़ने, फंगस और एलर्जेन के संपर्क में आने तथा मौसम में अचानक बदलाव के कारण कुछ लोगों में सांस से जुड़ी तकलीफ बढ़ सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, अस्थमा के मरीजों को सिर्फ धूल और प्रदूषण से ही नहीं, बल्कि अपने व्यक्तिगत ट्रिगर्स से भी सावधान रहने की जरूरत होती है। बारिश के मौसम में घर के अंदर बिताया जाने वाला ज्यादा समय भी धूल, धूल-कण, पालतू जानवरों की रूसी और फफूंदी जैसे ट्रिगर्स के संपर्क को बढ़ा सकता है। बारिश में क्यों बढ़ सकती है सांस की परेशानी? मॉनसून के दौरान वातावरण में नमी बढ़ने से फफूंदी और अन्य एलर्जेन के पनपने की संभावना बढ़ सकती है। वहीं, तापमान और मौसम में बदलाव कुछ लोगों की सांस की नलियों को अधिक संवेदनशील बना सकता है। बारिश के दौरान घरों में नमी बढ़ने और पानी जमा होने से फंगस या मोल्ड की समस्या भी पैदा हो सकती है। इसके अलावा, घर के अंदर ज्यादा समय बिताने के कारण धूल-कण और पालतू जानवरों की रूसी जैसे एलर्जेन के संपर्क में आने की संभावना बढ़ सकती है। जिन लोगों को पहले से अस्थमा या एलर्जी है, उनमें ये कारक खांसी, सीने में जकड़न, सांस फूलने या घरघराहट जैसे लक्षणों को ट्रिगर कर सकते हैं। Thunderstorm Asthma क्या है? बारिश के साथ आने वाले तेज आंधी-तूफान यानी Thunderstorm भी कुछ लोगों के लिए परेशानी बढ़ा सकते हैं। इसे Thunderstorm Asthma कहा जाता है। इस दौरान हवा में मौजूद परागकण और अन्य एलर्जेन वातावरण में फैल सकते हैं और संवेदनशील लोगों में सांस से जुड़ी परेशानी बढ़ा सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में 2016 के एक बड़े Thunderstorm Asthma episode में बड़ी संख्या में लोगों को सांस लेने में गंभीर परेशानी हुई थी और अस्पतालों में मरीजों की संख्या अचानक बढ़ गई थी। इसलिए अस्थमा के मरीजों को मौसम विभाग की चेतावनियों और अपने डॉक्टर की सलाह को गंभीरता से लेना चाहिए, खासकर जब तेज आंधी-तूफान की संभावना हो। मॉनसून में किन लक्षणों को नजरअंदाज न करें? अस्थमा के मरीजों को बारिश के मौसम में अपने शरीर के संकेतों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। अगर सामान्य से ज्यादा खांसी हो, सांस लेने में परेशानी बढ़े, सीने में जकड़न महसूस हो या सांस लेते समय घरघराहट सुनाई दे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सर्दी-जुकाम और वायरल इंफेक्शन भी कुछ अस्थमा मरीजों में लक्षणों को बढ़ा सकते हैं। इसलिए लगातार बने रहने वाले या बढ़ते लक्षणों पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। बारिश में अस्थमा को कंट्रोल रखने के लिए क्या करें? अस्थमा को नियंत्रित रखने के लिए सबसे जरूरी है कि मरीज अपने डॉक्टर द्वारा बताए गए उपचार और दवाओं की योजना का पालन करें। डॉक्टर द्वारा निर्धारित इनहेलर और दवाएं समय पर लें। अपने व्यक्तिगत अस्थमा ट्रिगर्स की पहचान करें और उनसे बचने की कोशिश करें। घर में नमी और फफूंदी को बढ़ने न दें। घर की नियमित सफाई रखें और धूल जमा न होने दें। तेज आंधी-तूफान के दौरान बाहर जाने से बचें, खासकर अगर परागकण आपके लिए ट्रिगर हैं। बाहर निकलते समय अपनी व्यक्तिगत जरूरत के अनुसार मास्क का इस्तेमाल किया जा सकता है। धूम्रपान और धुएं से दूर रहें। ठंडी हवा या अन्य चीजों से अगर आपके लक्षण बढ़ते हैं, तो उनसे बचाव करें। पर्याप्त आराम और संतुलित खान-पान पर ध्यान दें। इनहेलर को लेकर लापरवाही न करें अस्थमा के मरीजों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डॉक्टर ने जो दवाएं या इनहेलर निर्धारित किए हैं, उन्हें अपनी मर्जी से बंद या कम नहीं करना चाहिए। दवा की खुराक में बदलाव डॉक्टर की सलाह से ही किया जाना चाहिए। अगर सांस फूलने की समस्या अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाए, बोलने या चलने में परेशानी हो, होंठ या चेहरा नीला पड़ने लगे या डॉक्टर द्वारा दिए गए रिलीवर उपचार से राहत न मिले, तो तत्काल चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है। बारिश में सिर्फ अस्थमा मरीज ही नहीं, एलर्जी वाले भी रहें सतर्क मॉनसून में बढ़ी नमी, फंगस, परागकण और वायरल संक्रमण कुछ लोगों में एलर्जी या सांस से जुड़ी समस्या बढ़ा सकते हैं। इसलिए अस्थमा और एलर्जी से पीड़ित लोगों को इस मौसम में अपने ट्रिगर्स पहचानकर सावधानी बरतनी चाहिए। हालांकि, हर व्यक्ति के ट्रिगर्स अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी एक चीज को सभी अस्थमा मरीजों के लिए सार्वभौमिक ट्रिगर मानने के बजाय अपने लक्षणों और डॉक्टर की सलाह के आधार पर सावधानी बरतना बेहतर है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। रात में एक-दो बार पेशाब के लिए उठना सामान्य हो सकता है, लेकिन यदि लगभग हर रात कई बार बाथरूम जाना पड़े तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। मेडिकल भाषा में इस स्थिति को नोक्ट्यूरिया (Nocturia) कहा जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह केवल नींद में खलल डालने वाली समस्या नहीं, बल्कि कई गंभीर बीमारियों का शुरुआती संकेत भी हो सकती है। नोक्ट्यूरिया क्या है और क्यों है चिंता का विषय? लगातार रात में पेशाब आने से नींद पूरी नहीं हो पाती, जिससे थकान, चिड़चिड़ापन, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी और लंबे समय में स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यदि यह समस्या लगातार बनी रहे तो डॉक्टर से सलाह लेकर इसकी वजह की जांच कराना जरूरी है। डायबिटीज बढ़ा सकती है रात में पेशाब की समस्या डायबिटीज में रक्त में शुगर का स्तर बढ़ने पर किडनी अतिरिक्त शुगर को पेशाब के जरिए बाहर निकालती है। इस प्रक्रिया में अधिक पानी भी शरीर से निकलता है, जिससे बार-बार पेशाब आता है। यदि इसके साथ अधिक प्यास, भूख, थकान या वजन कम होने जैसे लक्षण हों तो ब्लड शुगर की जांच करानी चाहिए। ओवरएक्टिव ब्लैडर भी हो सकता है कारण ओवरएक्टिव ब्लैडर की स्थिति में मूत्राशय समय से पहले सिकुड़ने लगता है, जिससे बार-बार और अचानक पेशाब की इच्छा होती है। बढ़ती उम्र, मोटापा, नसों की समस्या या ब्लैडर की मांसपेशियों की कमजोरी इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं। यूटीआई में भी बार-बार पेशाब आने की शिकायत यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) के कारण भी रात में कई बार पेशाब आ सकता है। इसके साथ पेशाब में जलन, दर्द, दुर्गंध, धुंधला पेशाब या बुखार जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। समय पर इलाज न होने पर संक्रमण किडनी तक फैल सकता है। किडनी की बीमारी का भी हो सकता है संकेत किडनी शरीर से अतिरिक्त पानी और अपशिष्ट पदार्थ बाहर निकालने का काम करती है। यदि किडनी ठीक से काम नहीं कर रही हो तो पेशाब की आदतों में बदलाव आ सकता है। पैरों में सूजन, थकान, भूख कम लगना और हाई ब्लड प्रेशर जैसे लक्षण भी इसके साथ दिखाई दे सकते हैं। हाई ब्लड प्रेशर और दवाओं का असर भी जिम्मेदार हाई ब्लड प्रेशर के इलाज में दी जाने वाली कुछ डाययूरेटिक दवाएं शरीर से अतिरिक्त पानी बाहर निकालती हैं। यदि इन्हें शाम या रात में लिया जाए तो रात में बार-बार पेशाब की जरूरत पड़ सकती है। लंबे समय तक अनियंत्रित हाई ब्लड प्रेशर भी किडनी को प्रभावित कर सकता है। लगातार समस्या होने पर डॉक्टर से करें संपर्क विशेषज्ञों का कहना है कि यदि रात में बार-बार पेशाब आने की समस्या लंबे समय तक बनी रहे या इसके साथ अन्य लक्षण भी हों, तो स्वयं इलाज करने के बजाय चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए। समय पर पहचान और सही उपचार से कई गंभीर बीमारियों का खतरा कम किया जा सकता है।