अमेरिका ने ईरान के ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को समर्थन देने के आरोप में चीन और हांगकांग की कई कंपनियों समेत 10 संस्थाओं और व्यक्तियों पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं. अमेरिकी ट्रेजरी विभाग की इस कार्रवाई को ईरान के सैन्य नेटवर्क पर बढ़ते दबाव के रूप में देखा जा रहा है.
यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब मध्य पूर्व में तनाव बना हुआ है और अमेरिका-ईरान संबंधों में किसी समाधान के संकेत फिलहाल नजर नहीं आ रहे हैं. दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के संभावित चीन दौरे से पहले इस कार्रवाई ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल बढ़ा दी है.
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के अनुसार, प्रतिबंधित कंपनियों और व्यक्तियों पर आरोप है कि वे ईरान को शहेद ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल बनाने के लिए जरूरी इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स, मशीनरी और कच्चा माल उपलब्ध करा रहे थे.
अमेरिका का कहना है कि यह नेटवर्क ईरान की सैन्य क्षमता को मजबूत करने में सक्रिय भूमिका निभा रहा था. ट्रेजरी विभाग ने साफ किया कि वह भविष्य में भी ईरान के सैन्य और रक्षा ढांचे को कमजोर करने के लिए आर्थिक प्रतिबंधों का इस्तेमाल जारी रखेगा.
प्रतिबंधों की सूची में चीन की Yushita Shanghai International Trade Company का नाम प्रमुख रूप से शामिल है. अमेरिकी अधिकारियों का आरोप है कि यह कंपनी ईरान के हथियार कार्यक्रम के लिए सामग्री जुटाने में मदद कर रही थी.
इसके अलावा दुबई स्थित Elite Energy FZCO पर भी कार्रवाई की गई है. आरोप है कि इस कंपनी ने हांगकांग की एक फर्म को करोड़ों डॉलर ट्रांसफर किए, जिनका इस्तेमाल ईरानी नेटवर्क के लिए किया गया.
हांगकांग की HK Hesin Industry और बेलारूस की Armory Alliance पर भी ईरान के लिए बिचौलिये की भूमिका निभाने का आरोप लगाया गया है.
अमेरिकी अधिकारियों ने हांगकांग की Mustad Ltd पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं. ट्रेजरी विभाग के मुताबिक, कंपनी ने ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के लिए हथियारों और रक्षा उपकरणों की खरीद में मदद की.
अमेरिका ने कहा कि ऐसे नेटवर्क वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा हैं और इनके खिलाफ लगातार कार्रवाई जारी रहेगी.
ट्रेजरी विभाग ने संकेत दिया है कि भविष्य में उन विदेशी बैंकों, एयरलाइंस और कंपनियों पर भी कार्रवाई की जा सकती है जो ईरान के प्रतिबंधित व्यापार को सहयोग दे रहे हैं. इसमें चीन की तथाकथित “टीपॉट” ऑयल रिफाइनरियां भी शामिल हैं, जिन पर ईरानी तेल खरीदने के आरोप लगते रहे हैं.
अमेरिका का कहना है कि उसका उद्देश्य ईरान को दोबारा सैन्य ताकत बढ़ाने से रोकना और उसके वैश्विक सप्लाई नेटवर्क को कमजोर करना है.
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
ब्रुसेल्स, एजेंसियां। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने यूरोप में लगातार बढ़ रही जंगल की आग की घटनाओं पर गंभीर चिंता जताई है। संगठन के यूरोप क्षेत्रीय कार्यालय के अनुसार, पिछले चार वर्षों में क्षेत्र में जंगल की आग की घटनाओं में 57% की वृद्धि दर्ज की गई है। इस साल 22 जुलाई तक यूरोप में 1,254 से अधिक बड़े जंगलों में आग लग चुकी है, जिससे करोड़ों टन कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में पहुंची है। फ्रांस, स्पेन और कई देशों में हालात गंभीर WHO ने कहा कि इस समय फ्रांस, स्पेन, ग्रीस, पुर्तगाल और जर्मनी समेत कई यूरोपीय देशों में जंगल की आग तेजी से फैल रही है। फ्रांस और स्पेन में आग के कारण ढाई लाख से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना पड़ा है, जबकि कई इलाकों में आपातकाल जैसी स्थिति बनी हुई है। स्पेन में इस वर्ष जंगल की आग से पहली मौत भी दर्ज की गई है। आग पर काबू पाने के लिए कई देशों ने सेना, हेलीकॉप्टर और फायर फाइटिंग विमानों को तैनात किया है। स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा गंभीर असर WHO ने चेतावनी दी कि जंगल की आग केवल पर्यावरण के लिए ही नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य के लिए भी बड़ा खतरा बनती जा रही है। आग से निकलने वाला धुआं और सूक्ष्म कण (PM2.5) सांस संबंधी बीमारियों, हृदय रोग और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ाते हैं। संगठन ने सरकारों से आग की रोकथाम, आपदा प्रबंधन और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए ठोस कदम उठाने की अपील की है।
यरुशलम, एजेंसियां। इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कब्जे वाले वेस्ट बैंक में सैन्य कार्रवाई तेज करने के आदेश दिए हैं। यह फैसला नाबलुस के पास स्थित तल (Tell) गांव में हुई हिंसक झड़प और उसके बाद बढ़ते तनाव के मद्देनज़र लिया गया है। इज़रायली सरकार ने सेना को व्यापक अभियान चलाने, संदिग्धों की गिरफ्तारी और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश दिए हैं। हिंसक झड़प के बाद बढ़ा तनाव इज़रायली सेना के अनुसार, नाबलुस के निकट एक इलाके में हुई झड़प में चार फिलिस्तीनी और दो इज़रायली सैनिकों की मौत हुई। घटना के बाद वेस्ट बैंक के कई हिस्सों में हालात तनावपूर्ण हो गए। इसके बाद सेना ने अतिरिक्त बल तैनात किए और कई क्षेत्रों में आवाजाही पर प्रतिबंध लगा दिया। नेतन्याहू ने दिए सख्त निर्देश प्रधानमंत्री नेतन्याहू और रक्षा मंत्री इज़रायल कैट्ज़ ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि सेना "व्यापक सैन्य अभियान" चलाएगी। आदेशों में संदिग्ध हमलावरों की तलाश, आतंकवादी ढांचे को नष्ट करने और सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ाने पर जोर दिया गया है। साथ ही, कथित हमलावर के घर को ध्वस्त करने की प्रक्रिया भी शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं। नई बस्तियों की स्थापना को भी मंजूरी सुरक्षा कार्रवाई के साथ-साथ नेतन्याहू ने वेस्ट बैंक में नई यहूदी बस्तियों की स्थापना को भी मंजूरी दी है। इज़रायल का कहना है कि यह कदम सुरक्षा मजबूत करने के लिए उठाया गया है, जबकि फिलिस्तीन और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के कई देशों ने इसे विवादित और अंतरराष्ट्रीय कानून के विरुद्ध बताया है। संयुक्त राष्ट्र ने जताई चिंता संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों ने वेस्ट बैंक में बढ़ती हिंसा पर चिंता व्यक्त की है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, इस वर्ष क्षेत्र में बसने वालों और सुरक्षा बलों से जुड़ी हिंसक घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे नागरिकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। क्षेत्रीय तनाव और बढ़ने की आशंका विशेषज्ञों का मानना है कि वेस्ट बैंक में सैन्य अभियान तेज होने से पहले से तनावग्रस्त मध्य पूर्व की स्थिति और जटिल हो सकती है। फिलिस्तीनी अधिकारियों ने इस कार्रवाई की आलोचना करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप की मांग की है।
पेरिस/मैड्रिड, एजेंसियां। फ्रांस और स्पेन इस समय वर्षों की सबसे भीषण जंगल की आग (Wildfire) से जूझ रहे हैं। तेज गर्मी, सूखी हवाओं और कम आर्द्रता के कारण आग तेजी से फैल रही है। हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि दोनों देशों में मिलाकर दो लाख से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है, जबकि कई इलाकों में राष्ट्रीय स्तर पर आपात कदम उठाए गए हैं। फ्रांस में बोर्डो के बाहरी इलाके तक पहुंची आग दक्षिण-पश्चिमी फ्रांस के गिरोंद (Gironde) क्षेत्र और कैप फेरे (Cap Ferret) प्रायद्वीप में लगी आग तेजी से फैलते हुए बोर्डो के बाहरी हिस्सों तक पहुंच गई है। अब तक 1.10 लाख से अधिक लोगों को निकाला गया है। कई पर्यटकों को सड़क मार्ग बंद होने के कारण नौकाओं के जरिए सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया गया। आग में दर्जनों घर, एक कैंपसाइट और हजारों हेक्टेयर जंगल जल चुके हैं। स्पेन ने पहली बार घोषित किया राष्ट्रीय आपातकाल स्पेन ने जंगल की आग की गंभीरता को देखते हुए इतिहास में पहली बार वाइल्डफायर के कारण राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया है। मैड्रिड और आविला (Ávila) के आसपास दो बड़ी आग एक-दूसरे से मिल गई हैं, जिससे स्थिति और खतरनाक हो गई है। हजारों दमकलकर्मी, सैनिक और विमान आग पर काबू पाने में जुटे हैं। यूरोपीय संघ से मांगी गई मदद फ्रांस और स्पेन दोनों ने यूरोपीय संघ (EU) से अतिरिक्त अग्निशमन विमान और हेलीकॉप्टर भेजने का अनुरोध किया है। क्रोएशिया, पुर्तगाल, इटली और अन्य देशों ने राहत एवं अग्निशमन सहायता उपलब्ध करानी शुरू कर दी है। भीषण गर्मी बनी सबसे बड़ी वजह विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोप इस वर्ष की तीसरी बड़ी हीटवेव का सामना कर रहा है। रिकॉर्ड तापमान, सूखे जंगल और तेज हवाओं ने आग को तेजी से फैलने में मदद की है। वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों से भी जोड़ रहे हैं। स्थिति पर लगातार नजर दोनों देशों की सरकारों ने प्रभावित इलाकों में लोगों से यात्रा से बचने और प्रशासन के निर्देशों का पालन करने की अपील की है। दमकलकर्मी लगातार आग पर काबू पाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कई क्षेत्रों में स्थिति अब भी बेहद गंभीर बनी हुई है।