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शेख हसीना पर बांग्लादेश की चिंता

भारत में रहकर शेख हसीना की राजनीतिक गतिविधियों पर बांग्लादेश की चिंता, द्विपक्षीय संबंधों पर असर की चेतावनी

ranjan kumar tiwari अगस्त 4, 2026 0
भारत में शेख हसीना की राजनीतिक गतिविधियों पर बांग्लादेश ने चिंता जताई
शेख हसीना और भारत-बांग्लादेश संबंध

ढाका, एजेंसियां। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने भारत के सामने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की भारत की धरती से राजनीतिक गतिविधियों को लेकर अपनी चिंता जताई है। बांग्लादेश सरकार का कहना है कि भारत से इस तरह की राजनीतिक गतिविधियां जारी रहने से दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंध प्रभावित हो सकते हैं।

 

भारत के सामने बांग्लादेश ने रखी आपत्ति

 

 

बांग्लादेश की ओर से भारत को यह संदेश ऐसे समय दिया गया है, जब शेख हसीना भारत में रह रही हैं और उनके बयानों तथा राजनीतिक गतिविधियों को लेकर ढाका में लगातार आपत्ति जताई जा रही है.

 

बांग्लादेश सरकार का मानना है कि भारत से दिए जाने वाले राजनीतिक बयान उसके घरेलू राजनीतिक माहौल को प्रभावित कर सकते हैं।

 

शेख हसीना के भारत में रहने का मुद्दा

 

 

शेख हसीना अगस्त 2024 में बांग्लादेश में बड़े राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों के बीच प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद भारत आ गई थीं। इसके बाद से उनके भारत में रहने को लेकर दोनों देशों के बीच राजनीतिक और कूटनीतिक चर्चा जारी है।

 

ढाका की ओर से पहले भी भारत से शेख हसीना को वापस भेजने की मांग की जा चुकी है।

 

द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ सकता है असर

 

 

बांग्लादेश सरकार ने संकेत दिया है कि भारत की जमीन से होने वाली राजनीतिक गतिविधियां दोनों देशों के बीच संबंधों के लिए संवेदनशील मुद्दा बन सकती हैं।

 

भारत और बांग्लादेश के बीच व्यापार, सीमा प्रबंधन, सुरक्षा, जल बंटवारे और क्षेत्रीय संपर्क जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। ऐसे में शेख हसीना का मुद्दा दोनों देशों के संबंधों में अतिरिक्त तनाव पैदा कर सकता है।

 

ढाका की नजर भारत के रुख पर

 

 

अब बांग्लादेश की नजर भारत की प्रतिक्रिया पर है। शेख हसीना को लेकर दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद मतभेदों के बीच ढाका का यह ताजा संदेश भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

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हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Ranjan Kumar Tiwari Ranjan123

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US Visa Rule: 50 देशों के लिए नया वीजा बॉन्ड नियम लागू, क्या भारतीयों को भी देना होगा $20,000?

US Visa Bond Program: अगर आप अमेरिका घूमने या बिजनेस के सिलसिले में जाने की योजना बना रहे हैं, तो यह खबर आपके लिए महत्वपूर्ण है। अमेरिका ने अपने Visa Bond Program को अब स्थायी नियम का रूप दे दिया है। इसके तहत कुछ देशों के नागरिकों को B-1 (बिजनेस) और B-2 (टूरिस्ट) वीजा जारी होने से पहले 20,000 डॉलर तक का रिफंडेबल सिक्योरिटी बॉन्ड जमा करना पड़ सकता है। हालांकि भारतीय नागरिकों के लिए राहत की बात यह है कि भारत इस सूची में शामिल नहीं है। किन लोगों पर लागू होगा नया नियम? नया नियम उन 50 देशों के नागरिकों पर लागू होगा जो B-1 और B-2 वीजा के लिए आवेदन करेंगे। पात्र आवेदकों से अधिकतम 20,000 डॉलर तक का सिक्योरिटी बॉन्ड लिया जा सकता है। यदि वीजा धारक अमेरिका में तय नियमों का पालन करता है और वीजा अवधि समाप्त होने से पहले देश छोड़ देता है, तो पूरी राशि वापस कर दी जाएगी। वहीं, यदि वीजा आवेदन अस्वीकार हो जाता है, तब भी जमा किया गया बॉन्ड लौटा दिया जाएगा। भारतीयों पर क्या होगा असर? फिलहाल भारत इस Visa Bond Program का हिस्सा नहीं है। इसका मतलब है कि भारत से B-1 या B-2 वीजा के लिए आवेदन करने वाले लोगों को यह अतिरिक्त सिक्योरिटी बॉन्ड जमा नहीं करना होगा। हालांकि, यह फैसला इस बात का संकेत है कि अमेरिकी प्रशासन वीजा ओवरस्टे (Visa Overstay) को रोकने के लिए अब पहले से अधिक सख्त रुख अपना रहा है। पहले क्या था और अब क्या बदला? इससे पहले लागू पायलट प्रोग्राम के तहत कॉन्सुलर अधिकारी 5,000 डॉलर, 10,000 डॉलर या अधिकतम 15,000 डॉलर तक का बॉन्ड तय कर सकते थे। अब नए स्थायी नियम में: 5,000 डॉलर का विकल्प समाप्त कर दिया गया है। अधिकतम बॉन्ड राशि बढ़ाकर 20,000 डॉलर कर दी गई है। यह कार्यक्रम ट्रंप प्रशासन ने अगस्त 2025 में पायलट आधार पर शुरू किया था। इसका उद्देश्य वीजा अवधि समाप्त होने के बाद भी अमेरिका में रुकने वाले लोगों की संख्या कम करना और इमिग्रेशन नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना था। क्यों लिया गया यह फैसला? अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, 2024 में कार्यक्रम में शामिल 50 देशों के लगभग 45,500 लोग वीजा अवधि समाप्त होने के बाद भी अमेरिका में रुके रहे। वहीं, पायलट प्रोग्राम के पहले 10 महीनों के दौरान जिन लोगों पर बॉन्ड नियम लागू किया गया, उनमें 50 से भी कम मामलों में वीजा ओवरस्टे दर्ज हुआ। विभाग का मानना है कि यह नियम B-1/B-2 वीजा के दुरुपयोग को कम करने में प्रभावी साबित हो सकता है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि इससे विकासशील देशों के यात्रियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ सकता है और अंतरराष्ट्रीय यात्रा प्रभावित हो सकती है।  

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गाजा, एजेंसियां। गाजा में युद्धविराम समझौते को आगे बढ़ाने की कोशिशों के बीच ‘बोर्ड ऑफ पीस’ ने इस्राइल और हमास दोनों से सीजफायर फ्रेमवर्क के तहत तय दायित्वों का पूरी तरह पालन करने की अपील की है। बोर्ड ने कहा है कि समझौते के अगले चरण में प्रगति तभी संभव होगी, जब दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिम्मेदारियां पूरी करेंगे।   दोनों पक्षों से समझौते का पालन करने की अपील     बोर्ड ऑफ पीस की ओर से यह अपील ऐसे समय की गई है जब गाजा में युद्धविराम के बावजूद हिंसा और सैन्य कार्रवाई को लेकर चिंता बनी हुई है। बोर्ड ने इस बात पर जोर दिया कि सीजफायर फ्रेमवर्क की सभी शर्तों को लागू करना आगे की शांति प्रक्रिया के लिए जरूरी है।     गाजा में लागू होना है समझौते का अगला चरण     बोर्ड ऑफ पीस के गाजा मामलों के उच्च प्रतिनिधि निकोलाय म्लादेनोव ने इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से मुलाकात कर समझौते के कार्यान्वयन पर चर्चा की। म्लादेनोव ने गाजा में हवाई हमले रोकने की अपील भी की, ताकि समझौते को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया प्रभावित न हो।     इस्राइल और हमास के बीच बनी हुई है असहमति     समझौते के कार्यान्वयन को लेकर दोनों पक्षों की स्थिति में अंतर बना हुआ है। इस्राइल हमास के पूर्ण निरस्त्रीकरण को अपनी सैन्य वापसी से जोड़ रहा है, जबकि हमास इस्राइली सैन्य कार्रवाई और वापसी के मुद्दे पर अलग शर्तें रख रहा है। यही मतभेद सीजफायर के अगले चरण की राह में बड़ी चुनौती बने हुए हैं।     शांति प्रक्रिया के सामने बड़ी चुनौती     बोर्ड ऑफ पीस का कहना है कि समझौते के तहत तय चरणों को आगे बढ़ाने के लिए दोनों पक्षों को अपने दायित्व पूरे करने होंगे। गाजा में जारी हिंसा के बीच अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थों की कोशिश है कि युद्धविराम को प्रभावी बनाया जाए और निरस्त्रीकरण, इस्राइली सैन्य वापसी तथा नागरिक प्रशासन की स्थापना की प्रक्रिया आगे बढ़े।  

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