व्हाइट हाउस डिनर में गूंजा शाही हास्य
ब्रिटेन के राजा चार्ल्स तृतीय ने व्हाइट हाउस में आयोजित राजकीय भोज के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर हल्के-फुल्के अंदाज में चुटकी ली। उनके इस मजाक ने पूरे हॉल में ठहाके गूंजा दिए।
चार्ल्स ने कहा, "मिस्टर प्रेसिडेंट, आपने हाल ही में कहा था कि अगर अमेरिका नहीं होता, तो यूरोप जर्मन बोल रहा होता। मैं कहूं कि अगर हम नहीं होते, तो आप आज फ्रेंच बोल रहे होते।"
राजा चार्ल्स का यह बयान उत्तरी अमेरिका में ब्रिटेन और फ्रांस के बीच हुई ऐतिहासिक प्रतिस्पर्धा की ओर इशारा था। अमेरिकी स्वतंत्रता से पहले दोनों यूरोपीय शक्तियां इस क्षेत्र पर कब्जे के लिए संघर्ष कर रही थीं।
उनका यह तंज ट्रंप की उस टिप्पणी का जवाब माना जा रहा है, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि अमेरिका के बिना यूरोप आज जर्मन बोल रहा होता।
चार्ल्स ने अपने भाषण में 1814 के 'बर्निंग ऑफ वॉशिंगटन' का भी जिक्र किया, जब ब्रिटिश सेना ने व्हाइट हाउस के कुछ हिस्सों को आग के हवाले कर दिया था।
उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा, "ब्रिटिशों ने भी व्हाइट हाउस के रियल एस्टेट री-डेवलपमेंट की कोशिश की थी।"
राजा ने बोस्टन टी पार्टी का जिक्र करते हुए कहा कि यह शाम उस ऐतिहासिक घटना से कहीं बेहतर साबित हुई है। उनके इस बयान पर मेहमानों ने जोरदार तालियां बजाईं।
ट्रंप ने भी पीछे नहीं हटते हुए चार्ल्स की कांग्रेस में दिए गए भाषण का जिक्र किया। उन्होंने हंसते हुए कहा, "उन्होंने डेमोक्रेट्स को खड़ा कर दिया, जो मैं कभी नहीं कर पाया।"
चार्ल्स ने अमेरिका और ब्रिटेन के रिश्तों को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण गठबंधनों में से एक बताया। उन्होंने दोनों देशों से वैश्विक चुनौतियों के बीच एकजुट रहने का आह्वान किया।
व्हाइट हाउस की यह शाम कूटनीति, इतिहास और हास्य का शानदार संगम बन गई।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
पेरिस/वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच 14 सूत्रीय ‘इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ (एमओयू) पर हस्ताक्षर होने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रुख में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। ट्रंप ने संकेत दिया है कि ईरान के पास सीमित संख्या में बैलिस्टिक मिसाइलें रहने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम, संवर्धित यूरेनियम भंडार और जमी हुई ईरानी संपत्तियों को लेकर भी अपेक्षाकृत नरम बयान दिए हैं। ट्रंप का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि युद्ध की शुरुआत में अमेरिका और इजराइल दोनों ईरान के मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह समाप्त करने की बात कर रहे थे। ‘दूसरे देशों के पास हैं तो ईरान के पास भी कुछ मिसाइलें हो सकती हैं’ फ्रांस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के इतर पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि यदि क्षेत्र के अन्य देशों के पास बैलिस्टिक मिसाइलें हैं तो ईरान के पास भी सीमित संख्या में ऐसी मिसाइलें होना पूरी तरह अनुचित नहीं है। ट्रंप ने कहा, “अगर दूसरे देशों के पास बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, तो ईरान के पास कुछ मिसाइलें होने से उन्हें पूरी तरह रोकना थोड़ा अनुचित होगा।” उन्होंने सऊदी अरब और कतर का उदाहरण देते हुए कहा कि क्षेत्रीय संतुलन को देखते हुए ईरान के पास भी कुछ मिसाइलें रहने दी जा सकती हैं। ‘मिसाइलें समस्या नहीं, परमाणु हथियार ज्यादा खतरनाक’ ट्रंप ने मिसाइल कार्यक्रम और परमाणु हथियारों के बीच अंतर करते हुए कहा कि बैलिस्टिक मिसाइलें सीमित नुकसान पहुंचा सकती हैं, लेकिन परमाणु हथियारों की विनाशकारी क्षमता कहीं अधिक है। उन्होंने कहा, “मिसाइलें किसी छोटे इलाके को नुकसान पहुंचा सकती हैं, लेकिन वे दुनिया को तबाह नहीं करतीं, जैसा कि परमाणु हथियार कर सकते हैं।” युद्ध के दौरान था मिसाइल कार्यक्रम खत्म करने का लक्ष्य 28 फरवरी को जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था, तब ट्रंप प्रशासन का स्पष्ट रुख था कि ईरान की मिसाइल क्षमता और परमाणु कार्यक्रम दोनों को कमजोर करना आवश्यक है। उस समय ट्रंप ने कहा था कि: ईरान की मिसाइल इंडस्ट्री को पूरी तरह नष्ट किया जाएगा। परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने के लिए कठोर कदम उठाए जाएंगे। ताजा बयान संकेत देता है कि वॉशिंगटन अब इस मुद्दे पर पहले जैसी कठोर स्थिति में नहीं है। इसके बावजूद ट्रंप ने कहा कि अगले 60 दिनों तक चलने वाली वार्ताओं में मिसाइल कार्यक्रम पर चर्चा जारी रहेगी। यूरेनियम भंडार तुरंत सौंपने की शर्त नहीं एमओयू के अनुसार, ईरान को अपने उच्च स्तर तक संवर्धित यूरेनियम भंडार को तत्काल सौंपने की बाध्यता नहीं दी गई है। समझौते में कहा गया है कि: इस मुद्दे का समाधान अगले 60 दिनों में तैयार किए जाने वाले अलग तंत्र के तहत होगा। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में संवर्धित यूरेनियम को कम स्तर पर लाने की प्रक्रिया पर चर्चा की जाएगी। ट्रंप ने इस मुद्दे को भी अधिक महत्व नहीं देते हुए कहा, “यह सामग्री अब उतनी मूल्यवान नहीं है, लेकिन मनोवैज्ञानिक तौर पर हम उसे हासिल करना चाहेंगे।” उन्होंने दावा किया कि पहले हुए हमलों के बाद संवर्धित सामग्री मलबे के नीचे दब चुकी है और उसे कोई छू भी नहीं सकता। जमी हुई ईरानी संपत्तियों को लौटाने के संकेत ट्रंप ने यह भी स्वीकार किया कि अमेरिका को ईरान की कुछ जमी हुई संपत्तियां वापस करनी पड़ सकती हैं। उन्होंने कहा, “हमने उनका काफी पैसा रोका हुआ है। वह उनका अपना पैसा है। मुझे लगता है कि हमें उसे वापस करना होगा।” ट्रंप के अनुसार, यदि अमेरिका ऐसा नहीं करता है तो वैश्विक निवेशकों का डॉलर पर भरोसा प्रभावित हो सकता है। 300 अरब डॉलर के रिकंस्ट्रक्शन फंड को मिली मान्यता अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका ने ईरान के प्रस्तावित 300 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण (Reconstruction) फंड को मान्यता दे दी है। हालांकि इस फंड के वित्तपोषण और धन के स्रोत को लेकर अभी कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। राष्ट्रपतियों ने समझौते पर किए हस्ताक्षर फ्रांस के वर्साय पैलेस में डील पर हस्ताक्षर करने के कुछ घंटों बाद ईरानी विदेश मंत्रालय ने घोषणा की कि एमओयू के अंतिम मसौदे पर दोनों देशों के राष्ट्रपतियों ने आधिकारिक हस्ताक्षर कर दिए हैं। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा, “इस्लामाबाद एमओयू का पाठ राष्ट्रपतियों के हस्ताक्षर के साथ अंतिम रूप ले चुका है। अब समझौते के क्रियान्वयन की परीक्षा शुरू होगी।” इससे पहले अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने डिजिटल रूप से दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे, जिसकी निगरानी स्वयं डोनाल्ड ट्रंप ने की थी। समझौते के बाद बदलते संकेत ट्रंप के ताजा बयानों ने यह संकेत दिया है कि अमेरिका-ईरान संबंधों में टकराव की जगह अब चरणबद्ध कूटनीतिक समाधान की दिशा में बढ़ने की कोशिश हो रही है। बैलिस्टिक मिसाइलों, परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों में राहत को लेकर आने वाले 60 दिनों की बातचीत इस समझौते की वास्तविक दिशा तय करेगी।
न्यूयॉर्क: अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित टाइम्स स्क्वायर में शुक्रवार को अचानक गोलियों की आवाज सुनाई देने के बाद अफरा-तफरी मच गई। फायरिंग की आवाज सुनते ही वहां मौजूद पर्यटक, स्थानीय लोग और जश्न में शामिल हजारों लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें लोग भयभीत होकर दौड़ते नजर आ रहे हैं। पुलिस के अनुसार, घटना में एक व्यक्ति घायल हुआ, जिसे तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया। हालांकि, उसकी हालत और चोटों की गंभीरता को लेकर फिलहाल कोई आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की गई है। दोपहर 3:40 बजे हुई घटना अधिकारियों के मुताबिक, यह घटना स्थानीय समयानुसार दोपहर करीब 3:40 बजे हुई। उस समय एनबीए चैंपियन न्यूयॉर्क निक्स की ऐतिहासिक जीत के उपलक्ष्य में निकाली गई विजय परेड समाप्त होने के बाद लोअर मैनहैटन और टाइम्स स्क्वायर क्षेत्र में भारी भीड़ मौजूद थी। न्यूयॉर्क निक्स ने 53 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद पहली बार एनबीए चैंपियनशिप जीतने का गौरव हासिल किया है, जिसके जश्न में हजारों प्रशंसक सड़कों पर जुटे हुए थे। पुलिस ने तुरंत की घेराबंदी फायरिंग की सूचना मिलते ही न्यूयॉर्क पुलिस ने पूरे इलाके की घेराबंदी कर दी और संदिग्ध की तलाश शुरू कर दी। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, संदिग्ध का तुरंत पीछा किया गया और उसे हिरासत में ले लिया गया है। फायर डिपार्टमेंट ने पुष्टि की है कि एक घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाया गया है। घटना के कारणों और फायरिंग के पीछे की मंशा की जांच की जा रही है। सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल अधिकारियों के अनुसार, न्यूयॉर्क निक्स की विजय परेड के दौरान सुरक्षा के लिए करीब 10,000 पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था। इसके बावजूद भीड़भाड़ वाले इलाके में फायरिंग की घटना ने न्यूयॉर्क की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। पुलिस ने लोगों से अपील की है कि वे अफवाहों से बचें और घटना से जुड़ी आधिकारिक जानकारी के लिए प्रशासनिक अपडेट पर भरोसा करें।
अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने की दिशा में एक बड़ा कूटनीतिक कदम उठाया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने 14 सूत्रीय समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। समझौते के लागू होने के साथ ही दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव कम करने, होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और आर्थिक एवं परमाणु मुद्दों पर व्यापक बातचीत शुरू करने का रास्ता साफ हो गया है। अमेरिकी प्रशासन ने इस दस्तावेज को ‘संयुक्त राज्य अमेरिका और इस्लामी गणराज्य ईरान के बीच इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन’ के रूप में जारी किया है। समझौते का उद्देश्य 60 दिनों के विस्तारित युद्धविराम को लागू करना और लंबित मुद्दों पर अंतिम समझौते की रूपरेखा तैयार करना है। होर्मुज जलडमरूमध्य तुरंत खोलने पर सहमति समझौते का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन इसी समुद्री मार्ग से होता है। समझौते के तहत ईरान ने 60 दिनों तक फारस की खाड़ी और ओमान सागर के बीच वाणिज्यिक जहाजों को सुरक्षित और निर्बाध मार्ग देने पर सहमति जताई है। प्रतिबंधों में चरणबद्ध राहत का रोडमैप अमेरिका ने ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों को चरणबद्ध तरीके से हटाने की प्रतिबद्धता जताई है। इसके तहत ईरानी तेल निर्यात, बैंकिंग, बीमा और परिवहन सेवाओं को तत्काल राहत देने का प्रावधान किया गया है। साथ ही अमेरिका ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों और धनराशि को भी जारी करने पर सहमत हुआ है। परमाणु कार्यक्रम पर आगे होगी विस्तृत बातचीत समझौते में ईरान ने एक बार फिर दोहराया है कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा और न ही उन्हें हासिल करने की कोशिश करेगा। दोनों देशों ने संवर्धित यूरेनियम भंडार, यूरेनियम संवर्धन और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े अन्य मुद्दों पर अंतिम समझौते के तहत विस्तृत चर्चा करने पर सहमति जताई है। 14 सूत्रीय समझौते की प्रमुख बातें सभी सैन्य अभियानों और युद्ध गतिविधियों को तत्काल प्रभाव से रोकना। एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना। 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते की दिशा में काम करना। अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की प्रक्रिया शुरू करना। होर्मुज जलडमरूमध्य से वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षित और मुफ्त आवाजाही सुनिश्चित करना। ईरान के लिए 300 अरब डॉलर की आर्थिक पुनर्निर्माण योजना तैयार करना। संयुक्त राष्ट्र और अमेरिकी प्रतिबंधों को चरणबद्ध तरीके से हटाने का रोडमैप बनाना। ईरान द्वारा परमाणु हथियार नहीं बनाने की प्रतिबद्धता दोहराना। अंतिम समझौते तक दोनों देशों द्वारा यथास्थिति बनाए रखना। ईरानी तेल निर्यात, बैंकिंग और बीमा सेवाओं को तत्काल राहत देना। ईरान की जमी हुई संपत्तियों और धनराशि को जारी करना। समझौते के अनुपालन के लिए विशेष निगरानी तंत्र स्थापित करना। अंतिम समझौते के लिए औपचारिक वार्ता शुरू करना। अंतिम समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के बाध्यकारी प्रस्ताव के माध्यम से वैधता प्रदान करना। पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा मोड़ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह समझौता तय शर्तों के अनुसार लागू होता है, तो इससे न केवल अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा टकराव समाप्त होगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, तेल बाजार, क्षेत्रीय सुरक्षा और पश्चिम एशिया की भू-राजनीति पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने से वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार में स्थिरता आने की उम्मीद भी बढ़ गई है।