राजनीति

अभिषेक बनर्जी के खिलाफ कल्याण बनर्जी का बगावती तेवर

abhishek singh जून 11, 2026 0
Kalyan Banerjee Abhishek Banerjee
Kalyan Banerjee Abhishek Banerjee

कोलकाता, एजेंसियां। कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर मतभेद उस समय खुलकर सामने आ गए जब पार्टी के वरिष्ठ सांसद और जाने-माने वकील कल्याण बनर्जी ने सांसद अभिषेक बनर्जी के किसी भी कानूनी मामले की पैरवी करने से इनकार कर दिया। कल्याण बनर्जी ने आरोप लगाया कि अभिषेक बनर्जी का व्यवहार अत्यधिक घमंडी है और इसी कारण उन्होंने उनसे जुड़े सभी मामलों से खुद को अलग करने का फैसला किया है।

 

मामला उस याचिका से जुड़ा है जिसमें अभिषेक बनर्जी ने पश्चिम बंगाल पुलिस की सीआईडी द्वारा भेजे गए समन को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी है। यह समन विधायकों के हस्ताक्षर मिलान (सिग्नेचर मिसमैच) मामले से संबंधित बताया जा रहा है। साथ ही याचिका में गिरफ्तारी या किसी भी प्रकार की जबरन कार्रवाई से अंतरिम राहत की मांग की गई है। गुरुवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान अभिषेक की ओर से वकील अयान भट्टाचार्य अदालत में पेश हुए।

 

कल्याण बनर्जी ने मीडिया से बातचीत में कहा


कल्याण बनर्जी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्होंने न केवल इस मामले बल्कि भविष्य में भी अभिषेक बनर्जी के किसी कानूनी प्रकरण में शामिल न होने का निर्णय लिया है। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने स्वयं अदालत में मामले की तत्काल सुनवाई की मांग की थी, जिसके बाद सुनवाई की तारीख तय हुई। लेकिन बाद में उन्हें जानकारी मिली कि उनकी जगह किसी अन्य वकील को नियुक्त किया गया है।

 

वरिष्ठ सांसद ने यह भी आरोप लगाया


वरिष्ठ सांसद ने यह भी आरोप लगाया कि हालिया विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारणों में अभिषेक बनर्जी की भूमिका रही है, फिर भी उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया। कल्याण बनर्जी ने कहा कि वह मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी से इस मुद्दे पर स्पष्ट निर्णय लेने का आग्रह करेंगे।

 

उन्होंने कहा कि चार दशक से अधिक समय से कानूनी पेशे में रहने के बाद वह किसी भी प्रकार के अपमानजनक या अहंकारी व्यवहार को स्वीकार नहीं करेंगे। इस बयान के बाद टीएमसी के भीतर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है और पार्टी नेतृत्व की प्रतिक्रिया पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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बंगाल में ‘सुरक्षा’ पर संग्राम! ममता बनर्जी के पसंदीदा बॉडीगार्ड हटाने पर टीएमसी-भाजपा आमने-सामने, डेरेक बोले- रातभर बिना सुरक्षा रहीं दीदी

  पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री Mamata Banerjee की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर राज्य की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने आरोप लगाया है कि नई भाजपा सरकार ने ममता बनर्जी की सुरक्षा में वर्षों से तैनात अधिकारियों को हटाकर उनकी सुरक्षा से खिलवाड़ किया है। वहीं, मुख्यमंत्री Suvendu Adhikari ने स्पष्ट कर दिया है कि पूर्व मुख्यमंत्री को अपनी पसंद के सुरक्षा अधिकारी चुनने का अधिकार नहीं है और सुरक्षा तैनाती का फैसला पुलिस प्रशासन करेगा। क्या है पूरा विवाद? 2026 के विधानसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन के बाद ममता बनर्जी की सुरक्षा में तैनात कुछ पुराने सुरक्षा अधिकारियों को हटाकर नए अधिकारियों की नियुक्ति की गई है। टीएमसी का दावा है कि ये अधिकारी कई वर्षों से, यहां तक कि ममता बनर्जी के रेल मंत्री रहने के समय से उनकी सुरक्षा में तैनात थे। ममता बनर्जी के करीबी नेताओं ने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात कर पुराने अधिकारियों को वापस तैनात करने की मांग की, लेकिन सरकार ने इस मांग को खारिज कर दिया। टीएमसी का आरोप- ‘राजनीतिक प्रतिशोध का नया निचला स्तर’ All India Trinamool Congress (AITC) की आधिकारिक वेबसाइट से जुड़े नेताओं ने इस कदम को ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ करार दिया है। टीएमसी ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि: “ममता बनर्जी की सुरक्षा में लंबे समय से तैनात कर्मियों को हटाना कोई प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि उन्हें अलग-थलग करने और खतरे में डालने की सोची-समझी कोशिश है।” पार्टी ने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी पर निशाना साधते हुए कहा कि यह कदम ‘बदले की राजनीति’ और ‘सत्ता के दुरुपयोग’ का उदाहरण है। डेरेक ओब्रायन का दावा- रातभर नहीं था कोई सुरक्षाकर्मी Derek O'Brien ने दावा किया कि ममता बनर्जी के कोलकाता स्थित कालीघाट आवास से लंबे समय से तैनात निजी सुरक्षा अधिकारियों (PSO) को हटा दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि: “बुधवार रात ममता बनर्जी के घर के बाहर कोई सुरक्षाकर्मी तैनात नहीं था।” डेरेक ने इसे पूर्व मुख्यमंत्री की सुरक्षा के साथ गंभीर लापरवाही बताया। सागरिका घोष ने उठाए सवाल टीएमसी की राज्यसभा सांसद Sagarika Ghose ने भी सरकार पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि: पूर्व मुख्यमंत्री की सुरक्षा राजनीति का विषय नहीं है। यह राज्य सरकार की संस्थागत जिम्मेदारी है। अचानक सुरक्षा अधिकारियों को हटाने का कारण स्पष्ट किया जाना चाहिए। यदि ममता बनर्जी को देर रात बिना सुरक्षा छोड़ा गया, तो यह बेहद गंभीर मामला है। शुभेंदु सरकार का रुख क्या है? मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का कहना है कि: सुरक्षा अधिकारियों की तैनाती पुलिस प्रशासन का अधिकार है। किसी भी पूर्व मुख्यमंत्री को अपनी पसंद के अधिकारियों की मांग करने का विशेष अधिकार नहीं है। सुरक्षा व्यवस्था पेशेवर और प्रशासनिक मानकों के आधार पर तय की जाएगी। ममता बनर्जी को किस स्तर की सुरक्षा प्राप्त है? ममता बनर्जी को वर्तमान में ‘जेड श्रेणी (Z Category) सुरक्षा’ प्राप्त है। इस श्रेणी में प्रशिक्षित सुरक्षा कर्मियों की एक बड़ी टीम, व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारी (PSO) और अन्य सुरक्षा प्रबंध शामिल होते हैं। राजनीतिक महत्व यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद टीएमसी और भाजपा के बीच राजनीतिक तनाव लगातार बढ़ रहा है। ममता बनर्जी की सुरक्षा को लेकर उठा यह विवाद राज्य की राजनीति में एक नए टकराव का केंद्र बन गया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार इस मामले पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी करती है या नहीं, और क्या टीएमसी इस मुद्दे को राजनीतिक और कानूनी स्तर पर आगे बढ़ाती है।  

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  अयोध्या से समाजवादी पार्टी के सांसद अवधेश प्रसाद ने उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बयान पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि भाजपा को आगामी विधानसभा चुनाव में हार का डर अभी से सताने लगा है, इसलिए उसके नेता अनर्गल और बेतुकी बातें कर रहे हैं। 'सपा का कोई सांसद बीजेपी के संपर्क में नहीं' दरअसल, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने दावा किया था कि समाजवादी पार्टी के कई सांसद भाजपा के संपर्क में हैं और पार्टी में शामिल होना चाहते हैं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अवधेश प्रसाद ने कहा कि समाजवादी पार्टी का एक भी सांसद भाजपा में जाने का इच्छुक नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा राम मंदिर के चढ़ावे में कथित चोरी के मुद्दे से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए ऐसे बयान दे रही है। 'अखिलेश यादव की लोकप्रियता से घबराई बीजेपी' सपा सांसद ने कहा कि पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव की बढ़ती लोकप्रियता और समाजवादी पार्टी के प्रति जनता के बढ़ते भरोसे को देखकर भाजपा घबरा गई है। उन्होंने दावा किया कि विधानसभा चुनाव में संभावित हार की आशंका से भाजपा के नेता बौखलाहट में बयानबाजी कर रहे हैं। राम मंदिर मामले की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग अवधेश प्रसाद ने कहा कि राम मंदिर से जुड़ा कथित चढ़ावा चोरी का मामला करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा हुआ है। उन्होंने मांग की कि इस मामले में गठित एसआईटी की जांच रिपोर्ट जनता के सामने लाई जानी चाहिए, ताकि सच्चाई सामने आ सके। उन्होंने कहा कि आस्था से जुड़े मामलों में पारदर्शिता जरूरी है और सरकार को जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए।  

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रांची। झारखंड में राज्यसभा चुनाव के लिए मतदान जारी है। इसी बीच डुमरी विधायक जयराम महतो के एक बयान ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। मतदान के दौरान मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि राज्यसभा में वही व्यक्ति जाना चाहिए, जो दिल्ली में झारखंड के हितों की प्रभावी ढंग से पैरवी कर सके और राज्य के विकास से जुड़े कार्यों को आगे बढ़ा सके। जयराम महतो ने कहा कि राज्यसभा सांसद की जिम्मेदारी केवल सदन में उपस्थिति दर्ज कराना नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के समक्ष राज्य के मुद्दों को मजबूती से उठाना और विकास परियोजनाओं के लिए आवश्यक सहयोग सुनिश्चित करना भी है। उन्होंने कहा कि जनता ऐसे प्रतिनिधि की अपेक्षा करती है जो केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि परिणाम देने के लिए काम करे।   बयान से बढ़ी राजनीतिक सरगर्मी जयराम महतो के इस बयान के बाद राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल और तेज हो गई है। चुनावी माहौल पहले से ही गर्म है और विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने उम्मीदवारों के पक्ष में समर्थन जुटाने में लगे हैं। ऐसे समय में हर विधायक का वोट महत्वपूर्ण माना जा रहा है और नेताओं के बयान भी राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करने वाले माने जा रहे हैं। राज्यसभा चुनाव के नतीजों पर सभी दलों की नजर टिकी हुई है, जबकि राजनीतिक विश्लेषक इसे राज्य की बदलती सियासी दिशा के लिहाज से भी अहम मान रहे हैं।

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