रांची। बिजली के पोल पर अनधिकृत और असुरक्षित तरीके से लगाए गए टेलीकॉम, ओएफसी और टीवी केबल के खिलाफ झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड (जेबीवीएनएल) ने सख्त कार्रवाई शुरू कर दी है। कंपनियों को केबल व्यवस्थित करने के लिए दी गई 16 अगस्त की अंतिम समयसीमा खत्म होने के बाद निगम ने अब खुद ऐसे केबल हटाने का अभियान शुरू कर दिया है।
जेबीवीएनएल के अनुसार, सुरक्षा मानकों का पालन नहीं करने वाले केबल और उपकरणों को हटाने में आने वाला खर्च संबंधित कंपनी या एजेंसी से वसूला जाएगा। निगम ने इससे पहले जून में भी दूरसंचार कंपनियों को केबल सुरक्षित करने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट के स्वत: संज्ञान मामले के बाद 13 अगस्त को कंपनियों को अंतिम नोटिस जारी किया गया था।
अभियान के पहले चरण में रांची के कई प्रमुख इलाकों में बिजली पोल पर झूलते और असुरक्षित केबल हटाए गए। इनमें कुसई चौक, हिनू रोड, हरमू रोड, श्रद्धानंद रोड, कांके रोड, तुपुदाना, बूटी मोड़, मेन रोड, कोचा टोली, खेलगांव रोड, कोकर, करमटोली और जगन्नाथपुर समेत कई इलाके शामिल हैं।
इसके अलावा डोरंडा, हिनू, डंगराटोली, लालपुर, पुरुलिया रोड, मोरहाबादी, चिरौंदी और नामकुम में भी कार्रवाई की जा रही है।
जेबीवीएनएल ने कार्रवाई के लिए रांची के ईस्ट, वेस्ट, सेंट्रल, न्यू कैपिटल, डोरंडा और कोकर विद्युत आपूर्ति प्रमंडलों को जिम्मेदारी दी है। रांची के अलावा खूंटी, गुमला, लोहरदगा और सिमडेगा में भी अनधिकृत और असुरक्षित केबल हटाने के निर्देश दिए गए हैं।
निगम के मुताबिक कई जगह बिना अनुमति बिजली पोल पर बड़ी संख्या में केबल लगाए गए हैं। कई केबल निर्धारित सुरक्षित ऊंचाई से नीचे झूल रहे हैं। इससे बड़े वाहनों के केबल में फंसने, तार टूटने और बिजली के बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। बारिश के मौसम में ऐसे केबल हादसे का कारण बन सकते हैं।
जेबीवीएनएल ने संबंधित कंपनियों से बिजली के पोल पर लगाए गए केबल और उपकरणों का पूरा विवरण भी मांगा है। इसमें पोल की GPS लोकेशन, प्रत्येक पोल पर लगे केबलों की संख्या और उपकरणों की जानकारी शामिल है। निगम का कहना है कि कई कंपनियों ने निर्देश के बावजूद पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई है।
अभियान के तहत बीएसएनएल, रेलटेल, रिलायंस जियो, वोडाफोन समेत दूरसंचार कंपनियों और स्थानीय केबल ऑपरेटरों के केबल भी जांच के दायरे में हैं। जेबीवीएनएल ने सभी संबंधित कंपनियों से एक सप्ताह के भीतर केबल की वैधता का प्रमाण देने और उन्हें सुरक्षा मानकों के अनुरूप व्यवस्थित करने को कहा है।
जेबीवीएनएल ने साफ किया है कि निर्धारित मानकों का पालन नहीं करने वाले और अवैध तरीके से लगाए गए केबल निगम अपने स्तर से हटाएगा। इस कार्रवाई में होने वाला पूरा खर्च संबंधित कंपनी या एजेंसी से वसूला जाएगा।
निगम के मुताबिक अभियान का उद्देश्य केवल अवैध केबल हटाना नहीं है, बल्कि बिजली के पोल और वितरण व्यवस्था को सुरक्षित रखने के साथ राहगीरों और वाहन चालकों के लिए दुर्घटना का खतरा कम करना भी है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
रांची। झारखंड में सरकारी नियुक्तियों को लेकर बड़ा फैसला लिया गया है। राज्य सरकार ने झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) के तहत आयोजित या प्रक्रियाधीन 21 परीक्षाओं को रद्द करने का आदेश जारी किया है। इसके साथ ही करीब 1744 पदों पर चल रही नियुक्ति प्रक्रिया प्रभावित हुई है। इनमें झारखंड पात्रता परीक्षा (JET), सिविल जज, सहायक वन संरक्षक, फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर, असिस्टेंट प्रोफेसर और सीडीपीओ जैसी नियुक्तियां शामिल हैं। सबसे अहम बात यह है कि वर्ष 2018 से चल रही कुछ नियुक्ति प्रक्रियाओं को भी रद्द कर दिया गया है। कई परीक्षाओं में अभ्यर्थी लिखित परीक्षा, रिजल्ट और नियुक्ति तक की प्रक्रिया पूरी कर चुके थे और कुछ चयनित अभ्यर्थी वर्तमान में विभिन्न जिलों में कार्यरत भी हैं। JET परीक्षा भी रद्द विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति और पीएचडी/जेआरएफ के लिए आयोजित होने वाली झारखंड पात्रता परीक्षा (JET) 2024 को भी रद्द कर दिया गया है। राज्य गठन के बाद यह दूसरी बार JET आयोजित की जा रही थी। इससे विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति प्रक्रिया में और देरी होने की आशंका है। सिविल सेवा समेत कई परीक्षाओं पर असर JPSC की 14वीं सिविल सेवा परीक्षा, बैकलॉग सिविल सेवा परीक्षा, सिविल सेवा परीक्षा 2023, सिविल जज जूनियर डिविजन, सहायक वन संरक्षक और फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर जैसी परीक्षाएं भी इस फैसले से प्रभावित हुई हैं। कई परीक्षाओं की प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा के परिणाम जारी हो चुके थे, जबकि कुछ अभ्यर्थी अगले चरण की परीक्षा या शारीरिक जांच की तैयारी कर रहे थे। सीडीपीओ के चयनित अभ्यर्थी भी प्रभावित सीडीपीओ के 64 पदों पर नियुक्ति के लिए जनवरी 2026 में फाइनल रिजल्ट जारी किया गया था। अप्रैल में मुख्यमंत्री ने चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र भी सौंपे थे। ये अभ्यर्थी फिलहाल विभिन्न जिलों में कार्यरत हैं। इसी तरह फूड सेफ्टी ऑफिसर के 56 पदों पर चयनित अभ्यर्थी भी वर्तमान में जिलों में काम कर रहे हैं। नियमावली की त्रुटि से कई भर्तियां अटकी थीं राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज और पॉलिटेक्निक कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर तथा व्याख्याता के पदों पर भर्ती प्रक्रिया पहले ही नियमावली में त्रुटियों के कारण स्थगित की जा चुकी थी। सरकार ने संबंधित अधियाचनाएं वापस ले ली थीं। अब इन प्रक्रियाओं को भी रद्द कर दिया गया है। अभ्यर्थियों में बढ़ी चिंता JPSC की 21 परीक्षाओं को रद्द किए जाने से हजारों अभ्यर्थियों की चिंता बढ़ गई है। खासकर वे उम्मीदवार प्रभावित हुए हैं जिन्होंने वर्षों से इन नियुक्तियों की तैयारी की थी और प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में पहुंच चुके थे। अब इन पदों पर आगे किस व्यवस्था के तहत नई नियुक्ति प्रक्रिया शुरू होगी, इसे लेकर अभ्यर्थियों की नजर सरकार के अगले फैसले पर है। कुल मिलाकर, JPSC की 21 परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला झारखंड की भर्ती प्रक्रिया के लिए बड़ा बदलाव माना जा रहा है। इससे 1744 पदों पर नियुक्तियां प्रभावित हुई हैं और कई पुरानी भर्ती प्रक्रियाओं का भविष्य एक बार फिर अनिश्चित हो गया है।
रांची। राजधानी रांची में साइबर ठगी का एक और मामला सामने आया है। साइबर अपराधियों ने खुद को एटीएस अधिकारी बताकर एक दंपती को डराया और डिजिटल अरेस्ट की धमकी देकर करीब 3.40 लाख रुपये ठग लिए। मामले में अरगोड़ा थाना क्षेत्र निवासी अतुल कुमार ने साइबर क्राइम थाने में शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। ATS अधिकारी बनकर आया फोन पीड़ित अतुल कुमार के अनुसार, उनके मोबाइल पर एक फोन आया। कॉल करने वाले ने खुद को जांच एजेंसी का अधिकारी बताया और दावा किया कि उनका मोबाइल नंबर किसी संदिग्ध गतिविधि से जुड़ा हुआ है। इसके बाद ठगों ने मामले को गंभीर बताते हुए उन्हें डराना शुरू कर दिया। आरोपियों ने वीडियो कॉल के जरिए दंपती से पूछताछ की। वीडियो कॉल के दौरान कुछ लोग पुलिस की वर्दी में नजर आए, जिससे दंपती को विश्वास हो गया कि वे किसी सरकारी जांच एजेंसी के अधिकारियों से बात कर रहे हैं। बम ब्लास्ट से कनेक्शन बताकर बनाया दबाव साइबर अपराधियों ने दंपती को बताया कि उनका मोबाइल नंबर दिल्ली में हुए एक बम ब्लास्ट से जुड़े संदिग्ध डॉक्टर के संपर्क में मिला है। इस तरह की गंभीर बातें बताकर दोनों पर लगातार मानसिक दबाव बनाया गया। ठगों ने उन्हें डिजिटल अरेस्ट करने की धमकी भी दी। इसके बाद बैंक खाते की जांच और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर उनसे बैंक संबंधी जानकारी हासिल की गई। अलग-अलग प्रक्रिया के नाम पर ट्रांसफर कराए पैसे आरोपियों ने जांच और कानूनी प्रक्रिया का हवाला देते हुए दंपती से अलग-अलग खातों में रकम ट्रांसफर करवाई। लगातार धमकियों और डिजिटल अरेस्ट के डर के कारण दंपती ठगों के निर्देशों का पालन करते रहे। इस दौरान उनसे कुल करीब 3.40 लाख रुपये की ठगी कर ली गई। पीड़ित के मुताबिक, ठगों ने खुद को अधिकारी साबित करने के लिए फर्जी दस्तावेज और अन्य जानकारियां भी दिखाईं। जिस बैंक खाते में रकम ट्रांसफर की गई, वह कर्नाटक का बताया जा रहा है। मोबाइल नंबर और बैंक खातों की जांच शिकायत मिलने के बाद साइबर क्राइम पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। पुलिस साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबरों, बैंक खातों और पैसों के लेन-देन की जानकारी खंगाल रही है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि ठगी के पीछे कौन-कौन लोग शामिल हैं। डिजिटल अरेस्ट के नाम पर लगातार बढ़ रहे मामले डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी का एक नया और खतरनाक तरीका बन गया है। ठग खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी या अन्य जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर लोगों को किसी गंभीर अपराध में फंसाने का डर दिखाते हैं। इसके बाद वीडियो कॉल पर पूछताछ और गिरफ्तारी का भय पैदा कर पैसे ट्रांसफर करवाते हैं। पुलिस और साइबर सुरक्षा एजेंसियां लगातार लोगों से अपील कर रही हैं कि किसी भी सरकारी एजेंसी की ओर से फोन या वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी का डर दिखाकर पैसे मांगे जाएं तो तुरंत सतर्क हो जाएं। किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर बैंक संबंधी जानकारी या पैसे ट्रांसफर नहीं करने चाहिए।
बोकारो। बोकारो स्टील सिटी में BSL प्रबंधन ने एक आवासीय क्वार्टर पर ताला लगा दिया, जिसका इस्तेमाल कथित तौर पर कांग्रेस के जिला कार्यालय के रूप में किया जा रहा था। BSL के अनुसार यह क्वार्टर मूल रूप से उसके कर्मचारियों के लिए निर्धारित था और इसे कार्यालय के रूप में इस्तेमाल करने के लिए उचित अनुमति नहीं ली गई थी। कार्रवाई के बाद कांग्रेस नेताओं ने विरोध जताया और इसे राजनीतिक कार्रवाई बताया। क्वार्टर के इस्तेमाल को लेकर विवाद BSL प्रबंधन की कार्रवाई उस समय सामने आई जब अधिकारियों ने संबंधित परिसर के आवंटन और इस्तेमाल से जुड़े दस्तावेजों की जानकारी मांगी। रिपोर्ट के अनुसार, क्वार्टर का इस्तेमाल कांग्रेस की गतिविधियों और कार्यालय के तौर पर किया जा रहा था। BSL का कहना है कि आवासीय क्वार्टरों का इस्तेमाल निर्धारित नियमों के अनुसार ही किया जा सकता है। कांग्रेस ने कार्रवाई पर उठाए सवाल क्वार्टर पर ताला लगाए जाने के बाद कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया। पार्टी की ओर से कार्रवाई को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए सवाल उठाए गए और परिसर में दोबारा प्रवेश की मांग की गई। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। BSL ने नियमों का हवाला दिया BSL प्रबंधन की ओर से मुख्य जोर क्वार्टर के आवंटन और अधिकृत इस्तेमाल पर है। प्रबंधन के मुताबिक यदि किसी कर्मचारी आवास का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य से अलग किया जा रहा है, तो उसके खिलाफ नियमों के तहत कार्रवाई की जा सकती है। कार्रवाई के बाद सियासत गरमाई बोकारो में क्वार्टर पर ताला लगाने की घटना ने स्थानीय स्तर पर कांग्रेस और BSL प्रबंधन के बीच विवाद को राजनीतिक रंग दे दिया है। कांग्रेस जहां इसे राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में देख रही है, वहीं BSL की कार्रवाई आवासीय संपत्ति के नियमों और अधिकृत उपयोग से जुड़ी बताई जा रही है। अब पूरे मामले में आगे की कार्रवाई और दोनों पक्षों के आधिकारिक रुख पर नजर रहेगी।