NEET परीक्षा में कथित अनियमितताओं और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी समर्थन मिलने लगा है। अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के कई शहरों में उनके समर्थन में प्रदर्शन किए गए। प्रदर्शनकारियों ने भारत सरकार से वांगचुक और अन्य आंदोलनकारियों से बातचीत कर समाधान निकालने की अपील की।
अमेरिका स्थित मानवाधिकार संगठन 'हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स' के कार्यकर्ताओं ने न्यूयॉर्क के यूनियन स्क्वायर और सैन होजे में महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने हाथों में तख्तियां लेकर वांगचुक के समर्थन में नारे लगाए और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की भी मांग की।
संगठन ने बताया कि ब्रिटेन के लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग और आयरलैंड के डबलिन स्थित भारतीय दूतावास के बाहर भी प्रदर्शन आयोजित किए गए। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि भारत के छात्रों के साथ निष्पक्ष और सम्मानजनक व्यवहार होना चाहिए तथा उनकी मांगों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए।
'हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स' और आजादी प्रोजेक्ट समेत कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने यूरोप के विभिन्न शहरों में भारतीय मिशनों के बाहर प्रदर्शन किए। संगठनों का कहना है कि भारतीय युवाओं को पारदर्शी परीक्षा प्रणाली, जवाबदेही और शिक्षा व्यवस्था में सुधार का अधिकार है।
मानवाधिकार संगठन ने भारत सरकार से अपील की है कि वह सोनम वांगचुक और NEET परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर आंदोलन कर रहे अन्य प्रदर्शनकारियों के साथ संवाद शुरू करे। संगठन का कहना है कि लोकतांत्रिक तरीके से उठाई जा रही मांगों का समाधान बातचीत के जरिए निकाला जाना चाहिए।
तीन सप्ताह से अधिक समय तक आमरण अनशन पर रहने के कारण सोनम वांगचुक की तबीयत बिगड़ने पर दिल्ली पुलिस उन्हें जंतर-मंतर से सफदरजंग अस्पताल लेकर गई थी। बाद में दिल्ली हाई कोर्ट की अनुमति मिलने के बाद उन्हें गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में स्थानांतरित किया गया, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली,एजेंसियां। दिल्ली हाईकोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधार के समर्थक सोनम वांगचुक को इलाज के लिए मेदांता अस्पताल में स्थानांतरित करने की अनुमति दे दी है। लंबे समय से जारी उनके अनशन के दौरान स्वास्थ्य बिगड़ने पर यह फैसला लिया गया। अदालत के आदेश के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों की निगरानी में उनका उपचार जारी है। स्वास्थ्य बिगड़ने पर अदालत का हस्तक्षेप सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि लगातार अनशन के कारण सोनम वांगचुक की तबीयत खराब हो गई है और उन्हें बेहतर चिकित्सा सुविधा की आवश्यकता है। इस पर हाईकोर्ट ने उनकी चिकित्सकीय देखभाल सुनिश्चित करने के लिए मेदांता अस्पताल में स्थानांतरण की अनुमति दे दी। डॉक्टरों की एक टीम उनके स्वास्थ्य की नियमित निगरानी कर रही है। धरनास्थल पर लौटे समर्थक सोनम वांगचुक को अस्पताल ले जाने के बाद उनके समर्थक और प्रदर्शनकारी फिर से अपने धरनास्थल पर लौट आए। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनका आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से जारी रहेगा और वे अपनी मांगों को लेकर सरकार से बातचीत चाहते हैं। मौके पर सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल तैनात किया गया है। सरकार से वार्ता की मांग जारी प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार से जल्द बातचीत शुरू करने और उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय लेने की अपील की है। वहीं प्रशासन का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखते हुए स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। सोनम वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति पर भी अस्पताल और प्रशासन नियमित जानकारी साझा कर रहे हैं।
दिल्ली में छात्रों के मुद्दे और कथित नीट धांधली को लेकर विपक्ष के प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव समेत कई सांसदों को पुलिस ने हिरासत में लिया। प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और प्रधानमंत्री आवास की ओर मार्च कर रहे विपक्षी नेताओं को पुलिस ने रास्ते में रोक दिया, जिसके बाद प्रदर्शन स्थल पर धक्का-मुक्की और नारेबाजी का माहौल बन गया। PM आवास के बाहर धरने पर बैठे विपक्षी नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के 30 से अधिक सांसद प्रधानमंत्री आवास के बाहर सड़क पर बैठ गए। उनके साथ प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव और कई अन्य नेता भी मौजूद थे। प्रदर्शनकारियों ने छात्रों के साथ हुई पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। पुलिस से धक्का-मुक्की, राहुल के चेहरे पर चोट प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने नेताओं को हटाने के लिए सुरक्षा घेरा बनाया। इस दौरान राहुल गांधी और पुलिसकर्मियों के बीच धक्का-मुक्की हुई। घटनास्थल की तस्वीरों में राहुल गांधी के चेहरे पर चोट के निशान भी दिखाई दिए। पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेकर बस के जरिए वहां से हटाया। प्रियंका गांधी को अलग ले गई पुलिस महिला पुलिसकर्मियों ने प्रियंका गांधी वाड्रा को भी हिरासत में लिया। उन्हें राहुल गांधी से अलग मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन ले जाया गया। प्रियंका गांधी ने हिरासत के दौरान पुलिस कार्रवाई का विरोध किया। विपक्ष की क्या थी मांग? विपक्षी दलों की मांग थी कि: संसद में नीट परीक्षा में कथित धांधली पर चर्चा कराई जाए। 20 जुलाई को संसद मार्च कर रहे छात्रों पर हुए लाठीचार्ज और पुलिस कार्रवाई की जांच हो। छात्रों के खिलाफ कार्रवाई करने वाले अधिकारियों पर सख्त कदम उठाए जाएं। हिरासत के बाद क्या है नियम? संसदीय परंपराओं के अनुसार, यदि किसी सांसद को हिरासत में लिया जाता है या गिरफ्तार किया जाता है, तो संबंधित एजेंसी को इसकी सूचना लोकसभा अध्यक्ष को देना आवश्यक होता है। प्रियंका गांधी का सरकार पर हमला रिहा होने के बाद प्रियंका गांधी ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि छात्रों की आवाज दबाने के लिए पुलिस का इस्तेमाल लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि छात्रों के साथ किया गया व्यवहार पूरी तरह अनुचित और अस्वीकार्य है। देर रात हुई रिहाई राहुल गांधी को हिरासत में लेने के बाद उत्तर दिल्ली स्थित छत्रसाल स्टेडियम, जिसे अस्थायी हिरासत केंद्र बनाया गया था, ले जाया गया। करीब तीन घंटे बाद रात लगभग 10 बजे उन्हें रिहा कर दिया गया। वहीं, प्रियंका गांधी को मंदिर मार्ग थाने में रखा गया, जहां उनसे मिलने सोनिया गांधी भी पहुंचीं। इसके बाद रात करीब 9:45 बजे प्रियंका गांधी को भी रिहा कर दिया गया। क्या सांसदों को गिरफ्तारी से छूट मिलती है? सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और विधि विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक हो, तो पुलिस किसी भी व्यक्ति को हिरासत में ले सकती है। सांसद होने के कारण किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी या हिरासत से स्वतः छूट नहीं मिलती। छात्रों के मुद्दे पर हुए इस प्रदर्शन के बाद राजधानी दिल्ली का राजनीतिक माहौल और गरमा गया है। विपक्ष ने सरकार पर छात्रों की आवाज दबाने का आरोप लगाया है, जबकि पुलिस का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कार्रवाई की गई।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रमुख ममता बनर्जी ने ‘शहीद दिवस’ रैली के मंच से भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलों से एकजुट होने की अपील की। हालांकि, उनकी इस पहल पर कांग्रेस और माकपा (CPIM) ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए पुराने राजनीतिक मतभेदों और घटनाओं का हवाला दिया। ममता बनर्जी की अपील कोलकाता में आयोजित रैली को संबोधित करते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि पश्चिम बंगाल में भाजपा को रोकने के लिए INDIA गठबंधन के सभी दलों को साथ आना चाहिए। उन्होंने कहा, "भाजपा के खिलाफ लड़ाई किसी व्यक्ति या पार्टी के अहंकार से बड़ी है। मेरे मन में किसी के प्रति कोई अहं नहीं है। सभी दल मतभेद भुलाकर लोकतंत्र बचाने के लिए एकजुट हों।" कांग्रेस का पलटवार ममता बनर्जी की अपील पर पश्चिम बंगाल कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि 21 जुलाई 1993 का आंदोलन युवा कांग्रेस के बैनर तले हुआ था और तृणमूल कांग्रेस उसके इतिहास का अकेले श्रेय नहीं ले सकती। कांग्रेस नेता ने कहा कि यदि ममता बनर्जी वास्तव में रिश्ते सुधारना चाहती हैं, तो उन्हें सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना चाहिए कि कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाना उनकी राजनीतिक भूल थी। 'पहले गलती स्वीकार करें' शुभंकर सरकार ने कहा कि ममता बनर्जी को कांग्रेस के मंच पर आकर 21 जुलाई के शहीदों को श्रद्धांजलि देनी चाहिए और अतीत की गलतियों को स्वीकार करना चाहिए। तभी विपक्षी एकता की बात आगे बढ़ सकती है। माकपा ने भी साधा निशाना मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPIM) ने भी ममता बनर्जी की अपील पर सवाल उठाए। वाम नेताओं ने आरोप लगाया कि ममता बनर्जी ने कभी वाममोर्चा को हराने के लिए भाजपा और एनडीए के साथ गठबंधन किया था। उन्होंने यह भी कहा कि तृणमूल कांग्रेस के शासन में वामपंथी और कांग्रेस कार्यकर्ताओं को लगातार राजनीतिक हिंसा का सामना करना पड़ा। माकपा का कहना है कि अब जब तृणमूल कांग्रेस संगठनात्मक चुनौतियों का सामना कर रही है, तब उसे विपक्षी एकता की याद आ रही है। राजनीतिक मायने पश्चिम बंगाल में 21 जुलाई का शहीद दिवस तृणमूल कांग्रेस के सबसे बड़े राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जाता है। इस बार ममता बनर्जी की INDIA गठबंधन को लेकर की गई अपील और उस पर कांग्रेस व माकपा की तीखी प्रतिक्रिया से साफ है कि राज्य में भाजपा विरोधी दलों के बीच अब भी गहरे राजनीतिक मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में आगामी चुनावों से पहले पश्चिम बंगाल में विपक्षी एकता की राह आसान नहीं दिख रही है।