नेपाल के पूर्वी पहाड़ी क्षेत्रों में उगने वाला रुद्राक्ष लंबे समय से धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक महत्व का प्रतीक माना जाता रहा है। भारत सहित कई देशों में इसकी बड़ी मांग है। हालांकि हाल के वर्षों में चीन से बढ़ती मांग ने रुद्राक्ष को एक बड़े अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक उत्पाद में बदल दिया है। इसके साथ ही रुद्राक्ष उत्पादन में रसायनों के बढ़ते उपयोग को लेकर नई चिंताएं सामने आई हैं।
नेपाल के मकालू क्षेत्र सहित कई इलाकों में रुद्राक्ष की खेती दशकों से की जा रही है। स्थानीय किसान बताते हैं कि रुद्राक्ष उनके परिवारों की आय का प्रमुख स्रोत रहा है। एलिएओकार्पस गैनिट्रस प्रजाति के पेड़ों से प्राप्त होने वाले ये बीज धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व रखते हैं।
पहले रुद्राक्ष का प्रमुख बाजार भारत था, जहां इसे भगवान शिव से जुड़ी आस्था के कारण खरीदा जाता था। लेकिन पिछले एक दशक में चीन से मांग बढ़ने के बाद इसका व्यापार तेजी से विस्तारित हुआ है।
भारतीय खरीदार जहां रुद्राक्ष को मुख्य रूप से धार्मिक दृष्टिकोण से देखते हैं, वहीं चीन में इसकी मांग सजावटी वस्तु और आभूषण के रूप में बढ़ी है। इसके चलते बड़े आकार, आकर्षक बनावट और चमकदार स्वरूप वाले रुद्राक्षों की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
स्थानीय व्यापारियों के अनुसार, बाजार की इसी मांग ने किसानों पर अधिक आकर्षक दिखने वाले रुद्राक्ष उत्पादन का दबाव बढ़ाया है।
कई किसानों का कहना है कि बेहतर आकार और आकर्षक स्वरूप पाने के लिए कुछ स्थानों पर प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर (PGR) जैसे रसायनों का उपयोग किया जा रहा है। इनका प्रयोग पेड़ों के विकास और फल के आकार को प्रभावित करने के उद्देश्य से किया जाता है।
किसानों का एक वर्ग मानता है कि यह बाजार की मजबूरी बन गई है, जबकि अन्य लोग इसके दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर चिंतित हैं।
कृषि विशेषज्ञों और स्थानीय किसानों का कहना है कि लंबे समय तक अत्यधिक रासायनिक उपयोग से पेड़ों की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है। कुछ किसानों ने दावा किया है कि लगातार रसायनों के इस्तेमाल से पेड़ों की सेहत कमजोर होने और बीजों की प्राकृतिक संरचना में बदलाव जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं।
इन दावों पर व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता बताई जा रही है।
रिपोर्टों के अनुसार, रुद्राक्ष उत्पादन में उपयोग किए जा रहे कुछ विशेष ग्रोथ रेगुलेटरों को लेकर नियामक स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इसी वजह से इनके उपयोग, मात्रा और संभावित प्रभावों पर बहस जारी है।
स्थानीय प्रशासन का कहना है कि कृषि क्षेत्र में ग्रोथ रेगुलेटर का उपयोग असामान्य नहीं है, लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब इनका अत्यधिक या अनुचित मात्रा में प्रयोग किया जाता है।
वर्तमान में ऐसी कोई व्यापक वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है कि रुद्राक्ष पर उपयोग किए गए ग्रोथ रेगुलेटर सीधे तौर पर त्वचा रोग या स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा करते हैं। फिर भी विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि उपभोक्ता विश्वसनीय स्रोतों से रुद्राक्ष खरीदें और उपयोग से पहले उसे अच्छी तरह साफ करें।
यदि किसी व्यक्ति को त्वचा संबंधी संवेदनशीलता या एलर्जी की समस्या है, तो रुद्राक्ष धारण करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उचित हो सकता है।
नेपाल में रुद्राक्ष आज केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये के निर्यात उद्योग का हिस्सा बन चुका है। बढ़ती अंतरराष्ट्रीय मांग किसानों के लिए आय के नए अवसर लेकर आई है, लेकिन इसके साथ प्राकृतिक गुणवत्ता, पारंपरिक खेती और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने की चुनौती भी सामने खड़ी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गुणवत्ता नियंत्रण, वैज्ञानिक निगरानी और टिकाऊ खेती के उपायों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो अल्पकालिक लाभ की दौड़ इस महत्वपूर्ण प्राकृतिक विरासत को दीर्घकालिक नुकसान पहुंचा सकती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
वॉशिंगटन/तेहरान, एजेंसियां। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित परमाणु समझौते को लेकर विरोधाभासी बयान सामने आए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है और समझौते की अच्छी संभावना है। वहीं ईरान ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि अमेरिका के साथ फिलहाल कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष वार्ता नहीं चल रही है। ट्रंप का दावा- बातचीत सही दिशा में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका कूटनीतिक समाधान चाहता है और यदि ईरान सहयोग करता है तो समझौते का रास्ता खुल सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर आक्रामक रुख अपनाता है, तो अमेरिका सैन्य विकल्प अपनाने से भी पीछे नहीं हटेगा। ईरान का स्पष्ट इनकार ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने ट्रंप के बयान को खारिज करते हुए कहा कि ईरान और अमेरिका के बीच इस समय किसी भी स्तर पर कोई बातचीत नहीं हो रही है। उन्होंने कहा कि जब तक वाशिंगटन अपने रवैये में बदलाव नहीं लाता और प्रतिबंधों के मुद्दे पर ठोस कदम नहीं उठाता, तब तक वार्ता की कोई संभावना नहीं है। परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंध बने मुख्य मुद्दे दोनों देशों के बीच विवाद का सबसे बड़ा कारण ईरान का परमाणु कार्यक्रम और उस पर लगे अमेरिकी प्रतिबंध हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर सख्त नियंत्रण स्वीकार करे, जबकि ईरान पहले आर्थिक प्रतिबंध हटाने की मांग कर रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि दोनों देशों के परस्पर विरोधी बयानों से फिलहाल किसी तत्काल समझौते की संभावना कम दिखाई देती है।
अबुजा, एजेंसियां। नाइजीरिया के उत्तर-पश्चिमी कडूना राज्य में बंदूकधारियों ने एक गांव पर देर रात हमला कर कम से कम 30 लोगों की हत्या कर दी। हमलावरों ने नारिडोन गांव में घुसकर अंधाधुंध गोलीबारी की, कई घरों में आग लगा दी और महिलाओं, बच्चों तथा बुजुर्गों को भी निशाना बनाया। हमले में कई अन्य लोग घायल हुए हैं। महिलाओं और बच्चों को भी बनाया निशाना स्थानीय निवासियों के अनुसार, हमलावर आधी रात के करीब गांव में पहुंचे और लोगों पर अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। कई घर जलकर राख हो गए। मृतकों में आठ बच्चे भी शामिल हैं, जबकि चार से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। घटना के बाद पूरे इलाके में दहशत का माहौल है। सुरक्षा बलों ने शुरू किया तलाशी अभियान हमले की सूचना मिलने के बाद पुलिस और सुरक्षा बल मौके पर पहुंचे तथा पूरे इलाके में सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिया गया। अभी तक किसी संगठन ने हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन शुरुआती आशंका है कि यह हमला उत्तर-पश्चिमी नाइजीरिया में सक्रिय सशस्त्र आपराधिक गिरोहों ने किया है। अधिकारियों ने हमलावरों की तलाश तेज कर दी है। लगातार बढ़ रही है हिंसा कडूना और आसपास के इलाकों में हाल के वर्षों में सशस्त्र गिरोहों द्वारा गांवों पर हमले, अपहरण और फिरौती की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। सुरक्षा एजेंसियों के लिए इन हमलों पर नियंत्रण बड़ी चुनौती बना हुआ है। स्थानीय लोगों ने सरकार से क्षेत्र में स्थायी सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
Mali Kidnapping: पश्चिम अफ्रीकी देश माली में करीब तीन महीने पहले अगवा किए गए भारतीय मूल के हीरा कारोबारी धीरू रमानी (75) को रिहा कर दिया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनके परिवार ने लगभग ₹44 करोड़ (4 मिलियन यूरो) की फिरौती चुकाने के बाद उनकी रिहाई सुनिश्चित कराई। पहले मांगे गए थे ₹100 करोड़ रिपोर्ट्स के अनुसार, अपहरणकर्ताओं ने शुरुआत में करीब ₹100 करोड़ की फिरौती की मांग की थी। हालांकि, अमेरिका में रहने वाले धीरू रमानी के परिवार ने लंबी बातचीत के बाद रकम घटाकर 4 मिलियन यूरो (करीब ₹44 करोड़) कर दी, जिसके बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। हाल ही में खरीदी थी सोने की खदान धीरू रमानी मूल रूप से गुजरात के अमरेली जिले के रहने वाले हैं और सूरत के हीरा कारोबार से जुड़े रहे हैं। बताया जा रहा है कि उन्होंने हाल ही में माली में एक सोने की खदान खरीदी थी और कुछ समय से वहीं रह रहे थे। इसी दौरान उनका अपहरण कर लिया गया था। रिहाई के बाद माली में ही हैं मौजूद सूत्रों के मुताबिक, रिहाई के बाद धीरू रमानी अभी भी माली में हैं। स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां उनसे घटना के संबंध में पूछताछ कर रही हैं। परिवार ने खुद की अपहरणकर्ताओं से बातचीत रिपोर्ट के अनुसार, फिरौती और रिहाई की पूरी बातचीत अमेरिका में रहने वाले उनके परिवार ने सीधे अपहरणकर्ताओं से की। सूत्रों का कहना है कि इस प्रक्रिया में भारत सरकार की किसी एजेंसी की प्रत्यक्ष भूमिका नहीं रही।