राजनीति

राजद ने कांग्रेस पर साधा निशाना, कहा- पहले अपने विधायकों को संभालें फिर दूसरों पर आरोप लगाएं

abhishek singh जून 19, 2026 0
RJD Tejashwi Yadav
Tejashwi Yadav

रांची। झारखंड राज्यसभा चुनाव के नतीजों के बाद महागठबंधन के भीतर तनाव बढ़ गया है। कांग्रेस उम्मीदवार की हार के बाद लगाए गए क्रॉस वोटिंग के आरोपों पर अब राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने कड़ा पलटवार किया है। चुनाव में एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार की जीत और महागठबंधन की हार के बाद गठबंधन में बयानबाजी तेज हो गई है।

 

कांग्रेस की ओर से आरोप लगाया गया था कि राजद और भाकपा (माले) के कुछ विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए राजद ने कांग्रेस पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

राजद का बयान: हार का ठीकरा दूसरों पर फोड़ा जा रहा है


राजद ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि कांग्रेस अपने ही विधायकों का समर्थन सुनिश्चित करने में असफल रही और अब दूसरों पर आरोप लगा रही है। पार्टी ने कहा कि पहले कांग्रेस को आत्ममंथन करना चाहिए और अपनी संगठनात्मक कमजोरियों पर ध्यान देना चाहिए।


राजद ने यह भी दावा किया कि इससे पहले हरियाणा, ओडिशा और बिहार जैसे राज्यों में भी कांग्रेस के कई विधायकों ने क्रॉस वोटिंग या मतदान से दूरी बनाई थी, लेकिन उन मामलों में पार्टी ने कोई गंभीर कार्रवाई नहीं की।

 

INDIA गठबंधन की एकजुटता पर सवाल


राजद ने अपने बयान में कहा कि इस तरह के सार्वजनिक आरोप INDIA गठबंधन की एकजुटता को नुकसान पहुंचा सकते हैं। पार्टी ने कांग्रेस नेताओं से संयम बरतने और गठबंधन धर्म का पालन करने की सलाह दी।


राजद ने यह भी कहा कि अन्य राज्यों में हुई घटनाओं के बावजूद सहयोगी दलों ने कभी कांग्रेस पर सार्वजनिक रूप से हमला नहीं किया, लेकिन झारखंड में स्थिति अलग दिखाई दे रही है।

 

राज्यसभा चुनाव के बाद शुरू हुई यह बयानबाजी अब झारखंड की राजनीति में नया विवाद बन गई है और महागठबंधन के भीतर मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं।

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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बांकीपुर में BJP की हार से बदलेगी रणनीति? प्रशांत किशोर की जीत ने बिहार की राजनीति को दिए नए संकेत

Bankipur Bypoll Result: बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। लंबे समय से बीजेपी का मजबूत गढ़ मानी जाने वाली इस सीट पर जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर की जीत ने न सिर्फ उन्हें एक मजबूत राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित किया है, बल्कि बीजेपी की चुनावी रणनीति पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह परिणाम आगामी विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के लिए चेतावनी भी है और आत्ममंथन का अवसर भी। बीजेपी के गढ़ में कैसे मिली प्रशांत किशोर को जीत? बांकीपुर उन शहरी सीटों में शामिल रही है, जहां बीजेपी वर्षों से मजबूत स्थिति में रही है। लेकिन इस उपचुनाव में प्रशांत किशोर ने लगातार जनसंपर्क, स्थानीय मुद्दों और बदलाव की राजनीति को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ा। उन्होंने महीनों तक लोगों के बीच जाकर शिक्षा, रोजगार, ट्रैफिक, बुनियादी सुविधाओं और युवाओं से जुड़े मुद्दों को उठाया, जबकि बीजेपी का प्रचार अपेक्षाकृत पारंपरिक और सीमित नजर आया। 'बदलाव' के संदेश ने किया असर जन सुराज ने चुनाव को केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं, बल्कि बदलाव के अभियान के रूप में पेश किया। प्रशांत किशोर ने खुद लोगों से संवाद किया और स्थानीय समस्याओं को चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाया। दूसरी ओर, बीजेपी अपने पुराने संगठनात्मक ढांचे और पारंपरिक वोट बैंक पर अधिक निर्भर दिखाई दी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उम्मीदवार बदलने का फैसला भी बीजेपी के लिए नुकसानदायक साबित हुआ। विपक्ष ने इसे पार्टी की घबराहट और अंदरूनी असंतोष के तौर पर प्रचारित किया, जिसका असर मतदाताओं पर भी पड़ा। पारंपरिक वोट बैंक में सेंध बांकीपुर में सवर्ण मतदाताओं की बड़ी संख्या है और यह वर्ग लंबे समय से बीजेपी का मजबूत समर्थक माना जाता रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में पेपर लीक, रोजगार, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और युवाओं से जुड़े मुद्दों ने शहरी और मध्यम वर्ग के मतदाताओं में नाराजगी बढ़ाई है। विश्लेषकों का मानना है कि जन सुराज ने इसी असंतोष को चुनावी समर्थन में बदलने में सफलता हासिल की। इसका असर बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक पर भी देखने को मिला। शहरी मतदाताओं ने दिया स्पष्ट संदेश बांकीपुर जैसे शहरी क्षेत्रों में मतदाता जातीय समीकरणों के साथ-साथ विकास, रोजगार, ट्रैफिक, शिक्षा और बेहतर नागरिक सुविधाओं जैसे मुद्दों को भी प्राथमिकता देते हैं। इस उपचुनाव के नतीजे संकेत देते हैं कि शहरी मतदाता अब केवल राजनीतिक परंपरा या पुराने समीकरणों के आधार पर वोट देने के बजाय प्रदर्शन और स्थानीय मुद्दों को अधिक महत्व दे रहे हैं। क्या बदलेगी बीजेपी की रणनीति? इस हार के बाद माना जा रहा है कि बीजेपी बिहार में अपनी चुनावी रणनीति की समीक्षा कर सकती है। पार्टी को संगठन के साथ-साथ बूथ स्तर पर सक्रियता बढ़ाने, युवाओं से जुड़े मुद्दों पर अधिक फोकस करने और शहरी मतदाताओं की अपेक्षाओं के अनुरूप राजनीतिक संदेश तैयार करने की जरूरत महसूस हो सकती है। बिहार की राजनीति को मिला नया संकेत बांकीपुर उपचुनाव का परिणाम सिर्फ एक सीट की हार-जीत नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बिहार की बदलती राजनीतिक सोच का संकेत भी माना जा रहा है। इस जीत ने प्रशांत किशोर और जन सुराज को राज्य की राजनीति में नई मजबूती दी है, वहीं बीजेपी के सामने यह चुनौती खड़ी कर दी है कि वह अपने पारंपरिक गढ़ों में भी मतदाताओं का भरोसा कैसे बनाए रखे। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले यह उपचुनाव सभी राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण संदेश लेकर आया है।  

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Sakshi Maharaj on Rahul Gandhi: भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सांसद साक्षी महाराज ने कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को लेकर विवादित बयान दिया है। उन्होंने राहुल गांधी की नागरिकता और उनकी मां सोनिया गांधी के विदेशी मूल का जिक्र करते हुए कहा कि "विदेशी महिला से पैदा हुआ बालक कभी राष्ट्रभक्त नहीं हो सकता और उसे देश की बागडोर नहीं दी जा सकती।" उनके इस बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और इसे लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। 'विदेशी मूल' को लेकर की टिप्पणी साक्षी महाराज ने अपने बयान में राहुल गांधी की मां सोनिया गांधी के विदेशी मूल का उल्लेख करते हुए कहा कि विदेशी महिला से जन्मा व्यक्ति देश का सच्चा राष्ट्रभक्त नहीं हो सकता। उन्होंने शायराना अंदाज में कहा, "दिल बहलाने के लिए गालिब ये ख्याल अच्छा है," और राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की चर्चाओं को केवल कल्पना बताया। उन्होंने कहा कि देश का नेतृत्व ऐसे व्यक्ति के हाथों में नहीं होना चाहिए, जिसकी पृष्ठभूमि पर सवाल उठते हों। हालांकि, उन्होंने अपने बयान के समर्थन में कोई कानूनी या संवैधानिक आधार प्रस्तुत नहीं किया। सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो साक्षी महाराज का यह बयान सामने आने के बाद इसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। कई लोगों ने इस टिप्पणी का समर्थन किया, जबकि विपक्षी नेताओं और सोशल मीडिया यूजर्स के एक वर्ग ने इसे व्यक्तिगत और आपत्तिजनक टिप्पणी बताते हुए आलोचना की। राजनीतिक माहौल हुआ गर्म बीजेपी सांसद के इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। कांग्रेस और बीजेपी के बीच पहले से जारी राजनीतिक टकराव के बीच इस बयान ने सियासी माहौल को और गर्म कर दिया है। फिलहाल कांग्रेस की ओर से इस बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयान आने वाले समय में दोनों दलों के बीच जुबानी जंग को और तेज कर सकते हैं। पहले भी विवादों में रहे हैं साक्षी महाराज यह पहली बार नहीं है जब साक्षी महाराज अपने बयानों को लेकर चर्चा में आए हों। इससे पहले भी वे कई बार अपने विवादित और तीखे राजनीतिक बयानों के कारण सुर्खियों में रह चुके हैं। इस बार राहुल गांधी और उनके परिवार को लेकर की गई टिप्पणी ने एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है।  

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नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद के मानसून सत्र के दौरान पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव शुक्रवार को विपक्ष के सांकेतिक प्रदर्शन में पुजारी के वेश में नजर आए। प्रदर्शन के दौरान राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़े कथित चोरी के मुद्दे को लेकर विरोध जताया गया। इस दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत विपक्षी सांसदों की मौजूदगी में सांकेतिक तौर पर दान पात्र भी रखा गया। घटना के बाद पप्पू यादव को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है।   संसद परिसर में पुजारी के वेश में नजर आए पप्पू यादव   नई दिल्ली स्थित संसद परिसर में विपक्षी सांसदों के प्रदर्शन के दौरान पप्पू यादव ने पुजारी का रूप धारण किया। प्रदर्शन का उद्देश्य राम मंदिर में चढ़ावे और उससे जुड़े कथित अनियमितताओं के मुद्दे को उठाना था। इस दौरान विपक्ष की ओर से केंद्र सरकार पर भी सवाल उठाए गए।   राहुल गांधी ने दान पात्र में डाले पैसे   प्रदर्शन के दौरान एक दान पात्र रखा गया था, जिसमें राहुल गांधी ने पैसे डाले। विपक्ष की ओर से इस प्रदर्शन को राम मंदिर से जुड़े चढ़ावे के मुद्दे पर सरकार और संबंधित संस्थाओं से जवाब मांगने के प्रतीकात्मक तरीके के तौर पर पेश किया गया।   पप्पू यादव के खिलाफ दिल्ली में शिकायत   इस प्रदर्शन के बाद पप्पू यादव के खिलाफ दिल्ली के जहांगीरपुरी थाने में शिकायत दर्ज किए जाने की खबर सामने आई है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि संसद में पुजारी का वेश धारण करने से धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। मामले को लेकर राजनीतिक और धार्मिक स्तर पर विवाद शुरू हो गया है।   बीजेपी ने प्रदर्शन को बताया राजनीतिक स्टंट   बीजेपी की ओर से भी पप्पू यादव के प्रदर्शन पर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने पप्पू यादव और राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए इसे हिंदुत्व और साधु-संतों के अपमान से जोड़कर आलोचना की है। इस घटनाक्रम के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बयानबाजी तेज हो गई है।    

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