नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है। संसद ने सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को मंजूरी दे दी है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश समेत न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 34 से बढ़कर 38 हो जाएगी।
लोकसभा के बाद राज्यसभा ने भी बुधवार को विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया। यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या बढ़ाने के लिए लाया गया है। सरकार की ओर से इसे न्यायिक व्यवस्था की क्षमता बढ़ाने और लंबित मामलों के दबाव को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया है।
विधेयक के तहत मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 की जाएगी। मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने पर कुल स्वीकृत संख्या 38 होगी।
इस संशोधन के जरिए सुप्रीम कोर्ट में चार अतिरिक्त न्यायाधीशों के पद बढ़ेंगे। केंद्र सरकार ने इस वृद्धि का प्रमुख उद्देश्य अदालत की कार्यक्षमता बढ़ाना और मामलों के निपटारे में तेजी लाना बताया है।
सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश संख्या में इससे पहले वर्ष 2019 में बढ़ोतरी की गई थी। उस समय मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर स्वीकृत संख्या 30 से बढ़ाकर 33 की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के पीछे लंबित मामलों की बड़ी संख्या और न्यायिक कार्यभार को कम करना प्रमुख वजहों में शामिल है। सरकार का कहना है कि अतिरिक्त न्यायाधीशों से मामलों की सुनवाई और निपटारे की क्षमता बढ़ेगी तथा न्याय मिलने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सकेगी।
अब संसद से विधेयक पारित होने के बाद इसके लागू होने की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने पर सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृत न्यायाधीश क्षमता 38 हो जाएगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
रेलवे का बड़ा सुधार, कंटेनर ट्रेन ऑपरेटरों को मिलेगा सिंगल ऑल-इंडिया लाइसेंस नई दिल्ली, एजेंसियां। भारतीय रेलवे ने कंटेनर ट्रेन ऑपरेटरों के लिए लाइसेंस व्यवस्था को आसान बनाने की दिशा में बड़ा फैसला लिया है। अब कंटेनर ट्रेन ऑपरेटरों को देश के अलग-अलग रेल मार्गों पर परिचालन के लिए अलग-अलग लाइसेंस लेने की जरूरत नहीं होगी। एक सिंगल ऑल-इंडिया लाइसेंस के जरिए पूरे भारतीय रेल नेटवर्क पर कंटेनर ट्रेन चलाने की सुविधा मिलेगी। लाइसेंस व्यवस्था हुई आसान रेल मंत्रालय ने कंटेनर ट्रेन ऑपरेटरों को अनुमति देने से जुड़े मॉडल कंसेशन एग्रीमेंट (MCA) में संशोधन को मंजूरी दी है। इसका उद्देश्य लाइसेंस प्रक्रिया को सरल बनाना और निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देना है। नई व्यवस्था से कंटेनर ट्रेन संचालकों के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में कारोबार का विस्तार करना आसान होगा। इससे बार-बार अलग-अलग मार्गों के लिए अनुमति लेने की प्रक्रिया भी कम हो सकती है। पूरे देश में परिचालन की सुविधा सिंगल ऑल-इंडिया लाइसेंस के तहत पात्र कंटेनर ट्रेन ऑपरेटर भारतीय रेल नेटवर्क के सभी रेल मार्गों पर परिचालन कर सकेंगे। इससे लॉजिस्टिक्स और माल ढुलाई क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ने की उम्मीद है। रेलवे का यह कदम देश में माल परिवहन को अधिक सुगम और कुशल बनाने की व्यापक योजना का हिस्सा है। माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र को फायदा कंटेनर ट्रेनों के परिचालन में आसानी होने से सड़क और रेल के बीच माल ढुलाई के बेहतर संतुलन में मदद मिल सकती है। कंटेनर आधारित परिवहन बढ़ने से लंबी दूरी के माल परिवहन में रेलवे की भूमिका और मजबूत होने की उम्मीद है। रेलवे के इस सुधार से निजी कंटेनर ट्रेन ऑपरेटरों को नए मार्गों और बाजारों में विस्तार का अवसर मिलेगा। इससे आने वाले समय में रेल माल ढुलाई क्षमता बढ़ाने और लॉजिस्टिक्स लागत कम करने में मदद मिल सकती है। रेलवे के ‘रिफॉर्म एक्सप्रेस’ अभियान का हिस्सा यह फैसला भारतीय रेलवे में माल ढुलाई व्यवस्था को अधिक आधुनिक, प्रतिस्पर्धी और कारोबारी अनुकूल बनाने के लिए किए जा रहे सुधारों से जुड़ा है। सिंगल लाइसेंस व्यवस्था से कंटेनर ट्रेन संचालन की प्रक्रिया को सरल बनाने और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया है।
पीएम मोदी के वीडियो पर Meta CEO ने मांगी माफी, भारत सरकार की सख्ती के बाद लिया संज्ञान नई दिल्ली, एजेंसियां। सोशल मीडिया मंच फेसबुक पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक वीडियो को अस्थायी रूप से प्रतिबंधित किए जाने के मामले में मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग की ओर से भारत सरकार के सामने माफी मांगे जाने की खबर सामने आई है। कंपनी ने इस कार्रवाई को तकनीकी/ऑपरेशनल गलती से जुड़ा मामला बताया है। पीएम मोदी के वीडियो को लेकर हुआ विवाद मामला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक वीडियो से जुड़ा है, जिसे फेसबुक पर कुछ समय के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया था। इसके बाद भारत सरकार और मेटा के बीच इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज हो गई। सरकार ने सोशल मीडिया मंचों की सामग्री मॉडरेशन व्यवस्था और भारत में उनके दायित्वों को लेकर सवाल उठाए। इसके बाद मेटा की ओर से इस घटना पर स्पष्टीकरण दिया गया। सरकार ने मेटा से मांगा था जवाब इस मामले में भारत सरकार ने मेटा से स्पष्टीकरण मांगते हुए प्लेटफॉर्म पर सामग्री हटाने और प्रतिबंधित करने की प्रक्रिया को लेकर जवाब तलब किया था। सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों को भारत के कानूनों और नियमों का पालन करने की जरूरत पर भी जोर दिया। मामला केवल प्रधानमंत्री के वीडियो तक सीमित नहीं रहा। मेटा के प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM), डीपफेक और कंटेंट मॉडरेशन से जुड़े मुद्दों पर भी सरकार की ओर से चिंता जताई गई। सुरक्षित-पनाह प्रावधान पर भी दबाव मेटा के सामने भारत में उसके सेफ हार्बर दर्जे को लेकर भी सवाल उठे हैं। यह प्रावधान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को उपयोगकर्ताओं की ओर से पोस्ट की गई सामग्री के लिए कुछ कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है। सरकार की सख्ती के बीच मेटा की ओर से मामले को गंभीरता से लेने और हुई गलती के लिए माफी मांगने की बात सामने आई है। अब सरकार की ओर से कंपनी के अगले कदम और कंटेंट मॉडरेशन व्यवस्था में किए जाने वाले सुधारों पर नजर रहेगी। भारत में मेटा की नीतियों पर बढ़ी निगरानी इस घटनाक्रम के बाद भारत में मेटा के फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्मों पर सामग्री मॉडरेशन को लेकर निगरानी और बढ़ सकती है। सरकार खासतौर पर आपत्तिजनक सामग्री, डीपफेक और बच्चों से संबंधित अवैध सामग्री के खिलाफ प्लेटफॉर्म की कार्रवाई को लेकर जवाबदेही तय करना चाहती है। मेटा की ओर से माफी के बाद विवाद को सुलझाने की दिशा में कदम जरूर बढ़ा है, लेकिन प्लेटफॉर्म की नीतियों और भारत के कानूनों के अनुपालन को लेकर आगे भी सरकार की निगरानी जारी रहने की संभावना है।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल में ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की है। निर्धारित ध्वनि सीमा का उल्लंघन करने वाले धार्मिक स्थलों पर अभियान चलाकर पिछले दो दिनों में करीब 1,500 लाउडस्पीकर हटाए गए। कार्रवाई में 1,279 मस्जिदों और 199 मंदिरों से लाउडस्पीकर हटाए जाने की जानकारी सामने आई है। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई पुलिस के निर्देश पर यह अभियान उन धार्मिक स्थलों के खिलाफ चलाया गया, जहां लाउडस्पीकर निर्धारित ध्वनि सीमा से अधिक आवाज में चलाए जा रहे थे। प्रशासन का कहना है कि धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर के इस्तेमाल के लिए संबंधित नियमों का पालन और आवश्यक अनुमति जरूरी है। उत्तर बंगाल में सबसे ज्यादा कार्रवाई रिपोर्ट के अनुसार, कार्रवाई का सबसे बड़ा हिस्सा उत्तर बंगाल में हुआ। वहां 1,238 मस्जिदों और 117 मंदिरों से लाउडस्पीकर हटाए गए। पुलिस ने ध्वनि प्रदूषण की शिकायतों और निर्धारित मानकों के उल्लंघन को कार्रवाई का आधार बनाया है। सभी समुदायों पर नियम समान रूप से लागू पुलिस की कार्रवाई में मंदिर और मस्जिद दोनों को शामिल किया गया है। प्रशासन का जोर धार्मिक पहचान के बजाय ध्वनि प्रदूषण के नियमों के पालन पर है। अधिकारियों के अनुसार, जिन स्थानों पर निर्धारित सीमा और अनुमति संबंधी नियमों का उल्लंघन पाया गया, वहां कार्रवाई की गई। ध्वनि सीमा और समय का पालन जरूरी पश्चिम बंगाल में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को लेकर ध्वनि सीमा और समय संबंधी नियम पहले से लागू हैं। सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार लाउडस्पीकर का इस्तेमाल निर्धारित ध्वनि मानकों के भीतर होना चाहिए और रात के समय भी प्रतिबंधों का पालन करना होता है। पुलिस की ताजा कार्रवाई से साफ है कि राज्य में ध्वनि प्रदूषण को लेकर प्रशासन अब नियमों का उल्लंघन करने वाले धार्मिक और अन्य प्रतिष्ठानों पर सख्ती बढ़ा रहा है।