ग्लासगो, एजेंसियां। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय जूडो ने इतिहास रच दिया है। अस्मिता डे और हर्ष सिंह ने अपने-अपने भार वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर भारत को जूडो में पहली बार दो गोल्ड मेडल दिलाए। अस्मिता ने महिलाओं के 48 किलोग्राम और हर्ष ने पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में खिताब अपने नाम किया।
अस्मिता डे ने महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग के फाइनल में कनाडा की हेइडी क्वाच को हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। मुकाबला निर्धारित समय के बाद बराबरी पर रहा, जिसके बाद गोल्ड मेडल का फैसला गोल्डन स्कोर में हुआ। अस्मिता ने निर्णायक अंक हासिल करते हुए भारत को जूडो में कॉमनवेल्थ गेम्स का पहला स्वर्ण दिलाया।
अस्मिता के बाद हर्ष सिंह ने पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में भारत के लिए दूसरा स्वर्ण पदक जीता। फाइनल में हर्ष का सामना ऑस्ट्रेलिया के जोशुआ कैट्ज से हुआ। भारतीय खिलाड़ी ने मुकाबले में दमदार प्रदर्शन करते हुए 10-0 से जीत दर्ज की और जूडो में भारत के लिए ऐतिहासिक दोहरा स्वर्ण पूरा किया।
अस्मिता और हर्ष की उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि इससे पहले कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत ने जूडो में स्वर्ण पदक नहीं जीता था। एक ही दिन महिला और पुरुष वर्ग में दो गोल्ड जीतना भारतीय जूडो के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बन गई है। दोनों खिलाड़ियों के प्रदर्शन से ग्लासगो में भारतीय दल के पदक अभियान को भी बड़ी मजबूती मिली है।
जूडो में अस्मिता डे और हर्ष सिंह के स्वर्ण पदकों ने ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के प्रदर्शन को नई ऊंचाई दी है। भारतीय खिलाड़ियों से प्रतियोगिता के बाकी दिनों में भी कई स्पर्धाओं में पदक की उम्मीद बनी हुई है। जूडो के इस ऐतिहासिक प्रदर्शन से देश में इस खेल को लेकर नई रुचि और युवा खिलाड़ियों को प्रेरणा मिलने की उम्मीद है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
ग्लासगो, एजेंसियां। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय जूडो ने इतिहास रच दिया है। अस्मिता डे और हर्ष सिंह ने अपने-अपने भार वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर भारत को जूडो में पहली बार दो गोल्ड मेडल दिलाए। अस्मिता ने महिलाओं के 48 किलोग्राम और हर्ष ने पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में खिताब अपने नाम किया। अस्मिता डे ने 48 किग्रा वर्ग में रचा इतिहास अस्मिता डे ने महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग के फाइनल में कनाडा की हेइडी क्वाच को हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। मुकाबला निर्धारित समय के बाद बराबरी पर रहा, जिसके बाद गोल्ड मेडल का फैसला गोल्डन स्कोर में हुआ। अस्मिता ने निर्णायक अंक हासिल करते हुए भारत को जूडो में कॉमनवेल्थ गेम्स का पहला स्वर्ण दिलाया। हर्ष सिंह ने 60 किग्रा वर्ग में किया शानदार प्रदर्शन अस्मिता के बाद हर्ष सिंह ने पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में भारत के लिए दूसरा स्वर्ण पदक जीता। फाइनल में हर्ष का सामना ऑस्ट्रेलिया के जोशुआ कैट्ज से हुआ। भारतीय खिलाड़ी ने मुकाबले में दमदार प्रदर्शन करते हुए 10-0 से जीत दर्ज की और जूडो में भारत के लिए ऐतिहासिक दोहरा स्वर्ण पूरा किया। कॉमनवेल्थ गेम्स में भारतीय जूडो का नया अध्याय अस्मिता और हर्ष की उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि इससे पहले कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत ने जूडो में स्वर्ण पदक नहीं जीता था। एक ही दिन महिला और पुरुष वर्ग में दो गोल्ड जीतना भारतीय जूडो के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बन गई है। दोनों खिलाड़ियों के प्रदर्शन से ग्लासगो में भारतीय दल के पदक अभियान को भी बड़ी मजबूती मिली है। दोनों स्वर्ण पदकों से भारत का पदक अभियान मजबूत जूडो में अस्मिता डे और हर्ष सिंह के स्वर्ण पदकों ने ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के प्रदर्शन को नई ऊंचाई दी है। भारतीय खिलाड़ियों से प्रतियोगिता के बाकी दिनों में भी कई स्पर्धाओं में पदक की उम्मीद बनी हुई है। जूडो के इस ऐतिहासिक प्रदर्शन से देश में इस खेल को लेकर नई रुचि और युवा खिलाड़ियों को प्रेरणा मिलने की उम्मीद है।
Neeraj Chopra: भारतीय एथलेटिक्स के सबसे बड़े सितारों में शामिल नीरज चोपड़ा ने पिछले एक दशक में जेवलिन थ्रो की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है। जूनियर स्तर से लेकर ओलंपिक, विश्व चैंपियनशिप, एशियन गेम्स और कॉमनवेल्थ गेम्स तक नीरज ने लगभग हर बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन किया है। हाल ही में ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भी नीरज ने शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने 85.83 मीटर का सीजन बेस्ट थ्रो करते हुए सिल्वर मेडल जीता। इसके साथ ही उनके अंतरराष्ट्रीय पदकों की सूची में एक और बड़ी उपलब्धि जुड़ गई। 13 बड़े अंतरराष्ट्रीय इवेंट्स में पदक उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, नीरज चोपड़ा अब तक कुल 13 बड़े अंतरराष्ट्रीय इवेंट्स में पदक जीत चुके हैं। इन प्रतियोगिताओं में दो ओलंपिक, दो विश्व चैंपियनशिप, एक डायमंड लीग फाइनल, दो कॉमनवेल्थ गेम्स, दो एशियन गेम्स, एक एशियन चैंपियनशिप, एक साउथ एशियन गेम्स, एक अंडर-20 विश्व चैंपियनशिप और एक अंडर-20 एशियन चैंपियनशिप शामिल हैं। इन उपलब्धियों के आधार पर नीरज ने 9 गोल्ड और 3 सिल्वर मेडल अपने नाम किए हैं, जबकि डायमंड लीग फाइनल में भी उन्होंने पहला स्थान हासिल किया है। यही निरंतरता उन्हें भारत के सबसे सफल मौजूदा एथलीटों में शामिल करती है। 2016 में शुरू हुआ अंतरराष्ट्रीय सफर नीरज चोपड़ा के बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में पदक जीतने का सिलसिला साल 2016 से शुरू हुआ। इसी साल उन्होंने अंडर-20 विश्व चैंपियनशिप में 86.48 मीटर का शानदार थ्रो करते हुए गोल्ड मेडल जीता। इसके बाद 2016 साउथ एशियन गेम्स में उन्होंने 82.23 मीटर के थ्रो के साथ स्वर्ण पदक हासिल किया। 2017 एशियन चैंपियनशिप में 85.23 मीटर के प्रदर्शन के साथ उन्होंने एक और गोल्ड अपने नाम किया। हालांकि उनके करियर में सबसे बड़ा मोड़ टोक्यो ओलंपिक 2020 में आया, जहां नीरज ने 87.58 मीटर का थ्रो करते हुए गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। ओलंपिक में गोल्ड और सिल्वर ओलंपिक जैसे सबसे बड़े खेल मंच पर नीरज की उपलब्धियां भारतीय एथलेटिक्स के लिए ऐतिहासिक रही हैं। उनके नाम 1 गोल्ड और 1 सिल्वर मेडल है। टोक्यो ओलंपिक में गोल्ड जीतने के बाद नीरज ने ओलंपिक स्तर पर भारत की उम्मीदों को और मजबूत किया। इसके बाद उन्होंने सिल्वर मेडल के साथ अपनी पदक सूची को और समृद्ध किया। विश्व चैंपियनशिप में भी शानदार रिकॉर्ड विश्व चैंपियनशिप में भी नीरज चोपड़ा ने भारत को बड़ी सफलता दिलाई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, उन्होंने इस प्रतियोगिता में 1 गोल्ड और 1 सिल्वर मेडल जीता है। विश्व स्तर की इस प्रतियोगिता में लगातार पदक जीतना उनके शानदार प्रदर्शन और लंबे समय तक शीर्ष स्तर पर बने रहने की क्षमता को दर्शाता है। Asian Games में दो गोल्ड एशियन गेम्स में नीरज का रिकॉर्ड और भी शानदार है। उन्होंने इस प्रतियोगिता में 2 गोल्ड मेडल जीते हैं। एशिया के सबसे बड़े मल्टी-स्पोर्ट इवेंट में नीरज का दबदबा यह बताता है कि वह सिर्फ वैश्विक स्तर पर ही नहीं, बल्कि महाद्वीपीय स्तर पर भी लंबे समय से अपनी श्रेष्ठता कायम रखने में सफल रहे हैं। Commonwealth Games में भी गोल्ड और सिल्वर कॉमनवेल्थ गेम्स में नीरज चोपड़ा के नाम 1 गोल्ड और 1 सिल्वर है। हालांकि, 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स में उनसे गोल्ड की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन इस बार उन्हें सिल्वर से संतोष करना पड़ा। ग्लासगो में नीरज ने 85.83 मीटर का सीजन बेस्ट थ्रो किया। श्रीलंका के रुमेश थारंगा पथिरागे ने 89.75 मीटर के थ्रो के साथ गोल्ड मेडल जीता। वहीं भारत के यशवीर सिंह ने 85.41 मीटर के व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के साथ ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया। नीरज चोपड़ा के अंतरराष्ट्रीय मेडल उपलब्ध कराई गई सामग्री के अनुसार नीरज चोपड़ा का पदक रिकॉर्ड इस प्रकार है: ओलंपिक: 1 गोल्ड, 1 सिल्वर विश्व चैंपियनशिप: 1 गोल्ड, 1 सिल्वर कॉमनवेल्थ गेम्स: 1 गोल्ड, 1 सिल्वर एशियन गेम्स: 2 गोल्ड एशियन चैंपियनशिप: 1 गोल्ड साउथ एशियन गेम्स: 1 गोल्ड अंडर-20 विश्व चैंपियनशिप: 1 गोल्ड अंडर-20 एशियन चैंपियनशिप: 1 सिल्वर नीरज की उपलब्धियां क्यों हैं खास? नीरज चोपड़ा की खासियत सिर्फ पदकों की संख्या नहीं है, बल्कि अलग-अलग स्तर की प्रतियोगिताओं में लंबे समय तक शीर्ष प्रदर्शन करना भी है। जूनियर स्तर पर विश्व चैंपियन बनने से लेकर ओलंपिक चैंपियन और विश्व चैंपियन बनने तक उनका सफर भारतीय एथलेटिक्स के लिए प्रेरणादायक रहा है। 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स में सिल्वर मेडल के बावजूद नीरज ने एक बार फिर यह दिखाया कि बड़े मंच पर वह लगातार पदक जीतने की क्षमता रखते हैं। 85.83 मीटर का सीजन बेस्ट थ्रो उनके मौजूदा स्तर को भी दर्शाता है। भारत के लिए नीरज की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता नहीं, बल्कि भारतीय एथलेटिक्स के वैश्विक मंच पर मजबूत होने की कहानी भी है। आने वाले अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में भी उनकी नजरें अपने पदकों की संख्या बढ़ाने और भारत के लिए नए रिकॉर्ड बनाने पर होंगी।
ग्लासगो, एजेंसियां। भारत के स्टार भाला फेंक खिलाड़ी नीरज चोपड़ा ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में पुरुषों की जैवलिन थ्रो स्पर्धा में रजत पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है। चोपड़ा ने फाइनल में 85.83 मीटर का सर्वश्रेष्ठ थ्रो किया। श्रीलंका के रुमेश थरंगा पथिरागे ने 89.75 मीटर के प्रयास के साथ स्वर्ण पदक अपने नाम किया। भारत के यशवीर सिंह ने भी कांस्य पदक जीता, जिससे जैवलिन थ्रो में भारत ने दो पदक हासिल किए। नीरज चोपड़ा ने 85.83 मीटर का थ्रो किया ग्लासगो में आयोजित पुरुषों की जैवलिन थ्रो फाइनल में नीरज चोपड़ा का सर्वश्रेष्ठ प्रयास 85.83 मीटर रहा। वह स्वर्ण पदक से पीछे रह गए, लेकिन रजत पदक जीतकर उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के पदकों की संख्या बढ़ा दी। चोपड़ा का प्रदर्शन ऐसे समय में आया है जब देश की नजर भारतीय एथलेटिक्स दल पर बनी हुई है। यशवीर सिंह ने भी जीता कांस्य पदक इसी मुकाबले में भारतीय खिलाड़ी यशवीर सिंह ने कांस्य पदक अपने नाम किया। इस तरह पुरुषों की जैवलिन थ्रो स्पर्धा में भारत को एक साथ रजत और कांस्य पदक मिले। दोनों भारतीय खिलाड़ियों के एक साथ पोडियम पर पहुंचने को देश के लिए खास उपलब्धि माना जा रहा है। भारत के पदक अभियान को मिली मजबूती नीरज चोपड़ा के रजत पदक के बाद कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के पदकों की संख्या और बढ़ गई है। उपलब्ध ताजा आंकड़ों के अनुसार भारत के खाते में अब तक 23 पदक आ चुके हैं, जिनमें 5 स्वर्ण, 12 रजत और 6 कांस्य पदक शामिल हैं। प्रतियोगिता के अंतिम चरण में भारतीय मुक्केबाजों समेत कई खिलाड़ियों से पदक की उम्मीद बनी हुई है।