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केंद्र सरकार का बड़ा फैसला, कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन और गृह सचिव गोविंद मोहन का कार्यकाल एक साल बढ़ा

abhishek singh अगस्त 5, 2026 0
Dr. T.V. Somanathan, Govind Mohan
Dr. T.V. Somanathan, Govind Mohan 1 year Extension

नई दिल्ली, एजेंसियां। केंद्र सरकार ने शीर्ष नौकरशाही में निरंतरता बनाए रखने के लिए कैबिनेट सचिव डॉ. टी.वी. सोमनाथन और केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन के कार्यकाल को एक-एक साल के लिए बढ़ा दिया है। नियुक्ति संबंधी मंत्रिमंडलीय समिति (ACC) ने बुधवार को दोनों अधिकारियों के सेवा विस्तार को मंजूरी दी।

 

दोनों अधिकारियों को एक साल का सेवा विस्तार

 

सरकारी आदेश के अनुसार, टी.वी. सोमनाथन का कैबिनेट सचिव के रूप में कार्यकाल 30 अगस्त 2026 के बाद एक साल के लिए बढ़ाया गया है। अब वह 30 अगस्त 2027 तक इस पद पर बने रहेंगे।

 

वहीं, केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन का कार्यकाल 22 अगस्त 2026 के बाद एक साल के लिए बढ़ाया गया है। वह अब 22 अगस्त 2027 तक गृह सचिव के पद पर रहेंगे।

 

शीर्ष प्रशासन में बनी रहेगी निरंतरता

 

टी.वी. सोमनाथन 1987 बैच के तमिलनाडु कैडर के IAS अधिकारी हैं और अगस्त 2024 में कैबिनेट सचिव नियुक्त हुए थे। गोविंद मोहन 1989 बैच के सिक्किम कैडर के IAS अधिकारी हैं और अगस्त 2024 में केंद्रीय गृह सचिव का पद संभाला था।

 

दोनों अधिकारियों का कार्यकाल बढ़ाए जाने से केंद्र सरकार के शीर्ष प्रशासनिक ढांचे में फिलहाल निरंतरता बनी रहेगी।

 

नियुक्ति समिति ने दी मंजूरी

 

दोनों अधिकारियों के सेवा विस्तार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली नियुक्ति संबंधी मंत्रिमंडलीय समिति (ACC) ने मंजूरी दी है। इसके बाद कार्मिक मंत्रालय की ओर से संबंधित आदेश जारी किए गए।

 

सरकार के इस फैसले से कैबिनेट सचिवालय और गृह मंत्रालय के शीर्ष स्तर पर नेतृत्व में तत्काल बदलाव की संभावना फिलहाल टल गई है।

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

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हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

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लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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अनुच्छेद 370 के सात साल पूरे, जम्मू-कश्मीर में सियासी टकराव; NC-PDP का विरोध, BJP का जश्न श्रीनगर, एजेंसियां। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के विशेष प्रावधान हटाए जाने के सात साल पूरे होने पर बुधवार को केंद्रशासित प्रदेश में राजनीतिक गतिविधियां तेज रहीं। नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) ने 5 अगस्त को विरोध और काले दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की, जबकि BJP ने इसे राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कार्यक्रम आयोजित किए।   NC-PDP का विरोध, काले दिवस के रूप में मनाया दिन     नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी नेताओं ने अनुच्छेद 370 हटाए जाने के फैसले का विरोध किया। दोनों दलों का कहना है कि 5 अगस्त 2019 को लिया गया फैसला जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे और संवैधानिक स्थिति से जुड़ा बड़ा बदलाव था। विरोध कार्यक्रमों को देखते हुए प्रशासन ने कई संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की। राजनीतिक गतिविधियों पर नजर रखने के लिए सुरक्षा बलों की तैनाती भी बढ़ाई गई।     BJP ने बताया ऐतिहासिक उपलब्धि     वहीं भाजपा ने 5 अगस्त को राष्ट्रीय एकता और एकीकरण के लिए महत्वपूर्ण दिन बताते हुए कार्यक्रम आयोजित किए। पार्टी नेताओं ने कहा कि अनुच्छेद 370 के प्रावधान हटने के बाद जम्मू-कश्मीर को देश के बाकी हिस्सों के साथ पूरी तरह जोड़ने की प्रक्रिया मजबूत हुई है। BJP कार्यकर्ताओं ने विभिन्न स्थानों पर कार्यक्रम और सभाएं आयोजित कर केंद्र सरकार के 2019 के फैसले का समर्थन किया।     2019 में हुआ था बड़ा संवैधानिक बदलाव     5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष प्रावधानों को प्रभावी रूप से समाप्त कर दिया था। इसके बाद जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के तहत तत्कालीन राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख नाम के दो केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजित किया गया.   दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 हटाने के केंद्र के फैसले को बरकरार रखा था। इसके बाद जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव हुए और निर्वाचित सरकार का गठन हुआ।   राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग भी तेज     अनुच्छेद 370 की सातवीं वर्षगांठ पर राजनीतिक टकराव के बीच जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग भी फिर प्रमुख मुद्दा बनी हुई है।   NC और PDP समेत कई क्षेत्रीय राजनीतिक दल केंद्र से राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग कर रहे हैं। वहीं BJP अनुच्छेद 370 हटाने के बाद क्षेत्र में हुए बदलावों को अपनी सरकार की उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है। इस तरह 5 अगस्त 2026 को जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को लेकर समर्थन और विरोध की राजनीति एक बार फिर आमने-सामने दिखाई दी।

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Pakistan's Interior Minister Mohsin Naqvi addresses the media, sparking political debate amid speculation over the country's political future.
पाकिस्तान में तख्तापलट की अटकलें तेज? गृह मंत्री मोहसिन नकवी के बयान से बढ़ी सियासी हलचल

पाकिस्तान की राजनीति में एक बार फिर तख्तापलट की चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है। इसकी वजह बने हैं शहबाज शरीफ सरकार के गृह मंत्री मोहसिन नकवी, जिन्हें सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर का करीबी माना जाता है। नकवी ने सार्वजनिक रूप से देश की प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाते हुए दावा किया कि पाकिस्तान की संस्थाओं में वर्षों से गहरे स्तर पर भ्रष्टाचार व्याप्त है। उनके बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में नई बहस शुरू हो गई है। 21 साल पुराने कथित घोटाले का किया दावा मीडिया से बातचीत में मोहसिन नकवी ने कहा कि पाकिस्तान के इतिहास में शायद ही कभी इतना बड़ा घोटाला सामने आया हो। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 21 वर्षों से अवैध वित्तीय लेन-देन का सिलसिला चलता रहा और इसमें कई प्रभावशाली लोग शामिल रहे। नकवी ने कहा कि इस कथित घोटाले में न्यायपालिका, नौकरशाही, राजनेता और बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े लोग भी शामिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार इस मामले में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी। उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि पाकिस्तान के इतिहास में कभी इतना बड़ा घोटाला हुआ है, जिसमें जज, नौकरशाह, राजनेता और बैंकर सभी शामिल रहे हों। 21 सालों तक अवैध लेन-देन चलता रहा और लोग इसका लाभ उठाते रहे। अब हर जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।" हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह कथित घोटाला किस मामले से जुड़ा है और इसमें किन लोगों की भूमिका की जांच की जा रही है। बयान के बाद क्यों बढ़ीं तख्तापलट की चर्चाएं? मोहसिन नकवी का बयान ऐसे समय आया है, जब पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और संस्थागत टकराव का सामना कर रहा है। चूंकि नकवी को सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर का करीबी माना जाता है, इसलिए उनके इस बयान को लेकर कई तरह की राजनीतिक अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि, अब तक पाकिस्तान में सेना की ओर से किसी तख्तापलट या सत्ता परिवर्तन को लेकर कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है। इसलिए तख्तापलट की चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। पाकिस्तान में तख्तापलट का इतिहास पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में सेना कई बार सत्ता अपने हाथ में ले चुकी है। 1958: पहला सैन्य तख्तापलट राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा ने संविधान निलंबित कर मार्शल लॉ लागू किया। कुछ ही दिनों बाद जनरल अय्यूब खान ने इस्कंदर मिर्जा को सत्ता से हटाकर खुद देश की कमान संभाल ली। अय्यूब खान 1969 तक सत्ता में रहे। 1977: दूसरा तख्तापलट जनरल जिया-उल-हक ने प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार को हटाकर सत्ता पर कब्जा कर लिया। बाद में भुट्टो को गिरफ्तार किया गया और 1979 में उन्हें फांसी दे दी गई। जिया-उल-हक 1988 तक शासन करते रहे। 1999: तीसरा तख्तापलट कारगिल युद्ध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ के बीच टकराव बढ़ गया। सेना ने नवाज शरीफ की सरकार को हटाकर सत्ता अपने हाथ में ले ली। जनरल परवेज मुशर्रफ 2008 तक पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे। क्या फिर बदल सकती है पाकिस्तान की सियासत? मोहसिन नकवी के बयान ने पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था और सरकारी संस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, फिलहाल ऐसा कोई आधिकारिक संकेत नहीं है कि देश में सैन्य तख्तापलट की तैयारी चल रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में सरकार की कार्रवाई, जांच की दिशा और सेना का रुख यह तय करेगा कि पाकिस्तान की राजनीति किस ओर बढ़ती है।  

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