श्रीनगर, एजेंसियां। भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने अपने जम्मू-कश्मीर दौरे के दौरान क्षेत्र को “भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा” बताया। श्रीनगर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात के बाद गोर ने जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा स्थिति में सुधार की भी सराहना की। जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा स्थिति की तारीफ सर्जियो गोर ने कहा कि केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने क्षेत्र को अधिक सुरक्षित बनाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। उन्होंने जम्मू-कश्मीर की प्राकृतिक सुंदरता और यहां पर्यटन की संभावनाओं का भी उल्लेख किया। अमेरिकी ट्रैवल एडवाइजरी की समीक्षा के संकेत अमेरिकी राजदूत ने संकेत दिया कि अमेरिका जम्मू-कश्मीर के लिए जारी अपनी मौजूदा ट्रैवल एडवाइजरी की समीक्षा कर सकता है। उनका कहना है कि सुरक्षा स्थिति में सुधार को देखते हुए अमेरिकी नागरिकों के लिए यात्रा संबंधी दिशा-निर्देशों में बदलाव पर विचार किया जा सकता है। हालांकि, उन्होंने बदलाव की कोई निश्चित समयसीमा नहीं बताई। पाकिस्तान ने जताया कड़ा विरोध गोर के बयान के बाद पाकिस्तान ने अमेरिकी राजनयिक को तलब कर कड़ा विरोध दर्ज कराया। पाकिस्तान के विदेश कार्यालय ने जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा बताए जाने वाली टिप्पणी को खारिज किया और इसे “तथ्यात्मक रूप से गलत” बताया। सर्जियो गोर का यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत-पाकिस्तान के बीच जम्मू-कश्मीर को लेकर कूटनीतिक तनाव बना हुआ है। बयान को भारत के पक्ष में अमेरिका की ओर से आया एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक संकेत माना जा रहा है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। अमेरिका के साउथ और सेंट्रल एशिया के स्पेशल एनवॉय सर्जियो गोर की जम्मू-कश्मीर यात्रा ने भारत-अमेरिका-पाकिस्तान के कूटनीतिक समीकरण को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। 19 अगस्त को गोर ने जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात की। इसके बाद उनके उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से मिलने और लद्दाख जाने का कार्यक्रम भी बताया गया। इस यात्रा का सबसे अहम पहलू गोर का यह बयान रहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद अमेरिकी प्रतिनिधि की यह पहली स्वतंत्र और हाई-प्रोफाइल जम्मू-कश्मीर यात्रा बताई जा रही है। कश्मीर को लेकर अमेरिकी भाषा में बदलाव गोर ने जम्मू-कश्मीर को भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। इससे पहले अमेरिकी कूटनीतिक बयानों में कश्मीर को लेकर ‘विवादित क्षेत्र’ या भारत-पाकिस्तान विवाद जैसी शब्दावली देखने को मिलती रही है। हालांकि, उन्होंने इसे भारत का ‘अभिन्न अंग’ नहीं कहा है। इसलिए इसे अमेरिकी नीति में पूरी तरह बदलाव मानना अभी जल्दबाजी होगी। उमर अब्दुल्ला ने दिया साफ संदेश मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने पहले ही स्पष्ट किया था कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाना उनकी प्राथमिकता नहीं है। उन्होंने संकेत दिया कि दिल्ली के साथ राजनीतिक मतभेदों को भारत के भीतर ही सुलझाया जाएगा। इससे यह संदेश गया कि जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर किसी तीसरे देश की मध्यस्थता को लेकर श्रीनगर की ओर से भी उत्सुकता नहीं है। पाकिस्तान के लिए क्या संदेश? अमेरिका ने पाकिस्तान के कश्मीर दावे को सीधे तौर पर खारिज नहीं किया है। इसलिए इसे पाकिस्तान के खिलाफ अमेरिकी नीति में बड़ा बदलाव कहना सही नहीं होगा। फिर भी जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा बताना पाकिस्तान के उस नैरेटिव के लिए झटका माना जा सकता है, जिसमें वह कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय विवाद के तौर पर पेश करता रहा है। ट्रैवल एडवाइजरी में राहत के संकेत गोर की यात्रा के दौरान अमेरिकी ट्रैवल एडवाइजरी में बदलाव की संभावना के संकेत भी महत्वपूर्ण हैं। पहलगाम हमले के बाद अमेरिका ने जम्मू-कश्मीर को लेकर अपने नागरिकों के लिए कड़ी यात्रा चेतावनी जारी की थी। अगर भविष्य में एडवाइजरी में राहत मिलती है और अमेरिकी पर्यटकों की आवाजाही बढ़ती है, तो इससे जम्मू-कश्मीर के पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को फायदा हो सकता है। क्या अमेरिका भारत के पक्ष में पूरी तरह आ गया? फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। अमेरिका भारत के साथ अपने संबंध मजबूत करने के साथ पाकिस्तान के साथ अपने रणनीतिक हित भी बनाए रखना चाहता है। इसलिए गोर की यात्रा को अमेरिकी विदेश नीति में पूर्ण यू-टर्न के बजाय कश्मीर को लेकर सार्वजनिक कूटनीतिक भाषा में संभावित बदलाव के तौर पर देखना ज्यादा उचित होगा। कुल मिलाकर, इस यात्रा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि अमेरिकी प्रतिनिधि ने सार्वजनिक रूप से जम्मू-कश्मीर को भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है। हालांकि, आने वाले समय में अमेरिका के आधिकारिक बयानों और नीतिगत फैसलों से ही स्पष्ट होगा कि यह केवल कूटनीतिक शब्दावली का बदलाव है या व्यापक नीति परिवर्तन की शुरुआत।
नई दिल्ली: पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े एक कार्यक्रम का कथित वीडियो सामने आने के बाद कश्मीर में आतंकवाद को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। मौलवी नसीर मदनी ने कथित तौर पर दावा किया कि लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद ने कश्मीर में 10 हजार आतंकियों को भेजा था। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। मदनी के इस बयान पर भारतीय सेना के पूर्व अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडेय ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आतंकवादियों के खिलाफ जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों की कार्रवाई का जिक्र करते हुए मदनी पर तंज कसा और कहा कि आतंकवाद का रास्ता चुनने वालों का अंत सुरक्षा बलों की कार्रवाई में हुआ है। लश्कर से जुड़े कार्यक्रम में मदनी का दावा रिपोर्ट के मुताबिक, 14 अगस्त को पाकिस्तान के बहावलनगर में लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े एक कार्यक्रम में नसीर मदनी मंच पर नजर आया। कथित भाषण के दौरान उसने हाफिज सईद की तारीफ करते हुए दावा किया कि सईद ने कश्मीर में 10 हजार आतंकियों को भेजा था। यह दावा ऐसे समय सामने आया है जब पाकिस्तान से संचालित आतंकी संगठनों और जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के बीच संबंध लंबे समय से भारत की सुरक्षा चिंताओं का प्रमुख मुद्दा रहे हैं। हालांकि, मदनी द्वारा बताए गए 10 हजार के आंकड़े की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। पूर्व सैन्य अधिकारी ने दिया तीखा जवाब मदनी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडेय ने भारतीय सेना, चिनार कोर और जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा आतंकवाद विरोधी अभियानों का हवाला दिया। उन्होंने अपने बयान में संकेत दिया कि कश्मीर में आतंकवाद फैलाने वाले कई आतंकियों को सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मार गिराया गया। इसी संदर्भ में उन्होंने मदनी के बयान पर कटाक्ष करते हुए उसके लिए भी ‘विदाई’ जैसी टिप्पणी की। हार्ट अटैक के बाद फिर चर्चा में मदनी नसीर मदनी इससे पहले जुलाई में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के जहानियां में एक धार्मिक कार्यक्रम के दौरान अचानक गिरने के बाद चर्चा में आया था। रिपोर्टों के अनुसार, उसे अस्पताल ले जाया गया और बाद में उसकी हालत स्थिर बताई गई थी। अब अगस्त में लश्कर से जुड़े कार्यक्रम में उसकी कथित मौजूदगी और कश्मीर को लेकर दिए गए बयान ने उसे फिर सुर्खियों में ला दिया है। हाफिज सईद का नाम फिर चर्चा में हाफिज सईद लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा प्रमुख चेहरा रहा है और भारत लंबे समय से उसके संगठनात्मक नेटवर्क तथा आतंकवादी गतिविधियों को लेकर पाकिस्तान पर सवाल उठाता रहा है। ऐसे में नसीर मदनी के कथित बयान ने कश्मीर में सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
जम्मू, एजेंसियां। जम्मू-कश्मीर सरकार में मंत्री सतीश शर्मा ने प्रशासनिक अधिकारियों के रवैये को लेकर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से शिकायत की है। शर्मा ने आरोप लगाया कि कुछ अधिकारी मंत्रियों की ओर से दिए गए निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री से मामले में हस्तक्षेप कर प्रशासनिक स्तर पर जरूरी कार्रवाई करने की मांग की है। अधिकारियों के रवैये पर उठाए सवाल सतीश शर्मा के पास खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले, परिवहन, सूचना प्रौद्योगिकी, युवा सेवाएं एवं खेल तथा प्रशासनिक सुधार एवं प्रशिक्षण जैसे विभाग हैं। उन्होंने शिकायत में कथित तौर पर कहा कि विभागीय कामकाज के दौरान मंत्रियों के निर्देशों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। मंत्री की शिकायत ऐसे समय सामने आई है, जब जम्मू-कश्मीर सरकार प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही और अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार जोर दे रही है। मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग शर्मा ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से इस मामले को गंभीरता से लेने और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को सरकार के निर्णयों एवं मंत्रियों के निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराने का अनुरोध किया है। सरकार के कामकाज में मंत्री और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच बेहतर समन्वय को महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में एक मंत्री द्वारा मुख्यमंत्री के समक्ष अधिकारियों के आदेश नहीं मानने की शिकायत किया जाना राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उमर सरकार के सामने प्रशासनिक समन्वय की चुनौती जम्मू-कश्मीर में उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार के सामने प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावी बनाने की चुनौती बनी हुई है। सरकार पहले भी अधिकारियों से विभागीय लक्ष्यों को समय पर पूरा करने और जनसेवा से जुड़े कामों की निगरानी बढ़ाने पर जोर देती रही है। अब सतीश शर्मा की शिकायत के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मुख्यमंत्री कार्यालय इस मामले में क्या कदम उठाता है और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कोई प्रशासनिक कार्रवाई होती है या नहीं।
कुपवाड़ा, एजेंसियां। जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में स्वतंत्रता दिवस से पहले 1,200 मीटर लंबे तिरंगे के साथ मेगा तिरंगा रैली निकाली गई। मंगलवार को आयोजित यह रैली गुंडीशार्ट से टीटवाल तक, नियंत्रण रेखा (LoC) के पास निकाली गई, जिसमें स्कूली छात्रों, पूर्व सैनिकों, स्थानीय लोगों और प्रशासनिक अधिकारियों ने हिस्सा लिया। 1,200 मीटर लंबे तिरंगे ने खींचा ध्यान रैली का सबसे बड़ा आकर्षण 1,200 मीटर लंबा राष्ट्रीय ध्वज रहा। बड़ी संख्या में लोगों ने तिरंगे को हाथों में लेकर मार्च किया और देशभक्ति के नारे लगाए। LoC के नजदीक हुए इस आयोजन ने पूरे इलाके में देशभक्ति का माहौल बना दिया। छात्रों और पूर्व सैनिकों ने लिया हिस्सा रैली में स्कूल के छात्र-छात्राओं, शिक्षकों, पूर्व सैनिकों, नागरिक समाज के सदस्यों और स्थानीय निवासियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कुपवाड़ा के डिप्टी कमिश्नर श्रीकांत बालासाहेब सुसे और एसएसपी सैयद अल ताहिर गिलानी ने भी रैली में शामिल होकर प्रतिभागियों के साथ मार्च किया। स्वतंत्रता दिवस से पहले देशभक्ति का संदेश यह आयोजन ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के तहत किया गया। अधिकारियों के मुताबिक, रैली का उद्देश्य लोगों में राष्ट्रीय एकता, देशभक्ति और सामुदायिक भागीदारी की भावना को मजबूत करना था। LoC के करीब आयोजित इस कार्यक्रम ने क्षेत्र में बदलते माहौल और लोगों की बढ़ती सार्वजनिक भागीदारी को भी सामने रखा।
जम्मू, एजेंसियां। जम्मू-कश्मीर के जम्मू शहर में रविवार रात बड़ा सड़क हादसा हो गया। शकुंतला फ्लाईओवर पर छात्रों को ले जा रही एक मेटाडोर (मिनीबस) अनियंत्रित होकर पलट गई। हादसे में 29 छात्र घायल हुए हैं, जिनमें तीन की हालत गंभीर बताई जा रही है। सभी घायलों को इलाज के लिए जम्मू के सरकारी मेडिकल कॉलेज (GMC) अस्पताल में भर्ती कराया गया है। तिरंगा रैली से लौटते समय हुआ हादसा जानकारी के मुताबिक, छात्र तिरंगा रैली में शामिल होने के बाद बाग-ए-बाहु से मुबारक मंडी लौट रहे थे। इसी दौरान शकुंतला फ्लाईओवर पर मिनीबस हादसे का शिकार हो गई। दुर्घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और स्थानीय लोगों की मदद से राहत एवं बचाव कार्य शुरू किया गया। घायलों को तत्काल जम्मू के GMC अस्पताल पहुंचाया गया, जहां डॉक्टरों की टीम उनका इलाज कर रही है। 29 मरीज अस्पताल में भर्ती GMC जम्मू के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. वीरेंद्र त्रिसाल के अनुसार, हादसे में कुल 29 छात्र घायल हुए हैं। ज्यादातर छात्रों की स्थिति खतरे से बाहर है, हालांकि कुछ छात्रों को फ्रैक्चर हुआ है। अस्पताल की ओर से जारी आधिकारिक सूची के अनुसार, 3 मरीजों की हालत क्रिटिकल, जबकि 26 मरीजों की स्थिति स्थिर बताई गई है। गंभीर रूप से घायल तीन छात्राओं में: सुहानी देवी (21) — भवाल, जम्मू आरती देवी (20) — मजालता, उधमपुर सीमा देवी (27) — अथोली, किश्तवाड़ शामिल हैं। सीएम उमर अब्दुल्ला ने जताया दुख हादसे की जानकारी मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को भी मिली। उन्होंने दुर्घटना पर चिंता और दुख जताते हुए घायलों के जल्द स्वस्थ होने की कामना की। मुख्यमंत्री ने संबंधित अधिकारियों को घायलों को हर संभव चिकित्सा सुविधा और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। फिलहाल अस्पताल में सभी घायलों का इलाज जारी है और गंभीर मरीजों की स्थिति पर डॉक्टर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
श्रीनगर, एजेंसियां। जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों ने लश्कर-ए-तैयबा के कथित कमांडर मोहम्मद लतीफ भट की तलाश तेज कर दी है। पुलिस ने उसकी गिरफ्तारी में मदद करने वाली जानकारी देने वाले व्यक्ति के लिए 15 लाख रुपये के इनाम की घोषणा की है। दक्षिण कश्मीर के कई इलाकों और जम्मू के कुछ हिस्सों में भट के पोस्टर भी लगाए गए हैं。 कई इलाकों में लगाए गए वांटेड पोस्टर सुरक्षा एजेंसियों ने लतीफ भट की तस्वीर वाले वांटेड पोस्टर दक्षिण कश्मीर के विभिन्न जिलों में लगाए हैं। इन पोस्टरों के जरिए लोगों से उसकी मौजूदगी या ठिकाने से जुड़ी जानकारी सुरक्षा एजेंसियों तक पहुंचाने की अपील की गई है। पुलिस का कहना है कि सूचना देने वाले की पहचान गोपनीय रखी जाएगी। दक्षिण कश्मीर में हालिया घटनाओं के बाद बढ़ी सक्रियता लतीफ भट को दक्षिण कश्मीर में हाल की लक्षित हत्याओं से जोड़कर सुरक्षा एजेंसियां उसकी तलाश कर रही हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, अनंतनाग और कुलगाम में हाल में हुई घटनाओं के बाद सुरक्षा बलों ने उसके खिलाफ अभियान तेज किया है। गिरफ्तारी के लिए सुरक्षा एजेंसियों का अभियान तेज सुरक्षा बलों और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने लतीफ भट को पकड़ने के लिए अभियान तेज कर दिया है। उसके संभावित ठिकानों और आवाजाही से जुड़े इनपुट की जांच की जा रही है। 15 लाख रुपये के इनाम की घोषणा के साथ ही उसके बारे में सूचना जुटाने के लिए आम लोगों से भी सहयोग मांगा गया है।
जम्मू। जम्मू-कश्मीर के रामबन जिले में जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर शुक्रवार तड़के एक संदिग्ध स्कॉर्पियो वाहन ने सुरक्षा नाके पर पुलिस के रुकने के संकेत को नजरअंदाज कर नाकाबंदी तोड़ दी। वाहन को रोकने के लिए पुलिस ने तीन राउंड फायरिंग की, लेकिन चालक तेज रफ्तार से भाग निकला। बाद में वाहन बरामद कर लिया गया, जबकि चालक फरार है। पूरे इलाके में सुरक्षा एजेंसियों ने संयुक्त तलाशी अभियान शुरू कर दिया है। सुबह 3:30 बजे हुई घटना पुलिस के अनुसार घटना सुबह करीब 3:30 बजे रामबन जिले के चंदरकोट सुरक्षा नाके पर हुई। श्रीनगर से जम्मू की ओर आ रही स्कॉर्पियो को जांच के लिए रोका गया, लेकिन चालक ने वाहन रोकने के बजाय तेज गति से बैरिकेड पार कर दिए। पुलिस ने की तीन राउंड फायरिंग संदिग्ध वाहन को रोकने के प्रयास में पुलिस ने तीन राउंड फायरिंग की, लेकिन चालक नाशरी की दिशा में भागने में सफल रहा। सूचना मिलते ही जम्मू-कश्मीर पुलिस, सीआरपीएफ और भारतीय सेना ने संयुक्त रूप से पूरे इलाके की घेराबंदी कर सर्च ऑपरेशन शुरू किया। कुछ दूरी पर मिली स्कॉर्पियो रामबन के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) अरुण गुप्ता ने बताया कि संदिग्ध स्कॉर्पियो डलवास इलाके से बरामद कर ली गई है। हालांकि चालक वाहन छोड़कर फरार हो गया। उसकी तलाश जारी है। मंशा की जांच में जुटीं एजेंसियां सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि चालक ने सुरक्षा जांच से बचने की कोशिश क्यों की और उसके पीछे क्या उद्देश्य था। फिलहाल पूरे क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और मामले की जांच जारी है।
अनुच्छेद 370 के सात साल पूरे, जम्मू-कश्मीर में सियासी टकराव; NC-PDP का विरोध, BJP का जश्न श्रीनगर, एजेंसियां। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के विशेष प्रावधान हटाए जाने के सात साल पूरे होने पर बुधवार को केंद्रशासित प्रदेश में राजनीतिक गतिविधियां तेज रहीं। नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) ने 5 अगस्त को विरोध और काले दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की, जबकि BJP ने इसे राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कार्यक्रम आयोजित किए। NC-PDP का विरोध, काले दिवस के रूप में मनाया दिन नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी नेताओं ने अनुच्छेद 370 हटाए जाने के फैसले का विरोध किया। दोनों दलों का कहना है कि 5 अगस्त 2019 को लिया गया फैसला जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे और संवैधानिक स्थिति से जुड़ा बड़ा बदलाव था। विरोध कार्यक्रमों को देखते हुए प्रशासन ने कई संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की। राजनीतिक गतिविधियों पर नजर रखने के लिए सुरक्षा बलों की तैनाती भी बढ़ाई गई। BJP ने बताया ऐतिहासिक उपलब्धि वहीं भाजपा ने 5 अगस्त को राष्ट्रीय एकता और एकीकरण के लिए महत्वपूर्ण दिन बताते हुए कार्यक्रम आयोजित किए। पार्टी नेताओं ने कहा कि अनुच्छेद 370 के प्रावधान हटने के बाद जम्मू-कश्मीर को देश के बाकी हिस्सों के साथ पूरी तरह जोड़ने की प्रक्रिया मजबूत हुई है। BJP कार्यकर्ताओं ने विभिन्न स्थानों पर कार्यक्रम और सभाएं आयोजित कर केंद्र सरकार के 2019 के फैसले का समर्थन किया। 2019 में हुआ था बड़ा संवैधानिक बदलाव 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष प्रावधानों को प्रभावी रूप से समाप्त कर दिया था। इसके बाद जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के तहत तत्कालीन राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख नाम के दो केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजित किया गया. दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 हटाने के केंद्र के फैसले को बरकरार रखा था। इसके बाद जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव हुए और निर्वाचित सरकार का गठन हुआ। राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग भी तेज अनुच्छेद 370 की सातवीं वर्षगांठ पर राजनीतिक टकराव के बीच जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग भी फिर प्रमुख मुद्दा बनी हुई है। NC और PDP समेत कई क्षेत्रीय राजनीतिक दल केंद्र से राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग कर रहे हैं। वहीं BJP अनुच्छेद 370 हटाने के बाद क्षेत्र में हुए बदलावों को अपनी सरकार की उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है। इस तरह 5 अगस्त 2026 को जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को लेकर समर्थन और विरोध की राजनीति एक बार फिर आमने-सामने दिखाई दी।
पुंछ, एजेंसियां। जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में नियंत्रण रेखा (LoC) के नजदीक स्थित कुछ सीमावर्ती गांवों में मोर्टार के पुराने गोले मिलने के बाद सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। ग्रामीण इलाकों में इन संदिग्ध वस्तुओं के मिलने के बाद सुरक्षा बलों ने क्षेत्र को सुरक्षित कर जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों ने लोगों से ऐसी किसी भी वस्तु को छूने से बचने और तुरंत सुरक्षाबलों को सूचना देने की अपील की है। सीमावर्ती इलाकों में मिले मोर्टार के गोले प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, पुंछ के LoC से सटे कुछ गांवों में ग्रामीणों को मोर्टार के गोले दिखाई दिए। सूचना मिलने के बाद सुरक्षाबलों और पुलिस की टीमों ने मौके पर पहुंचकर इलाके की घेराबंदी की और संदिग्ध वस्तुओं की जांच शुरू की। अधिकारियों को आशंका है कि ये गोले पुराने हो सकते हैं और पहले हुई गोलीबारी या सैन्य गतिविधियों के दौरान यहां रह गए होंगे। हालांकि, इनके वहां पहुंचने की वास्तविक वजह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी। सुरक्षा एजेंसियों ने बढ़ाई निगरानी घटना के बाद सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया गया है। सुरक्षाबलों ने आसपास के इलाकों में तलाशी अभियान चलाकर यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि वहां कोई अन्य संदिग्ध वस्तु मौजूद न हो। मोर्टार के गोले मिलने के बाद सुरक्षा एजेंसियां इस पहलू की भी जांच कर रही हैं कि क्या ये वस्तुएं हाल की किसी गतिविधि से जुड़ी हैं या लंबे समय से जमीन में पड़ी हुई थीं। ग्रामीणों से सतर्क रहने की अपील सुरक्षा अधिकारियों ने सीमावर्ती गांवों के लोगों से अपील की है कि यदि उन्हें कोई मोर्टार का गोला, विस्फोटक या संदिग्ध वस्तु दिखाई दे तो उसे छूने या हटाने की कोशिश न करें। ऐसी वस्तु मिलने पर तुरंत पुलिस या सुरक्षा बलों को सूचना देने को कहा गया है। सीमावर्ती इलाकों में पहले भी पुराने और बिना फटे गोला-बारूद मिलने के मामले सामने आते रहे हैं। ऐसे मामलों में विशेषज्ञ टीम ही वस्तु को सुरक्षित तरीके से हटाने या निष्क्रिय करने की कार्रवाई करती है। जांच के बाद स्पष्ट होगी स्थिति फिलहाल सुरक्षा एजेंसियां बरामद मोर्टार गोलों की जांच कर रही हैं। अधिकारियों के अनुसार, जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि ये गोले कितने पुराने हैं और उनके पुंछ के सीमावर्ती गांवों तक पहुंचने की वजह क्या है। घटना के बाद क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी गई है और सुरक्षा एजेंसियां किसी भी संभावित खतरे को देखते हुए स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।
जम्मू, एजेंसियां। जम्मू-कश्मीर के रामबन जिले में पुलिस ने 21 संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों को हिरासत में लिया है। अधिकारियों के मुताबिक, ये लोग जम्मू से कश्मीर घाटी की ओर दो वाहनों में यात्रा कर रहे थे। नियमित जांच के दौरान उनके पास पहचान और यात्रा से जुड़े वैध दस्तावेज नहीं मिलने के बाद उन्हें हिरासत में लिया गया। बनिहाल में जांच के दौरान पकड़े गए पुलिस के अनुसार, समूह को रामबन जिले के बनिहाल क्षेत्र में एक चेकपॉइंट पर रोका गया था। प्रारंभिक जांच में उनके पास भारत में रहने या यात्रा करने से संबंधित आवश्यक दस्तावेज नहीं पाए गए। अधिकारियों ने सभी लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की है। रिपोर्टों के अनुसार, हिरासत में लिए गए लोगों में महिलाएं और नाबालिग बच्चे भी शामिल हैं। एक रिपोर्ट में तीन महिलाओं और सात बच्चों का उल्लेख किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि समूह के बांग्लादेश के अलग-अलग इलाकों, खासकर सिलहट क्षेत्र से होने की जानकारी सामने आई है। इमिग्रेशन नियमों के तहत जांच मामले में पुलिस ने Immigration and Foreigners Act, 2025 की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि ये लोग भारत में कैसे दाखिल हुए और जम्मू-कश्मीर तक कैसे पहुंचे। अधिकारियों की पूछताछ का एक अहम पहलू यह भी है कि कहीं इन लोगों की भारत में आवाजाही में किसी व्यक्ति या नेटवर्क ने मदद तो नहीं की। जांच पूरी होने के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई तय की जाएगी। सुरक्षा व्यवस्था के बीच बढ़ी जांच यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। अधिकारियों ने बताया कि दस्तावेजों की जांच और पहचान सत्यापन की प्रक्रिया के बाद ही हिरासत में लिए गए लोगों की आगे की स्थिति स्पष्ट होगी। फिलहाल पुलिस मामले की जांच कर रही है और उनके भारत में प्रवेश तथा यहां रहने से जुड़े तथ्यों को सत्यापित किया जा रहा है।
जम्मू, एजेंसियां। जम्मू-कश्मीर के राजौरी और पुंछ जिलों में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश के बीच बादल फटने, अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन ने भारी तबाही मचा दी है। ताज़ा जानकारी के अनुसार, इस प्राकृतिक आपदा में कम से कम 14 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई लोग अब भी लापता हैं। प्रशासन ने आशंका जताई है कि मलबे में दबे लोगों के मिलने के साथ मृतकों की संख्या बढ़ सकती है। पुंछ और राजौरी सबसे ज्यादा प्रभावित सबसे अधिक नुकसान पुंछ और राजौरी के पहाड़ी इलाकों में हुआ है, जहां तेज बारिश के कारण कई मकान, सड़कें और पुल बह गए। अचानक आई बाढ़ और पहाड़ों से गिरे मलबे ने कई गांवों का संपर्क भी तोड़ दिया है। स्थानीय प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्रों में राहत शिविर स्थापित किए हैं। बचाव अभियान युद्धस्तर पर जारी NDRF, SDRF, सेना, पुलिस और स्थानीय प्रशासन की टीमें संयुक्त रूप से राहत एवं बचाव कार्य में जुटी हुई हैं। मलबे में फंसे लोगों को निकालने और लापता लोगों की तलाश के लिए भारी मशीनों और ड्रोन की मदद ली जा रही है। कई परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। सरकार ने लिया स्थिति का जायजा मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उपराज्यपाल प्रशासन लगातार हालात की निगरानी कर रहे हैं। प्रभावित जिलों में राहत सामग्री पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं और मृतकों के परिजनों को आर्थिक सहायता देने की घोषणा भी की गई है। भारी बारिश का अलर्ट जारी मौसम विभाग ने जम्मू-कश्मीर के कई हिस्सों में अगले 24 घंटों तक भारी बारिश की चेतावनी जारी की है। प्रशासन ने लोगों से नदियों-नालों और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों से दूर रहने तथा केवल आवश्यक होने पर ही यात्रा करने की अपील की है।
श्रीनगर, एजेंसियां। जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को लेकर आयोजित नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) की जनसभा के बाद नया विवाद खड़ा हो गया है। जम्मू के महाराजा हरि सिंह पार्क में आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला समेत पार्टी के वरिष्ठ नेताओं द्वारा महाराजा हरि सिंह की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित नहीं किए जाने को लेकर कई सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने नाराजगी जताई है। संगठनों ने इसे महाराजा हरि सिंह का अपमान बताते हुए नेशनल कॉन्फ्रेंस से सार्वजनिक माफी की मांग की है। श्रद्धांजलि नहीं देने पर उठे सवाल रविवार को आयोजित जनसभा में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग उठाई थी। हालांकि कार्यक्रम समाप्त होने के बाद यह आरोप लगाया गया कि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और अन्य नेताओं ने पार्क में स्थापित महाराजा हरि सिंह की प्रतिमा पर न तो कार्यक्रम से पहले और न ही बाद में श्रद्धांजलि अर्पित की। इस मुद्दे को लेकर राष्ट्रीय बजरंग दल सहित कई संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई। संगठनों ने सार्वजनिक माफी की मांग की राष्ट्रीय बजरंग दल का कहना है कि जिस राज्य की बहाली की मांग की जा रही है, उसकी नींव महाराजा हरि सिंह ने रखी थी। ऐसे में उनकी प्रतिमा के समक्ष श्रद्धांजलि न देना उनका अपमान है। वहीं युवा राजपूत सभा ने भी इस घटना की निंदा करते हुए कहा कि जम्मू के लोग इस व्यवहार को स्वीकार नहीं करेंगे और नेशनल कॉन्फ्रेंस को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। राजनीतिक विशेषज्ञों ने बताया राजनीतिक संदेश राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक पृष्ठभूमि से भी जुड़ा है। उनके अनुसार, नेशनल कॉन्फ्रेंस 13 जुलाई को 'शहीदी दिवस' के रूप में मनाती है और उस ऐतिहासिक घटना के लिए महाराजा हरि सिंह के शासन को जिम्मेदार ठहराती रही है। ऐसे में कार्यक्रम के दौरान श्रद्धांजलि न देना भी एक राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।
श्रीनगर: 3 जुलाई से शुरू होने वाली अमरनाथ यात्रा से पहले जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था अभूतपूर्व स्तर पर कड़ी कर दी गई है। अनंतनाग पुलिस ने पहलगाम और आसपास के इलाकों में घर-घर तलाशी अभियान शुरू कर दिया है, ताकि आतंकी घुसपैठ की किसी भी कोशिश को समय रहते नाकाम किया जा सके। सुरक्षा एजेंसियां यात्रा मार्ग से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति की पहचान और पृष्ठभूमि की जांच कर रही हैं। इसके तहत घोड़ा संचालकों, ड्राइवरों, पिट्ठुओं और फोटोग्राफरों को अलग-अलग QR कोड वाले पहचान पत्र जारी किए गए हैं। बिना QR-ID यात्रियों के साथ नहीं जा सकेगा कोई पुलिस ने स्पष्ट किया है कि अब बिना वैध QR कोड और पहचान पत्र के कोई भी व्यक्ति यात्रियों के साथ पहाड़ पर नहीं जा सकेगा। सुरक्षा बल प्रत्येक आईडी कार्ड को स्कैन कर उसका सत्यापन कर रहे हैं, जिससे फर्जी पहचान के जरिए यात्रा मार्ग में प्रवेश की संभावना समाप्त हो सके। 2017 के आतंकी हमले से लिया सबक सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के पीछे वर्ष 2017 की वह घटना भी है, जब 10 जुलाई को अनंतनाग में अमरनाथ यात्रियों की बस पर आतंकियों ने अंधाधुंध फायरिंग की थी। इस हमले में आठ श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी, जबकि 19 अन्य घायल हुए थे। जांच में सामने आया था कि आतंकियों को स्थानीय स्तर पर मदद मिली थी और कुछ संदिग्ध लोग यात्रियों के बीच घुसपैठ करने में सफल रहे थे। इसी अनुभव को ध्यान में रखते हुए इस बार यात्रा से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति का विस्तृत सत्यापन किया जा रहा है। QR सिस्टम से रहेगा हर गतिविधि का रिकॉर्ड सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, QR कोड आधारित व्यवस्था से प्रत्येक घोड़ा संचालक, पिट्ठू, ड्राइवर और सेवा प्रदाता का पूरा डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा। किसी भी संदिग्ध गतिविधि या गड़बड़ी की स्थिति में संबंधित व्यक्ति की तुरंत पहचान कर कार्रवाई की जा सकेगी। स्थानीय लोगों ने किया स्वागत घोड़ा संचालकों और वाहन चालकों ने इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि QR कोड प्रणाली से न केवल उनकी पहचान सुनिश्चित हुई है, बल्कि इससे श्रद्धालुओं का भरोसा भी बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि अब फर्जी सेवा प्रदाताओं और ठगी की घटनाओं पर भी अंकुश लगेगा। 3 जुलाई से शुरू होगी 57 दिन की अमरनाथ यात्रा इस वर्ष अमरनाथ यात्रा 3 जुलाई 2026 से शुरू होकर 28 अगस्त 2026 (रक्षाबंधन) तक चलेगी। कुल 57 दिनों तक चलने वाली इस यात्रा के लिए ऑनलाइन पंजीकरण प्रक्रिया 15 अप्रैल 2026 से शुरू हो चुकी है। प्रशासन को इस वर्ष भी लाखों श्रद्धालुओं के पवित्र गुफा तक पहुंचने की उम्मीद है।
इस्लामाबाद/नई दिल्ली: पाकिस्तान ने पिछले 16 महीनों में अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को अभूतपूर्व गति देते हुए छह नए अर्थ-ऑब्जर्वेशन (पृथ्वी अवलोकन) सैटेलाइट लॉन्च किए हैं। सुरक्षा और अंतरिक्ष मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि इन उपग्रहों ने पाकिस्तान की निगरानी क्षमता को पहले की तुलना में काफी मजबूत बना दिया है। रिपोर्टों के अनुसार, इनमें से कई सैटेलाइट भारत, विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर और उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्रों की बार-बार निगरानी करने में सक्षम हैं। इस तेज विस्तार में चीन की तकनीकी और प्रक्षेपण सहायता को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 16 महीनों में छह नए मिशन रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2025 से जून 2026 के बीच पाकिस्तान ने छह प्रमुख अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजे हैं। इनमें PAUSAT-1, PRSC-EO1, PRSS-2, HS-1, PRSC-EO2 और PRSC-EO3 शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इतने कम समय में लगातार छह सैटेलाइट मिशनों का सफल संचालन पाकिस्तान के अंतरिक्ष कार्यक्रम में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। यह विस्तार ऐसे समय में हुआ है जब दक्षिण एशिया में सामरिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। नागरिक परियोजना या रणनीतिक निगरानी? पाकिस्तान की अंतरिक्ष एजेंसी सुपारको (SUPARCO) इन उपग्रहों को कृषि, पर्यावरण अध्ययन, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और आपदा निगरानी जैसी नागरिक आवश्यकताओं से जुड़ा बताती रही है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट्स आमतौर पर दोहरे उपयोग (Dual-Use) की क्षमता रखते हैं। यानी इन्हें नागरिक उद्देश्यों के साथ-साथ सैन्य और रणनीतिक निगरानी के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। कौन-कौन से सैटेलाइट हुए लॉन्च? PAUSAT-1: शुरुआत जनवरी 2025 में 14 जनवरी 2025 को पाकिस्तान ने PAUSAT-1 लॉन्च किया। यह एक अर्थ-ऑब्जर्वेशन क्यूबसैट है जिसे पृथ्वी की निम्न कक्षा में स्थापित किया गया। PRSC-EO1: तीन दिन बाद दूसरा मिशन 17 जनवरी 2025 को PRSC-EO1 लॉन्च किया गया। इसका उद्देश्य भू-स्थानिक डेटा एकत्र करना और पृथ्वी की सतह की निगरानी करना बताया गया। PRSS-2: हाई-रिजॉल्यूशन इमेजिंग क्षमता जुलाई 2025 में लॉन्च किया गया PRSS-2 उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें लेने में सक्षम माना जाता है। इससे जमीन पर होने वाली गतिविधियों की अधिक स्पष्ट निगरानी संभव होती है। HS-1: पहला हाइपरस्पेक्ट्रल सैटेलाइट अक्टूबर 2025 में पाकिस्तान ने HS-1 लॉन्च किया, जिसे उसका पहला हाइपरस्पेक्ट्रल अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट बताया गया। यह विभिन्न तरंगदैर्घ्यों पर डेटा एकत्र कर जमीन पर मौजूद वस्तुओं और संरचनाओं की बेहतर पहचान करने में सक्षम है। PRSC-EO2 और PRSC-EO3 फरवरी और अप्रैल 2026 में लॉन्च किए गए PRSC-EO2 और PRSC-EO3 को पाकिस्तान के पृथ्वी अवलोकन कार्यक्रम का अगला चरण माना जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, PRSC-EO3 की कक्षा को विशेष रूप से अधिक निगरानी क्षमता प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया है। जम्मू-कश्मीर पर विशेष फोकस? रिपोर्ट में सबसे अधिक चर्चा PRSC-EO3 को लेकर की गई है। दावा किया गया है कि इसे ऐसी कक्षा में स्थापित किया गया है, जिससे दक्षिण एशिया के कुछ क्षेत्रों, खासकर जम्मू-कश्मीर और उत्तरी भारत के ऊपर अधिक बार निगरानी संभव हो सके। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी क्षेत्र की बार-बार तस्वीरें लेने की क्षमता से सीमावर्ती गतिविधियों, बुनियादी ढांचे में बदलाव और सैन्य तैनाती पर लगातार नजर रखना आसान हो जाता है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। आधुनिक तकनीक से लैस हैं नए उपग्रह रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के हालिया सैटेलाइट मिशनों में हाई-रिजॉल्यूशन ऑप्टिकल इमेजिंग, हाइपरस्पेक्ट्रल सेंसर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित डेटा विश्लेषण जैसी उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। इन तकनीकों की मदद से बड़े पैमाने पर डेटा संग्रहण, गतिविधियों की पहचान और विस्तृत भू-स्थानिक विश्लेषण संभव हो सकता है। 1961 के बाद सबसे तेज विस्तार पाकिस्तान की अंतरिक्ष एजेंसी सुपारको की स्थापना 1961 में हुई थी। रिपोर्ट के अनुसार, स्थापना के बाद से पाकिस्तान ने कुल 15 सैटेलाइट मिशन संचालित किए हैं। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से छह मिशन केवल पिछले 16 महीनों में पूरे किए गए हैं। विशेषज्ञ इसे पाकिस्तान के अंतरिक्ष कार्यक्रम का सबसे तेज विस्तार मान रहे हैं। चीन बना सबसे बड़ा सहयोगी हाल के अधिकांश पाकिस्तानी सैटेलाइट मिशनों में चीन की भूमिका प्रमुख रही है। कई उपग्रहों को चीनी रॉकेटों की सहायता से लॉन्च किया गया, जबकि कुछ परियोजनाएं संयुक्त तकनीकी सहयोग के तहत विकसित की गईं। विश्लेषकों का मानना है कि चीन के सहयोग के बिना इतने कम समय में इस स्तर का विस्तार संभव नहीं होता। यही कारण है कि पाकिस्तान-चीन अंतरिक्ष सहयोग को क्षेत्रीय रणनीतिक समीकरणों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह घटनाक्रम? विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक युद्ध और राष्ट्रीय सुरक्षा में अंतरिक्ष आधारित निगरानी की भूमिका लगातार बढ़ रही है। सीमाओं की निगरानी, सैन्य गतिविधियों का आकलन, संचार नेटवर्क और वास्तविक समय की खुफिया जानकारी जुटाने में सैटेलाइट्स की अहम भूमिका होती है। ऐसे में पाकिस्तान की बढ़ती अंतरिक्ष निगरानी क्षमता को भारत के रणनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि भारत को भी अपनी पृथ्वी अवलोकन, संचार और निगरानी उपग्रह क्षमताओं को लगातार मजबूत बनाए रखना होगा। भविष्य की सामरिक प्रतिस्पर्धा का नया मोर्चा विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले वर्षों में अंतरिक्ष केवल वैज्ञानिक अनुसंधान का क्षेत्र नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक प्रतिस्पर्धा का प्रमुख मंच भी बनेगा। पाकिस्तान के हालिया सैटेलाइट मिशन इस बात का संकेत हैं कि दक्षिण एशिया में अंतरिक्ष आधारित निगरानी और खुफिया क्षमताओं की दौड़ अब और तेज होने वाली है।
नई दिल्ली: पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान में 7 जून को होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। इसी बीच भारत ने चुनाव कराने की पाकिस्तान की योजना पर कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए कहा है कि यह क्षेत्र भारत का अभिन्न हिस्सा है और वहां की स्थिति बदलने की कोई भी कोशिश स्वीकार्य नहीं है। भारत ने चुनावों को बताया अवैध विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के पूरे केंद्र शासित प्रदेश, जिनमें गिलगित-बाल्टिस्तान भी शामिल है, भारत के अभिन्न और अविभाज्य हिस्से हैं। मंत्रालय के अनुसार पाकिस्तान द्वारा इस क्षेत्र में कराए जाने वाले चुनाव उसकी ओर से किए जा रहे अवैध कब्जे को वैध नहीं बना सकते। भारत ने कहा कि पाकिस्तान को ऐसे क्षेत्रों पर अपना अवैध कब्जा समाप्त करना चाहिए और वहां की वास्तविक स्थिति बदलने के प्रयासों से बचना चाहिए। अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती का दावा चुनाव से पहले क्षेत्र में सुरक्षा बढ़ाने की खबरें भी सामने आई हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ता अमजद अयूब मिर्जा ने दावा किया है कि गिलगित-बाल्टिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में लगभग 14,000 अतिरिक्त सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की जा रही है। मिर्जा के अनुसार, यह कदम चुनावी प्रक्रिया और कानून-व्यवस्था के नाम पर उठाया जा रहा है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। मानवाधिकार और राजनीतिक स्वतंत्रता पर उठे सवाल भारत ने अपने बयान में कहा कि पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों में मानवाधिकारों के उल्लंघन, राजनीतिक दमन और आर्थिक शोषण जैसी समस्याएं लगातार बनी हुई हैं। भारत का कहना है कि चुनावी गतिविधियां इन मुद्दों से ध्यान नहीं हटा सकतीं। वहीं मानवाधिकार कार्यकर्ता अमजद अयूब मिर्जा ने आरोप लगाया कि क्षेत्र में राजनीतिक कार्यकर्ताओं और अधिकारों की मांग करने वाले समूहों पर दबाव बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि कई राजनीतिक नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया है। प्रधानमंत्री मोदी से हस्तक्षेप की अपील मिर्जा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील की है कि वे पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के अधिकारों और लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाएं। उन्होंने कहा कि गिलगित-बाल्टिस्तान में राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं को लेकर लंबे समय से असंतोष बना हुआ है। क्षेत्रीय राजनीति पर रहेगी नजर गिलगित-बाल्टिस्तान में होने वाले चुनाव और उससे पहले बढ़ी सुरक्षा व्यवस्था पर भारत और पाकिस्तान दोनों की नजरें टिकी हुई हैं। चुनावी प्रक्रिया, सुरक्षा हालात और दोनों देशों के बयानों के चलते यह मुद्दा एक बार फिर क्षेत्रीय राजनीति और कूटनीति के केंद्र में आ गया है।
पहलगाम आतंकी हमले की जांच में सुरक्षा एजेंसियों के हाथ एक महत्वपूर्ण सुराग लगा है, जिसने हमले के संभावित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की ओर संकेत किया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) और जम्मू-कश्मीर पुलिस की जांच में पता चला है कि आतंकियों के पास से बरामद दो मोबाइल फोन पाकिस्तान में आयात की गई खेप का हिस्सा थे। हैरानी की बात यह है कि दोनों उपकरण वर्षों तक निष्क्रिय रहे और हमले से ठीक पहले सक्रिय किए गए। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम स्थित बैसरन घाटी में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की जान गई थी। इसके बाद शुरू हुई जांच के दौरान सुरक्षा बलों ने जुलाई 2025 में दाचीगाम के मुलनार महादेव क्षेत्र में मुठभेड़ में तीन आतंकियों को मार गिराया। मारे गए आतंकियों के पास से दो शाओमी रेडमी सीरीज के मोबाइल फोन बरामद हुए थे। पाकिस्तान से आयातित खेप का हिस्सा था मोबाइल जांच में सामने आया कि बरामद रेडमी 9टी मोबाइल वर्ष 2021 में पाकिस्तान पहुंची एक आयातित खेप का हिस्सा था। तकनीकी विश्लेषण से पता चला कि फोन पाकिस्तान पहुंचने के बाद कभी इस्तेमाल नहीं किया गया और पहली बार हमले की तैयारी के दौरान सक्रिय हुआ। दूसरा फोन, रेडमी नोट 12, भी पाकिस्तान से आयातित था और उसके उपयोग का पैटर्न भी लगभग समान पाया गया। जांच अधिकारियों का मानना है कि दोनों मोबाइल फोन विशेष उद्देश्य के लिए सुरक्षित रखे गए थे और बाद में आतंकियों तक पहुंचाए गए। मोबाइल में मिले नक्शे और तस्वीरें फोन से कोई कॉल रिकॉर्ड, चैट या संदेश बरामद नहीं हुए हैं, लेकिन जांचकर्ताओं को इनमें पहलगाम और उसके आसपास के क्षेत्रों के नक्शे तथा कई तस्वीरें मिली हैं। एक तस्वीर 30 मार्च 2025 की बताई जा रही है, जिससे संकेत मिलता है कि हमलावर घटना से कई सप्ताह पहले इलाके में डेरा डाले हुए थे। तस्वीरों में एक अस्थायी टेंट और अन्य सामान भी दिखाई दे रहे हैं, जिससे सुरक्षा एजेंसियों को हमले की पूर्व तैयारी के संबंध में अहम संकेत मिले हैं। आतंकियों ने अपनाई थी वैकल्पिक संचार प्रणाली प्रारंभिक जांच के अनुसार, आतंकी मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट आधारित संचार पर निर्भर नहीं थे। अधिकारियों का मानना है कि वे लंबी दूरी की रेडियो संचार प्रणाली का इस्तेमाल कर रहे थे, जिससे उनकी गतिविधियां डिजिटल निगरानी से काफी हद तक बची रहीं। जांच को मिली नई दिशा मोबाइल फोन की उत्पत्ति, उनका वर्षों तक निष्क्रिय रहना और फिर हमले से ठीक पहले सक्रिय होना जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है। एनआईए और जम्मू-कश्मीर पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि ये उपकरण पाकिस्तान से आतंकियों तक कैसे पहुंचे और हमले की साजिश में उनकी क्या भूमिका रही। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इन डिजिटल सबूतों से हमले के पूरे नेटवर्क, उसके संचालकों और सीमा पार मौजूद संभावित समर्थन तंत्र तक पहुंचने में मदद मिल सकती है। जांच अधिकारियों का मानना है कि दोनों मोबाइल फोन विशेष उद्देश्य के लिए सुरक्षित रखे गए थे और बाद में आतंकियों तक पहुंचाए गए। मोबाइल में मिले नक्शे और तस्वीरें फोन से कोई कॉल रिकॉर्ड, चैट या संदेश बरामद नहीं हुए हैं, लेकिन जांचकर्ताओं को इनमें पहलगाम और उसके आसपास के क्षेत्रों के नक्शे तथा कई तस्वीरें मिली हैं। एक तस्वीर 30 मार्च 2025 की बताई जा रही है, जिससे संकेत मिलता है कि हमलावर घटना से कई सप्ताह पहले इलाके में डेरा डाले हुए थे। तस्वीरों में एक अस्थायी टेंट और अन्य सामान भी दिखाई दे रहे हैं, जिससे सुरक्षा एजेंसियों को हमले की पूर्व तैयारी के संबंध में अहम संकेत मिले हैं। आतंकियों ने अपनाई थी वैकल्पिक संचार प्रणाली प्रारंभिक जांच के अनुसार, आतंकी मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट आधारित संचार पर निर्भर नहीं थे। अधिकारियों का मानना है कि वे लंबी दूरी की रेडियो संचार प्रणाली का इस्तेमाल कर रहे थे, जिससे उनकी गतिविधियां डिजिटल निगरानी से काफी हद तक बची रहीं। जांच को मिली नई दिशा मोबाइल फोन की उत्पत्ति, उनका वर्षों तक निष्क्रिय रहना और फिर हमले से ठीक पहले सक्रिय होना जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है। एनआईए और जम्मू-कश्मीर पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि ये उपकरण पाकिस्तान से आतंकियों तक कैसे पहुंचे और हमले की साजिश में उनकी क्या भूमिका रही। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इन डिजिटल सबूतों से हमले के पूरे नेटवर्क, उसके संचालकों और सीमा पार मौजूद संभावित समर्थन तंत्र तक पहुंचने में मदद मिल सकती है।
भारत के खिलाफ बड़े आतंकी हमलों में शामिल एक और आतंकवादी के मारे जाने की खबर सामने आई है। पुलवामा आतंकी हमले की साजिश रचने वाले आतंकवादी Burhan Hamza की पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में गोली मारकर हत्या कर दी गई। सूत्रों के मुताबिक, बुरहान हमजा को मुजफ्फराबाद में अज्ञात हमलावरों ने निशाना बनाया। वह पाकिस्तान आधारित आतंकी नेटवर्क से जुड़ा हुआ था और लंबे समय से भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर था। पुलवामा हमले की साजिश में थी अहम भूमिका बुरहान हमजा का नाम 14 फरवरी 2019 को हुए Pulwama attack की साजिश से जुड़ा था। इस आतंकी हमले में सीआरपीएफ (CRPF) के 40 जवान शहीद हो गए थे। यह हमला जम्मू-कश्मीर में भारतीय सुरक्षा बलों पर हुए सबसे घातक हमलों में से एक माना जाता है। जांच एजेंसियों के अनुसार, बुरहान पाकिस्तान में बैठकर आतंकियों की भर्ती, प्रशिक्षण और हमले की योजना तैयार करने में सक्रिय भूमिका निभा रहा था। 2022 में भारत सरकार ने घोषित किया था आतंकवादी केंद्र की Narendra Modi सरकार ने साल 2022 में बुरहान हमजा को आधिकारिक रूप से आतंकवादी घोषित किया था। गृह मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना में उसका असली नाम अरजुमंद गुलजार डार बताया गया था। अधिसूचना के मुताबिक, वह पुलवामा जिले के खरबतपोरा, रत्नीपोरा का निवासी था और आतंकी संगठन Al-Badr से जुड़ा हुआ था। अल-बदर को UAPA के तहत प्रतिबंधित आतंकी संगठन घोषित किया गया है। पढ़ाई के बहाने गया पाकिस्तान, बना आतंकी कमांडर जानकारी के अनुसार, बुरहान हमजा साल 2017 में उच्च शिक्षा हासिल करने के बहाने पाकिस्तान गया था। वहां पहुंचने के बाद वह अल-बदर आतंकी संगठन में शामिल हो गया और धीरे-धीरे संगठन का सक्रिय कमांडर बन गया। सुरक्षा एजेंसियों का मानना था कि वह पाकिस्तान में रहकर भारत विरोधी आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने की रणनीति तैयार करता था। कैसे हुआ था पुलवामा हमला? 14 फरवरी 2019 को जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-44) पर सीआरपीएफ जवानों का बड़ा काफिला गुजर रहा था। इस काफिले में 78 बसें और कई अन्य वाहन शामिल थे। दोपहर के समय जब काफिला पुलवामा पहुंचा, तभी एक आत्मघाती हमलावर ने विस्फोटकों से भरी कार को सीआरपीएफ की बस से टकरा दिया। टक्कर के तुरंत बाद जोरदार विस्फोट हुआ, जिसमें बस के परखच्चे उड़ गए। इस भयावह हमले में 40 जवान मौके पर ही शहीद हो गए थे। हमले के बाद पूरे देश में आक्रोश फैल गया था। भारत ने बालाकोट एयरस्ट्राइक से दिया था जवाब पुलवामा हमले के जवाब में भारत ने पाकिस्तान के बालाकोट में एयरस्ट्राइक की थी। भारतीय वायुसेना ने आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाते हुए बड़ी कार्रवाई की थी, जिसे भारत की आतंकवाद के खिलाफ सख्त नीति के तौर पर देखा गया।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में जम्मू-कश्मीर मुद्दे को उठाने पर भारत ने पाकिस्तान को कड़ा जवाब दिया है। भारत के स्थायी प्रतिनिधि हरीश पर्वथनेनी ने कहा कि जिस देश का इतिहास नरसंहार, आतंकवाद और हिंसा से जुड़ा रहा हो, उसे भारत के आंतरिक मामलों पर अंतरराष्ट्रीय मंच से टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है। सशस्त्र संघर्ष में नागरिकों की सुरक्षा पर आयोजित UNSC की खुली बहस के दौरान पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर का मुद्दा उठाया था। इसके जवाब में भारत ने पाकिस्तान पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया और कहा कि वह अपनी घरेलू विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए सीमा पार हिंसा और उकसावे का सहारा लेता रहा है। भारत ने पाकिस्तान को बताया पाखंडी हरीश पर्वथनेनी ने कहा कि पाकिस्तान एक ओर अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों की बात करता है, जबकि दूसरी ओर मासूम नागरिकों को निशाना बनाने का इतिहास रखता है। उन्होंने आरोप लगाया कि रमजान के महीने में पाकिस्तान ने काबुल स्थित ओमिद नशा मुक्ति अस्पताल पर हवाई हमला किया था, जिसमें बड़ी संख्या में आम नागरिक मारे गए और घायल हुए। भारत के प्रतिनिधि के मुताबिक, यह हमला तरावीह की नमाज के बाद हुआ था, जब मरीज मस्जिद से बाहर निकल रहे थे। उन्होंने कहा कि किसी अस्पताल को सैन्य ठिकाना बताकर हमला करना बेहद अमानवीय और कायराना कृत्य है। 1971 का भी किया जिक्र भारत ने संयुक्त राष्ट्र में 1971 के ऑपरेशन सर्चलाइट का भी उल्लेख किया। पर्वथनेनी ने कहा कि उस दौरान पाकिस्तान की सेना पर बड़े पैमाने पर अत्याचार और महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म के आरोप लगे थे। उन्होंने कहा कि ऐसे रिकॉर्ड रखने वाला देश अगर मानवाधिकारों और कश्मीर पर भाषण देता है तो यह पूरी तरह विडंबनापूर्ण है। भारत ने दोहराया कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और आंतरिक हिस्सा है तथा पाकिस्तान द्वारा इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाना अनुचित है। UNSC में बढ़ा तनाव भारत और पाकिस्तान के बीच संयुक्त राष्ट्र में हुई यह तीखी बहस ऐसे समय में सामने आई है जब क्षेत्रीय सुरक्षा और सीमा पार आतंकवाद को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बना हुआ है। भारत ने स्पष्ट संकेत दिया कि वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के आरोपों का मजबूती से जवाब देता रहेगा।
बंतलाब इलाके में शुक्रवार को एक बड़ा हादसा सामने आया, जब एक निर्माणाधीन पुल का हिस्सा अचानक ढह गया। इस घटना में कई मजदूर मलबे के नीचे दब गए, जिससे इलाके में अफरा-तफरी मच गई। 6 मजदूर फंसे, 2 को सुरक्षित निकाला गया स्थानीय जानकारी के अनुसार, हादसे के वक्त कुल 6 मजदूर मौके पर काम कर रहे थे। इनमें से 2 मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है, जबकि 4 मजदूर अब भी मलबे में फंसे हुए हैं। बचाव कार्य तेजी से जारी है और समय के साथ रेस्क्यू टीमों की चुनौती बढ़ती जा रही है। राहत और बचाव कार्य युद्ध स्तर पर घटना के तुरंत बाद प्रशासन हरकत में आया और बचाव अभियान शुरू कर दिया गया। मौके पर राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल और राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल की टीमें पहुंच चुकी हैं। इसके अलावा स्थानीय पुलिस, दमकल विभाग और अन्य सुरक्षा एजेंसियां भी राहत कार्य में जुटी हुई हैं। मलबे को हटाने के लिए भारी मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि मजदूरों को सुरक्षित निकालने के लिए सावधानीपूर्वक ऑपरेशन चलाया जा रहा है। पुराने पुल की कमजोर नींव बनी वजह? घटनास्थल पर पहुंचे विधायक श्यामलाल शर्मा ने बताया कि यह पुल पहले से ही जर्जर हालत में था और उसकी नींव कमजोर हो चुकी थी। इसी कारण इसका पुनर्निर्माण किया जा रहा था। उन्होंने आशंका जताई कि खुदाई के दौरान उत्पन्न कंपन या ऊपर से गुजर रहे किसी भारी वाहन के दबाव के कारण पुल का हिस्सा अचानक ढह गया। हालांकि, हादसे के वास्तविक कारणों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। जांच के आदेश की संभावना प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि इस घटना की विस्तृत जांच कराई जाएगी, ताकि यह पता लगाया जा सके कि निर्माण कार्य में किसी तरह की लापरवाही तो नहीं हुई। लोगों में दहशत, प्रशासन पर सवाल इस हादसे के बाद स्थानीय लोगों में डर और आक्रोश का माहौल है। निर्माण कार्य के दौरान सुरक्षा मानकों के पालन को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
जम्मू-कश्मीर की राजधानी Srinagar में सुरक्षा एजेंसियों को बड़ी कामयाबी मिली है। पुलिस ने आतंकियों को लॉजिस्टिक सपोर्ट देने के आरोप में चार ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGWs) को गिरफ्तार किया है, जिनमें एक महिला भी शामिल है। हजरतबल इलाके से हुई गिरफ्तारी पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, यह कार्रवाई बुधवार रात शहर के Hazratbal इलाके में की गई। गिरफ्तार आरोपियों की पहचान जाहूर अहमद मीर, बशीर अहमद भट, गुलाम मोहम्मद भट और शाजिया मोहम्मद के रूप में हुई है। सभी आरोपी हजरतबल क्षेत्र के निवासी बताए जा रहे हैं। हथियार और नकदी बरामद सुरक्षा बलों ने आरोपियों के कब्जे से एक हैंड ग्रेनेड, AK-47 की 15 गोलियां, चार मोबाइल फोन और नकदी बरामद की है। अधिकारियों का कहना है कि ये लोग आतंकियों को जरूरी सामग्री और जानकारी उपलब्ध कराते थे, जिससे उनकी गतिविधियों को मदद मिलती थी। कड़े कानूनों के तहत मामला दर्ज पुलिस ने चारों आरोपियों के खिलाफ Unlawful Activities (Prevention) Act (UAPA) और आर्म्स एक्ट के तहत केस दर्ज किया है। जांच एजेंसियां अब इस नेटवर्क के अन्य संभावित कनेक्शन की भी जांच कर रही हैं। सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता जारी अधिकारियों का कहना है कि घाटी में आतंकवाद के खिलाफ अभियान लगातार जारी है और ऐसे तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है। इस गिरफ्तारी को सुरक्षा बलों की एक महत्वपूर्ण सफलता माना जा रहा है, जिससे आतंकियों के नेटवर्क को कमजोर करने में मदद मिलेगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।