देवघर: राजकीय श्रावणी मेला 2026 के 16वें दिन शुक्रवार को बाबा बैद्यनाथ की नगरी में आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिला. भोर होते ही देवघर कांवरियों और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ से पट गया. बाबा बैद्यनाथ मंदिर में सुबह 4:21 बजे गर्भगृह का पट खुलते ही जलार्पण शुरू हो गया. इसके साथ ही मंदिर परिसर से लेकर कांवरिया रूट तक हर तरफ ‘बोल-बम’, ‘हर-हर महादेव’ और ‘बाबा बैद्यनाथ’ के जयकारे गूंजने लगे.
सुबह से ही बड़ी संख्या में कांवरिये बाबा बैद्यनाथ के दर्शन और जलार्पण के लिए कतार में खड़े रहे. कांवरियों की भीड़ इतनी अधिक रही कि लंबी कतार बीएड कॉलेज तक पहुंच गयी. भगवा वस्त्र पहने कांवरियों और हाथों में कांवर लिये श्रद्धालुओं से पूरा मार्ग भक्तिमय नजर आया. लंबी दूरी तय कर बाबाधाम पहुंचे शिवभक्तों में दर्शन को लेकर जबरदस्त उत्साह देखने को मिला.
बाबा मंदिर में जलार्पण के लिए तड़के सुबह से ही कांवरियों की कतार लगातार बढ़ती गयी. बीएड कॉलेज से लेकर मंदिर परिसर तक शिवभक्त निर्धारित रूट लाइन में अनुशासित तरीके से आगे बढ़ते रहे. भीड़ के बावजूद श्रद्धालुओं में उत्साह और भक्ति का भाव साफ नजर आया.
जिला प्रशासन की ओर से कांवरियों की सुविधा और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए रूट लाइन के माध्यम से श्रद्धालुओं को मंदिर तक पहुंचाया जा रहा है. जगह-जगह व्यवस्था संभालने के लिए प्रशासन और सुरक्षा बलों की मौजूदगी रही.
सुलतानगंज से उत्तरवाहिनी गंगा का पवित्र जल लेकर पैदल देवघर पहुंचे कांवरियों में बाबा के दर्शन को लेकर खास उत्साह देखने को मिला. जैसे-जैसे कांवरिये मंदिर की ओर बढ़ते गये, वैसे-वैसे ‘बोल-बम’ और ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष तेज होते गये.
कांवरिया पथ पर जगह-जगह श्रद्धालु भक्ति गीत गाते और बाबा का जयकारा लगाते नजर आये. पूरा वातावरण धार्मिक उत्साह से सराबोर रहा. कांवरियों की भीड़ और लगातार गूंजते जयघोष ने बाबानगरी को पूरी तरह शिवमय बना दिया.
सुलतानगंज से देवघर तक कई किलोमीटर की पैदल यात्रा पूरी कर पहुंचे कांवरियों के चेहरों पर थकान के बजाय बाबा के दर्शन की खुशी नजर आयी. कई कांवरिये रास्ते भर भक्ति गीत गाते और जयकारे लगाते हुए आगे बढ़ते रहे.
लंबी यात्रा और घंटों कतार में खड़े रहने के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ. कांवरियों का कहना था कि बाबा बैद्यनाथ के दर्शन और जलार्पण की इच्छा के आगे यात्रा की सारी थकान छोटी लग रही है.
श्रावणी मेला के 16वें दिन सुबह से ही देवघर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं का सिलसिला जारी रहा. शहर के प्रमुख मार्गों और कांवरिया पथ पर बड़ी संख्या में शिवभक्त नजर आये. बाबा मंदिर में जलार्पण के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ लगातार बढ़ती रही.
कांवरियों की भारी भीड़, भगवा रंग में रंगी बाबानगरी और चारों ओर गूंजते ‘बोल-बम’ के जयघोष ने देवघर के माहौल को पूरी तरह भक्तिमय बना दिया. बाबा बैद्यनाथ के दरबार में जल चढ़ाने के लिए उमड़ी यह भीड़ श्रावणी मेले में श्रद्धालुओं की बढ़ती आस्था और उत्साह की तस्वीर पेश करती नजर आयी.
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
रांची। संसद के दोनों सदनों से Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 पारित होने के बाद झारखंड और केरल ने इसका कड़ा विरोध किया है। दोनों राज्यों का कहना है कि विधेयक के प्रावधानों से खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त जमीन पर राज्यों के कर एवं उपकर लगाने के अधिकार सीमित होंगे, जिससे राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और राजस्व पर असर पड़ सकता है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जताई कड़ी आपत्ति झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने केंद्र सरकार से विधेयक पर पुनर्विचार करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि खनिज संपदा से मिलने वाला राजस्व झारखंड की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और नए कानून से राज्य के राजस्व पर बड़ा असर पड़ सकता है। सोरेन ने इस मुद्दे पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को भी पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है। झारखंड सरकार के मुताबिक, मिनरल बेयरिंग लैंड सेस से राज्य को मिलने वाला राजस्व आने वाले वर्षों में हजारों करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। सरकार को आशंका है कि विधेयक लागू होने के बाद इस संभावित आय पर असर पड़ सकता है। केरल ने भी केंद्र के कदम को बताया अधिकारों में दखल केरल सरकार ने भी संशोधन का विरोध करने का ऐलान किया है। राज्य का तर्क है कि खनिज-युक्त जमीन पर कर और सेस लगाने की शक्ति सीमित करना राज्यों के संवैधानिक अधिकारों और संघीय ढांचे को प्रभावित कर सकता है। केरल ने राजनीतिक और कानूनी स्तर पर इस मुद्दे का विरोध करने की बात कही है। केंद्र सरकार ने बताया विधेयक का उद्देश्य केंद्र सरकार का कहना है कि संशोधन का मकसद राज्यों की आय छीनना नहीं, बल्कि खनन क्षेत्र में एक समान, स्थिर और पूर्वानुमान योग्य कर व्यवस्था बनाना है। सरकार के अनुसार अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग कर, सेस और शुल्क लगाए जाने से खनन कंपनियों के लिए लागत और निवेश को लेकर अनिश्चितता पैदा होती है। विधेयक में राज्यों द्वारा खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर नए कर या शुल्क लगाने की शक्ति पर केंद्र की निर्धारित शर्तों और सीमाओं के अधीन प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है। सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले का भी जिक्र विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2024 में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने राज्यों के खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि राज्यों के पास खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी शक्ति है। नए विधेयक में इसी शक्ति पर सीमाएं लगाने की कोशिश की गई है। विधेयक अब राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद कानून का रूप लेगा। इस बीच झारखंड में सत्तारूढ़ दल ने इसके खिलाफ बड़े आंदोलन की चेतावनी दी है।
डुमरी: डुमरी विधायक जयराम कुमार महतो ने लोकसभा से पारित खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर चिंता जतायी है। उन्होंने केंद्र सरकार की खनिज नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रस्तावित बदलावों का असर झारखंड जैसे खनिज संपदा से समृद्ध राज्यों के अधिकारों और आर्थिक हितों पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि राज्य की खनिज संपदा का लाभ यहां के लोगों को मिलना चाहिए, लेकिन नीतिगत बदलावों से राज्य के अधिकार प्रभावित होने की आशंका है। खनिज संसाधनों पर निर्भर है झारखंड की अर्थव्यवस्था जयराम महतो ने कहा कि झारखंड देश के प्रमुख खनिज संपदा वाले राज्यों में शामिल है। कोयला, लौह अयस्क समेत कई खनिज संसाधनों से राज्य को राजस्व प्राप्त होता है और इससे विकास योजनाओं को गति मिलती है। ऐसे में खनिज संसाधनों से जुड़े अधिकारों में किसी तरह का हस्तक्षेप राज्य की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने कहा कि झारखंड के पास प्रचुर मात्रा में खनिज संपदा होने के बावजूद राज्य के कई हिस्से आज भी आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं। इसलिए खनिज संसाधनों से मिलने वाले राजस्व और लाभ का उचित हिस्सा राज्य और स्थानीय जनता तक पहुंचना जरूरी है। रॉयल्टी के मुद्दे पर केंद्र को घेरा विधायक ने रॉयल्टी से जुड़े मामलों को लेकर भी केंद्र सरकार पर राज्य के हितों की अनदेखी करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि झारखंड से बड़े पैमाने पर खनिज संसाधनों का दोहन होता है, इसलिए राज्य को उसके संसाधनों का उचित आर्थिक लाभ मिलना चाहिए। जयराम महतो ने कहा कि खनिज संपदा केवल जमीन के नीचे मौजूद संसाधन नहीं है, बल्कि यह राज्य के विकास और यहां के लोगों के भविष्य से जुड़ा विषय है। इसलिए खनिज नीति बनाते समय राज्यों के अधिकार और स्थानीय लोगों के हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अवैध खनन पर भी राज्य सरकार को घेरा जयराम महतो ने राज्य में हो रहे अवैध खनन और खनिज कारोबार पर भी सवाल उठाये। उन्होंने आरोप लगाया कि अवैध उत्खनन के कारण सरकार को राजस्व का नुकसान हो रहा है। साथ ही, प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन का असर पर्यावरण और स्थानीय आबादी पर भी पड़ता है। उन्होंने कहा कि अवैध खनन पर प्रभावी रोक लगाने के लिए प्रशासन और संबंधित विभागों को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। खनिज संसाधनों के दोहन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है। विधेयक वापस लेने की मांग डुमरी विधायक ने केंद्र सरकार से खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को वापस लेने की मांग की। साथ ही उन्होंने राज्य सरकार से अवैध खनन और खनिज कारोबार के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की अपील की। उन्होंने कहा कि झारखंड की खनिज संपदा पर पहला अधिकार राज्य और यहां की जनता के हितों का होना चाहिए। विकास के नाम पर ऐसी कोई नीति नहीं बननी चाहिए, जिससे राज्य के आर्थिक अधिकार कमजोर हों और उसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़े।
बुंडू: झारखंड की लोककला और संस्कृति को अपनी प्रतिभा से देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाने वाली लोक कलाकार बुटन देवी की कहानी संघर्ष और समर्पण की मिसाल है. गरीब आदिवासी परिवार में जन्मीं बुटन देवी ने बिना औपचारिक शिक्षा के लोकनृत्य और संगीत के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई. पिछले 43 वर्षों से अधिक समय से वह झारखंड समेत पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और सीमावर्ती बिहार के सैकड़ों स्थानों पर मंचीय प्रस्तुतियां दे चुकी हैं. खेत-खलिहान से शुरू हुआ कला का सफर बुटन देवी का जन्म 1 जनवरी 1966 को रांची जिले के सोनाहातू प्रखंड के तेतला गांव में एक गरीब आदिवासी परिवार में हुआ. बचपन अभावों के बीच बीता. वह खेत-खलिहान में काम करने के साथ गोबर-गोइठा बनाने जैसे घरेलू काम भी करती थीं. आर्थिक तंगी के कारण वह स्कूल नहीं जा सकीं और औपचारिक शिक्षा से वंचित रहीं. हालांकि बचपन से ही संगीत और नृत्य के प्रति उनका गहरा लगाव था. इसी रुचि ने आगे चलकर उन्हें रंगमंच की दुनिया तक पहुंचाया. 16 साल की उम्र में शुरू हुआ रंगमंच का सफर बुटन देवी के अनुसार करीब 16 वर्ष की उम्र में उनकी मुलाकात बुंडू प्रखंड के ताऊ गांव निवासी लोक कलाकार लखीचरण मुंडा से हुई. इसके बाद वह संगीत और नाटक कला टीम से जुड़ गयीं और नृत्य-संगीत की प्रस्तुतियां देने लगीं. वर्ष 1983 में उन्होंने लखीचरण मुंडा से विवाह किया. इसके बाद भी उनका कला से जुड़ाव लगातार बना रहा. अलग-अलग लोक विधाओं में बनाई पहचान बुटन देवी ने पारंपरिक झूमर, डमकच, नागपुरी, पंचपरगनिया, कुरमाली और मुंडारी जैसी लोक संगीत विधाओं में प्रस्तुति दी है. ढोल, नगाड़ा, बांसुरी और दूसरे पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ उनकी टीम ने वर्षों तक विभिन्न अखाड़ों और मंचों पर अपनी कला का प्रदर्शन किया. उनकी प्रस्तुतियों ने ग्रामीण संस्कृति, लोक परंपरा और झारखंड की मिट्टी से जुड़ी कलाओं को मंच तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है. 14 सदस्यीय टीम के साथ करती हैं प्रस्तुति लोक कलाकार और पटकथा लेखक विश्वनाथ महतो के सहयोग से बुटन देवी का कला सफर और मजबूत हुआ. उनकी टीम में करीब 14 सदस्य हैं. टीम सरकारी, गैर-सरकारी और निजी आयोजनों में लगातार लोककला की प्रस्तुतियां देती रही है. बहन सोमवारी देवी भी हैं सम्मानित लोक कलाकार बुटन देवी की छोटी बहन सोमवारी देवी भी लोकनाटक, संगीत और नृत्य के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है. दोनों बहनों ने अपना जीवन झारखंड की लोककला और संस्कृति को समर्पित किया है. अभावों से निकलकर रंगमंच तक पहुंचने वाली बुटन देवी की कहानी आज की पीढ़ी के लिए यह संदेश देती है कि प्रतिभा को अवसर मिले तो मिट्टी के घर से निकली आवाज भी बड़े मंच तक पहुंच सकती है.