पुर्तगाल, एजेंसियां। फुटबॉल सुपरस्टार क्रिस्टियानो रोनाल्डो और उनकी लंबे समय से पार्टनर जॉर्जिना रोड्रिगेज आखिरकार शादी के बंधन में बंध गए हैं। दोनों ने 11 अगस्त 2026 को पुर्तगाल के कैस्केस में एक निजी सिविल समारोह में शादी की। करीब एक दशक लंबे रिश्ते के बाद दोनों अब आधिकारिक तौर पर पति-पत्नी बन गए हैं।
शादी की खबर रोनाल्डो ने सोशल मीडिया के जरिए साझा की। उन्होंने ऐसी तस्वीर पोस्ट की, जिसमें दोनों के हाथों में शादी की अंगूठियां नजर आ रही हैं। पोस्ट सामने आते ही फैंस के बीच खुशी की लहर दौड़ गई और कुछ ही समय में इसे लाखों लाइक्स मिल गए।
रोनाल्डो और जॉर्जिना की मुलाकात 2016 में मैड्रिड में हुई थी। उस समय जॉर्जिना एक Gucci स्टोर में काम करती थीं, जबकि रोनाल्डो रियल मैड्रिड के लिए खेल रहे थे। धीरे-धीरे दोनों का रिश्ता मजबूत हुआ और जॉर्जिना रोनाल्डो के निजी और पारिवारिक जीवन का अहम हिस्सा बन गईं।
जॉर्जिना ने 11 अगस्त 2025 को सोशल मीडिया पर अपनी सगाई की घोषणा की थी। इसके बाद से ही दोनों की शादी को लेकर लगातार चर्चाएं होती रही थीं। अब ठीक एक साल बाद शादी के साथ उनके रिश्ते ने नया मुकाम हासिल किया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, शादी के इस निजी समारोह में दोनों के पांचों बच्चे भी मौजूद थे। रोनाल्डो और जॉर्जिना लंबे समय से एक परिवार के रूप में साथ रह रहे हैं और सोशल मीडिया पर भी अक्सर परिवार की तस्वीरें साझा करते हैं।
निजी जिंदगी में शादी के बाद रोनाल्डो का फुटबॉल करियर भी जारी है। स्पोर्टिंग लिस्बन, मैनचेस्टर यूनाइटेड, रियल मैड्रिड, जुवेंटस और अल-नस्र जैसे क्लबों के लिए खेल चुके रोनाल्डो अपने गोल स्कोरिंग रिकॉर्ड के लिए दुनिया के सबसे चर्चित खिलाड़ियों में शामिल हैं।
रोनाल्डो और जॉर्जिना की शादी की खबर ने दुनियाभर के फुटबॉल फैंस और सेलिब्रिटी जगत का ध्यान खींचा है। करीब 10 साल के रिश्ते के बाद दोनों का पति-पत्नी बनना उनके प्रशंसकों के लिए भी खास पल है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
लखनऊ, एजेंसियां। उत्तर प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था, रोजगार और भर्ती परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर युवाओं के एक समूह ने ‘जस्टिस मोर्चा’ बनाने की घोषणा की है। लखनऊ प्रेस क्लब में हुई घोषणा के मुताबिक, संगठन 12 अगस्त 2026 से 50 दिनों का प्रदेशव्यापी जनसंपर्क अभियान शुरू करेगा। पेपर लीक और लंबित भर्तियों को लेकर उठे सवाल ‘जस्टिस मोर्चा’ के प्रमुख मुद्दों में पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी, लंबित भर्तियां और युवाओं से जुड़े रोजगार के सवाल शामिल हैं। आयोजकों का कहना है कि प्रदेश के युवाओं की समस्याओं को लेकर व्यापक स्तर पर आवाज उठाने की जरूरत है। 50 दिन का प्रदेशव्यापी अभियान आयोजकों ने 50 दिनों तक प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में युवाओं और छात्रों से संपर्क करने की योजना बनाई है। अभियान का उद्देश्य शिक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दों को लेकर युवाओं को एक मंच पर लाना बताया गया है। 20 अगस्त से शुरू होगी साइकिल यात्रा अभियान के अगले चरण में 20 अगस्त से चौरी चौरा से साइकिल यात्रा शुरू करने की घोषणा की गई है। यह यात्रा प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से होते हुए 2 अक्टूबर को लखनऊ पहुंचने की योजना है। ‘जस्टिस मोर्चा’ की घोषणा ऐसे समय हुई है जब देशभर में युवाओं के बीच शिक्षा, भर्ती प्रक्रिया और रोजगार से जुड़े मुद्दे चर्चा में हैं। अब इस अभियान की गतिविधियों और सरकार की प्रतिक्रिया पर नजर रहेगी।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। भारत और अमेरिका के बीच व्यापार शुल्क को लेकर तनाव एक बार फिर बढ़ता दिख रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने भारत पर अमेरिकी टैरिफ को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच शुल्क विवाद में भारत को अमेरिकी चिंताओं को गंभीरता से लेना होगा। उन्होंने भारत के रूसी तेल आयात को भी अमेरिका की व्यापार नीति से जोड़कर सवाल उठाए हैं। भारत के रूसी तेल आयात पर अमेरिका की नाराजगी पीटर नवारो लंबे समय से भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद की आलोचना करते रहे हैं। उनका तर्क है कि रूस से तेल खरीदकर भारत अप्रत्यक्ष रूप से मॉस्को की अर्थव्यवस्था और यूक्रेन युद्ध को समर्थन दे रहा है। नवारो ने भारत पर रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदने के साथ-साथ अमेरिकी उत्पादों पर अपेक्षाकृत ऊंचे शुल्क लगाने का आरोप लगाया है। अमेरिका इसी आधार पर भारत के साथ व्यापार संतुलन और टैरिफ को लेकर दबाव बढ़ा रहा है। ट्रंप प्रशासन ने टैरिफ बढ़ाने की दी चेतावनी ट्रंप प्रशासन भारत पर पहले ही अतिरिक्त शुल्क लगाने की दिशा में कदम उठा चुका है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि भारत की व्यापार नीतियों और रूसी तेल खरीद को लेकर वॉशिंगटन की चिंताएं दूर नहीं हुईं तो अमेरिकी टैरिफ का दबाव और बढ़ सकता है। भारत की ओर से हालांकि यह स्पष्ट किया गया है कि उसकी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए तेल खरीद के फैसले लिए जाते हैं। भारत रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी दबाव के बावजूद अपने हितों के अनुसार ऊर्जा नीति जारी रखने की बात कहता रहा है। भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर नजर टैरिफ विवाद के बीच दोनों देशों के बीच संभावित व्यापार समझौते को लेकर भी बातचीत महत्वपूर्ण हो गई है। भारत चाहता है कि अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों के लिए बेहतर पहुंच मिले, जबकि अमेरिका भारत से अपने उत्पादों के लिए अधिक बाजार पहुंच और शुल्क में कमी की मांग कर रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर दोनों देशों के बीच टैरिफ विवाद जल्द नहीं सुलझता है तो इसका असर भारतीय निर्यातकों, टेक्सटाइल, ऑटोमोबाइल, फार्मा और अन्य उद्योगों पर पड़ सकता है। अमेरिका-भारत व्यापार संबंधों में यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों देश रणनीतिक साझेदार हैं और व्यापार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। अब नजर इस बात पर है कि नई टैरिफ नीति और रूसी तेल के मुद्दे पर दोनों देश किस तरह समझौते तक पहुंचते हैं।
ग्रामीण भारत में रोजगार और मजदूरी को लेकर नई योजना VB-G RAM G के शुरुआती आंकड़े सामने आए हैं। सरकार ने लोकसभा में बताया कि योजना लागू होने के करीब एक महीने में 9.69 करोड़ से अधिक पर्सन-डे रोजगार दर्ज किए गए हैं। इसके साथ ही औसत दैनिक मजदूरी बढ़कर 327.4 रुपये हो गई है। वहीं, ग्रामीण विकास और पंचायती राज पर संसदीय स्थायी समिति ने मजदूरी निर्धारण की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा करते हुए 400 रुपये प्रतिदिन न्यूनतम मजदूरी तय करने पर विचार करने की सिफारिश की है। इससे ग्रामीण श्रमिकों की आय और रोजगार व्यवस्था को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। एक महीने में 9.69 करोड़ से ज्यादा रोजगार लोकसभा में दिए गए लिखित जवाब के अनुसार, VB-G RAM G लागू होने के बाद पहले महीने में 9.69 करोड़ से अधिक पर्सन-डे रोजगार दर्ज किए गए। सरकार के मुताबिक, यह योजना देश के ग्रामीण क्षेत्रों में लागू है और इसके तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार को एक वित्तीय वर्ष में 125 दिनों के वेतन वाले रोजगार की कानूनी गारंटी दी गई है। यह सुविधा उन परिवारों के वयस्क सदस्यों के लिए है, जो अकुशल शारीरिक श्रम करने के लिए स्वेच्छा से तैयार हों। मजदूरी बढ़कर 327.4 रुपये प्रतिदिन नई व्यवस्था में ग्रामीण मजदूरों की औसत दैनिक मजदूरी में भी बढ़ोतरी हुई है। 1 जुलाई से 300 रुपये प्रतिदिन की अंतरिम बेस वेज रेट लागू की गई थी। इसके बाद राष्ट्रीय औसत घोषित मजदूरी 298.8 रुपये से बढ़कर 327.4 रुपये प्रतिदिन हो गई। यानी औसत आधार पर मजदूरी में 28.6 रुपये प्रतिदिन की बढ़ोतरी हुई है। इससे पहले कई राज्यों में घोषित मजदूरी 300 रुपये से भी कम थी। सबसे कम घोषित मजदूरी दर 241 रुपये प्रतिदिन बताई गई थी। संसदीय समिति ने मांगी 400 रुपये न्यूनतम मजदूरी इसी बीच ग्रामीण विकास और पंचायती राज पर संसदीय स्थायी समिति ने मजदूरी तय करने की मौजूदा प्रणाली में बदलाव की जरूरत बताई है। कांग्रेस सांसद सप्तगिरि शंकर उलका की अध्यक्षता वाली समिति ने 2011 के आधार वर्ष और CPI-AL यानी कृषि श्रमिकों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की पर्याप्तता की समीक्षा करने की सिफारिश की है। समिति का कहना है कि अलग-अलग क्षेत्रों में महंगाई और जीवन-यापन की लागत को देखते हुए 400 रुपये प्रतिदिन न्यूनतम मजदूरी तय करने पर विचार किया जाना चाहिए। महंगाई के अनुसार मजदूरी तय करने पर जोर संसदीय समिति ने ग्रामीण इलाकों में वास्तविक जीवन-यापन की लागत को दर्शाने वाले बेहतर महंगाई संकेतक की जरूरत पर जोर दिया है। समिति ने मजदूरी में व्यवस्थित और प्रभावी इंडेक्सेशन की सिफारिश की है, ताकि महंगाई बढ़ने के साथ ग्रामीण श्रमिकों की आय में भी उचित बदलाव हो सके। समिति ने यह भी कहा है कि जब तक मजदूरी निर्धारण की संरचना में व्यापक बदलाव नहीं होता, तब तक मौजूदा चक्र में वेतन बढ़ाने के लिए पर्याप्त वित्तीय गुंजाइश तैयार की जानी चाहिए। तीन महीने में कार्रवाई रिपोर्ट संसदीय समिति ने अपनी सिफारिशों पर सरकार से तीन महीने के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट मांगी है। रिपोर्ट ग्रामीण विकास विभाग से जुड़ी वर्ष 2026-27 की अनुदान मांगों पर की गई सिफारिशों और उनके अनुपालन से संबंधित है। अब देखना होगा कि सरकार 400 रुपये न्यूनतम मजदूरी की सिफारिश को किस रूप में आगे बढ़ाती है। राज्यों के सामने 60:40 फंडिंग की चुनौती VB-G RAM G की फंडिंग व्यवस्था को लेकर राज्यों की चिंता भी सामने आई है। ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान के मुताबिक, योजना में सामान्य राज्यों के लिए 60:40 का फंडिंग मॉडल अपनाया गया है। यानी योजना के खर्च में केंद्र और राज्य दोनों की हिस्सेदारी होगी। सरकार का कहना है कि राज्यों के साथ इस विषय पर नियमित बातचीत जारी है। वहीं, पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों के लिए 90:10 का फंडिंग पैटर्न रखा गया है। इसमें 90 फीसदी खर्च केंद्र सरकार वहन करेगी। रोजगार के साथ मजदूरी पर भी नजर VB-G RAM G के शुरुआती आंकड़ों ने ग्रामीण रोजगार व्यवस्था की तस्वीर को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी सामने रखी है। एक तरफ सरकार 9.69 करोड़ से अधिक पर्सन-डे रोजगार का आंकड़ा बता रही है, तो दूसरी तरफ संसदीय समिति मजदूरी को मौजूदा महंगाई और जीवन-यापन की लागत के अनुरूप बढ़ाने की जरूरत पर जोर दे रही है। अब आने वाले समय में योजना की असली परीक्षा इस बात से होगी कि 125 दिनों की रोजगार गारंटी कितने परिवारों तक प्रभावी रूप से पहुंचती है और मजदूरी में प्रस्तावित बढ़ोतरी का वास्तविक लाभ ग्रामीण श्रमिकों को कितना मिलता है।