केंद्र सरकार ने Meta की ग्लोबल टीम को भारत बुलाया, CSAM और सोशल मीडिया कंटेंट पर होगी चर्चा नई दिल्ली, एजेंसियां। केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Meta की वैश्विक टीम को भारत बुलाया है। सरकार और Meta के बीच होने वाली बैठक में सोशल मीडिया पर बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM), आपत्तिजनक कंटेंट, कंटेंट मॉडरेशन और डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही से जुड़े गंभीर मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। Meta की ग्लोबल टीम के साथ होगी बैठक सरकार की ओर से Meta की वैश्विक टीम को भारत बुलाने का फैसला ऐसे समय में हुआ है, जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आपत्तिजनक और गैरकानूनी सामग्री को लेकर सरकार की सख्ती बढ़ रही है। बैठक में भारत में Meta के प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कंटेंट की निगरानी और शिकायतों के निपटारे से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा होने की संभावना है। CSAM पर सरकार का सख्त रुख बैठक का एक प्रमुख मुद्दा CSAM यानी Child Sexual Abuse Material होगा। सरकार सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के प्रसार को रोकने के लिए प्लेटफॉर्मों से अधिक प्रभावी कार्रवाई की अपेक्षा कर रही है। सरकार यह भी चाहती है कि ऐसी सामग्री की पहचान होने के बाद उसे तेजी से हटाया जाए और संबंधित मामलों में कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ आवश्यक सहयोग किया जाए। कंटेंट मॉडरेशन और प्लेटफॉर्म की जवाबदेही पर चर्चा बैठक में कंटेंट मॉडरेशन, यूजर सेफ्टी और प्लेटफॉर्म की जवाबदेही से जुड़े मुद्दों पर भी बातचीत होगी। सरकार की कोशिश है कि सोशल मीडिया कंपनियां भारत के कानूनों और डिजिटल सुरक्षा से जुड़े नियमों का प्रभावी तरीके से पालन करें। Meta के भारत में Facebook, Instagram और WhatsApp जैसे बड़े प्लेटफॉर्म हैं। ऐसे में सरकार और कंपनी के बीच होने वाली यह बैठक भारत में सोशल मीडिया नियमन और ऑनलाइन सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
PM Modi AI Video Case: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के AI-जनरेटेड (मॉर्फ्ड) वीडियो मामले में Meta India की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने इस मामले में Meta India के प्रमुख अरुण श्रीनिवास समेत कई सोशल मीडिया यूजर्स के खिलाफ FIR दर्ज की है। पुलिस का कहना है कि Facebook और Instagram पर वायरल हुए AI से तैयार फर्जी वीडियो की गहन जांच की जा रही है। यह मामला किसी बड़ी टेक कंपनी के शीर्ष अधिकारी के खिलाफ दर्ज किए गए महत्वपूर्ण मामलों में से एक माना जा रहा है। पुलिस सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि AI तकनीक का इस्तेमाल कर तैयार किए गए इन वीडियो के जरिए लोगों को गुमराह करने, गलत सूचना फैलाने या जनभावनाओं को प्रभावित करने की कोशिश तो नहीं की गई। मामले की जांच भारतीय न्याय संहिता (BNS) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) के विभिन्न प्रावधानों के तहत की जा रही है। Facebook और Instagram पर वायरल हुए थे AI वीडियो प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कथित AI-जनरेटेड और मॉर्फ्ड वीडियो Facebook और Instagram सहित Meta के विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर तेजी से वायरल हुए थे। इन वीडियो की सत्यता को लेकर सवाल उठने के बाद साइबर क्राइम पुलिस ने मामले का संज्ञान लिया और तकनीकी जांच शुरू की। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि इन वीडियो को सबसे पहले किसने तैयार किया, किन अकाउंट्स से इन्हें अपलोड किया गया और सोशल मीडिया पर इन्हें बड़े स्तर पर कैसे फैलाया गया। Meta से पहले भी मांगा गया था जवाब एफआईआर दर्ज होने से पहले हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने Meta के प्रतिनिधियों को पूछताछ के लिए तलब किया था। अधिकारियों ने कंपनी से पूछा था कि AI से बनाए गए फर्जी वीडियो, डीपफेक कंटेंट, ऑनलाइन स्कैम और फेक विज्ञापनों की पहचान कर उन्हें हटाने के लिए कंपनी के पास कौन-कौन से सुरक्षा तंत्र और मॉडरेशन सिस्टम मौजूद हैं। पुलिस ने यह भी जानकारी मांगी थी कि संदिग्ध कंटेंट की पहचान होने के बाद उसे हटाने की प्रक्रिया क्या है और ऐसे मामलों में कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ कंपनी किस तरह सहयोग करती है। किन पहलुओं की जांच कर रही है साइबर क्राइम पुलिस? हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस अब इस पूरे मामले की तकनीकी और कानूनी दोनों स्तरों पर जांच कर रही है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि AI से तैयार किए गए वीडियो का मूल स्रोत क्या है, उन्हें बनाने के लिए किस तकनीक का इस्तेमाल किया गया और उनके प्रसार के पीछे किन लोगों या समूहों की भूमिका रही। इसके अलावा पुलिस यह भी जांच कर रही है कि Meta के सुरक्षा और कंटेंट मॉडरेशन सिस्टम ऐसे वीडियो को समय रहते पहचानने और रोकने में कितने प्रभावी रहे। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या नियमों के उल्लंघन के संकेत मिलते हैं, तो उसके आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। यूजर्स की भूमिका भी जांच के दायरे में पुलिस केवल प्लेटफॉर्म की भूमिका ही नहीं, बल्कि वीडियो बनाने, अपलोड करने, शेयर करने और वायरल करने वाले सोशल मीडिया यूजर्स की भी जांच कर रही है। जांच एजेंसियां डिजिटल साक्ष्यों, सर्वर लॉग और सोशल मीडिया गतिविधियों के आधार पर यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि फर्जी वीडियो के प्रसार में किसकी क्या भूमिका रही। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद तकनीकी रिपोर्ट और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। AI और डीपफेक तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के बीच यह मामला सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और डिजिटल कंटेंट मॉडरेशन को लेकर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। Instagram ने अपने क्रिएटर्स और यूज़र्स के लिए Replace Audio नाम का नया फीचर लॉन्च किया है। इस फीचर की मदद से अब यूज़र पहले से पब्लिश हो चुकी फीड और कैरोसल पोस्ट्स का म्यूजिक बिना पोस्ट डिलीट किए बदल सकेंगे। पहले किसी पोस्ट का ऑडियो बदलने के लिए उसे हटाकर दोबारा अपलोड करना पड़ता था, जिससे लाइक्स, कमेंट्स और अन्य एंगेजमेंट भी खत्म हो जाते थे। पोस्ट का ऑडियो बदलना हुआ आसान Instagram के मुताबिक, यूज़र अब अपनी पहले से शेयर की गई पोस्ट के मेन्यू में जाकर Replace Audio विकल्प चुनकर नया ट्रैक जोड़ सकते हैं। सबसे खास बात यह है कि ऑडियो बदलने के बावजूद पोस्ट के लाइक्स, कमेंट्स, शेयर और रीच पर कोई असर नहीं पड़ेगा। कंपनी ने इस फीचर को चरणबद्ध तरीके से इसी सप्ताह रोलआउट करना शुरू कर दिया है। क्रिएटर्स और ब्रांड्स को होगा फायदा यह फीचर खासतौर पर कंटेंट क्रिएटर्स और ब्रांड्स के लिए उपयोगी माना जा रहा है। इसकी मदद से वे पुरानी पोस्ट्स को मौजूदा ट्रेंडिंग म्यूजिक के साथ अपडेट कर सकेंगे, बिना कंटेंट दोबारा अपलोड किए। इससे पुराने कंटेंट को नई ऑडियंस तक पहुंचाने में भी मदद मिलेगी। लगातार जुड़ रहे नए फीचर्स Instagram पिछले कुछ महीनों से क्रिएटर्स के लिए लगातार नए टूल्स पेश कर रहा है। हाल ही में कंपनी ने कैरोसल पोस्ट की हर स्लाइड पर अलग-अलग कैप्शन जोड़ने की सुविधा शुरू की थी। इसके अलावा इस साल Instants फीचर भी लॉन्च किया गया, जिसके जरिए यूज़र स्नैपचैट की तरह अपने करीबी दोस्तों और फॉलोअर्स के साथ डिसअपीयरिंग फोटो शेयर कर सकते हैं। यूज़र एक्सपीरियंस बेहतर बनाने पर फोकस Meta के स्वामित्व वाला Instagram लगातार ऐसे फीचर्स ला रहा है, जिनका उद्देश्य कंटेंट क्रिएशन को आसान बनाना और यूज़र्स को अधिक कस्टमाइजेशन विकल्प उपलब्ध कराना है। नया Replace Audio फीचर भी इसी दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। टेक दिग्गज Meta ने अपने नए AI इमेज जनरेशन टूल Muse Image के सबसे चर्चित फीचर को लॉन्च के महज तीन दिन बाद बंद कर दिया है। यह फीचर यूजर्स को सार्वजनिक Instagram अकाउंट्स की तस्वीरों के आधार पर AI इमेज बनाने की सुविधा देता था। लेकिन प्राइवेसी और बिना सहमति तस्वीरों के इस्तेमाल को लेकर भारी विरोध के बाद कंपनी ने इसे हटाने का फैसला किया। प्राइवेसी को लेकर उठा बड़ा विवाद Muse Image के जरिए कोई भी व्यक्ति किसी सार्वजनिक इंस्टाग्राम प्रोफाइल की तस्वीरों का उपयोग कर AI से नई तस्वीरें तैयार कर सकता था। इस फीचर को डिफॉल्ट रूप से सक्रिय किए जाने और स्पष्ट सहमति नहीं लेने पर यूजर्स, डिजिटल अधिकार संगठनों और हॉलीवुड कलाकारों के संगठन SAG-AFTRA ने कड़ी आपत्ति जताई। आलोचकों ने इसे डीपफेक और पहचान के दुरुपयोग का खतरा बताया। Meta ने माना- 'फीचर उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा' बढ़ते विरोध के बाद Meta ने बयान जारी कर कहा कि इस फीचर का उद्देश्य लोगों को रचनात्मक टूल उपलब्ध कराना था, लेकिन यह "लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा"। कंपनी ने स्वीकार किया कि लोगों की प्रतिक्रिया को देखते हुए इस सुविधा को वापस लिया जा रहा है। हालांकि Muse Image के अन्य AI इमेज एडिटिंग और जनरेशन फीचर पहले की तरह उपलब्ध रहेंगे। AI कंपनियों के लिए बढ़ी नई चुनौती इस घटना ने एक बार फिर AI टूल्स में डेटा गोपनीयता, कॉपीराइट और यूजर की सहमति को लेकर बहस तेज कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में AI आधारित सेवाओं के लिए टेक कंपनियों को अधिक पारदर्शी नीतियां अपनानी होंगी, ताकि नई तकनीक और यूजर्स की निजता के बीच संतुलन बनाया जा सके।
सोशल मीडिया कंपनी Meta ने यूजर्स की कड़ी आलोचना के बाद Instagram से जुड़ा अपना विवादित AI इमेज जनरेशन फीचर हटा दिया है। यह फीचर किसी भी सार्वजनिक (Public) Instagram अकाउंट को टैग करके उसकी AI तस्वीर बनाने की अनुमति देता था, जिसे लेकर गोपनीयता (Privacy) और सहमति (Consent) को लेकर गंभीर सवाल उठे थे। कंपनी ने स्वीकार किया कि इस फीचर को लॉन्च करने का फैसला सही नहीं था और यूजर्स की प्रतिक्रिया के बाद इसे बंद कर दिया गया है। क्या था विवादित AI फीचर? Meta ने हाल ही में Muse Image नाम का AI इमेज जनरेशन टूल लॉन्च किया था। इस फीचर की मदद से कोई भी व्यक्ति किसी सार्वजनिक Instagram अकाउंट को प्रॉम्प्ट में टैग करके उसकी AI-जनरेटेड तस्वीर बना सकता था। इसके लिए संबंधित व्यक्ति की अनुमति की आवश्यकता नहीं थी। हालांकि, यह सुविधा केवल Public Accounts तक सीमित थी। निजी (Private) अकाउंट और 18 वर्ष से कम उम्र के यूजर्स इस फीचर से बाहर रखे गए थे। क्यों हुआ विरोध? इस फीचर को लेकर सबसे बड़ी आपत्ति यह थी कि सभी सार्वजनिक Instagram अकाउंट डिफॉल्ट रूप से (Opt-in) इसमें शामिल थे। यदि कोई यूजर अपनी तस्वीरों का AI उपयोग नहीं चाहता था, तो उसे स्वयं जाकर सेटिंग्स बदलनी पड़ती थीं। इसके अलावा Meta यूजर्स को यह भी नहीं बताता था कि किसी ने उनकी प्रोफाइल का उपयोग कर AI इमेज बनाई है या नहीं। इस वजह से लोगों ने आशंका जताई कि उनकी तस्वीरों का बिना अनुमति दुरुपयोग हो सकता है। Meta ने क्या कहा? Meta ने अपने आधिकारिक ब्लॉग में कहा कि कंपनी का उद्देश्य लोगों को एक उपयोगी रचनात्मक (Creative) टूल उपलब्ध कराना था और उन्हें अपने कंटेंट पर नियंत्रण देना था। हालांकि, कंपनी ने माना कि यूजर्स की प्रतिक्रिया के बाद उसे एहसास हुआ कि यह फीचर अपेक्षित मानकों पर खरा नहीं उतरा। Meta ने कहा कि इस सुविधा को अब पूरी तरह हटा दिया गया है, जबकि Muse Image का बाकी AI इमेज जनरेशन प्लेटफॉर्म पहले की तरह उपलब्ध रहेगा। अब क्या बदला? फीचर हटाए जाने के बाद अब यदि कोई यूजर Meta AI में किसी Instagram अकाउंट को टैग करके उसकी AI तस्वीर बनाने की कोशिश करता है, तो AI ऐसा करने से इनकार कर देता है। इसके अलावा Meta ने Instagram सेटिंग्स से वह विकल्प भी हटा दिया है, जिसके जरिए Public Account यूजर अपने कंटेंट को AI फीचर्स में इस्तेमाल करने की अनुमति देते थे। हॉलीवुड से भी उठी थी आपत्ति इस फीचर का विरोध केवल आम यूजर्स तक सीमित नहीं रहा। हॉलीवुड की प्रमुख टैलेंट एजेंसी Creative Artists Agency (CAA), जो टॉम क्रूज़, ज़ेंडाया और मेरिल स्ट्रीप जैसे कलाकारों का प्रतिनिधित्व करती है, ने भी Meta से डिफॉल्ट सुरक्षा लागू करने की मांग की थी। एजेंसी का कहना था कि AI उपयोग के लिए लोगों की तस्वीरों का इस्तेमाल Opt-in यानी स्पष्ट अनुमति के बाद ही होना चाहिए, न कि डिफॉल्ट रूप से। AI फीचर्स को लेकर बढ़ रही हैं चुनौतियां Meta पहली कंपनी नहीं है जिसे AI फीचर को लेकर आलोचना का सामना करना पड़ा हो। इससे पहले OpenAI और xAI जैसी कंपनियां भी अपने AI इमेज और वीडियो जनरेशन टूल्स को लेकर गोपनीयता और दुरुपयोग से जुड़े विवादों में घिर चुकी हैं। AI तकनीक के तेजी से विस्तार के साथ कंपनियों पर यूजर्स की निजता और सहमति की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित करने का दबाव लगातार बढ़ रहा है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया में Meta ने एक नया इमेज जनरेशन मॉडल Muse Image पेश किया है। कंपनी का दावा है कि यह टूल केवल टेक्स्ट प्रॉम्प्ट के आधार पर कुछ ही सेकंड में बेहद वास्तविक (Realistic) तस्वीरें तैयार कर सकता है। इतना ही नहीं, यह मौजूदा तस्वीरों को एडिट करने और कई इमेज को मिलाकर नया विजुअल बनाने की भी क्षमता रखता है। हालांकि, इस नई तकनीक के साथ प्राइवेसी और यूजर डेटा के इस्तेमाल को लेकर नई बहस भी शुरू हो गई है। क्या है Meta का Muse Image? Muse Image एक AI आधारित इमेज जनरेशन मॉडल है, जो यूजर द्वारा दिए गए टेक्स्ट निर्देशों (Prompt) को समझकर नई तस्वीरें तैयार करता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई यूजर समुद्र किनारे बने आधुनिक घर की तस्वीर चाहता है, तो उसे केवल उसका विवरण लिखना होगा। इसके बाद AI उसी आधार पर नई इमेज तैयार कर देगा। इसकी खास बात यह है कि यह सिर्फ नई तस्वीरें ही नहीं बनाता, बल्कि कई रेफरेंस इमेज को मिलाकर नया डिजाइन तैयार करने और पहले से मौजूद तस्वीरों में बदलाव करने की सुविधा भी देता है। किन प्लेटफॉर्म पर मिलेगा यह फीचर? Meta ने Muse Image को अपने AI इकोसिस्टम का हिस्सा बनाना शुरू कर दिया है। फिलहाल यह फीचर Meta AI ऐप और वेबसाइट पर उपलब्ध कराया जा रहा है। अमेरिका में इसे Instagram Stories के साथ भी जोड़ा गया है, जबकि कुछ देशों में WhatsApp पर इसकी सीमित सुविधा शुरू की गई है। कंपनी भविष्य में इसे Facebook और Marketplace जैसे अन्य प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध कराने की योजना बना रही है। अभी यूजर इस सुविधा का मुफ्त उपयोग कर सकते हैं, हालांकि भविष्य में सीमित उपयोग के बाद सब्सक्रिप्शन मॉडल लागू किया जा सकता है। क्यों बढ़ा प्राइवेसी को लेकर विवाद? Muse Image का सबसे चर्चित फीचर वह है, जिसमें किसी व्यक्ति के Instagram यूजरनेम के आधार पर उसकी सार्वजनिक (Public) प्रोफाइल पर मौजूद तस्वीरों से नई AI इमेज तैयार की जा सकती है। यही सुविधा अब विवाद का कारण बन गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति की अनुमति के बिना उसकी सार्वजनिक तस्वीरों का इस्तेमाल AI इमेज बनाने में किया जाता है, तो इससे प्राइवेसी और डिजिटल पहचान से जुड़े गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं। क्या हो सकता है गलत इस्तेमाल? तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इस तरह की सुविधा पर पर्याप्त नियंत्रण नहीं रखा गया तो इसका गलत उपयोग भी संभव है। AI की मदद से तैयार होने वाली तस्वीरें अब पहले से कहीं अधिक वास्तविक दिखाई देती हैं। ऐसे में भविष्य में असली और AI से बनी तस्वीरों के बीच अंतर करना मुश्किल हो सकता है। इससे फर्जी तस्वीरें, गलत जानकारी और डिजिटल पहचान से जुड़े जोखिम बढ़ सकते हैं। 'ऑप्ट-आउट' सिस्टम पर भी उठे सवाल Muse Image को लेकर एक और चिंता इसका ऑप्ट-आउट सिस्टम है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस व्यवस्था में यदि कोई यूजर नहीं चाहता कि उसका सार्वजनिक कंटेंट AI मॉडल के लिए इस्तेमाल हो, तो उसे स्वयं सेटिंग्स में जाकर यह विकल्प बंद करना होगा। ऐसे में कई लोगों को यह जानकारी भी नहीं होगी कि उनकी सार्वजनिक तस्वीरों का उपयोग AI प्रशिक्षण या इमेज जनरेशन के लिए किया जा सकता है। AI के साथ बढ़ रही जिम्मेदारी भी AI आधारित इमेज जनरेशन तकनीक क्रिएटिविटी के नए अवसर जरूर खोल रही है, लेकिन इसके साथ डेटा सुरक्षा, यूजर की सहमति और डिजिटल पहचान की सुरक्षा जैसे मुद्दे भी तेजी से महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि AI तकनीक के विस्तार के साथ कंपनियों को पारदर्शी नीतियां अपनानी होंगी, ताकि नई सुविधाओं का लाभ भी मिलता रहे और यूजर्स की निजता भी सुरक्षित रह सके।
नई दिल्ली, एजेंसियां। इंस्टेंट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म WhatsApp अपने यूजर्स के लिए एक नया और उपयोगी फीचर लाने की तैयारी कर रहा है। कंपनी इन दिनों 'ग्रीन डॉट' फीचर की टेस्टिंग कर रही है, जिसके जरिए यूजर्स बिना चैट खोले ही यह जान सकेंगे कि उनके कौन-से कॉन्टैक्ट उस समय ऑनलाइन और ऐप पर सक्रिय हैं। यह सुविधा पहले से ही Meta के अन्य प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम और मैसेंजर पर उपलब्ध है और अब जल्द ही WhatsApp में भी देखने को मिल सकती है। प्रोफाइल पर दिखेगा ऑनलाइन होने का संकेत रिपोर्ट्स के अनुसार, नया फीचर आने के बाद किसी कॉन्टैक्ट की प्रोफाइल फोटो या कॉन्टैक्ट इंफो पेज पर एक ग्रीन डॉट दिखाई देगा। यह संकेत देगा कि संबंधित व्यक्ति उस समय WhatsApp पर एक्टिव है। यदि ग्रीन डॉट दिखाई नहीं देता, तो इसका अर्थ होगा कि वह यूजर फिलहाल ऑनलाइन नहीं है। शुरुआती चरण में यह सुविधा कॉन्टैक्ट इंफो पेज तक सीमित रह सकती है, जबकि भविष्य में इसे चैट लिस्ट और कन्वर्सेशन स्क्रीन पर भी उपलब्ध कराया जा सकता है। प्राइवेसी से नहीं होगा समझौता WhatsApp ने इस फीचर के साथ यूजर्स की प्राइवेसी का भी ध्यान रखा है। ग्रीन डॉट उसी ऑनलाइन स्टेटस सेटिंग के आधार पर काम करेगा, जिसका उपयोग अभी किया जा रहा है। यदि किसी यूजर ने अपना ऑनलाइन स्टेटस छिपा रखा है, तो ग्रीन डॉट भी अन्य लोगों को दिखाई नहीं देगा। यानी यूजर्स के पास यह विकल्प पहले की तरह रहेगा कि वे अपनी ऑनलाइन मौजूदगी दिखाना चाहते हैं या नहीं। iPhone और Android दोनों पर मिलेगा फीचर यह फीचर सबसे पहले Android के बीटा वर्जन में देखा गया था और अब इसकी टेस्टिंग iPhone पर भी शुरू हो चुकी है। माना जा रहा है कि आने वाले कुछ सप्ताह में इसे चरणबद्ध तरीके से रोलआउट किया जाएगा। हालांकि, WhatsApp की ओर से अभी तक इसकी आधिकारिक लॉन्च तारीख की घोषणा नहीं की गई है। नए फीचर से यूजर्स के लिए ऑनलाइन कॉन्टैक्ट की पहचान करना पहले से कहीं अधिक आसान और सुविधाजनक हो जाएगा।
नई दिल्ली, एजेंसियां। केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया कंपनी Meta को कड़ा नोटिस जारी करते हुए Instagram पर कथित तौर पर बाल यौन शोषण सामग्री से जुड़े विज्ञापनों और कंटेंट को तत्काल हटाने का निर्देश दिया है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने कंपनी से इस मामले में सात दिनों के भीतर विस्तृत जवाब भी मांगा है। यह कार्रवाई मीडिया रिपोर्टों में ऐसे विज्ञापनों के सामने आने के बाद की गई है। तुरंत हटाने और जवाब देने का निर्देश सरकारी सूत्रों के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने Meta को स्पष्ट निर्देश दिया है कि Instagram पर ऐसे सभी विज्ञापन और कंटेंट तत्काल निष्क्रिय किए जाएं, जो बाल यौन शोषण सामग्री तक पहुंच को बढ़ावा देते हों या उसकी सुविधा उपलब्ध कराते हों। मंत्रालय ने यह भी पूछा है कि ऐसे विज्ञापन प्लेटफॉर्म की निगरानी व्यवस्था से कैसे बच निकले और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे। आईटी और POCSO कानूनों के तहत हो सकती है कार्रवाई सरकार ने संकेत दिया है कि यदि Meta संतोषजनक जवाब देने में विफल रहता है या निर्देशों का पालन नहीं करता है, तो उसके खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और POCSO अधिनियम सहित लागू कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है। सरकार ने ऑनलाइन बाल सुरक्षा से जुड़े मामलों में किसी भी तरह की लापरवाही को गंभीर अपराध बताया है। ऑनलाइन बाल सुरक्षा पर सरकार का सख्त रुख केंद्र सरकार ने कहा है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बच्चों से जुड़े यौन शोषण की सामग्री को किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मंत्रालय ऐसे मामलों की लगातार निगरानी कर रहा है और सभी सोशल मीडिया कंपनियों से भारतीय कानूनों तथा सुरक्षा दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करने की अपेक्षा की गई है।
पुणे: केतन अग्रवाल की मौत पर सोशल मीडिया पर कथित तौर पर मजाक उड़ाने वाली पोस्ट करना डॉ. मुस्कान सोनी को भारी पड़ गया। ऑल इंडिया डेंटल स्टूडेंट्स एंड सर्जन्स एसोसिएशन (AIDSA) ने अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उन्हें संगठन की सदस्यता और सभी जिम्मेदारियों से पांच वर्ष के लिए निलंबित कर दिया है। एसोसिएशन की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि डॉ. मुस्कान सोनी का आचरण संगठन की आचार संहिता, अनुशासन और नैतिक मूल्यों के विपरीत पाया गया। इसलिए उनके खिलाफ तत्काल प्रभाव से कार्रवाई की गई है। विवादित इंस्टाग्राम पोस्ट बनी कार्रवाई की वजह AIDSA के अनुसार, केतन अग्रवाल की दर्दनाक मौत के बाद डॉ. मुस्कान सोनी ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक पोस्ट साझा की थी, जिसे मृतक का मजाक उड़ाने वाला और असंवेदनशील माना गया। संगठन का कहना है कि ऐसी टिप्पणियां न केवल पीड़ित परिवार की भावनाओं को आहत करती हैं, बल्कि संस्था की गरिमा और पेशेवर नैतिकता के भी खिलाफ हैं। पांच साल तक लागू रहेगा निलंबन जारी आदेश के मुताबिक, निलंबन अगले पांच वर्षों तक प्रभावी रहेगा। इस अवधि में डॉ. मुस्कान सोनी संगठन की किसी भी गतिविधि, पद या सदस्यता से जुड़ी भूमिका नहीं निभा सकेंगी। सक्षम प्राधिकारी परिस्थितियों के आधार पर भविष्य में इस आदेश की समीक्षा या संशोधन कर सकता है। केतन अग्रवाल हत्याकांड की जांच जारी इस बीच पुणे पुलिस केतन अग्रवाल हत्याकांड की जांच में जुटी हुई है। जांच एजेंसियां केतन के मोबाइल फोन की फोरेंसिक जांच कर रही हैं। पुलिस के अनुसार, घटना के बाद केतन का मोबाइल कुछ समय तक उनकी मंगेतर सिया गोयल के पास था, जिसके बाद फोन परिवार को सौंप दिया गया। अब यह जांच की जा रही है कि फोन से कोई डिजिटल साक्ष्य मिटाया गया या उसके साथ छेड़छाड़ की गई। 18 जून को हुई थी घटना पुलिस के मुताबिक, 18 जून को पुणे जिले के लोहागढ़ किले पर सिया गोयल और उसके कथित प्रेमी चेतन चौधरी ने केतन अग्रवाल को कथित रूप से खाई में धक्का दे दिया था, जिससे उनकी मौत हो गई। केतन और सिया की शादी इसी वर्ष नवंबर में प्रस्तावित थी। घटना के बाद पुलिस ने सिया गोयल और चेतन चौधरी को गिरफ्तार किया। दोनों फिलहाल पुलिस हिरासत में हैं और जांच एजेंसियां डिजिटल साक्ष्यों सहित मामले के सभी पहलुओं की पड़ताल कर रही हैं। घटनास्थल पर कराया गया सीन रीक्रिएशन जांच के क्रम में पुलिस दोनों आरोपियों को अलग-अलग समय पर लोहागढ़ किले लेकर गई, जहां कथित घटनाक्रम का पुनर्निर्माण (सीन रीक्रिएशन) कराया गया। पुलिस का कहना है कि इससे घटना के क्रम और दोनों आरोपियों की भूमिका को समझने में मदद मिल रही है।
प्रसिद्ध पार्श्व गायिका Asha Bhosle के निधन के बाद पूरे देश में शोक की लहर है। राजनीतिक हस्तियों से लेकर फिल्मी सितारों तक, हर कोई उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा है। इसी बीच अभिनेत्री Athiya Shetty की एक बड़ी चूक सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गई है। श्रद्धांजलि में हुई बड़ी गलती अथिया शेट्टी ने इंस्टाग्राम स्टोरी के जरिए Asha Bhosle को श्रद्धांजलि दी, लेकिन गलती से उनकी जगह उनकी बड़ी बहन Lata Mangeshkar की तस्वीर शेयर कर दी। गौरतलब है कि Lata Mangeshkar का निधन साल 2022 में हो चुका है। हालांकि, अभिनेत्री ने अपनी गलती का एहसास होते ही पोस्ट डिलीट कर दिया, लेकिन तब तक इसका स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो चुका था। सोशल मीडिया पर भड़के यूजर्स इस चूक के बाद Athiya Shetty को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर जमकर आलोचना का सामना करना पड़ा। कई यूजर्स ने उनकी जानकारी पर सवाल उठाए, तो कुछ ने इसे “बेहद शर्मनाक” बताया। एक यूजर ने लिखा कि क्या किसी को उन्हें बताना चाहिए कि लता मंगेशकर का कई साल पहले निधन हो चुका है। वहीं कुछ अन्य यूजर्स ने कड़ी भाषा का इस्तेमाल करते हुए उन्हें ट्रोल किया। तेजी से बढ़ा विवाद सोशल मीडिया पर यह मामला तेजी से फैल गया और कई लोगों ने इसे संवेदनशील मौके पर की गई बड़ी लापरवाही बताया। हालांकि, अभी तक Athiya Shetty की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यह घटना एक बार फिर यह दिखाती है कि सार्वजनिक मंचों पर की गई छोटी सी गलती भी बड़े विवाद का रूप ले सकती है, खासकर जब मामला किसी सम्मानित हस्ती से जुड़ा हो।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।