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Apple Health Facts: कटे सेब मिनटों में क्यों हो जाते हैं काले? जानिए इसके पीछे का विज्ञान

Anjali Kumari मई 7, 2026 0
Apple Health Facts
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नई दिल्ली, एजेंसियां। आपने अक्सर देखा होगा कि जैसे ही सेब को काटा जाता है, कुछ ही मिनटों में उसका रंग बदलकर भूरा या काला हो जाता है। कई लोग इसे खराब समझकर फेंक देते हैं, लेकिन असल में यह एक सामान्य वैज्ञानिक प्रक्रिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, कटे सेब का रंग बदलना सेहत के लिए खतरनाक नहीं होता, बल्कि यह एक प्राकृतिक रिएक्शन है।

 

क्या है रंग बदलने की असली वजह?


डॉक्टरों के मुताबिक, सेब के कटते ही उसका अंदरूनी हिस्सा हवा के संपर्क में आता है। इसके बाद एंजाइमेटिक ब्राउनिंग नामक प्रक्रिया शुरू होती है। इसमें मौजूद एंजाइम और ऑक्सीजन मिलकर ऑक्सीडेशन करते हैं, जिससे ‘मेलानिन’ जैसा भूरा पिगमेंट बनता है। यही कारण है कि सेब 5–10 मिनट में रंग बदलना शुरू कर देता है और 30–60 मिनट में पूरी तरह भूरा हो सकता है।

 

क्या काला पड़ा सेब खाना सुरक्षित है?


विशेषज्ञों का कहना है कि हल्का भूरा पड़ा सेब खाना सुरक्षित होता है। हालांकि, इससे स्वाद, टेक्सचर और पोषण में थोड़ी कमी आ सकती है। बेहतर है कि सेब को काटने के 20–30 मिनट के अंदर खा लिया जाए, ताकि उसका पूरा पोषण मिल सके।

 

कितने समय तक रहता है ताजा?


कटे हुए सेब को अगर खुले में रखा जाए तो यह 6–12 घंटे में खराब हो सकता है। वहीं, फ्रिज में रखने पर यह 6–8 घंटे तक ठीक रहता है। दूसरी ओर, साबुत सेब कमरे के तापमान पर 7–14 दिन और फ्रिज में 3–5 हफ्ते तक सुरक्षित रह सकते हैं।

 

भूरा होने से कैसे बचाएं?


सेब के टुकड़ों पर नींबू का रस लगाने से ऑक्सीडेशन की प्रक्रिया धीमी हो जाती है, क्योंकि इसमें साइट्रिक एसिड होता है। इसके अलावा, सेब को नमक या चीनी मिले पानी में कुछ देर भिगोकर भी रखा जा सकता है। एयरटाइट कंटेनर में रखने से भी यह जल्दी काला नहीं पड़ता।

 

बच्चों के टिफिन के लिए खास टिप


अगर बच्चों के लंच बॉक्स में सेब पैक करना हो, तो उसे काटने के बाद तुरंत एयरटाइट डिब्बे में रखें और थोड़ा नींबू रस लगाएं। इससे सेब ज्यादा देर तक ताजा दिखेगा और बच्चे उसे आसानी से खा सकेंगे।

 

ध्यान रखें ये बातें


अगर सेब से बदबू आए, उसमें फफूंदी हो या वह ज्यादा नरम हो गया हो, तो उसे खाने से बचना चाहिए। सेब का काला पड़ना एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन सही तरीके से स्टोर करके और समय पर खाकर आप इसके स्वाद और पोषण दोनों का पूरा फायदा उठा सकते हैं।

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हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

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लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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इन सब्जियों को कच्चा खाना पड़ सकता है भारी

नई दिल्ली, एजेंसियां।  हेल्दी रहने के लिए लोग अक्सर कच्ची सब्जियों को अपनी डाइट में शामिल करते हैं, लेकिन हर सब्जी को कच्चा खाना सुरक्षित नहीं होता। विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ सब्जियों में ऐसे तत्व मौजूद होते हैं जो बिना पकाए खाने पर पाचन तंत्र को नुकसान पहुंचा सकते हैं और कई स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकते हैं। खासतौर पर बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर पाचन वाले लोगों को अधिक सतर्क रहने की जरूरत है।   क्यों नुकसानदायक होती हैं कुछ कच्ची सब्जियां? कई सब्जियों में प्राकृतिक रूप से मौजूद रसायन और एंजाइम कच्चे रूप में शरीर के लिए हानिकारक साबित हो सकते हैं। ये पाचन में बाधा डालते हैं, गैस, एसिडिटी और पेट दर्द जैसी समस्याएं पैदा कर सकते हैं। इसलिए इन्हें सही तरीके से पकाकर खाना जरूरी होता है।   इन सब्जियों को कच्चा खाने से बचें ब्रोकली और फूलगोभी जैसी सब्जियों में गोइट्रोजन और गैस बनाने वाले तत्व पाए जाते हैं, जो कच्चा खाने पर थायरॉयड और पाचन से जुड़ी परेशानी बढ़ा सकते हैं। पत्तागोभी भी कच्ची खाने पर पेट में भारीपन और गैस का कारण बन सकती है।   टमाटर भले ही सलाद का हिस्सा हो, लेकिन कुछ लोगों में यह एसिडिटी बढ़ा सकता है। वहीं, बैंगन को कच्चा खाना बिल्कुल नहीं चाहिए, क्योंकि इसमें सोलानिन नामक हल्का जहरीला तत्व होता है, जो अपच और जलन पैदा कर सकता है।   इसके अलावा, पालक और सरसों के पत्तों में ऑक्सलेट्स होते हैं, जो कच्चे सेवन पर कैल्शियम के अवशोषण को प्रभावित करते हैं और किडनी स्टोन का खतरा बढ़ा सकते हैं।   सुरक्षित तरीके से कैसे करें सेवन? इन सब्जियों को हल्का उबालकर, भूनकर या स्टीम करके खाना सबसे सुरक्षित तरीका माना जाता है। पकाने से इनमें मौजूद हानिकारक तत्व काफी हद तक कम हो जाते हैं और पाचन भी आसान हो जाता है।   सावधानी ही है बचाव स्वस्थ रहने के लिए केवल पौष्टिक भोजन ही नहीं, बल्कि उसे सही तरीके से खाना भी जरूरी है। छोटी-सी लापरवाही पेट से जुड़ी बड़ी समस्या बन सकती है। इसलिए डाइट में बदलाव करते समय यह जरूर जान लें कि कौन सी सब्जी किस रूप में आपके लिए फायदेमंद है।

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नई दिल्ली, एजेंसियां। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में Junk Food हमारी डाइट का अहम हिस्सा बन चुका है। पिज्जा, बर्गर, चिप्स और फ्राइड फूड स्वाद तो देते हैं, लेकिन शरीर पर इसका नकारात्मक असर धीरे-धीरे दिखने लगता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति 60 दिनों तक जंक फूड से दूरी बना ले, तो शरीर में कई सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं।   हार्मोन और भूख पर कंट्रोल रिसर्च के अनुसार, प्रोसेस्ड फूड भूख से जुड़े हार्मोन को असंतुलित कर देते हैं। लेकिन 60 दिनों तक इन्हें न खाने से ‘लेप्टिन’ और ‘घ्रेलिन’ जैसे हार्मोन संतुलित हो जाते हैं, जिससे भूख सही समय पर लगती है और ओवरईटिंग कम होती है।   वजन और कैलोरी पर असर स्टडीज बताती हैं कि जंक फूड छोड़ने से रोजाना कैलोरी इनटेक अपने आप कम हो जाता है। इससे वजन नियंत्रित रहता है और ब्लड शुगर लेवल भी स्थिर रहता है।   पाचन तंत्र में सुधार जंक फूड आंतों के अच्छे बैक्टीरिया को नुकसान पहुंचाता है। 60 दिन तक इससे दूरी बनाने पर पाचन तंत्र मजबूत होता है, सूजन कम होती है और पेट से जुड़ी समस्याओं में राहत मिलती है।   मेटाबॉलिज्म और एनर्जी बेहतर हेल्दी डाइट अपनाने से मेटाबॉलिज्म तेज होता है, जिससे शरीर ज्यादा एक्टिव और एनर्जेटिक महसूस करता है। इंसुलिन सेंसिटिविटी भी बेहतर होती है।   दिमाग और स्किन पर असर एक्सपर्ट्स के मुताबिक, जंक फूड का असर दिमाग पर भी पड़ता है। इसे छोड़ने से फोकस बेहतर होता है और क्रेविंग कम होती है। साथ ही शरीर से टॉक्सिन निकलने लगते हैं, जिससे त्वचा में निखार आता है और सूजन कम होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ 60 दिनों तक जंक फूड से दूरी बनाकर आप अपने शरीर और दिमाग को “रीसेट” कर सकते हैं। हालांकि, किसी भी डाइट में बदलाव से पहले डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।

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मध्यम से गंभीर Atopic Dermatitis के इलाज में Ultraviolet B phototherapy (UVB) लंबे समय से प्रभावी विकल्प माना जाता है, खासकर उन मरीजों के लिए जो टॉपिकल स्टेरॉयड जैसे उपचारों से पर्याप्त लाभ नहीं पा रहे हैं। अब एक नई रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल ने narrowband और broadband UVB के बीच तुलना करते हुए अहम निष्कर्ष सामने रखे हैं। स्टडी कैसे की गई? इस अध्ययन में 18 वर्ष से अधिक उम्र के 69 मरीज शामिल किए गए, जिन्हें मध्यम से गंभीर और ट्रीटमेंट-रेफ्रैक्टरी एटोपिक डर्मेटाइटिस था। मरीजों को दो समूहों में बांटा गया: एक को broadband UVB दूसरे को narrowband UVB दोनों समूहों को 12 हफ्तों तक फुल-बॉडी फोटोथेरेपी दी गई, साथ ही उनकी मौजूदा टॉपिकल थेरेपी जारी रही। अध्ययन का मुख्य मापदंड Eczema Area and Severity Index (EASI) स्कोर में बदलाव था। असर में नहीं दिखा बड़ा अंतर रिजल्ट्स के मुताबिक, दोनों ही थेरेपी ने बीमारी की गंभीरता में उल्लेखनीय सुधार किया: Broadband UVB: EASI में औसत −8.1 की कमी Narrowband UVB: EASI में औसत −8.9 की कमी दोनों के बीच का अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं था, यानी प्रभाव लगभग समान रहा। इसके अलावा vIGA, POEM, PP-NRS, DLQI और RECAP जैसे अन्य क्लिनिकल और मरीज-आधारित मापदंडों में भी दोनों ग्रुप्स के बीच कोई खास अंतर नहीं पाया गया। सहनशीलता में बड़ा फर्क हालांकि, टॉलरबिलिटी (सहनशीलता) के मामले में फर्क देखने को मिला: Broadband UVB ग्रुप में 4 मरीजों ने साइड इफेक्ट्स के कारण इलाज छोड़ दिया Narrowband UVB ग्रुप में कोई भी मरीज बीच में नहीं छोड़ा यह दर्शाता है कि narrowband UVB ज्यादा सुरक्षित और बेहतर सहन किया जाने वाला विकल्प हो सकता है। क्या है इसका मतलब? इस अध्ययन से यह साफ होता है कि दोनों UVB थेरेपी प्रभावी हैं, लेकिन बेहतर सहनशीलता के कारण narrowband UVB को प्राथमिकता दी जा सकती है। यह निष्कर्ष डॉक्टरों को इलाज का सही विकल्प चुनने में मदद कर सकता है, खासकर उन मरीजों के लिए जिनकी बीमारी लंबे समय से नियंत्रण में नहीं आ रही।  

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