रांची: झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की अलग-अलग नियुक्ति परीक्षाओं में ईडब्ल्यूएस और ओबीसी (नॉन-क्रीमी लेयर) प्रमाण पत्र को लेकर अलग-अलग मापदंड अपनाने का मामला सामने आया है. अभ्यर्थियों का आरोप है कि एक ही तरह के प्रमाण पत्र को लेकर आयोग ने अलग-अलग परीक्षाओं में अलग-अलग नियम लागू किए. इसका सबसे ज्यादा असर उन अभ्यर्थियों पर पड़ा है, जिन्होंने परीक्षा पास करने के बाद नियुक्ति की उम्मीद लगायी थी.
अभ्यर्थियों के अनुसार, महिला पर्यवेक्षिका नियुक्ति परीक्षा में अद्यतन ईडब्ल्यूएस और ओबीसी (एनसीएल) प्रमाण पत्र को आधार मानकर कई अभ्यर्थियों की नियुक्ति की अनुशंसा कर दी गयी. वहीं, माध्यमिक आचार्य नियुक्ति परीक्षा में इसी तरह के प्रमाण पत्र को लेकर 50 से अधिक अभ्यर्थियों का रिजल्ट रोक दिया गया है. अब अभ्यर्थी आयोग से सवाल कर रहे हैं कि जब प्रमाण पत्र को लेकर नियम समान हैं, तो अलग-अलग परीक्षाओं में अलग-अलग मापदंड क्यों अपनाये जा रहे हैं.
अभ्यर्थियों का कहना है कि JSSC की ओर से जारी नियुक्ति विज्ञापनों में ईडब्ल्यूएस और ओबीसी (एनसीएल) प्रमाण पत्र को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं दी जाती. आवेदन के समय भी कई मामलों में संबंधित प्रमाण पत्र जमा नहीं कराया जाता है. ऐसे में अभ्यर्थियों को यह स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाती कि आवेदन की अंतिम तिथि, प्रमाण पत्र सत्यापन की तारीख या नियुक्ति के समय किस वर्ष का प्रमाण पत्र अनिवार्य माना जायेगा.
अभ्यर्थियों का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया कई वर्षों तक चलती है. इस दौरान प्रमाण पत्र की वैधता और वित्तीय वर्ष बदल जाता है. ऐसे में आयोग को विज्ञापन जारी करते समय ही प्रमाण पत्र की तारीख और वैधता को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश देना चाहिए, ताकि बाद में अभ्यर्थियों को परेशानी का सामना न करना पड़े.
महिला पर्यवेक्षिका नियुक्ति परीक्षा में अद्यतन ईडब्ल्यूएस और ओबीसी (एनसीएल) प्रमाण पत्र के आधार पर अभ्यर्थियों की नियुक्ति की अनुशंसा किये जाने की बात सामने आयी है.
बताया जा रहा है कि कुछ ऐसे अभ्यर्थी भी थे, जिनके पास आवेदन वर्ष 2023 का प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं था, लेकिन उनके पास बाद के वर्ष का वैध प्रमाण पत्र था. ऐसे अभ्यर्थियों की नियुक्ति की अनुशंसा की गयी. कुछ अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र भी मिल चुका है.
हालांकि, बाद में विभागीय स्तर पर कुछ नियुक्तियों को लेकर सवाल उठे और संबंधित अभ्यर्थियों को नोटिस भी जारी किया गया. इससे अभ्यर्थियों के बीच असमंजस की स्थिति पैदा हो गयी है.
दूसरी ओर, माध्यमिक आचार्य नियुक्ति परीक्षा में प्रमाण पत्र को लेकर अलग स्थिति देखने को मिली. अलग-अलग विषयों में प्रमाण पत्र सत्यापन के लिए बुलाये गये 50 से अधिक अभ्यर्थियों का रिजल्ट रोक दिया गया है.
अभ्यर्थियों से आवेदन जमा करने के समय और प्रमाण पत्र सत्यापन के समय से संबंधित वित्तीय वर्ष का ईडब्ल्यूएस और ओबीसी (एनसीएल) प्रमाण पत्र मांगा जा रहा है. उर्दू विषय के एक अभ्यर्थी ने भी दावा किया कि उससे आवेदन की अंतिम तिथि तक या उससे पहले जारी ईडब्ल्यूएस प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने को कहा गया.
ऐसे में अभ्यर्थियों का सवाल है कि जब एक परीक्षा में बाद के वर्ष का अद्यतन प्रमाण पत्र स्वीकार करते हुए नियुक्ति की अनुशंसा की गयी, तो दूसरी परीक्षा में इसी तरह के प्रमाण पत्र को आधार बनाकर रिजल्ट रोकना किस नियम के तहत किया गया.
अभ्यर्थियों का मुख्य सवाल यही है कि JSSC की सभी नियुक्ति परीक्षाओं के लिए प्रमाण पत्र को लेकर एक समान नियम क्यों नहीं है?
अभ्यर्थियों का कहना है कि यदि आवेदन की अंतिम तिथि तक का प्रमाण पत्र अनिवार्य है, तो यह शर्त हर नियुक्ति परीक्षा के विज्ञापन में स्पष्ट रूप से लिखी जानी चाहिए. वहीं, अगर नियुक्ति के समय अद्यतन प्रमाण पत्र को मान्य किया जाता है, तो सभी परीक्षाओं में यही व्यवस्था लागू होनी चाहिए.
उनका कहना है कि अलग-अलग मापदंड के कारण एक ही परिस्थिति वाले अभ्यर्थियों के साथ अलग व्यवहार हो रहा है. इससे परीक्षा पास करने के बावजूद कई अभ्यर्थियों की नियुक्ति अटक गयी है.
JSSC की नियुक्ति प्रक्रिया अक्सर आवेदन से लेकर परीक्षा, रिजल्ट, प्रमाण पत्र सत्यापन और नियुक्ति तक लंबी चलती है. इस दौरान ईडब्ल्यूएस और ओबीसी (एनसीएल) प्रमाण पत्र से जुड़े वित्तीय वर्ष में बदलाव हो जाता है.
ऐसे में अभ्यर्थियों का कहना है कि आयोग को भर्ती प्रक्रिया के हर चरण में प्रमाण पत्र की जरूरत और उसकी वैधता को लेकर स्पष्ट व्यवस्था बनानी चाहिए. नियम अस्पष्ट रहने पर बाद में अभ्यर्थियों को दस्तावेजों के कारण नियुक्ति से बाहर होने का डर बना रहता है.
प्रमाण पत्र को लेकर उठे विवाद के बीच अभ्यर्थियों ने JSSC से पूरे मामले की समीक्षा करने और सभी नियुक्ति परीक्षाओं में एक समान नियम लागू करने की मांग की है. उनका कहना है कि यदि किसी परीक्षा में अद्यतन प्रमाण पत्र को मान्य किया गया है, तो समान परिस्थितियों वाले अभ्यर्थियों को दूसरी परीक्षा में अलग मापदंड के आधार पर बाहर नहीं किया जाना चाहिए.
अब सवाल यह है कि JSSC इस मामले में क्या स्पष्टीकरण देता है और माध्यमिक आचार्य नियुक्ति परीक्षा में रोके गये 50 से अधिक अभ्यर्थियों के रिजल्ट को लेकर क्या निर्णय लिया जाता है. भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता और समान नियम की मांग के बीच यह मामला आयोग के लिए भी एक अहम परीक्षा बन गया है.
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
रांची। झारखंड सरकार द्वारा JSSC CGL परीक्षा और उससे जुड़ी नियुक्तियों को रद्द किए जाने के फैसले के बाद चयनित अभ्यर्थियों का आक्रोश बढ़ गया है। मंगलवार को बड़ी संख्या में चयनित और नवनियुक्त अभ्यर्थियों ने प्रोजेक्ट भवन के बाहर प्रदर्शन किया और सरकार से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की। नौकरी बचाने की मांग को लेकर सड़क पर उतरे अभ्यर्थी प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्होंने वर्षों की मेहनत के बाद JSSC CGL परीक्षा पास की और चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद कई लोगों को सरकारी नौकरी भी मिल चुकी है। अब परीक्षा रद्द होने से उनकी नियुक्तियों पर संकट खड़ा हो गया है। रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 2,000 चयनित अभ्यर्थियों के सामने नौकरी जाने का डर है। अभ्यर्थियों ने सरकार से सवाल किया कि यदि परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है तो उसकी जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की जाए, लेकिन मेहनत से परीक्षा पास करने वाले सभी अभ्यर्थियों को इसका खामियाजा क्यों भुगतना पड़े। प्रोजेक्ट भवन से बिरसा चौक तक विरोध मार्च चयनित अभ्यर्थियों ने प्रोजेक्ट भवन से बिरसा चौक तक विरोध मार्च निकाला। प्रदर्शन के दौरान अभ्यर्थियों ने मोबाइल की फ्लैश लाइट जलाकर भी विरोध दर्ज कराया। उन्होंने सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए अपनी नियुक्तियां बहाल करने की मांग उठाई। कई अभ्यर्थियों ने अपनी व्यक्तिगत परेशानियों का भी जिक्र किया। कुछ ने बताया कि नौकरी मिलने के भरोसे उन्होंने दूसरे रोजगार छोड़े, जबकि कुछ अभ्यर्थी शादी, परिवार और आर्थिक जिम्मेदारियों के बीच अब भविष्य को लेकर चिंतित हैं। सरकार के फैसले के बाद दोहरा आंदोलन JSSC CGL को लेकर झारखंड में अब स्थिति जटिल हो गई है। एक तरफ परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन कर रहे छात्र निष्पक्ष जांच और CBI जांच की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ परीक्षा पास कर नौकरी हासिल करने वाले अभ्यर्थी परीक्षा और नियुक्तियां रद्द किए जाने का विरोध कर रहे हैं। राज्य सरकार ने JSSC CGL समेत कई भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने के साथ पुरानी भर्ती परीक्षाओं की जांच का फैसला लिया है। ऐसे में अब चयनित अभ्यर्थियों की नजर सरकार के अगले कदम और संभावित कानूनी कार्रवाई पर है। अभ्यर्थियों ने दी आंदोलन तेज करने की चेतावनी प्रदर्शन कर रहे चयनित अभ्यर्थियों का कहना है कि वे अपनी नौकरी बचाने के लिए आंदोलन जारी रखेंगे। कुछ अभ्यर्थियों ने भूख हड़ताल और कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी है। वहीं सरकार की ओर से सफल अभ्यर्थियों को न्यायिक रास्ता अपनाने की बात कही गई है। फिलहाल JSSC CGL चयनित अभ्यर्थियों की सबसे बड़ी मांग यही है कि नियुक्त अभ्यर्थियों की नौकरी सुरक्षित रखी जाए और यदि किसी स्तर पर अनियमितता हुई है तो वास्तविक दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
रांची: सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में मरीजों के लिए बड़ी स्वास्थ्य सुविधा शुरू होने जा रही है. अस्पताल में इंडोस्कोपी-यूएसजी मशीन का इंस्टॉलेशन पूरा हो गया है. आने वाले दिनों में गैस्ट्रोइंट्रोलॉजी विभाग में इस अत्याधुनिक मशीन से मरीजों की जांच शुरू की जायेगी. अस्पताल प्रबंधन के अनुसार, यह सुविधा मरीजों को नि:शुल्क उपलब्ध करायी जायेगी. नई मशीन के शुरू होने से पेट और पाचन तंत्र से जुड़ी गंभीर और जटिल बीमारियों की जांच में काफी मदद मिलेगी. खासकर आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को निजी अस्पतालों में होने वाले महंगे इलाज और जांच के खर्च से राहत मिलने की उम्मीद है. एंडोस्कोपी और अल्ट्रासाउंड दोनों की सुविधा इंडोस्कोपी-यूएसजी आधुनिक जांच तकनीक है, जिसमें एंडोस्कोपी और अल्ट्रासाउंड को एक साथ इस्तेमाल किया जाता है. इसमें एक पतली ट्यूब की मदद से शरीर के अंदरूनी हिस्सों की बारीकी से जांच की जाती है. इस तकनीक से पेट, पैंक्रियाज, लिवर, पित्ताशय और आंतों से जुड़ी समस्याओं की विस्तृत जानकारी प्राप्त की जा सकती है. इससे डॉक्टरों को बीमारी की सही स्थिति समझने और इलाज की दिशा तय करने में मदद मिलती है. कैंसर और ट्यूमर की शुरुआती पहचान में मदद नई तकनीक की मदद से कैंसर, ट्यूमर और अल्सर जैसी गंभीर बीमारियों की शुरुआती अवस्था में पहचान करने में सहायता मिलेगी. बीमारी का समय रहते पता चलने पर मरीज का इलाज जल्द शुरू किया जा सकता है. खासकर पैंक्रियाटिक कैंसर, लिवर से जुड़ी बीमारियों और पित्ताशय तथा पाचन तंत्र की जटिल समस्याओं की जांच में यह मशीन काफी उपयोगी मानी जाती है. जांच के साथ बायोप्सी की भी सुविधा इंडोस्कोपी-यूएसजी की एक खास सुविधा यह है कि जरूरत पड़ने पर डॉक्टर प्रभावित हिस्से से बायोप्सी के लिए सैंपल भी ले सकते हैं. इससे संदिग्ध बीमारी की पुष्टि करने में मदद मिलती है. एक ही प्रक्रिया के दौरान विस्तृत जांच और आवश्यकतानुसार सैंपल लेने की सुविधा मिलने से मरीजों को अलग-अलग जांच के लिए कई जगह जाने की जरूरत कम होगी. निजी अस्पतालों के महंगे खर्च से मिलेगी राहत सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में यह सुविधा नि:शुल्क उपलब्ध होने से आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को सबसे अधिक लाभ मिलने की उम्मीद है. निजी अस्पतालों में ऐसी आधुनिक जांच पर होने वाला भारी खर्च कई मरीजों के लिए परेशानी का कारण बनता है. मशीन के संचालन के साथ गैस्ट्रोइंट्रोलॉजी विभाग में पाचन तंत्र से जुड़ी गंभीर बीमारियों की आधुनिक जांच की सुविधा उपलब्ध हो जायेगी. अस्पताल प्रबंधन के अनुसार, आने वाले कुछ दिनों में मशीन से मरीजों की जांच शुरू करने की तैयारी है.
रांची: ग्रामीण और आदिवासी बहुल क्षेत्रों में स्वास्थ्य संबंधी अनुसंधान को बढ़ावा देने की दिशा में रांची में एक महत्वपूर्ण पहल होने जा रही है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मलेरिया रिसर्च (आईसीएमआर) की ओर से रांची जिले के अनगढ़ा में मॉडल रूरल हेल्थ रिसर्च यूनिट (MRHRU) सेंटर स्थापित किया जाएगा. बुधवार शाम चार बजे स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी इसके भवन का शिलान्यास करेंगे. यह संस्थान स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के तहत काम करेगा. इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाली आबादी की स्वास्थ्य समस्याओं को बेहतर तरीके से समझना और उनके आधार पर उच्च गुणवत्ता वाले स्वास्थ्य अनुसंधान को बढ़ावा देना है. ग्रामीण और आदिवासी आबादी की स्वास्थ्य समस्याओं पर होगा अध्ययन मॉडल रूरल हेल्थ रिसर्च यूनिट की स्थापना आईसीएमआर और एनएमआईआर के संयुक्त प्रयास से की जा रही है. इसके माध्यम से अनगढ़ा और आसपास के ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़े जुटाये जायेंगे. स्थानीय लोगों में पायी जाने वाली विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं, बीमारियों और उनके कारणों का अध्ययन कर वैज्ञानिक स्तर पर शोध किया जायेगा. इससे क्षेत्र की वास्तविक स्वास्थ्य स्थिति को समझने और भविष्य में बेहतर स्वास्थ्य योजनाएं तैयार करने में मदद मिलने की उम्मीद है. स्थानीय आबादी को भी मिल सकता है लाभ अनगढ़ा जैसे ग्रामीण और आदिवासी बहुल क्षेत्र में इस तरह का अनुसंधान केंद्र स्थापित होने से स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य संबंधी गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है. शोध के दौरान जुटाये गये आंकड़ों के आधार पर क्षेत्र की स्वास्थ्य जरूरतों को समझने में मदद मिलेगी. साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों और बीमारियों के पैटर्न को लेकर वैज्ञानिक अध्ययन को भी मजबूती मिल सकती है. शिलान्यास कार्यक्रम में कई अधिकारी होंगे शामिल मॉडल रूरल हेल्थ रिसर्च यूनिट के शिलान्यास कार्यक्रम में कई जनप्रतिनिधि और वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे. कार्यक्रम में खिजरी विधायक राजेश कच्छप, आईसीएमआर के निदेशक डॉ. अनूप अन्विकार, भारत सरकार के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग की उप सचिव धारकत आर. लुईकांग, स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव अजय कुमार सिंह और आईसीएमआर-एनएमआईआर फील्ड यूनिट रांची के प्रभारी अधिकारी डॉ. प्रवीण कुमार त्रिपाठी सहित अन्य अधिकारी व गणमान्य लोग मौजूद रहेंगे. इस केंद्र के शुरू होने के बाद रांची के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य अनुसंधान को नई दिशा मिलने की उम्मीद है.