रांची। रांची स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) कार्यालय पर हुए पेट्रोल बम हमले की जांच में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को कई अहम सुराग मिले हैं। जांच के दौरान गिरफ्तार मुख्य आरोपी अमन अंसारी और सयाम सुजान ने कथित तौर पर स्वीकार किया है कि यह हमला एक सुनियोजित आतंकी साजिश का हिस्सा था। एनआईए के अनुसार, दोनों आरोपी पाकिस्तान और दुबई में मौजूद अपने कथित हैंडलरों के संपर्क में थे, जो उन्हें लगातार निर्देश दे रहे थे। एजेंसी ने दोनों को सात दिन की रिमांड पर लेकर गहन पूछताछ शुरू कर दी है।
जांच में सामने आया है कि आरोपियों को पेट्रोल बम बनाने और उसका इस्तेमाल करने की कथित ट्रेनिंग ऑनलाइन दी गई थी। एनआईए के अनुसार, वे वीडियो कॉलिंग ऐप बॉटिम और व्हाट्सएप के जरिए विदेशी संपर्कों से जुड़े हुए थे और इन्हीं माध्यमों से हमले की पूरी योजना तैयार की गई। एजेंसी अब यह भी जांच कर रही है कि आरोपी दुबई कैसे पहुंचे और वहां किन लोगों के संपर्क में आए। प्रारंभिक जांच में उनका संबंध कथित तौर पर 'तेहरीक-ए-तालिबान हिंदुस्तान' नामक आतंकी मॉड्यूल से होने की आशंका जताई जा रही है। जांच एजेंसी इस मॉड्यूल को मिलने वाले संभावित विदेशी समर्थन की भी पड़ताल कर रही है।
पूछताछ के दौरान यह भी जानकारी सामने आई है कि हमले के बाद आरोपी बोकारो, कोडरमा और बिहार के रास्ते दिल्ली भागने की योजना बना रहे थे। एनआईए अब यह पता लगाने में जुटी है कि दिल्ली में उनका संपर्क किससे होने वाला था और झारखंड में उन्हें किन लोगों से मदद या शरण मिली। इसके साथ ही आरोपियों के बैंक खातों, वित्तीय लेन-देन और संभावित फंडिंग नेटवर्क की भी जांच की जा रही है।
एनआईए राज्य में सक्रिय संभावित स्लीपर सेल और उनसे जुड़े नेटवर्क की भी गहन पड़ताल कर रही है। एजेंसी का कहना है कि जांच अभी जारी है और पूछताछ में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
रांची। राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में करीब 40 वर्षों से लगने वाले साप्ताहिक सब्जी बाजार को बंद किए जाने के फैसले का विरोध तेज हो गया है। सोमवार को भारी बारिश के बावजूद बड़ी संख्या में सब्जी और फल विक्रेता रांची नगर निगम कार्यालय पहुंचे और धरना देकर अपना विरोध दर्ज कराया। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के बाजार बंद करने से हजारों परिवारों की आजीविका पर संकट खड़ा हो गया है। मोरहाबादी मैदान में प्रत्येक बुधवार और शनिवार को लगने वाले इस बाजार में रांची समेत आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से करीब 1600 से अधिक विक्रेता अपनी उपज बेचने पहुंचते थे। शनिवार को नगर निगम और पुलिस प्रशासन ने बाजार नहीं लगने दिया, जिसके बाद विक्रेताओं में नाराजगी बढ़ गई। प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शन के दौरान विक्रेताओं ने मांग की कि या तो बाजार को पहले की तरह संचालित किया जाए या फिर जल्द से जल्द उनके लिए वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराया जाए। उनका कहना है कि वर्षों से यही बाजार उनकी आय का प्रमुख स्रोत रहा है और अचानक बंद होने से परिवार चलाना मुश्किल हो गया है। वहीं, नगर आयुक्त सुशांत गौरव ने निगम के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि बाजार का दायरा लगातार बढ़ने से आसपास की सड़कें अतिक्रमित हो रही थीं और पूरे क्षेत्र में गंभीर ट्रैफिक जाम की स्थिति बन रही थी। इसका असर स्थानीय लोगों, स्कूली बच्चों और आम राहगीरों पर पड़ रहा था। नगर आयुक्त ने कहा नगर आयुक्त ने कहा कि निगम विक्रेताओं की आजीविका और शहर की यातायात व्यवस्था, दोनों को ध्यान में रखते हुए समाधान तलाश रहा है। प्रशासन इस दिशा में मंथन कर रहा है ताकि विक्रेताओं को वैकल्पिक व्यवस्था मिल सके और शहरवासियों को भी जाम की समस्या से राहत मिले। फिलहाल नगर निगम और सब्जी विक्रेताओं के बीच किसी सहमति पर बात नहीं बन सकी है। अब सभी की निगाहें इस पर टिकी हैं कि प्रशासन इस विवाद का स्थायी और संतुलित समाधान कब तक निकालता है।
रांची। झारखंड के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर की सुरक्षा को लेकर सामने आई खबरों के बाद रविवार को उनके रांची स्थित आवास पर समर्थकों, कार्यकर्ताओं और शुभचिंतकों की भारी भीड़ जुट गई। पलामू और उनके विधानसभा क्षेत्र छत्तरपुर समेत विभिन्न इलाकों से बड़ी संख्या में लोग मंत्री से मिलने पहुंचे। समर्थकों ने कहा कि वे मंत्री की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं और आवश्यकता पड़ने पर उनकी सुरक्षा के लिए स्वयं आगे आने को तैयार हैं। हालांकि, राधाकृष्ण किशोर ने सभी समर्थकों को शांत रहने की अपील करते हुए उन्हें वापस लौटा दिया और सरकारी कार्यक्रमों में उनके साथ नहीं आने का आग्रह किया। बिना सुरक्षा घेरे के कार्यक्रमों में पहुंचे मंत्री रविवार को वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर महानगर कांग्रेस के 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में शामिल होने के लिए कॉर्निवेल हॉल पहुंचे। इसके बाद उन्होंने एचईसी परिसर स्थित पारस अस्पताल का भी दौरा किया। पूरे दिन मंत्री बिना किसी सुरक्षा घेरे के नजर आए। हालांकि, उनकी सुरक्षा में तैनात स्पेशल ब्रांच और जैप के जवान दूर से उनकी गतिविधियों और आवास पर आने-जाने वालों पर नजर बनाए रहे। बारिश के बावजूद सुरक्षा कर्मी सड़क किनारे तैनात रहे और पूरे दिन स्थिति पर निगरानी रखते रहे। संयुक्त सचिव के नोटिस पर मांगी रिपोर्ट इस बीच वित्त मंत्री ने चार जुलाई को वित्त सचिव प्रशांत कुमार को पत्र लिखकर विभाग के संयुक्त सचिव पंकज सिंह द्वारा सरकारी वाहन लौटाने संबंधी नोटिस पर आपत्ति जताई है। उन्होंने पूछा है कि यह नोटिस किस नियम और अधिकार के तहत जारी किया गया। यदि यह पुलिस मुख्यालय के निर्देश पर भेजा गया है, तो संबंधित आदेश की प्रति उपलब्ध कराने को भी कहा है। मंत्री ने पूरे मामले की जांच कर 10 दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंपने और दोषी अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। राधाकृष्ण किशोर ने स्पष्ट किया कि उनकी सरकार से कोई नाराजगी नहीं है। उनका कहना है कि वे केवल प्रशासनिक जवाबदेही और राजकीय मर्यादा बनाए रखने की बात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार में सभी अधिकारियों को अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर रहकर कार्य करना चाहिए और प्रशासनिक व्यवस्था की गरिमा का पालन करना आवश्यक है।
रांची। ऐतिहासिक जगन्नाथपुर रथ मेला और रथ यात्रा के शांतिपूर्ण, सुरक्षित और सुव्यवस्थित आयोजन को लेकर रांची जिला प्रशासन और पुलिस ने तैयारियां अंतिम चरण में पहुंचा दी हैं। रविवार को धुर्वा स्थित जगन्नाथपुर मंदिर परिसर के नीलाद्री हॉल में एडीजी मुख्यालय मनोज कौशिक की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित की गई। बैठक में मंदिर न्यास समिति, पुलिस और विभिन्न विभागों के अधिकारियों ने सुरक्षा, ट्रैफिक, भीड़ प्रबंधन और श्रद्धालुओं की सुविधाओं को लेकर विस्तृत रणनीति तैयार की। ड्रोन, सीसीटीवी और सादे लिबास में पुलिस की रहेगी नजर प्रशासन ने मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करने का फैसला लिया है। पूरे मेला क्षेत्र में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात रहेगा। महिलाओं, बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। चोरी, छिनतई और पॉकेटमारी जैसी घटनाओं पर रोक लगाने के लिए महिला और पुरुष पुलिसकर्मियों को सादे लिबास में भी तैनात किया जाएगा। पूरे परिसर की निगरानी सीसीटीवी कैमरों और ड्रोन के जरिए की जाएगी, जबकि कंट्रोल रूम से हर गतिविधि पर लगातार नजर रखी जाएगी। ट्रैफिक, पार्किंग और स्वास्थ्य सुविधाओं की भी विशेष तैयारी श्रद्धालुओं की सुविधा और शहर में जाम से बचाव के लिए ट्रैफिक डायवर्जन प्लान लागू किया जाएगा। आम लोगों और वीआईपी वाहनों के लिए अलग-अलग पार्किंग स्थल बनाए जाएंगे। प्रमुख मार्गों पर अतिरिक्त ट्रैफिक पुलिस की तैनाती होगी और जरूरत पड़ने पर वन-वे व्यवस्था भी लागू की जाएगी। वहीं, मेला परिसर में अस्थायी चिकित्सा शिविर स्थापित किए जाएंगे, जहां डॉक्टर और पैरामेडिकल कर्मी 24 घंटे उपलब्ध रहेंगे। आपात स्थिति से निपटने के लिए एंबुलेंस भी तैनात रहेंगी। बैठक में मंदिर समिति के सदस्यों को पहचान के लिए एक समान पगड़ी या विशेष पहचान चिह्न धारण करने के निर्देश दिए गए। एडीजी मनोज कौशिक ने कहा कि जगन्नाथपुर रथ मेला राज्य की आस्था का प्रमुख आयोजन है और सभी विभागों के समन्वय से श्रद्धालुओं को सुरक्षित, सुगम और व्यवस्थित वातावरण उपलब्ध कराया जाएगा। उन्होंने सभी तैयारियां समय पर पूरी करने और सुरक्षा व्यवस्था में किसी भी तरह की लापरवाही नहीं बरतने के निर्देश दिए।