नई दिल्ली, एजेंसियां। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में Junk Food हमारी डाइट का अहम हिस्सा बन चुका है। पिज्जा, बर्गर, चिप्स और फ्राइड फूड स्वाद तो देते हैं, लेकिन शरीर पर इसका नकारात्मक असर धीरे-धीरे दिखने लगता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति 60 दिनों तक जंक फूड से दूरी बना ले, तो शरीर में कई सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
रिसर्च के अनुसार, प्रोसेस्ड फूड भूख से जुड़े हार्मोन को असंतुलित कर देते हैं। लेकिन 60 दिनों तक इन्हें न खाने से ‘लेप्टिन’ और ‘घ्रेलिन’ जैसे हार्मोन संतुलित हो जाते हैं, जिससे भूख सही समय पर लगती है और ओवरईटिंग कम होती है।
स्टडीज बताती हैं कि जंक फूड छोड़ने से रोजाना कैलोरी इनटेक अपने आप कम हो जाता है। इससे वजन नियंत्रित रहता है और ब्लड शुगर लेवल भी स्थिर रहता है।
जंक फूड आंतों के अच्छे बैक्टीरिया को नुकसान पहुंचाता है। 60 दिन तक इससे दूरी बनाने पर पाचन तंत्र मजबूत होता है, सूजन कम होती है और पेट से जुड़ी समस्याओं में राहत मिलती है।
हेल्दी डाइट अपनाने से मेटाबॉलिज्म तेज होता है, जिससे शरीर ज्यादा एक्टिव और एनर्जेटिक महसूस करता है। इंसुलिन सेंसिटिविटी भी बेहतर होती है।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, जंक फूड का असर दिमाग पर भी पड़ता है। इसे छोड़ने से फोकस बेहतर होता है और क्रेविंग कम होती है। साथ ही शरीर से टॉक्सिन निकलने लगते हैं, जिससे त्वचा में निखार आता है और सूजन कम होती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ 60 दिनों तक जंक फूड से दूरी बनाकर आप अपने शरीर और दिमाग को “रीसेट” कर सकते हैं। हालांकि, किसी भी डाइट में बदलाव से पहले डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
WHO ने महामारी की आशंकाओं को किया खारिज (WHO) ने हंटावायरस को लेकर फैल रही महामारी की आशंकाओं को खारिज कर दिया है। संगठन के विशेषज्ञों ने साफ कहा है कि मौजूदा स्थिति की तुलना कोविड-19 महामारी की शुरुआती परिस्थितियों से नहीं की जा सकती। यह बयान अटलांटिक महासागर में यात्रा कर रहे एक क्रूज शिप पर हंटावायरस के Andes strain के संक्रमण के बाद आया है, जिसमें तीन लोगों की मौत हो चुकी है जबकि पांच अन्य संक्रमित पाए गए हैं। “यह SARS-CoV-2 नहीं है” WHO की महामारी और रोकथाम विभाग की निदेशक Maria Van Kerkhove ने कहा कि लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा, “मैं साफ तौर पर कहना चाहती हूं कि यह SARS-CoV-2 जैसी स्थिति नहीं है। हम छह साल पहले जैसी परिस्थिति में नहीं हैं।” उनके मुताबिक हंटावायरस इंसानों में बहुत सीमित तरीके से फैलता है और इसके संक्रमण के लिए बेहद करीबी संपर्क जरूरी होता है। जबकि कोविड वायरस आसानी से एक व्यक्ति से दूसरे में फैल जाता था। Andes strain ही इंसानों में फैलने वाला दुर्लभ प्रकार WHO के अनुसार हंटावायरस का Andes strain अब तक ऐसा इकलौता प्रकार माना जाता है, जो इंसानों के बीच फैल सकता है। हालांकि इसका संक्रमण बहुत सीमित स्तर पर होता है। क्रूज शिप पर मौजूद बाकी यात्रियों और क्रू में फिलहाल कोई लक्षण नहीं पाए गए हैं। एहतियात के तौर पर यात्रियों को कमरे से बाहर निकलने पर मेडिकल मास्क पहनने की सलाह दी गई है। स्पेन की ओर जा रहा है क्रूज शिप संक्रमण की घटना MV Hondius नामक क्रूज शिप पर सामने आई, जो फिलहाल Tenerife की ओर बढ़ रहा है। जहाज को मेडिकल सहायता के लिए रास्ता बदलकर स्पेन के कैनरी द्वीप भेजा गया है। WHO प्रमुख Tedros Adhanom Ghebreyesus ने कहा कि कैनरी द्वीप के लोगों के लिए जोखिम काफी कम है। उन्होंने इस स्थिति से निपटने में अंतरराष्ट्रीय सहयोग और स्पेन सरकार की भूमिका की भी सराहना की। WHO ने क्या कहा? WHO विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला असामान्य जरूर है क्योंकि संक्रमण क्रूज शिप पर सामने आया, लेकिन फिलहाल इसे वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल जैसी स्थिति नहीं माना जा रहा है। संगठन ने कहा कि विभिन्न देशों के विशेषज्ञ मिलकर जांच, टेस्टिंग और सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों पर काम कर रहे हैं ताकि संक्रमण को फैलने से रोका जा सके।
Psilocybin यानी मैजिक मशरूम में पाया जाने वाला साइकेडेलिक कंपाउंड एक बार की हाई डोज लेने के बाद इंसानी दिमाग पर गहरा असर डाल सकता है। एक नई रिसर्च में दावा किया गया है कि सिर्फ 25 mg की एक डोज दिमाग की कार्यप्रणाली और संरचना में ऐसे बदलाव ला सकती है, जिन्हें एक घंटे से लेकर एक महीने तक देखा जा सकता है। यह स्टडी 2026 में 28 स्वस्थ लोगों पर की गई, जिन्होंने पहले कभी साइकेडेलिक पदार्थों का इस्तेमाल नहीं किया था। रिसर्च में वैज्ञानिकों ने EEG और fMRI तकनीक की मदद से दिमाग में होने वाले बदलावों को रिकॉर्ड किया। पहले दी गई प्लेसीबो डोज, फिर 25 mg की हाई डोज रिसर्च के दौरान प्रतिभागियों को सबसे पहले 1 mg की बहुत छोटी डोज दी गई, जिसे प्लेसीबो जैसा माना गया। इसके एक महीने बाद उन्हें 25 mg की हाई डोज दी गई, जो एक गहरा साइकेडेलिक अनुभव पैदा करने के लिए पर्याप्त मानी जाती है। सिर्फ एक घंटे में दिखने लगे बदलाव रिसर्च के मुताबिक, डोज लेने के एक घंटे के भीतर EEG स्कैन में “ब्रेन एंट्रॉपी” में तेजी देखी गई। इसका मतलब है कि दिमाग सामान्य से ज्यादा विविध तरीके से जानकारी प्रोसेस करने लगा और मानसिक अवस्थाओं की संभावनाएं बढ़ गईं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह स्थिति दिमाग को ज्यादा खुला और लचीला बना सकती है। दिमाग की संरचना में भी दिखे बदलाव रिसर्च में इस्तेमाल की गई Diffusion Tensor Imaging तकनीक से पता चला कि एक महीने बाद प्रतिभागियों के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स और सबकॉर्टिकल हिस्सों में व्हाइट मैटर फाइबर्स पतले हुए। हालांकि शोधकर्ताओं ने कहा कि स्वस्थ लोगों में लंबे समय तक रहने वाले फंक्शनल बदलाव उतने मजबूत नहीं दिखे, जितने मानसिक बीमारियों से जूझ रहे मरीजों में देखे जाते हैं। मानसिक स्वास्थ्य और सोचने की क्षमता में सुधार स्टडी में यह भी सामने आया कि एक महीने बाद प्रतिभागियों में– Cognitive Flexibility (सोचने की क्षमता में लचीलापन) Psychological Insight (आत्म-समझ) Wellbeing (मानसिक संतुलन और खुशी) इनमें सुधार देखा गया। शोधकर्ताओं का मानना है कि साइकेडेलिक अनुभव के दौरान मिलने वाली गहरी मानसिक समझ, लंबे समय तक मानसिक स्वास्थ्य में सुधार का कारण बन सकती है। प्रतिभागियों ने बताया “जीवन का सबसे अलग अनुभव” 25 mg डोज लेने वाले लगभग सभी प्रतिभागियों ने इसे अपने जीवन का “सबसे असामान्य चेतन अनुभव” बताया। सिर्फ एक प्रतिभागी ने इसे अपने जीवन के “टॉप 5 सबसे अलग अनुभवों” में शामिल किया। क्या कहते हैं विशेषज्ञ? वैज्ञानिकों का कहना है कि यह रिसर्च साइकेडेलिक थेरेपी और मानसिक स्वास्थ्य उपचार के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोल सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के पदार्थों का इस्तेमाल केवल मेडिकल रिसर्च और विशेषज्ञ निगरानी में ही होना चाहिए। मैजिक मशरूम कई देशों में नियंत्रित या प्रतिबंधित पदार्थों की श्रेणी में आते हैं और इनके अनियंत्रित उपयोग से मानसिक और शारीरिक जोखिम भी हो सकते हैं।
हृदय रोग के इलाज में लंबे समय से यह सवाल बना हुआ है कि सर्जरी बेहतर है या स्टेंटिंग। हालिया रिसर्च ने इस बहस को नई दिशा दी है। Coronary Artery Disease के इलाज में Coronary Artery Bypass Graft (CABG) और Percutaneous Coronary Intervention (PCI) के बीच तुलना करने वाली एक व्यापक स्टडी से कई अहम निष्कर्ष सामने आए हैं। क्या कहती है स्टडी? यह अध्ययन कई रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल्स पर आधारित है, जिनमें कम से कम 3 साल का फॉलो-अप शामिल था। मुख्य फोकस था–मृत्यु दर (all-cause mortality), जबकि सेकेंडरी पैरामीटर्स में हार्ट अटैक, स्ट्रोक जैसे गंभीर इवेंट्स और दोबारा इलाज (revascularisation) शामिल थे। मृत्यु दर में बड़ा अंतर नहीं स्टडी के अनुसार, CABG और PCI के बीच कुल मृत्यु दर में कोई बड़ा अंतर नहीं पाया गया। रिलेटिव रिस्क: 0.90 95% कॉन्फिडेंस इंटरवल: 0.78–1.04 हालांकि, जिन मरीजों में आर्टरी ब्लॉकेज कम जटिल था (SYNTAX स्कोर 23 से कम), उनमें CABG से मृत्यु का जोखिम कुछ कम देखा गया। गंभीर हार्ट इवेंट्स में CABG आगे भले ही मृत्यु दर लगभग समान रही, लेकिन अन्य महत्वपूर्ण पैरामीटर्स में CABG बेहतर साबित हुआ: मेजर कार्डियोवैस्कुलर और सेरेब्रोवैस्कुलर इवेंट्स (MACCE) का जोखिम कम रिलेटिव रिस्क: 0.75 दोबारा प्रक्रिया (revascularisation) की जरूरत आधी तक कम (RR: 0.50) यह फायदे अलग-अलग मरीज समूहों में भी समान रूप से देखे गए। इलाज के फैसले पर क्या असर? यह निष्कर्ष डॉक्टरों और मरीजों दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं। अगर लक्ष्य सिर्फ जीवन बचाना है, तो दोनों विकल्प लगभग समान हैं लेकिन लंबे समय में जटिलताओं और दोबारा इलाज से बचना है, तो CABG बेहतर विकल्प हो सकता है क्या होना चाहिए अगला कदम? विशेषज्ञों का मानना है कि हर मरीज के लिए एक ही इलाज सही नहीं हो सकता। इलाज का चयन करते समय मरीज की स्थिति, आर्टरी की जटिलता और व्यक्तिगत जोखिम को ध्यान में रखना जरूरी है।