गाजियाबाद, एजेंसियां। त्योहारों के सीजन से पहले गाजियाबाद में खाद्य विभाग की छापेमारी में नकली पनीर बनाने के बड़े मामले का खुलासा हुआ है। भोजपुर थाना क्षेत्र के नाहली गांव में तीन फैक्ट्रियों में पनीर को सफेद और वजनदार बनाने के लिए कपड़े धोने में इस्तेमाल होने वाला वाइटनर, पामोलीन ऑयल, दूध पाउडर और अन्य रसायनों के इस्तेमाल की बात सामने आई है।
खाद्य विभाग ने कार्रवाई के दौरान 868 किलो पनीर और 170 किलो खोया मौके पर नष्ट कराया। विभिन्न रसायनों समेत कुल 20 नमूने जांच के लिए लखनऊ की लैब भेजे गए हैं।
पूछताछ में सामने आया कि तीनों फैक्ट्रियों में त्योहारों के दौरान रोजाना करीब 300 से 400 किलो पनीर तैयार किया जा रहा था। यह पनीर गाजियाबाद के अलावा दिल्ली, फरीदाबाद, गुरुग्राम, बुलंदशहर, गौतमबुद्धनगर और हापुड़ तक सप्लाई किए जाने की जानकारी मिली है।
सस्ता होने के कारण यह पनीर बाजार में करीब 200 से 250 रुपये प्रति किलो की कीमत पर बेचा जा रहा था। खाद्य विभाग के मुताबिक त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने के कारण उत्पादन भी बढ़ा दिया गया था।
सहायक आयुक्त खाद्य-2 सुरेश कुमार मिश्रा के अनुसार, नाहली निवासी फैक्टरी संचालकों कलवा, सकील और कफील के खिलाफ भोजपुर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई गई है। आरोपियों पर BNS की धारा 123, 275 समेत अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।
लखनऊ लैब से नमूनों की जांच रिपोर्ट आने के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। पुलिस भी पूरे मामले की जांच कर रही है।
मुख्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी आशुतोष राय ने बताया कि फैक्ट्रियों में पनीर तैयार करने के लिए इस्तेमाल होने वाले कुछ केमिकल आरोपी खुद तैयार कर रहे थे। अधिकारियों के अनुसार, इन रसायनों के इस्तेमाल के बाद मिलावटी पनीर को सामान्य घरेलू तरीकों से पहचानना मुश्किल हो सकता है।
दिखने और स्वाद में यह पनीर असली जैसा लग सकता है, जिससे आम लोगों के लिए इसकी पहचान करना चुनौतीपूर्ण हो जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार वाइटनर और अन्य हानिकारक रसायनों का सेवन स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। लंबे समय तक ऐसे रसायनों के संपर्क या सेवन से चक्कर, बेहोशी और शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर प्रतिकूल प्रभाव जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
बच्चों और बुजुर्गों पर ऐसे हानिकारक पदार्थों का असर अधिक गंभीर हो सकता है।
खाद्य विभाग ने लोगों से अपील की है कि पनीर और अन्य डेयरी उत्पाद ब्रांडेड तथा FSSAI लाइसेंस प्राप्त दुकानों से ही खरीदें। विभाग ने लोगों को सस्ते पनीर के लालच में स्वास्थ्य से समझौता नहीं करने की सलाह दी है।
त्योहारों को देखते हुए जिले में मिठाई और डेयरी उत्पाद बनाने वाली इकाइयों के खिलाफ जांच अभियान जारी रखने की बात भी कही गई है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
चेन्नई: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या को स्थायी रूप से बनाए रखने की मांग की है। उन्होंने इसके लिए संविधान में जरूरी संशोधन करने का आग्रह किया है। मुख्यमंत्री का कहना है कि जनगणना के बाद प्रस्तावित परिसीमन से दक्षिणी राज्यों की लोकसभा सीटों में कमी आ सकती है, इसलिए मौजूदा राज्यवार सीट वितरण को बरकरार रखा जाना चाहिए। इसके साथ ही विजय ने आगामी लोकसभा चुनाव और उसके बाद होने वाले विधानसभा चुनावों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की मांग भी उठाई है। तमिलनाडु विधानसभा के प्रस्ताव का दिया हवाला मुख्यमंत्री विजय ने अपने पत्र में तमिलनाडु विधानसभा द्वारा बुधवार को पारित प्रस्ताव का उल्लेख किया। इस प्रस्ताव में लोकसभा की कुल सदस्य संख्या को 543 पर स्थायी रूप से तय करने और प्रत्येक राज्य को वर्तमान में मिली सीटों की संख्या को बनाए रखने की मांग की गई है। विजय ने प्रधानमंत्री से विधानसभा के प्रस्ताव पर विचार करने और इसके अनुरूप संविधान में आवश्यक संशोधन लाने का अनुरोध किया। परिसीमन को लेकर दक्षिणी राज्यों की चिंता तमिलनाडु विधानसभा ने प्रस्ताव में आशंका जताई है कि आगामी जनगणना के बाद जनसंख्या के आधार पर होने वाले परिसीमन से दक्षिणी राज्यों की लोकसभा सीटों पर असर पड़ सकता है। प्रस्ताव में कहा गया कि दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में लंबे समय तक बेहतर प्रदर्शन किया है। ऐसे में केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण इन राज्यों के लिए नुकसानदेह हो सकता है। विधानसभा ने इसे दक्षिणी राज्यों के साथ दीर्घकालिक अन्याय की आशंका से जोड़ा है। 1967 का उदाहरण देकर जताई चिंता तमिलनाडु विधानसभा ने अपने प्रस्ताव में 1967 का उदाहरण भी दिया। प्रस्ताव के अनुसार, उस समय तमिलनाडु की लोकसभा सीटों की संख्या 41 से घटकर 39 रह गई थी। विधानसभा का तर्क है कि यदि 1971 के बाद की जनसंख्या के आधार पर परिसीमन किया जाता है और मौजूदा सीट वितरण में बदलाव होता है, तो इसका दक्षिणी राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर स्थायी प्रभाव पड़ सकता है। महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण की भी मांग मुख्यमंत्री विजय ने केवल लोकसभा सीटों के मुद्दे को ही नहीं उठाया, बल्कि महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी जोर दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री से आगामी लोकसभा चुनावों और उसके बाद होने वाले विधानसभा चुनावों में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण सुनिश्चित करने की अपील की। इस मांग को तमिलनाडु विधानसभा के प्रस्ताव में भी शामिल किया गया था। विजय ने रखीं तीन प्रमुख मांगें प्रधानमंत्री को भेजे गए पत्र में मुख्यमंत्री विजय ने मुख्य रूप से तीन मांगें रखी हैं: लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 543 पर स्थायी रूप से तय की जाए। राज्यों के बीच मौजूदा लोकसभा सीटों का वितरण बरकरार रखा जाए। आगामी लोकसभा और उसके बाद होने वाले विधानसभा चुनावों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू किया जाए। यह मांग ऐसे समय में सामने आई है जब जनगणना के बाद संभावित परिसीमन को लेकर दक्षिणी राज्यों में राजनीतिक चर्चा तेज है। तमिलनाडु सरकार का कहना है कि विकास और जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को परिसीमन के कारण नुकसान नहीं होना चाहिए।
नई दिल्ली, एजेंसियां। स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त को लाल किले पर आयोजित होने वाले मुख्य समारोह को देखते हुए दिल्ली मेट्रो की सेवाओं में बदलाव किया गया है। दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) के मुताबिक, यात्रियों और समारोह में शामिल होने वाले मेहमानों की सुविधा के लिए मेट्रो सेवा सामान्य समय से पहले शुरू होगी। सुबह 4 बजे से शुरू होगी मेट्रो सेवा 15 अगस्त को सभी लाइनों के टर्मिनल स्टेशनों से मेट्रो की पहली ट्रेन सुबह 4 बजे रवाना होगी। सुबह 4 बजे से नियमित सेवा शुरू होने तक, यानी आमतौर पर करीब 6 बजे तक, सभी लाइनों पर ट्रेनें 30-30 मिनट के अंतराल पर चलेंगी। सुबह 6 बजे के बाद मेट्रो का संचालन सामान्य समय-सारिणी के अनुसार किया जाएगा। विशेष मेहमानों के लिए 1.30 लाख QR टिकट लाल किले में होने वाले स्वतंत्रता दिवस समारोह में शामिल होने के लिए रक्षा मंत्रालय की ओर से करीब 1.30 लाख विशेष QR टिकट जारी किए गए हैं। इन विशेष मेहमानों की आवाजाही को आसान बनाने के लिए दिल्ली मेट्रो ने भी आवश्यक व्यवस्था की है। लाल किला और दिल्ली गेट स्टेशन रहेंगे अहम रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी विशेष QR टिकट या आमंत्रण रखने वाले मेहमानों के लिए लाल किला और दिल्ली गेट मेट्रो स्टेशन समारोह स्थल के नजदीकी स्टेशन होंगे। यहां उतरने के बाद मेहमान लाल किले के समारोह स्थल तक पहुंच सकेंगे। यात्रियों को मिलेगी सुविधा स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सुबह जल्दी शुरू की गई मेट्रो सेवा का उद्देश्य समारोह में शामिल होने वाले लोगों के साथ-साथ अन्य यात्रियों को भी सुगम परिवहन सुविधा उपलब्ध कराना है। नियमित समय शुरू होने के बाद सभी लाइनों पर मेट्रो सेवा सामान्य रूप से संचालित होगी।
बेंगलुरु, एजेंसियां। बेंगलुरु में सड़क किनारे वाहन पार्क करना अब जेब पर भारी पड़ सकता है। कर्नाटक सरकार ने प्रस्तावित ‘ग्रेटर बेंगलुरु एरिया (पार्किंग) रूल्स, 2026’ का मसौदा तैयार किया है। इसमें ऑन-स्ट्रीट पार्किंग के लिए प्रति घंटे शुल्क, रिहायशी पार्किंग परमिट के लिए सालाना फीस और अवैध पार्किंग पर जुर्माने का प्रावधान किया गया है। ऑन-स्ट्रीट पार्किंग के लिए देना होगा शुल्क प्रस्तावित नियमों के तहत सार्वजनिक सड़कों पर पार्किंग को तीन कैटेगरी में बांटने का प्रस्ताव है। कारों के लिए कैटेगरी ए सड़कों पर ₹80 प्रति घंटा, कैटेगरी बी पर ₹60 और कैटेगरी सी पर ₹40 शुल्क प्रस्तावित है। वहीं, दोपहिया वाहनों के लिए इन तीनों कैटेगरी में क्रमशः ₹40, ₹30 और ₹20 प्रति घंटा शुल्क हो सकता है। दो घंटे से अधिक पार्किंग और पीक आवर के दौरान शुल्क बढ़ाया जा सकता है। रेजिडेंशियल पार्किंग परमिट भी महंगा जिन लोगों के पास घर में निजी पार्किंग या गैराज की सुविधा नहीं है और वे सार्वजनिक सड़क पर वाहन पार्क करते हैं, उनके लिए रेजिडेंशियल पार्किंग परमिट जरूरी हो सकता है। प्रस्ताव के अनुसार छोटी कारों के लिए सालाना ₹15,000, सेडान के लिए ₹20,000 और SUV के लिए ₹25,000 तक शुल्क देना पड़ सकता है। इसके अलावा प्रशासनिक शुल्क भी लिया जा सकता है। अवैध पार्किंग पर ₹500 तक जुर्माना सड़क किनारे अवैध रूप से कार पार्क करने पर ₹500 और दोपहिया वाहन पर ₹300 का जुर्माना प्रस्तावित है। फुटपाथ पर पार्किंग करने पर कार के लिए ₹1,000 और दोपहिया वाहन के लिए ₹600 तक जुर्माना लगाया जा सकता है। प्राइवेट पार्किंग ऑपरेटरों को नो-पार्किंग जोन में खड़े वाहनों को क्लैंप या टो करने की अनुमति देने का भी प्रस्ताव है। टो करने से पहले वीडियो रिकॉर्डिंग जरूरी होगी। कई जगहों पर नो-पार्किंग जोन ड्राफ्ट में मेट्रो और सबअर्बन रेलवे स्टेशनों के 150 मीटर के दायरे में नो-पार्किंग जोन बनाने का प्रस्ताव है। इसे भविष्य में 500 मीटर तक बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा बड़े सिग्नल वाले जंक्शन के 100 मीटर, बस स्टॉप के 25 मीटर के दायरे और फुटपाथ पर पार्किंग की अनुमति नहीं होगी। पार्किंग की जगह को दुकान या गोदाम बनाने पर कार्रवाई जिन व्यावसायिक प्रतिष्ठानों ने स्वीकृत बेसमेंट पार्किंग को दुकान या गोदाम में बदल दिया है और ग्राहकों को सड़क पर वाहन पार्क करने के लिए मजबूर करते हैं, उन पर ₹5,000 साप्ताहिक जुर्माना लगाया जा सकता है। एक महीने के भीतर पार्किंग सुविधा बहाल नहीं करने पर ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट और ट्रेड लाइसेंस रद्द करने का भी प्रावधान प्रस्तावित है। पार्किंग सुविधाएं बनाने पर टैक्स में छूट सरकार ने निजी पार्किंग सुविधाओं को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन का भी प्रस्ताव रखा है। खाली जमीन पर कम से कम 15 कारों की सरफेस पार्किंग बनाने पर प्रॉपर्टी टैक्स में 50 प्रतिशत तक छूट मिल सकती है। वहीं, 30 से 200 कारों की क्षमता वाली मल्टी-लेवल या मशीनीकृत पार्किंग सुविधा बनाने पर प्रॉपर्टी टैक्स और सर्विस चार्ज में 100 प्रतिशत छूट का प्रस्ताव है। 30 दिनों में मांगे गए सुझाव प्रस्तावित नियमों का उद्देश्य सड़क पर लंबे समय तक वाहनों की पार्किंग को हतोत्साहित करना, ट्रैफिक जाम कम करना और पार्किंग व्यवस्था को व्यवस्थित करना है। सरकार ने नोटिफिकेशन जारी होने के बाद 30 दिनों के भीतर जनता से आपत्तियां और सुझाव मांगे हैं। अगर ये नियम लागू होते हैं, तो बेंगलुरु में वाहन मालिकों के लिए खासकर रेजिडेंशियल पार्किंग परमिट और सड़क किनारे पार्किंग की लागत में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।