कोलकाता, एजेंसियां। पर्यावरण कार्यकर्ता सुभाष दत्ता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कोलकाता स्थित नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की ईस्टर्न जोन बेंच को फिर से नियमित रूप से सक्रिय करने के लिए हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने कहा कि नियमित बेंच के अभाव में पूर्वी भारत के कई महत्वपूर्ण पर्यावरणीय मामलों की सुनवाई में देरी हो रही है। पूर्वी भारत के पर्यावरण मामलों पर पड़ रहा असर सुभाष दत्ता ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा कि कोलकाता की NGT ईस्टर्न जोन बेंच पूर्वी भारत, पूर्वोत्तर राज्यों और अंडमान-निकोबार क्षेत्र से जुड़े पर्यावरण मामलों के निपटारे के लिए महत्वपूर्ण है। नियमित व्यवस्था नहीं होने से कई मामलों में सुनवाई प्रभावित हो रही है। पर्यावरण विवादों के जल्द समाधान की मांग पर्यावरण कार्यकर्ता का कहना है कि प्रदूषण, नदियों की सुरक्षा, औद्योगिक गतिविधियों और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े मामलों में समय पर न्याय जरूरी है। उन्होंने केंद्र सरकार से इस दिशा में जल्द कदम उठाने की अपील की है। NGT की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल पर्यावरण से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाला विशेष न्यायिक निकाय है। इसकी क्षेत्रीय बेंचों का उद्देश्य स्थानीय पर्यावरण विवादों का तेजी से निपटारा करना है। कोलकाता की ईस्टर्न जोन बेंच पूर्वी राज्यों के लिए अहम मानी जाती है। कोलकाता बेंच को लेकर पहले भी उठ चुकी हैं मांगें NGT की क्षेत्रीय बेंचों में लंबित मामलों और पर्याप्त न्यायिक सदस्यों की उपलब्धता को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। पर्यावरण संगठनों का कहना है कि मजबूत व्यवस्था के बिना पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में देरी हो सकती है। अब केंद्र के फैसले पर नजर सुभाष दत्ता की अपील के बाद अब नजर केंद्र सरकार के अगले कदम पर है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित बेंच के संचालन से पूर्वी भारत के पर्यावरण संबंधी मामलों की सुनवाई को गति मिल सकती है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारत के केमिकल सेक्टर को मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने देश में तीन समर्पित केमिकल पार्क (Chemical Parks) स्थापित करने के लिए ₹3,030 करोड़ की "BHAVYA-Rasayan" योजना को मंजूरी दी है। इन पार्कों का उद्देश्य घरेलू केमिकल उत्पादन बढ़ाना, आयात पर निर्भरता कम करना और रोजगार के नए अवसर पैदा करना है। हर केमिकल पार्क को मिल सकती है ₹1,000 करोड़ तक की सहायता सरकार की योजना के तहत प्रत्येक केमिकल पार्क के लिए केंद्र की ओर से अधिकतम ₹1,000 करोड़ तक की वित्तीय सहायता दी जा सकती है। इन पार्कों को आधुनिक सुविधाओं और तैयार औद्योगिक ढांचे (Plug-and-Play Infrastructure) के साथ विकसित किया जाएगा। रसायन उद्योग को मिलेगा बड़ा बढ़ावा केमिकल पार्क में कंपनियों को साझा सुविधाएं, पर्यावरण प्रबंधन व्यवस्था, लॉजिस्टिक सुविधा और अन्य जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराया जाएगा। इससे छोटी और बड़ी दोनों तरह की कंपनियों को उत्पादन शुरू करने में आसानी होगी। आयात कम करने और आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर जोर भारत रसायन और पेट्रोकेमिकल क्षेत्र में अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर लगातार काम कर रहा है। नए केमिकल पार्क बनने से घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा और कई जरूरी रसायनों के लिए विदेशी निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। हजारों रोजगार के अवसर बनने की उम्मीद सरकार का अनुमान है कि इन औद्योगिक पार्कों से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर पैदा होंगे। इससे केमिकल मैन्युफैक्चरिंग, फार्मा, प्लास्टिक, पेंट, टेक्सटाइल और अन्य संबंधित उद्योगों को भी फायदा मिलेगा। राज्यों के चयन की प्रक्रिया से स्थापित होंगे पार्क इन केमिकल पार्कों को राज्यों के साथ मिलकर विकसित किया जाएगा। चयन प्रक्रिया के आधार पर राज्यों को अवसर दिया जाएगा, जहां बेहतर औद्योगिक माहौल और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध होंगी।
नई दिल्ली, एजेंसियां। शिक्षा सुधार और परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे सोनम वांगचुक ने शनिवार को अस्पताल से एक वीडियो जारी कर अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने वीडियो में कहा कि वह अस्पताल से जा रहे हैं और अगर प्रशासन उन्हें गिरफ्तार करना चाहता है तो कर सकता है। उनके इस बयान के बाद एक बार फिर मामला चर्चा में आ गया है। अस्पताल में निगरानी का लगाया आरोप सोनम वांगचुक ने वीडियो में दावा किया कि अस्पताल में उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। उन्होंने कहा कि आंदोलन के दौरान उनकी आवाज को दबाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। उनके इस बयान के बाद उनके समर्थकों ने भी सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दी। वहीं अस्पताल प्रशासन और अधिकारियों की ओर से पूरे मामले को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट की गई है। प्रशासन का कहना है कि वांगचुक के स्वास्थ्य को देखते हुए जरूरी चिकित्सा निगरानी की जा रही थी। 26 दिन के अनशन के बाद बिगड़ी थी तबीयत सोनम वांगचुक ने परीक्षा व्यवस्था में सुधार, पेपर लीक जैसी घटनाओं पर सख्त कार्रवाई और छात्रों के हितों को लेकर लंबा अनशन किया था। लगातार उपवास के कारण उनकी तबीयत बिगड़ गई थी, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। बाद में उन्होंने सरकार की ओर से बातचीत और सुधार के आश्वासन के बाद अपना अनशन खत्म किया था। उन्होंने कहा था कि छात्रों के मुद्दों को लेकर संघर्ष आगे भी जारी रहेगा। शिक्षा सुधार को लेकर आंदोलन जारी रखने का ऐलान वांगचुक लगातार परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और छात्रों की समस्याओं के समाधान की मांग उठा रहे हैं। उनका कहना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में होने वाली अनियमितताओं से युवाओं के भविष्य पर असर पड़ता है। उनके आंदोलन को लेकर देश के कई हिस्सों में छात्रों और सामाजिक संगठनों ने समर्थन भी जताया है। अब आगे के कदम पर नजर सोनम वांगचुक के नए वीडियो के बाद उनके अगले कदम को लेकर चर्चा तेज हो गई है। वहीं प्रशासन और आंदोलन से जुड़े लोगों के बीच स्थिति पर सभी की नजर बनी हुई है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। देशभर में दक्षिण-पश्चिम मानसून एक बार फिर सक्रिय हो गया है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने गुजरात, राजस्थान, दिल्ली-एनसीआर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मध्य प्रदेश, ओडिशा, बिहार, झारखंड और पूर्वोत्तर के कई राज्यों में भारी से अत्यधिक भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है। मौसम विभाग ने अगले कुछ दिनों तक कई इलाकों में तेज बारिश, आंधी और बिजली गिरने की संभावना जताई है। इन राज्यों में सबसे ज्यादा बारिश की चेतावनी IMD के अनुसार, गुजरात में अलग-अलग स्थानों पर अत्यधिक भारी बारिश होने की आशंका है। वहीं राजस्थान, दिल्ली-एनसीआर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, बिहार, झारखंड, असम और मेघालय में भी भारी बारिश का दौर जारी रह सकता है। कई स्थानों पर तेज हवाएं और गरज-चमक के साथ बारिश होने की संभावना है। बाढ़ और भूस्खलन का बढ़ा खतरा मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि लगातार बारिश के कारण पहाड़ी राज्यों में भूस्खलन, जबकि निचले इलाकों में जलभराव और अचानक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) की स्थिति बन सकती है। संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को सतर्क रहने और प्रशासन द्वारा जारी निर्देशों का पालन करने की सलाह दी गई है। मछुआरों और यात्रियों के लिए एडवाइजरी जारी IMD ने समुद्र में ऊंची लहरों और खराब मौसम को देखते हुए मछुआरों को समुद्र में नहीं जाने की सलाह दी है। इसके अलावा, भारी बारिश वाले क्षेत्रों में यात्रा करने वाले लोगों से मौसम की जानकारी लेकर ही यात्रा करने और आवश्यक सावधानी बरतने की अपील की गई है। प्रशासन अलर्ट मोड पर बारिश की चेतावनी को देखते हुए कई राज्यों के प्रशासन ने आपदा प्रबंधन टीमों, NDRF और SDRF को सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं। स्थानीय प्रशासन ने लोगों से नदी-नालों और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों से दूर रहने तथा किसी भी आपात स्थिति में प्रशासन की हेल्पलाइन से संपर्क करने की अपील की है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। केंद्र सरकार राष्ट्रीय राजमार्गों पर यात्रा को अधिक किफायती बनाने के लिए नए टोल शुल्क फॉर्मूले पर काम कर रही है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) टोल वसूली प्रणाली में बदलाव के विभिन्न विकल्पों का अध्ययन कर रहे हैं। प्रस्तावित व्यवस्था लागू होने पर निजी वाहन चालकों को मौजूदा व्यवस्था की तुलना में कम टोल देना पड़ सकता है। क्या है नया प्रस्ताव? सरकार दो प्रमुख मॉडलों पर विचार कर रही है। पहला, दूरी के आधार पर टोल (Distance-Based Tolling), जिसमें वाहन चालक से केवल उतनी दूरी का शुल्क लिया जाएगा, जितनी दूरी उसने राष्ट्रीय राजमार्ग पर तय की है। दूसरा, वार्षिक टोल पास (Annual Toll Pass), जिसके तहत एक निश्चित शुल्क देकर पूरे वर्ष राष्ट्रीय राजमार्गों का उपयोग किया जा सकेगा। इन प्रस्तावों का उद्देश्य टोल प्रणाली को अधिक पारदर्शी और उपयोगकर्ता-अनुकूल बनाना है। GPS आधारित टोल प्रणाली पर भी चल रहा काम सरकार FASTag के साथ-साथ GPS और GNSS (Global Navigation Satellite System) आधारित टोल वसूली प्रणाली को चरणबद्ध तरीके से लागू करने की योजना पर भी काम कर रही है। इस तकनीक के माध्यम से वाहन जितनी दूरी तय करेगा, उसी के अनुसार स्वतः टोल शुल्क कटेगा। इससे टोल प्लाजा पर रुकने की आवश्यकता कम होगी और ट्रैफिक जाम में भी राहत मिलेगी। निजी वाहन चालकों को मिल सकती है बड़ी राहत यदि नया टोल फॉर्मूला लागू होता है तो नियमित रूप से राष्ट्रीय राजमार्गों पर यात्रा करने वाले लाखों निजी वाहन चालकों को आर्थिक राहत मिल सकती है। साथ ही, मालवाहक वाहनों के लिए भी अधिक पारदर्शी और दूरी आधारित शुल्क व्यवस्था विकसित होने की संभावना है। अभी अंतिम फैसला नहीं सरकार ने स्पष्ट किया है कि नया टोल फॉर्मूला अभी विचाराधीन है और इस पर अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। विभिन्न तकनीकी, वित्तीय और कानूनी पहलुओं का अध्ययन करने के बाद ही नई व्यवस्था लागू की जाएगी। सरकार का लक्ष्य ऐसी टोल प्रणाली विकसित करना है जो यात्रियों के लिए सुविधाजनक होने के साथ-साथ राष्ट्रीय राजमार्गों के रखरखाव के लिए आवश्यक राजस्व भी सुनिश्चित कर सके।
शिमला, एजेंसियां। हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में शुक्रवार को बड़ा हादसा हो गया। उदयपुर–पांगी मार्ग पर काडू नाला (Kadu Nala) के पास अचानक पहाड़ी से विशाल चट्टानें गिरने से एक यात्री वाहन उनकी चपेट में आ गया। हादसे में 13 लोगों की मौत हो गई, जिनमें 6 महीने का एक मासूम बच्चा भी शामिल है। घटना के बाद प्रशासन, पुलिस और राहत एजेंसियों ने मौके पर बचाव अभियान शुरू कर दिया है। चलती टैक्सी पर गिरी विशाल चट्टानें पुलिस के अनुसार, टाटा सूमो वाहन कुल्लू से किलाड़ की ओर जा रहा था। इसी दौरान काडू नाला के पास अचानक पहाड़ी से भारी चट्टानें वाहन पर आ गिरीं। टक्कर इतनी भीषण थी कि वाहन पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और उसके पिछले हिस्से में आग भी लग गई। हादसे के समय वाहन में 15 लोग सवार थे। 13 लोगों की मौत, दो लोग बचाए गए हादसे में 13 यात्रियों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दो लोग गंभीर रूप से घायल अवस्था में बचा लिए गए। घायलों को नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उनका इलाज जारी है। मृतकों की पहचान की प्रक्रिया भी प्रशासन द्वारा की जा रही है। राहत और बचाव अभियान जारी घटना की सूचना मिलते ही पुलिस, स्थानीय प्रशासन, सीमा सड़क संगठन (BRO) और अन्य राहत दल मौके पर पहुंच गए। मलबा हटाने और प्रभावित क्षेत्र को सुरक्षित बनाने का काम जारी है। पहाड़ी क्षेत्र में लगातार भूस्खलन की आशंका के कारण बचाव कार्य सावधानीपूर्वक किया जा रहा है। भारी बारिश के चलते बढ़ा भूस्खलन का खतरा हिमाचल प्रदेश में लगातार हो रही बारिश के कारण कई पर्वतीय इलाकों में भूस्खलन की घटनाएं बढ़ गई हैं। प्रशासन ने लोगों से खराब मौसम के दौरान अनावश्यक यात्रा से बचने और संवेदनशील मार्गों पर विशेष सतर्कता बरतने की अपील की है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। केंद्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति (CCEA) ने कर्नाटक के बल्लारी (Ballari) और आंध्र प्रदेश के गुंटकल (Guntakal) सेक्शन के बीच तीसरी और चौथी रेलवे लाइन बिछाने की परियोजना को मंजूरी दे दी है। ₹1,264 करोड़ की लागत वाली यह परियोजना पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान के तहत लागू की जाएगी। इसका उद्देश्य दोनों राज्यों के बीच रेल संपर्क, माल ढुलाई क्षमता और यात्री सेवाओं को बेहतर बनाना है। 46 किलोमीटर तक बढ़ेगा रेलवे नेटवर्क इस परियोजना के तहत बल्लारी–गुंटकल रेल खंड पर तीसरी और चौथी रेल लाइन का निर्माण किया जाएगा। इससे भारतीय रेलवे नेटवर्क में लगभग 46 किलोमीटर की अतिरिक्त लाइन जुड़ेगी। परियोजना कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के तीन जिलों को कवर करेगी और इसके 2028-29 तक पूरा होने का लक्ष्य रखा गया है। 99 गांवों और करीब 7 लाख लोगों को मिलेगा लाभ सरकार के अनुसार, इस परियोजना से लगभग 99 गांवों और करीब 7 लाख लोगों को बेहतर रेल संपर्क का लाभ मिलेगा। साथ ही, लौह अयस्क, कोयला, उर्वरक, इस्पात, चूना पत्थर और खाद्यान्न जैसी वस्तुओं की ढुलाई अधिक तेज और सुगम हो सकेगी, जिससे लॉजिस्टिक्स लागत में कमी आएगी। माल और यात्री ट्रेनों की क्षमता में होगा इजाफा नई लाइन बनने के बाद इस व्यस्त रेल मार्ग पर ट्रेनों की आवाजाही बढ़ाई जा सकेगी। इससे मालगाड़ियों और यात्री ट्रेनों दोनों का संचालन अधिक सुचारु होगा, देरी कम होगी और दक्षिण भारत के औद्योगिक क्षेत्रों को बेहतर रेल कनेक्टिविटी मिलेगी। पीएम गति शक्ति योजना के तहत मिलेगा बढ़ावा सरकार का कहना है कि यह परियोजना पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य मल्टी-मॉडल कनेक्टिविटी को मजबूत करना, लॉजिस्टिक्स दक्षता बढ़ाना और देशभर में आधुनिक परिवहन अवसंरचना का विकास करना है। परियोजना के पूरा होने से क्षेत्रीय आर्थिक विकास और रोजगार के अवसरों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।