स्वास्थ्य

5 Fruits That Can Add Protein to Your Diet

कभी सोचा नहीं होगा, अमरूद से भी मिलता है प्रोटीन! जानिए ताकत बढ़ाने वाले 5 फलों के बारे में

surbhi जून 20, 2026 0
Fresh guava, avocado, jackfruit, blackberries and apricots displayed as healthy fruits rich in nutrients and protein.
Protein Rich Fruits for a Healthy Diet

आज के दौर में फिटनेस और हेल्दी लाइफस्टाइल को लेकर लोगों की जागरूकता तेजी से बढ़ी है। ऐसे में प्रोटीन को शरीर के लिए सबसे जरूरी पोषक तत्वों में गिना जाता है। मांसपेशियों की मजबूती से लेकर इम्यून सिस्टम, त्वचा, बाल और शरीर की मरम्मत तक, प्रोटीन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।

हालांकि, शाकाहारी और वीगन डाइट अपनाने वाले लोगों के सामने अक्सर यह चुनौती रहती है कि वे अपनी दैनिक प्रोटीन जरूरत को कैसे पूरा करें। अधिकतर लोग दाल, दूध, पनीर या सोया को ही प्रोटीन का मुख्य स्रोत मानते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि कुछ फलों में भी प्रोटीन पाया जाता है।

कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल की क्लिनिकल डाइटीशियन फियोना संपत के अनुसार, कुछ फल ऐसे हैं जो विटामिन, मिनरल्स और फाइबर के साथ-साथ शरीर को अतिरिक्त प्रोटीन भी प्रदान करते हैं।

1. अमरूद: विटामिन C के साथ प्रोटीन का भी खजाना

अमरूद को आमतौर पर विटामिन C का बेहतरीन स्रोत माना जाता है, लेकिन इसमें प्रोटीन भी अच्छी मात्रा में पाया जाता है।

  • लगभग 150 ग्राम (एक कप) अमरूद में करीब 2 ग्राम प्रोटीन होता है।
  • इसमें फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स भी भरपूर होते हैं।
  • यह पाचन तंत्र को बेहतर बनाने और इम्यूनिटी मजबूत करने में मदद करता है।
  • नियमित सेवन से ब्लड शुगर और हृदय स्वास्थ्य को भी लाभ मिल सकता है।

2. एवोकाडो: हेल्दी फैट और प्रोटीन का शानदार कॉम्बिनेशन

एवोकाडो बाकी फलों की तुलना में थोड़ा महंगा जरूर है, लेकिन पोषण के मामले में बेहद समृद्ध माना जाता है।

  • एक मीडियम एवोकाडो में लगभग 4 से 5 ग्राम प्रोटीन मिलता है।
  • इसमें हेल्दी मोनोअनसैचुरेटेड फैट्स मौजूद होते हैं।
  • पोटैशियम, मैग्नीशियम और फाइबर से भरपूर यह फल लंबे समय तक पेट भरा महसूस कराता है।
  • ब्लड प्रेशर और डाइजेशन को बेहतर रखने में मदद करता है।

3. कटहल: वीगन डाइट वालों की पसंद

हाल के वर्षों में कटहल यानी जैकफ्रूट की लोकप्रियता काफी बढ़ी है।

  • एक कप कच्चे कटहल में लगभग 3 ग्राम प्रोटीन पाया जाता है।
  • इसमें पोटैशियम और फाइबर भी भरपूर मात्रा में मौजूद होता है।
  • यह शरीर को ऊर्जा देने और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने में सहायक माना जाता है।
  • गट हेल्थ को बेहतर बनाने में भी मदद करता है।

4. ब्लैकबेरी: छोटा फल, बड़े फायदे

ब्लैकबेरी केवल स्वाद में ही नहीं, पोषण के मामले में भी काफी फायदेमंद है।

  • 150 ग्राम ब्लैकबेरी में करीब 1.5 ग्राम प्रोटीन होता है।
  • इसमें एंथोसायनिन्स नामक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं।
  • यह सूजन कम करने, दिमागी कार्यक्षमता बढ़ाने और पाचन को बेहतर बनाने में मदद करता है।
  • विटामिन C की मौजूदगी त्वचा और इम्यूनिटी के लिए भी लाभकारी है।

5. खुबानी (Apricot): आंखों और मांसपेशियों के लिए फायदेमंद

खुबानी पोषण से भरपूर फल है, जिसमें प्रोटीन के साथ कई जरूरी विटामिन भी मौजूद होते हैं।

  • 150 ग्राम खुबानी में लगभग 1.5 ग्राम प्रोटीन मिलता है।
  • इसमें विटामिन A, विटामिन C और पोटैशियम अच्छी मात्रा में पाया जाता है।
  • यह आंखों की सेहत, मांसपेशियों और रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए लाभकारी माना जाता है।

क्या फल प्रोटीन का पूरा विकल्प हैं?

विशेषज्ञों के अनुसार, फल कभी भी दाल, डेयरी उत्पाद, अंडे, मछली या लीन मीट जैसे मुख्य प्रोटीन स्रोतों का विकल्प नहीं बन सकते। लेकिन इन्हें संतुलित आहार का हिस्सा बनाने से शरीर को अतिरिक्त पोषण, फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट्स और थोड़ी मात्रा में प्रोटीन जरूर मिलता है।

इसलिए अगर आप अपनी डाइट को और ज्यादा पौष्टिक बनाना चाहते हैं, तो इन फलों को रोजमर्रा के भोजन में शामिल करना एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

 

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लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Surbhi

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हर ओवेरियन सिस्ट कैंसर नहीं होती! जानिए महिलाओं में फैली 5 बड़ी गलतफहमियों की सच्चाई

भारत समेत दुनिया भर में महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के बाद ओवेरियन कैंसर सबसे गंभीर और आम कैंसरों में गिना जाता है। यह बीमारी अंडाशय (Ovary) से शुरू होती है और समय पर पहचान न होने पर जानलेवा साबित हो सकती है। हालांकि, आज भी ओवेरियन कैंसर को लेकर महिलाओं के बीच कई गलत धारणाएं प्रचलित हैं, जिनकी वजह से सही समय पर जांच और इलाज में देरी हो सकती है। आइए जानते हैं ओवेरियन कैंसर से जुड़े 5 बड़े मिथक और उनकी सच्चाई। मिथक 1: ओवेरियन कैंसर सिर्फ अधिक उम्र की महिलाओं को होता है बहुत सी महिलाओं का मानना है कि यह बीमारी केवल बुजुर्ग महिलाओं को होती है। जबकि सच्चाई यह है कि उम्र बढ़ने के साथ जोखिम जरूर बढ़ता है, लेकिन कम उम्र की महिलाएं भी इसकी शिकार हो सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी उम्र की महिला में ओवेरियन कैंसर विकसित हो सकता है। इसलिए केवल उम्र के आधार पर खतरे को नजरअंदाज करना सही नहीं है। मिथक 2: HPV या Pap Smear टेस्ट से ओवेरियन कैंसर का पता चल जाता है यह एक आम गलतफहमी है। HPV टेस्ट और Pap Smear मुख्य रूप से सर्वाइकल कैंसर (गर्भाशय ग्रीवा कैंसर) की जांच के लिए किए जाते हैं। फिलहाल ऐसा कोई नियमित स्क्रीनिंग टेस्ट उपलब्ध नहीं है, जो शुरुआती अवस्था में ओवेरियन कैंसर की सटीक पहचान कर सके। इसलिए इन टेस्टों को ओवेरियन कैंसर की जांच मानना गलत है। मिथक 3: टैल्कम पाउडर से ओवेरियन कैंसर होता है कई वर्षों से टैल्कम पाउडर और ओवेरियन कैंसर के संबंध को लेकर बहस चल रही है। कुछ पुरानी रिसर्च में संभावित संबंध की बात कही गई थी, लेकिन हाल की बड़ी स्टडी में दोनों के बीच कोई मजबूत वैज्ञानिक संबंध साबित नहीं हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस विषय पर अभी भी शोध जारी है और केवल टैल्कम पाउडर को कैंसर का कारण मान लेना सही नहीं होगा। मिथक 4: केवल अल्ट्रासाउंड या CA-125 टेस्ट से कैंसर की पुष्टि हो जाती है अल्ट्रासाउंड और CA-125 ब्लड टेस्ट महत्वपूर्ण जांच हैं, लेकिन अकेले इनके आधार पर ओवेरियन कैंसर की पुष्टि नहीं की जा सकती। CA-125 का स्तर कई अन्य सामान्य स्थितियों में भी बढ़ सकता है, जबकि कुछ कैंसर मरीजों में यह सामान्य भी रह सकता है। अंतिम पुष्टि के लिए बायोप्सी और पैथोलॉजी जांच की आवश्यकता होती है। मिथक 5: हर ओवेरियन सिस्ट कैंसर बन जाती है यह सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक है। अधिकांश ओवेरियन सिस्ट सामान्य (Benign) होती हैं और कई मामलों में बिना इलाज के अपने आप ठीक भी हो जाती हैं। डॉक्टर सिस्ट का आकार, महिला की उम्र, लक्षण और अन्य जांच रिपोर्टों के आधार पर तय करते हैं कि सर्जरी की जरूरत है या नहीं। हर सिस्ट कैंसर में नहीं बदलती। क्यों जरूरी है सही जानकारी? ओवेरियन कैंसर के शुरुआती लक्षण अक्सर सामान्य समस्याओं जैसे पेट फूलना, पेट दर्द, भूख कम लगना या बार-बार पेशाब आने जैसे हो सकते हैं। इसलिए किसी भी लगातार बने रहने वाले लक्षण को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और विशेषज्ञ डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। समय पर पहचान और सही जानकारी ही इस गंभीर बीमारी से बचाव और सफल इलाज की सबसे बड़ी कुंजी है।  

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पीरियड्स के दर्द में क्या आप गलत दवा ले रही हैं? अध्ययन में हुआ बड़ा खुलासा

मासिक धर्म के दौरान होने वाला दर्द लाखों महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करता है। हालांकि, एक नए अध्ययन में सामने आया है कि कई महिलाएं पीरियड्स के दर्द से राहत पाने के लिए ऐसी दवा का इस्तेमाल कर रही हैं, जो हमेशा सबसे प्रभावी विकल्प नहीं हो सकती। इंग्लैंड में किए गए एक बड़े शोध के अनुसार, पीरियड्स से जुड़े दर्द के लिए सबसे अधिक खरीदी जाने वाली दवा पैरासिटामोल है, जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि कई मामलों में इबुप्रोफेन अधिक असरदार साबित हो सकती है। करोड़ों खरीदारी रिकॉर्ड के विश्लेषण में सामने आई जानकारी शोधकर्ताओं ने 2006 से 2015 के बीच एक प्रमुख रिटेल चेन के 21.1 करोड़ से अधिक लेनदेन और 34 लाख ग्राहकों के खरीदारी डेटा का अध्ययन किया। अध्ययन में पाया गया कि मासिक धर्म से जुड़े उत्पादों जैसे सैनिटरी पैड और टैम्पोन के साथ खरीदे गए दर्द निवारक उत्पादों में पैरासिटामोल आधारित दवाओं की हिस्सेदारी लगभग दो-तिहाई थी, जबकि इबुप्रोफेन आधारित दवाएं केवल एक-तिहाई थीं। यह अध्ययन PLOS Digital Health जर्नल में प्रकाशित हुआ है। पीरियड्स के दर्द में इबुप्रोफेन क्यों हो सकती है ज्यादा प्रभावी? विशेषज्ञों के अनुसार, मासिक धर्म के दौरान गर्भाशय की मांसपेशियां सिकुड़ती हैं ताकि उसकी आंतरिक परत बाहर निकल सके। इस प्रक्रिया में शरीर में प्रोस्टाग्लैंडिन नामक रसायन बनता है, जो ऐंठन और दर्द का प्रमुख कारण माना जाता है। इबुप्रोफेन एक नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग (NSAID) है, जो प्रोस्टाग्लैंडिन के निर्माण को कम करने में मदद करती है। इसी वजह से यह पीरियड्स के दौरान होने वाली ऐंठन और मांसपेशियों के दर्द में अधिक प्रभावी मानी जाती है। वहीं, पैरासिटामोल मुख्य रूप से मस्तिष्क में दर्द के संकेतों को कम करने का काम करती है। इसलिए यह सिरदर्द और बुखार जैसी स्थितियों में अधिक उपयोगी मानी जाती है। पीरियड दर्द पर अभी भी सीमित है शोध अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं का कहना है कि महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़े दर्द और उसके उपचार पर अपेक्षाकृत कम शोध हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस विषय पर जागरूकता बढ़ाने और सही दवा के चयन के बारे में जानकारी देने की आवश्यकता है। कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए? सामान्य पीरियड दर्द मासिक धर्म का एक सामान्य हिस्सा हो सकता है, लेकिन यदि दर्द इतना अधिक हो कि दैनिक गतिविधियां प्रभावित होने लगें या दर्द लगातार असामान्य रूप से बना रहे, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक पीरियड दर्द एंडोमेट्रियोसिस, फाइब्रॉइड्स या अन्य स्त्री रोग संबंधी समस्याओं का संकेत भी हो सकता है। दवा लेने से पहले रखें इन बातों का ध्यान हालांकि इबुप्रोफेन कई महिलाओं के लिए प्रभावी विकल्प हो सकती है, लेकिन यह हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं होती। कुछ लोगों में इसके दुष्प्रभाव या स्वास्थ्य संबंधी जोखिम हो सकते हैं। इसलिए किसी भी दर्द निवारक दवा का उपयोग करने से पहले पैक पर दी गई जानकारी पढ़ना और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है। नोट: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से है। किसी भी दवा का सेवन चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही करें।  

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