रांची। झारखंड सरकार ने राज्य के सभी विधानसभा क्षेत्रों में विकास कार्यों को गति देने के लिए बड़ा कदम उठाया है। ग्रामीण विकास विभाग ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए विधायक स्थानीय क्षेत्र विकास निधि (MLA Fund) के तहत 405 करोड़ रुपये जारी कर दिए हैं। इस राशि से राज्य के 81 विधायक अपने-अपने विधानसभा क्षेत्र में 5-5 करोड़ रुपये तक की विकास योजनाएं संचालित कर सकेंगे।
सरकार की ओर से जारी इस फंड का उपयोग सड़क निर्माण, नाली, पेयजल व्यवस्था, सामुदायिक भवन, स्ट्रीट लाइट और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी परियोजनाओं पर किया जाएगा। इससे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लंबे समय से लंबित विकास कार्यों को भी तेजी मिलने की उम्मीद है।
ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों के अनुसार, कुल 405 करोड़ रुपये में से 215 करोड़ रुपये ट्राइबल सब प्लान (TSP) के तहत जनजातीय बहुल इलाकों के विकास के लिए आवंटित किए गए हैं, जबकि 190 करोड़ रुपये सामान्य क्षेत्रों (OSP) के विकास कार्यों के लिए जारी किए गए हैं।
राशि जारी होने के बाद विधायक अपने क्षेत्र की नई विकास योजनाओं की अनुशंसा कर सकेंगे और पहले से स्वीकृत लेकिन अधूरी परियोजनाओं को भी पूरा कराने की प्रक्रिया तेज होगी।
सरकार का मानना है कि समय पर निधि उपलब्ध होने से स्थानीय जरूरतों के अनुरूप विकास योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन होगा और राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में आधारभूत सुविधाओं का विस्तार तेजी से किया जा सकेगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
झारखंड छात्र आंदोलन के बीच सरकार का बड़ा कदम, राधाकृष्ण किशोर ने बातचीत की अपील रांची। झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्रों का आंदोलन जारी है। इसी बीच राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने प्रदर्शन कर रहे छात्रों से सरकार के साथ बातचीत करने की अपील की है। सरकार ने छात्रों की मांगों पर चर्चा के लिए कैबिनेट मंत्रियों की एक समिति गठित करने का फैसला किया है। छात्रों की मांगों पर बातचीत का प्रस्ताव छात्रों का आंदोलन मुख्य रूप से भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों और अनियमितताओं की जांच तथा भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग को लेकर चल रहा है। प्रदर्शनकारी छात्र सरकार से इस मामले में ठोस कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि सरकार छात्रों के कल्याण और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने आंदोलन कर रहे छात्रों से सरकार के साथ संवाद करने की अपील की है। सरकार ने बनाई मंत्रियों की समिति छात्रों के साथ बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए झारखंड सरकार ने कैबिनेट मंत्रियों की एक समिति गठित की है। समिति का उद्देश्य प्रदर्शनकारी छात्रों की मांगों को सुनना और उनके समाधान के लिए सरकार के स्तर पर आवश्यक कदमों पर चर्चा करना है। सरकार की इस पहल को आंदोलन को बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। छात्र भी बातचीत के लिए तैयार ताजा घटनाक्रम में छात्रों की ओर से भी सरकार के साथ बातचीत को लेकर सहमति के संकेत मिले हैं। हालांकि, प्रदर्शनकारी छात्रों ने बातचीत को लेकर अपनी कुछ शर्तें रखी हैं। वे चाहते हैं कि चर्चा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मौजूदगी में और मीडिया के सामने हो, ताकि बातचीत में पारदर्शिता बनी रहे। भर्ती परीक्षाओं की जांच पर टिकी नजर छात्रों के आंदोलन के बीच भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जांच भी जारी है। रिपोर्ट के मुताबिक, मामले में CID की जांच आगे बढ़ रही है और कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं। अब सरकार और छात्रों के बीच होने वाली बातचीत में भर्ती परीक्षाओं की प्रक्रिया, कथित गड़बड़ियों की जांच और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई जैसे मुद्दे प्रमुख रह सकते हैं। सरकार की बातचीत की पहल के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि छात्रों और सरकार के बीच संवाद कब शुरू होता है और आंदोलन को समाप्त करने के लिए कोई ठोस समाधान निकल पाता है या नहीं।
रांची। झारखंड विधानसभा के मानसून सत्र को देखते हुए रांची जिला प्रशासन ने विधानसभा के नए परिसर के 750 मीटर के दायरे में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू कर दी है। यह आदेश 6 अगस्त की सुबह 8 बजे से 12 अगस्त की रात 10 बजे तक प्रभावी रहेगा। छात्रों के विधानसभा घेराव के ऐलान के बीच प्रशासन के इस कदम को सुरक्षा व्यवस्था से जोड़कर देखा जा रहा है। पांच या उससे अधिक लोगों के जुटने पर रोक प्रशासन के आदेश के अनुसार निषेधाज्ञा की अवधि में विधानसभा के 750 मीटर के दायरे में पांच या उससे अधिक लोगों के एक जगह जमा होने पर रोक रहेगी। इसके साथ ही धरना, प्रदर्शन, घेराव, जुलूस, रैली और आमसभा आयोजित करने की अनुमति नहीं होगी। ध्वनि विस्तारक यंत्र के इस्तेमाल पर भी प्रतिबंध रहेगा। हालांकि सरकारी ड्यूटी में तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों तथा सरकारी कार्यक्रमों को इस आदेश से छूट दी गई है। हथियार और पारंपरिक हथियार ले जाने पर भी प्रतिबंध निषेधाज्ञा के दौरान किसी भी तरह के अस्त्र-शस्त्र लेकर चलने पर रोक रहेगी। प्रशासन ने लाठी-डंडा, तीर-धनुष, भाला और गड़ासा जैसे पारंपरिक हथियारों के साथ चलने पर भी प्रतिबंध लगाया है। हालांकि यह आदेश झारखंड हाईकोर्ट परिसर पर लागू नहीं होगा। छात्र आंदोलन के बीच प्रशासन का फैसला झारखंड में JPSC और JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्र आंदोलन कर रहे हैं। आंदोलनकारी छात्रों ने अपनी मांगों को लेकर विधानसभा घेराव का ऐलान किया था। इसी बीच विधानसभा का मानसून सत्र भी 6 से 12 अगस्त तक आयोजित किया जा रहा है। छात्रों की मांगों और आंदोलन को लेकर सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत की कोशिश भी चल रही है। ताजा अपडेट के अनुसार छात्र सरकार से बातचीत के लिए तैयार हैं, जबकि आंदोलन से जुड़े कुछ नेता अपनी मांगों को लेकर अब भी धरने पर हैं। विधानसभा सत्र के दौरान सुरक्षा बढ़ी विधानसभा सत्र और छात्र आंदोलन को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है। निषेधाज्ञा लागू करने का उद्देश्य विधानसभा परिसर के आसपास कानून-व्यवस्था बनाए रखना और किसी अप्रिय स्थिति को रोकना बताया गया है। अब विधानसभा सत्र के दौरान JPSC-JSSC विवाद और छात्रों की मांगों पर सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव बढ़ने की संभावना है।
झारखंड के सरकारी विश्वविद्यालयों और संबद्ध कॉलेजों में कार्यरत करीब 1800 शिक्षकों और शिक्षकेतर कर्मचारियों के भविष्य निधि (PF) को लेकर गंभीर वित्तीय विसंगति सामने आई है। आरोप है कि कर्मचारियों के वेतन से हर महीने काटी जाने वाली PF राशि को निर्धारित भविष्य निधि खाते में जमा करने के बजाय साधारण बचत खाते में रखा जा रहा है। इससे कर्मचारियों को कम ब्याज मिलने के साथ-साथ अतिरिक्त आयकर का बोझ भी उठाना पड़ रहा है। प्रारंभिक आकलन के अनुसार इस व्यवस्था से अब तक 100 करोड़ रुपये से अधिक का वित्तीय नुकसान हुआ है। PF खाते की जगह बचत खाते में जमा हो रही राशि जानकारी के अनुसार, विश्वविद्यालय गठन के बाद से कर्मचारियों की PF राशि नियमित रूप से काटी जाती रही, लेकिन उसे भविष्य निधि खाते में स्थानांतरित करने के बजाय बचत खाते में रखा गया। इसके कारण कर्मचारियों को PF पर मिलने वाले अधिक ब्याज का लाभ नहीं मिल पाया। जहां भविष्य निधि खाते पर करीब 8.00 से 8.25 प्रतिशत वार्षिक ब्याज मिलता है, वहीं सामान्य बचत खाते में केवल 2.70 से 3.50 प्रतिशत ब्याज ही मिलता है। ब्याज दरों के इस बड़े अंतर से कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति के समय मिलने वाली राशि भी प्रभावित हुई है। कम ब्याज के साथ टैक्स का भी बोझ शिक्षकों और कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें केवल कम ब्याज का नुकसान ही नहीं उठाना पड़ रहा, बल्कि बचत खाते पर मिलने वाला ब्याज आयकर के दायरे में आने के कारण अतिरिक्त टैक्स भी देना पड़ रहा है। दूसरी ओर, निर्धारित सीमा तक PF पर मिलने वाला ब्याज सामान्यतः करमुक्त होता है। कर्मियों का आरोप है कि वर्षों तक उनकी मेहनत की कमाई पर उन्हें वह लाभ नहीं मिला, जिसके वे कानूनी और नैतिक रूप से हकदार हैं। एक कर्मचारी को सालाना कितना हो सकता है नुकसान? विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी कर्मचारी के खाते में 5 लाख रुपये जमा हैं, तो— PF खाते में 8% ब्याज के हिसाब से सालाना लगभग 40,000 रुपये ब्याज मिलता। बचत खाते में 2.7% ब्याज के हिसाब से केवल 13,500 रुपये मिलते। इस तरह केवल ब्याज में ही 26,500 रुपये का सालाना नुकसान होता है। यदि कर्मचारी 30 प्रतिशत आयकर स्लैब में आता है, तो बचत खाते के ब्याज पर लगभग 4,212 रुपये (टैक्स और सेस सहित) अतिरिक्त कर देना पड़ सकता है। यानी एक कर्मचारी को कुल मिलाकर करीब 30,700 रुपये प्रति वर्ष का नुकसान हो सकता है। ऑडिट और जांच की उठी मांग शिक्षक और कर्मचारी संगठनों ने इस पूरे मामले की वित्तीय और प्रशासनिक ऑडिट कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यह पता लगाया जाए कि PF की राशि कितने समय तक बचत खातों में रखी गई, कर्मचारियों को वास्तविक रूप से कितना ब्याज मिलना चाहिए था और उन्हें कुल कितना आर्थिक नुकसान हुआ। संगठनों ने राज्य सरकार और उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग से इस व्यवस्था की समीक्षा कर दोषियों की जवाबदेही तय करने की मांग भी की है। सेवानिवृत्त कर्मचारियों पर भी पड़ा असर इस वित्तीय विसंगति का असर केवल वर्तमान कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। कई सेवानिवृत्त शिक्षक और कर्मचारी भी PF पर मिलने वाले अपेक्षित लाभ से वंचित रहे, जिससे उनकी आर्थिक सुरक्षा प्रभावित हुई है।