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Top Districts Dominate Bengal Cabinet Expansion

बंगाल मंत्रिमंडल में कोलकाता, पूर्व मेदिनीपुर और उत्तर 24 परगना का दबदबा, तीन जिलों को नहीं मिला प्रतिनिधित्व

Deepshikha जून 2, 2026 0
West Bengal Chief Minister and newly inducted ministers during cabinet expansion oath ceremony
West Bengal BJP Cabinet Expansion 2026

 

पश्चिम बंगाल में नवगठित भाजपा सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार के बाद राज्य की राजनीतिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की तस्वीर साफ हो गई है। सोमवार को आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में 35 विधायकों को मंत्री पद की शपथ दिलाई गई। इसके साथ ही मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की मंत्रिपरिषद में कुल 41 पद भर चुके हैं, जबकि तीन पद अभी खाली हैं।

जिलावार प्रतिनिधित्व के विश्लेषण से पता चलता है कि कोलकाता, पूर्व मेदिनीपुर और उत्तर 24 परगना को मंत्रिमंडल में सबसे अधिक स्थान मिला है। इन तीनों जिलों से चार-चार मंत्री बनाए गए हैं, जिससे सरकार में इन क्षेत्रों की भागीदारी सबसे ज्यादा हो गई है।

इन जिलों को मिला सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व

कोलकाता से मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी सहित चार नेताओं को मंत्रिमंडल में जगह मिली है। राजधानी होने के कारण प्रशासनिक और राजनीतिक दृष्टि से इस जिले को विशेष महत्व मिला है।

पूर्व मेदिनीपुर, जो मुख्यमंत्री का गृह जिला भी है, से चार नेताओं को मंत्री बनाया गया है। इनमें कैबिनेट और राज्य मंत्री दोनों स्तर के चेहरे शामिल हैं।

उत्तर 24 परगना से भी चार नेताओं को मंत्रिपरिषद में शामिल किया गया है। यह जिला राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से राज्य के सबसे प्रभावशाली क्षेत्रों में गिना जाता है।

कई जिलों को मिला संतुलित प्रतिनिधित्व

अलीपुरदुआर को तीन मंत्री पद मिले हैं। वहीं दक्षिण 24 परगना, बांकुड़ा, बीरभूम, कूचबिहार, पूर्व बर्धमान, पश्चिम बर्धमान, हुगली, झारग्राम, उत्तर दिनाजपुर, दार्जिलिंग और मुर्शिदाबाद से दो-दो नेताओं को मंत्रिमंडल में जगह दी गई है।

पश्चिम मेदिनीपुर, हावड़ा, पुरुलिया और मालदा को एक-एक मंत्री पद मिला है।

तीन जिलों को नहीं मिला मंत्रिमंडल में स्थान

मंत्रिमंडल विस्तार में नदिया, दक्षिण दिनाजपुर और कलिम्पोंग को कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। इन जिलों से भाजपा के विधायक होने के बावजूद किसी नेता को मंत्री नहीं बनाया गया।

राजनीतिक हलकों में इस फैसले को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। माना जा रहा है कि भविष्य में खाली पड़े पदों या संगठनात्मक जिम्मेदारियों के जरिए इन जिलों को संतुलित प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की जा सकती है।

अभी तीन पद खाली

294 सदस्यीय विधानसभा में नियमों के अनुसार मुख्यमंत्री सहित अधिकतम 44 मंत्री बनाए जा सकते हैं। वर्तमान में 41 पद भरे गए हैं। मंत्रिपरिषद में 13 कैबिनेट मंत्री, तीन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और 19 राज्य मंत्री शामिल हैं।

अब सभी की नजर विभागों के बंटवारे पर है। इससे यह स्पष्ट होगा कि सरकार के भीतर किस क्षेत्र और नेता को कितनी अहम जिम्मेदारी सौंपी जाती है।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Surbhi

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NEET Student Protest
NEET विवाद के बाद बिहार और असम में प्रदर्शनकारियों पर दर्ज केस वापस लेने की प्रक्रिया शुरू

नई दिल्ली, एजेंसियां। नीट-यूजी परीक्षा विवाद को लेकर हुए छात्र प्रदर्शनों के बाद बिहार और असम सरकार ने प्रदर्शनकारियों को बड़ी राहत देने का फैसला लिया है। दोनों राज्यों में आंदोलन के दौरान दर्ज एफआईआर और कानूनी कार्रवाई वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। सरकारों ने कहा है कि छात्रों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों की समीक्षा कर उन्हें वापस लिया जाएगा।   बिहार सरकार ने वापस लेने का किया ऐलान   बिहार सरकार ने नीट विवाद को लेकर हुए प्रदर्शनों में शामिल छात्रों और युवाओं के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने की घोषणा की है। सरकार के अनुसार, आंदोलन से जुड़े मामलों में दर्ज एफआईआर, शिकायत और अन्य कानूनी कार्रवाई को खत्म करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।   इसके साथ ही प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए कई युवाओं को रिहा करने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है। सरकार ने कहा है कि छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया गया है।   असम सरकार ने भी लिया फैसला   बिहार के बाद असम सरकार ने भी नीट प्रदर्शन से जुड़े मामलों में राहत देने का निर्णय लिया है। असम सरकार ने आंदोलन में शामिल प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने और भविष्य में इस मामले को लेकर नई कानूनी कार्रवाई नहीं करने का आश्वासन दिया है। इस फैसले को छात्रों के आंदोलन के बाद सरकार की ओर से उठाया गया महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।   छात्रों की मांगों के बाद आया फैसला   नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के आरोपों को लेकर देश के कई हिस्सों में छात्रों ने प्रदर्शन किया था। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, दोषियों पर कार्रवाई और छात्रों पर दर्ज मामलों को वापस लेना थी। छात्र संगठनों का कहना था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले कई युवाओं पर भी मामले दर्ज किए गए, जिससे उनके भविष्य पर असर पड़ सकता है।   राजनीतिक दबाव के बीच सरकार का कदम   नीट विवाद को लेकर विपक्षी दलों और छात्र संगठनों ने सरकार पर लगातार दबाव बनाया था। प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मामलों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे थे। अब बिहार और असम सरकार के इस फैसले के बाद छात्रों को राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि, परीक्षा में कथित गड़बड़ियों की जांच और सुधार की मांग अभी भी जारी है।   आगे की प्रक्रिया पर नजर   अब दोनों राज्यों में प्रशासनिक स्तर पर एफआईआर और अन्य मामलों की समीक्षा कर उन्हें वापस लेने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। छात्रों और अभिभावकों की नजर इस बात पर है कि कितने मामलों में कार्रवाई वापस ली जाती है और कितने युवाओं को राहत मिलती है।

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यूक्रेन में भारतीय जहाज MV OMORFI पर हमले के बाद विदेश मंत्रालय द्वारा यूक्रेनी राजदूत को तलब किए जाने की खबर
यूक्रेन में भारतीय नागरिकों वाले जहाज पर हमले के बाद भारत का कड़ा कदम, यूक्रेन के राजदूत को किया तलब

नई दिल्ली, एजेंसियां। यूक्रेन-रूस संघर्ष के बीच भारतीय नागरिकों वाले एक वाणिज्यिक जहाज पर हुए हमले के बाद भारत सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने यूक्रेन के भारत स्थित राजदूत डॉ. ओलेक्सांद्र पोलिशचुक को तलब कर इस घटना पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। मंत्रालय ने स्पष्ट कहा कि वाणिज्यिक जहाजों पर हमले निर्दोष नागरिक नाविकों की जान जोखिम में डालते हैं और वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए गंभीर खतरा हैं।   भारतीय नागरिक की मौत पर जताई गहरी चिंता   विदेश मंत्रालय के अनुसार, एमवी ओमोरफी (MV OMORFI) नामक वाणिज्यिक जहाज पर हुए हमले में एक भारतीय नागरिक की मौत हो गई। भारत ने इस घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाया जाना पूरी तरह अस्वीकार्य है। सरकार ने यूक्रेनी राजदूत से कहा कि वह भारत की गंभीर चिंता अपनी सरकार तक तत्काल पहुंचाएं।   समुद्री सुरक्षा और वैश्विक व्यापार पर चिंता   भारत ने जोर देकर कहा कि वाणिज्यिक जहाजों पर हमले केवल संबंधित देशों का मुद्दा नहीं हैं, बल्कि इससे समुद्री नौवहन की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होती है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि संघर्ष के दौरान नागरिक जहाजों और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सभी पक्षों की जिम्मेदारी है।   भारतीय नाविकों के लिए जारी की गई नई सलाह   घटना के बाद भारत सरकार ने भारतीय नाविकों को सलाह दी है कि वे ब्लैक सी (Black Sea) क्षेत्र में जाने वाले या वहां से गुजरने वाले जहाजों पर नौकरी स्वीकार करने से पहले सुरक्षा जोखिमों का पूरा आकलन करें। विदेश मंत्रालय ने कहा कि संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में काम करने वाले भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है और इस संबंध में आवश्यक कूटनीतिक प्रयास जारी रहेंगे।  

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उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन से सूखते जलस्रोत और प्रभावित पहाड़ी गांव
उत्तराखंड: जलवायु परिवर्तन की मार से हिमालय बेहाल, सूख रहे जलस्रोत और बढ़ रहा पलायन

देहरादून, एजेंसियां। के मध्य हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। बदलते मौसम ने न सिर्फ पर्यावरण को प्रभावित किया है, बल्कि पहाड़ों में रहने वाले लोगों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर भी गहरा असर डाला है।   सूख रहे पारंपरिक जलस्रोत, गहराता जल संकट   शोध के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण कई पारंपरिक जलस्रोत तेजी से सूख रहे हैं। भूमि के बंजर होने और वर्षा जल के जमीन में कम समाने से भूजल स्तर में गिरावट दर्ज की जा रही है, जिससे कई इलाकों में पानी की समस्या बढ़ रही है।   खेती और बागवानी पर पड़ा सीधा असर   बदलते तापमान और अनियमित मौसम के कारण कृषि और बागवानी उत्पादन में गिरावट आई है। कई पारंपरिक फसलें धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं, जबकि कुछ विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई हैं।   सेब और मोटे अनाज की खेती पर संकट   रिपोर्ट में बताया गया है कि जिन क्षेत्रों में पहले सेब और खट्टे फलों की खेती होती थी, वहां अब परिस्थितियां अनुकूल नहीं रह गई हैं। वहीं, मोटे अनाज की खेती में भी कमी आई है, जिससे खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है।   रोजगार की कमी से बढ़ा पलायन   कृषि संकट और रोजगार के सीमित अवसरों के कारण पहाड़ी इलाकों से पलायन तेज हुआ है। अध्ययन के मुताबिक, उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग पलायन कर चुके हैं और कई गांव वीरान हो गए हैं।   बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं बनी बड़ी चुनौती   जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा भी बढ़ रहा है। बदलते मौसम, अनियमित बारिश और आपदाओं की बढ़ती घटनाएं पहाड़ों के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।   विशेषज्ञों ने सतत विकास पर दिया जोर   विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों को बचाने के लिए जल संरक्षण, पर्यावरण अनुकूल खेती, स्थानीय रोजगार और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने वाली नीतियों पर तेजी से काम करने की जरूरत है।  

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