स्वास्थ्य

The Truth Behind Men’s Laughter

जब दर्द बन जाता है मज़ाक: पुरुषों की हंसी के पीछे छुपी सच्चाई पर एक भावनात्मक नजर

surbhi मार्च 25, 2026 0
smiling men hiding emotional pain behind humor, reflecting inner struggle and mental health reality
Hidden Pain Behind Men’s Laughter

आज की तेज़ रफ्तार और सामाजिक अपेक्षाओं से भरी दुनिया में पुरुषों की भावनाओं को लेकर एक गहरी और अक्सर अनदेखी सच्चाई सामने आती है-वे अपने दर्द को शब्दों में नहीं, बल्कि मज़ाक में बयां करते हैं। “फनी guy” यानी वह व्यक्ति जो हर माहौल को हल्का बना देता है, अक्सर खुद के भीतर भारी भावनाएं छिपाए रहता है।

यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक सामाजिक पैटर्न की है।

हंसी के पीछे छुपी रणनीति

बचपन से ही लड़कों को यह सिखाया जाता है कि वे अपनी भावनाओं को सीमित तरीके से व्यक्त करें। गुस्सा स्वीकार्य है, सफलता सराही जाती है, लेकिन दुख, डर या असुरक्षा-इन भावनाओं को अक्सर दबा दिया जाता है।

ऐसे में हास्य एक माध्यम बन जाता है-एक ऐसा तरीका जिससे सच्चाई भी कही जाए और माहौल भी भारी न हो। धीरे-धीरे यह आदत नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया बन जाती है।

दर्द से पंचलाइन तक का सफर

जब कोई पुरुष अपने सबसे कठिन अनुभवों को भी मज़ाक में बदल देता है, तो यह सिर्फ टैलेंट नहीं बल्कि एक सीखी हुई प्रक्रिया होती है। ब्रेकअप की कहानी हो या नौकरी खोने का दर्द-ये सब अक्सर एक मजेदार किस्से में बदल जाते हैं।

यह प्रक्रिया उन्हें समाज में “आसान” और “पसंद आने वाला” बनाती है। लोग उनके आसपास रहना पसंद करते हैं, क्योंकि वे माहौल को हल्का रखते हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में वे अपनी असली भावनाओं को धीरे-धीरे पीछे छोड़ देते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य पर असर

मनोविज्ञान के अनुसार, हास्य एक परिपक्व coping mechanism है, जो तनाव को कम करने और भावनाओं को नियंत्रित करने में मदद करता है। लेकिन जब यही एकमात्र माध्यम बन जाए, तो यह भावनाओं को समझने और स्वीकार करने की प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पुरुष अक्सर हास्य का इस्तेमाल “emotional deflection” यानी भावनाओं से बचने के लिए करते हैं, क्योंकि उन्हें खुलकर महसूस करने और व्यक्त करने का अवसर कम मिलता है।

क्या यह कमजोरी है?

बिल्कुल नहीं। किसी भी कठिन स्थिति को हंसी में बदल देना एक तरह की भावनात्मक और सामाजिक बुद्धिमत्ता है। यह क्षमता हर किसी में नहीं होती।

लेकिन सवाल यह है-क्या हमेशा ऐसा करना जरूरी है?

जरूरी है संतुलन

हर पल को मजाक में बदलना जरूरी नहीं। कभी-कभी चुप रहना, या यह कहना कि “आज अच्छा नहीं लग रहा”-भी उतना ही जरूरी है।

असल में, जो लोग सच में आपके अपने हैं, वे आपकी खामोशी को भी समझेंगे। आपको हर बार “फनी guy” बनने की जरूरत नहीं है।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Surbhi

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डॉक्टरों के लिए देशभर में एक समान मेडिकल लाइसेंस व्यवस्था की तैयारी
डॉक्टरों के लिए ‘एक देश-एक लाइसेंस’ की तैयारी, देशभर में कहीं भी प्रैक्टिस करने की राह होगी आसान

नई दिल्ली, एजेंसियां। केंद्र सरकार डॉक्टरों के लिए ‘एक देश-एक लाइसेंस’ की व्यवस्था लागू करने की दिशा में काम कर रही है। प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य डॉक्टरों को अलग-अलग राज्यों में चिकित्सा सेवा देने के लिए बार-बार अलग पंजीकरण कराने की जरूरत को कम करना है। इसके तहत राष्ट्रीय स्तर पर एक समान चिकित्सकीय पंजीकरण व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।   अलग-अलग राज्यों में पंजीकरण की परेशानी होगी कम   मौजूदा व्यवस्था में डॉक्टरों को कई राज्यों में प्रैक्टिस करने के लिए संबंधित राज्य चिकित्सा परिषदों में पंजीकरण से जुड़ी प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ सकता है। नई व्यवस्था लागू होने पर एक राष्ट्रीय लाइसेंस या पंजीकरण के आधार पर देश के अलग-अलग हिस्सों में काम करना आसान बनाने की कोशिश होगी।   राष्ट्रीय चिकित्सा रजिस्टर बनेगा आधार   इस व्यवस्था में नेशनल मेडिकल रजिस्टर (NMR) की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। इसमें देश में पंजीकृत डॉक्टरों की जानकारी को एकीकृत करने का उद्देश्य है, जिससे डॉक्टर की योग्यता और पंजीकरण की स्थिति को देशभर में सत्यापित किया जा सके।   डॉक्टरों और मरीजों दोनों को फायदा   ‘एक देश-एक लाइसेंस’ व्यवस्था से डॉक्टरों के लिए दूसरे राज्यों में नौकरी या प्रैक्टिस शुरू करने की प्रक्रिया आसान हो सकती है। वहीं मरीजों को डॉक्टर की योग्यता और पंजीकरण की स्थिति की ऑनलाइन पुष्टि करने में भी सुविधा मिल सकती है।

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नई दिल्ली, एजेंसियां। रोजमर्रा की व्यस्त जिंदगी में थकान, चिड़चिड़ापन, नींद में बदलाव या किसी काम में मन न लगना अक्सर सामान्य मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन अगर ये बदलाव लगातार कई दिनों या हफ्तों तक बने रहें और आपकी रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे, तो इन्हें गंभीरता से लेना जरूरी है। ये डिप्रेशन के शुरुआती संकेत हो सकते हैं।   डिप्रेशन केवल उदासी तक सीमित नहीं होता। इसका असर व्यक्ति के मूड, ऊर्जा, नींद, भूख, एकाग्रता और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता पर भी पड़ सकता है। समय रहते लक्षणों को पहचानकर विशेषज्ञ से सलाह लेना मददगार हो सकता है।   1. लगातार उदासी या निराशा   लंबे समय तक उदास, खालीपन या निराशा महसूस करना डिप्रेशन का प्रमुख संकेत हो सकता है। कई बार व्यक्ति को अपनी स्थिति का स्पष्ट कारण भी समझ नहीं आता। भविष्य को लेकर नकारात्मक विचार बढ़ना और पहले की तरह खुशी महसूस न होना भी इसके लक्षण हो सकते हैं।   2. पसंदीदा कामों में रुचि खत्म होना   अगर व्यक्ति उन गतिविधियों में भी रुचि खोने लगे, जिन्हें वह पहले पसंद करता था, तो यह ध्यान देने वाला संकेत है। दोस्तों से मिलना, घूमना, फिल्म देखना या किसी शौक में समय बिताना बोझ जैसा लग सकता है। व्यक्ति धीरे-धीरे सामाजिक गतिविधियों से दूरी बनाने लगता है।   3. आराम के बाद भी लगातार थकान   पर्याप्त नींद और आराम के बावजूद हर समय थकान या ऊर्जा की कमी महसूस होना भी डिप्रेशन से जुड़ा हो सकता है। सामान्य काम करने में भी ज्यादा मेहनत लगना, सुबह उठने में परेशानी या पढ़ाई-ऑफिस के काम में ऊर्जा न लगना इसके संकेत हो सकते हैं।   4. नींद और भूख में बदलाव   डिप्रेशन का असर नींद और खाने की आदतों पर भी पड़ सकता है। कुछ लोगों को नींद आने में परेशानी होती है या बार-बार नींद टूटती है, जबकि कुछ लोग जरूरत से ज्यादा सोने लगते हैं। इसी तरह भूख कम या ज्यादा हो सकती है और इसके कारण वजन में बदलाव भी देखने को मिल सकता है।   5. ध्यान लगाने और फैसले लेने में दिक्कत   डिप्रेशन के दौरान व्यक्ति को किसी काम पर ध्यान केंद्रित करने में परेशानी हो सकती है। पढ़ाई या ऑफिस के काम में मन न लगना, चीजें भूलना और छोटे-छोटे फैसले लेने में कठिनाई महसूस होना भी इसके संकेत हो सकते हैं।   कब लेनी चाहिए विशेषज्ञ की सलाह?   अगर ये लक्षण लगातार बने हुए हैं, बढ़ रहे हैं या आपकी पढ़ाई, नौकरी, रिश्तों और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहे हैं, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या डॉक्टर से सलाह लेना उचित है। सिर्फ थकान मानकर लंबे समय तक इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।   नोट: ये लक्षण डिप्रेशन का निश्चित निदान नहीं हैं। अलग-अलग कारणों से भी ऐसी परेशानियां हो सकती हैं। सही आकलन और उपचार के लिए योग्य डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लें।

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थायरॉइड की दवा लेने के बाद तुरंत नाश्ता करना पड़ सकता है भारी, हार्मोन लेवल पर पड़ सकता है असर

थायरॉइड की दवा रोजाना लेने वाले मरीजों के लिए सिर्फ दवा खाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसे सही समय और सही तरीके से लेना भी बेहद जरूरी है। खासकर लेवोथायरोक्सिन लेने के तुरंत बाद खाना-पीना शुरू कर देने से दवा के शरीर में अवशोषण पर असर पड़ सकता है और हार्मोन लेवल को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है। खाली पेट दवा लेने की सलाह क्यों? हाइपोथायरायडिज्म में आमतौर पर लेवोथायरोक्सिन दी जाती है। इसे नियमित समय पर खाली पेट, नाश्ते से करीब 30 से 60 मिनट पहले लेने की सलाह दी जाती है। भोजन के साथ लेने पर दवा का अवशोषण प्रभावित हो सकता है। दवा के तुरंत बाद किन चीजों से बचें? दवा लेने के बाद तुरंत इन चीजों का सेवन करने से बचने की सलाह दी जाती है: दूध और डेयरी उत्पाद कैल्शियम सप्लीमेंट आयरन सप्लीमेंट सोया और सोया मिल्क हाई-फाइबर भोजन कॉफी एंटासिड और कुछ एसिडिटी की दवाएं विशेष रूप से कैल्शियम और आयरन सप्लीमेंट को लेवोथायरोक्सिन से अलग समय पर लेने की जरूरत पड़ सकती है। कई स्रोत इन्हें लगभग चार घंटे के अंतर से लेने की सलाह देते हैं, लेकिन व्यक्तिगत स्थिति के अनुसार डॉक्टर की सलाह सर्वोपरि है। नाश्ता कब करें? आमतौर पर दवा लेने के बाद कम से कम 30 मिनट और बेहतर अवशोषण के लिए करीब 60 मिनट बाद नाश्ता करने की सलाह दी जाती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रोजाना दवा लेने का तरीका और समय एक जैसा रखा जाए। क्या ब्रेड पूरी तरह बंद करनी होगी? नहीं। थायरॉइड की दवा लेने वाले व्यक्ति को सामान्य रूप से ब्रेड खाने से परहेज करने की जरूरत नहीं होती। समस्या तब हो सकती है जब हाई-फाइबर ब्रेड या कैल्शियम वाले डेयरी उत्पाद दवा लेने के तुरंत बाद लिए जाएं। नाश्ते में क्या ले सकते हैं? दवा लेने के उचित अंतराल के बाद संतुलित नाश्ते में उबले अंडे या ऑमलेट, बेसन का चीला, ओट्स या दलिया, फल और सूखे मेवे जैसे विकल्प शामिल किए जा सकते हैं।  

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