विदेशों में छिपे आर्थिक अपराधियों और गंभीर मामलों के आरोपियों पर भारत सरकार लगातार शिकंजा कस रही है। आधुनिक तकनीक, जियो-लोकेशन ट्रैकिंग, डिजिटल फुटप्रिंट, रेड कॉर्नर नोटिस और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की मदद से पिछले कुछ वर्षों में बड़ी सफलता हासिल हुई है। गृह मंत्रालय के मुताबिक, साल 2021 से अब तक 36 देशों से 274 भगोड़े अपराधियों को भारत वापस लाया गया है। सरकार का दावा है कि अब फरार अपराधियों की पहचान छिपाना पहले जितना आसान नहीं रह गया है।
विदेश भाग चुके आरोपी अक्सर नाम, पहचान और ठिकाना बदलकर कानून से बचने की कोशिश करते हैं। ऐसे मामलों में सरकार अब सैटेलाइट तकनीक, जियो-लोकेशन ट्रैकिंग, डिजिटल फुटप्रिंट और सोशल मीडिया गतिविधियों का विश्लेषण कर उनकी लोकेशन का पता लगा रही है। इसके साथ ही इंटरपोल, विदेशी जांच एजेंसियों और विभिन्न देशों की कानून प्रवर्तन संस्थाओं के साथ समन्वय बढ़ाया गया है।
भगोड़ों की तलाश और गिरफ्तारी के लिए केंद्र सरकार ने ऑपरेशन त्रिशूल शुरू किया है। इस अभियान के तहत विदेशों में छिपे आरोपियों की गतिविधियों पर नजर रखी जाती है और उनकी पहचान बदलने की कोशिशों को तकनीक के जरिए ट्रैक किया जाता है। सरकार का कहना है कि इस अभियान ने कई मामलों में महत्वपूर्ण सफलता दिलाई है।
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में 401 भगोड़ों के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी किए गए हैं। वहीं, 2014 से पहले औसतन हर साल केवल चार भगोड़े ही भारत वापस लाए जा रहे थे। उस समय भारत की केवल 37 देशों के साथ प्रत्यर्पण संधि थी और करीब 110 प्रत्यर्पण आवेदन लंबित थे। अब कई नए देशों के साथ सहयोग बढ़ने और कानूनी प्रक्रियाओं में सुधार के कारण प्रत्यर्पण की रफ्तार तेज हुई है।
सरकार ने भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम लागू कर आर्थिक अपराधियों की संपत्ति जब्त करने का रास्ता मजबूत किया। इसके अलावा एनआईए संशोधन अधिनियम, यूएपीए संशोधन अधिनियम और 2024 में लागू तीन नए आपराधिक कानूनों ने भी जांच एजेंसियों को अतिरिक्त अधिकार दिए हैं। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 355 और 356 के तहत पहली बार फरार आरोपी की अनुपस्थिति में भी मुकदमा चलाने (Trial in Absentia) का प्रावधान किया गया है।
राज्यसभा में वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) बैंक धोखाधड़ी से जुड़े 32 मामलों की जांच कर रहा है। इन मामलों में 54 आरोपी देश छोड़कर फरार हो चुके हैं। अब तक 9 आरोपियों को भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित किया जा चुका है और उनकी 840.68 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की गई है। इसके अलावा 18 आरोपियों के प्रत्यर्पण की प्रक्रिया जारी है तथा उनसे जुड़ी 35,166.28 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति कुर्क की जा चुकी है।
सरकार का कहना है कि आधुनिक तकनीक, मजबूत कानूनों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए विदेशों में छिपे आर्थिक अपराधियों, ड्रग तस्करों और संगठित अपराध से जुड़े आरोपियों को कानून के दायरे में लाने की प्रक्रिया आगे भी इसी तरह जारी रहेगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
सौरव दास बुरे फंसे, दिल्ली हाईकोर्ट ने आपराधिक अवमानना मामले में जारी किया नोटिस नई दिल्ली, एजेंसियां। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) से जुड़े सौरव दास की मुश्किलें बढ़ गई हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करते हुए नोटिस जारी किया है। मामले में आरोप है कि हाईकोर्ट की एक न्यायाधीश को बदनाम करने के लिए सोशल मीडिया पर अभियान चलाया गया और इससे जुड़े इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को हटाने की कोशिश की गई। जज को बदनाम करने के अभियान का आरोप मामला दिल्ली हाईकोर्ट की जज जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोप है कि उनके खिलाफ सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों के जरिए एक अभियान चलाया गया। अदालत के सामने इलेक्ट्रॉनिक सामग्री और ऑनलाइन गतिविधियों से जुड़े आरोप भी रखे गए हैं। अदालत ने मामले को गंभीरता से लेते हुए सौरव दास से अपना पक्ष स्पष्ट करने को कहा है। उन्हें चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। इलेक्ट्रॉनिक सबूत मिटाने का भी आरोप मामले में सौरव दास पर इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को हटाने का आरोप भी लगाया गया है। हालांकि, यह आरोप अभी अदालत में साबित नहीं हुआ है और मामले की न्यायिक प्रक्रिया जारी है। दास ने इन आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि उन्होंने किसी भी संबंधित पोस्ट को डिलीट नहीं किया है। ऐसे में अब अदालत के सामने दोनों पक्षों के दावों और उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच महत्वपूर्ण होगी। चार सप्ताह में देना होगा जवाब दिल्ली हाईकोर्ट ने सौरव दास को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। आगे की सुनवाई में अदालत यह देखेगी कि लगाए गए आरोपों और उपलब्ध सामग्री के आधार पर आपराधिक अवमानना की कार्यवाही को किस दिशा में आगे बढ़ाया जाए। फिलहाल सौरव दास के खिलाफ लगाए गए आरोप अदालत में विचाराधीन हैं। अंतिम फैसला आने तक उन्हें दोषी करार देना उचित नहीं होगा।
संभल में तमन्ना मलिक की बुर्के में कांवड़ यात्रा पर विवाद, प्रशासन ने भेजा नोटिस; कानून-व्यवस्था को लेकर जताई चिंता संभल, एजेंसियां। उत्तर प्रदेश के संभल में तमन्ना मलिक के बुर्का पहनकर कांवड़ यात्रा करने के ऐलान को लेकर विवाद बढ़ गया है। संभल प्रशासन ने तमन्ना मलिक और उनके पति अमन त्यागी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। प्रशासन की ओर से यह कदम यात्रा के दौरान कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका को देखते हुए उठाया गया है। प्रशासन ने क्या कहा? रिपोर्टों के मुताबिक, तमन्ना मलिक ने सावन के दौरान बुर्के में कांवड़ यात्रा करने की इच्छा जताई थी। इसके बाद पुलिस ने संभावित तनाव और शांति व्यवस्था को लेकर प्रशासन को रिपोर्ट दी। इसके आधार पर SDM अदालत ने तमन्ना मलिक और उनके पति अमन त्यागी को नोटिस जारी किया। दोनों से इस संबंध में अपना पक्ष रखने को कहा गया है। छह महीने के बंधपत्र की कार्रवाई प्रशासन ने एहतियाती कदम के तौर पर दोनों से ₹20,000-₹20,000 के छह महीने के बंधपत्र की कार्रवाई की है। इसका उद्देश्य संभावित विवाद या शांति भंग की स्थिति को रोकना बताया गया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि उपलब्ध रिपोर्टों में प्रशासन की कार्रवाई को सिर्फ बुर्का पहनने पर कानूनी प्रतिबंध के रूप में पेश करना सही नहीं है। मामला मुख्य रूप से कानून-व्यवस्था और संभावित तनाव से जुड़ा बताया गया है। पहले भी चर्चा में रह चुकी हैं तमन्ना मलिक तमन्ना मलिक इससे पहले भी बुर्का पहनकर कांवड़ लेकर हरिद्वार से लौटने के कारण चर्चा में आई थीं। फरवरी 2026 में उन्होंने अपने पति अमन त्यागी के साथ कांवड़ यात्रा की थी और संभल पहुंचने पर उनका स्वागत भी किया गया था। तमन्ना मलिक का मामला अब एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का विषय बन गया है। प्रशासन की ओर से जारी नोटिस के बाद आगे की कार्रवाई उनके जवाब और स्थानीय कानून-व्यवस्था की स्थिति पर निर्भर करेगी।
संसद के मानसून सत्र का 13वां दिन भी हंगामेदार रहने के आसार हैं। मंगलवार को हुए तीखे विरोध-प्रदर्शन के बाद बुधवार (5 अगस्त) को भी विपक्ष केंद्र सरकार को कई मुद्दों पर घेरने की तैयारी में है। कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने संसद परिसर में मार्च निकालकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग की। विपक्ष का आरोप है कि छात्र आंदोलन पर पुलिस कार्रवाई, राम मंदिर चढ़ावा मामले और अन्य मुद्दों पर सरकार जवाब देने से बच रही है। राहुल-प्रियंका समेत विपक्ष का संसद परिसर में मार्च संसद परिसर में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे समेत कई विपक्षी सांसदों ने प्रेरणा स्थल स्थित गांधी प्रतिमा से मकर द्वार तक मार्च निकाला। इस दौरान विपक्ष ने 20 जुलाई को छात्र संगठन CJP के प्रदर्शन के दौरान हुई कथित पुलिस कार्रवाई, अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा में कथित गड़बड़ी और अन्य मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। विपक्षी नेताओं ने इन मामलों में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को जिम्मेदार ठहराते हुए उनके इस्तीफे की मांग की और सरकार से सदन में जवाब देने की मांग की। जंतर-मंतर छात्र प्रदर्शन पर चर्चा की मांग कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस देकर 20 जुलाई 2026 को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई पर तत्काल चर्चा कराने की मांग की। उन्होंने कहा कि सरकार को इस मामले पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए और गृह मंत्री अमित शाह को सदन में विस्तृत बयान देना चाहिए। दल-बदल कानून पर नई बहस की मांग कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भी लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया। उन्होंने अवसरवाद से प्रेरित बड़े पैमाने पर होने वाले राजनीतिक दल-बदल पर चिंता जताते हुए नए और अधिक प्रभावी दल-बदल विरोधी कानून पर चर्चा कराने की मांग की। उनका कहना है कि मौजूदा व्यवस्था लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है। E20 पेट्रोल के मुद्दे पर राज्यसभा में नोटिस आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने नियम 267 के तहत नोटिस देकर E20 पेट्रोल को अनिवार्य रूप से लागू किए जाने के मुद्दे पर चर्चा की मांग की। उन्होंने कहा कि इस फैसले से उपभोक्ताओं के अधिकार, वाहन मालिकों की चिंताएं और आम जनता पर पड़ने वाले आर्थिक प्रभाव जैसे गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, जिन पर सरकार को सदन में जवाब देना चाहिए। आज भी हंगामे के आसार मानसून सत्र के दौरान विपक्ष लगातार सरकार को कई मुद्दों पर घेर रहा है। ऐसे में बुधवार को भी लोकसभा और राज्यसभा में तीखी नोकझोंक और हंगामे की संभावना बनी हुई है। विपक्ष छात्र आंदोलन, राम मंदिर चढ़ावा मामले, E20 पेट्रोल नीति और दल-बदल कानून जैसे मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगने की तैयारी में है, जबकि सरकार अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगी।