अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump के एक दूत ने आगामी FIFA World Cup 2026 को लेकर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप के विशेष दूत पाओलो ज़ाम्पोली ने सुझाव दिया है कि क्वालिफाई कर चुकी Iran की जगह Italy को टूर्नामेंट में शामिल किया जाए।
ज़ाम्पोली ने कहा कि इटली जैसी चार बार की चैंपियन टीम का वर्ल्ड कप में होना खेल के लिए बेहतर होगा और यह उनके लिए “सपने जैसा” होगा।
Italy इस बार भी वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफाई नहीं कर सका। प्लेऑफ फाइनल में उसे Bosnia and Herzegovina के खिलाफ पेनल्टी शूटआउट में हार का सामना करना पड़ा।
अगर यह बदलाव होता है, तो इटली को टूर्नामेंट में एंट्री मिल सकती है, हालांकि यह पूरी तरह FIFA के नियमों और निर्णय पर निर्भर करेगा।
FIFA के नियमों के अनुसार, यदि कोई टीम टूर्नामेंट से हटती है तो उसकी जगह आमतौर पर उसी कॉन्फेडरेशन की रनर-अप या अगली योग्य टीम को मौका दिया जाता है।
इस आधार पर United Arab Emirates को प्राथमिकता मिल सकती है, जिसने एशियाई प्लेऑफ तक पहुंच बनाई थी। हालांकि, अंतिम फैसला FIFA अपने विवेक से भी ले सकता है।
Iran ने साफ कर दिया है कि वह वर्ल्ड कप में खेलने के लिए पूरी तरह तैयार है। पहले ईरान ने मैचों को अमेरिका से हटाकर मेक्सिको में कराने की मांग की थी, लेकिन अब टीम टूर्नामेंट में भाग लेने की योजना बना रही है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब Donald Trump और इटली की प्रधानमंत्री Giorgia Meloni के बीच रिश्तों में खटास की खबरें आई हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ऐसा फैसला लिया जाता है, तो इससे खेल और राजनीति के बीच की रेखा और धुंधली हो सकती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर इलेक्ट्रिक वाहन (EV) नीति को लेकर पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन की नीतियों पर हमला बोला है। मिशिगन में जनरल मोटर्स के मिलफोर्ड प्रूविंग ग्राउंड के दौरे के दौरान ट्रंप ने कहा कि उपभोक्ताओं को इलेक्ट्रिक और पेट्रोल-डीजल वाहनों के बीच अपनी पसंद से चुनाव करने की पूरी आजादी होनी चाहिए। उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार ने बाइडन प्रशासन की EV नीति और सख्त ईंधन दक्षता (CAFE) मानकों को खत्म कर अमेरिकी ऑटो उद्योग को बड़े नुकसान से बचाया। ट्रंप ने कहा कि अगर बाइडन की नीतियां जारी रहतीं तो अमेरिका का पारंपरिक ऑटोमोबाइल उद्योग संकट में आ सकता था। उन्होंने कहा कि जो लोग इलेक्ट्रिक कार खरीदना चाहते हैं, उनके लिए विकल्प मौजूद हैं, लेकिन किसी पर EV अपनाने का दबाव नहीं होना चाहिए। उनके मुताबिक, सरकार का काम लोगों को विकल्प देना है, न कि किसी एक तकनीक को अनिवार्य बनाना। रोजगार पर जताई चिंता ट्रंप ने दावा किया कि इलेक्ट्रिक वाहनों के निर्माण में पारंपरिक पेट्रोल और डीजल वाहनों की तुलना में कम कर्मचारियों की जरूरत होती है। उनका कहना है कि इससे मिशिगन जैसे राज्यों में रोजगार प्रभावित हो सकता है, जहां बड़ी आबादी ऑटोमोबाइल उद्योग पर निर्भर है। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने ऐसे नियमों को खत्म किया जो पारंपरिक वाहन उद्योग के लिए चुनौती बन रहे थे। टैरिफ और घरेलू उत्पादन पर जोर अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि उनकी सरकार ने अमेरिका के बाहर निर्मित कारों और ट्रकों पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया है, जबकि देश में बनने वाले वाहनों पर यह लागू नहीं होता। ट्रंप के मुताबिक, इस फैसले से कई वाहन कंपनियां अमेरिका में उत्पादन बढ़ाने और नए निवेश करने के लिए प्रेरित हुई हैं। उन्होंने जनरल मोटर्स की सराहना करते हुए कहा कि कंपनी ने 2026 में ट्रक और एसयूवी उत्पादन में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। साथ ही पिछले दो वर्षों में अमेरिका में विनिर्माण सुविधाओं के विस्तार के लिए करीब 9 अरब डॉलर का निवेश किया है। बाइडन प्रशासन की नीति क्या थी? बाइडन प्रशासन ने स्वच्छ ऊर्जा और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के उद्देश्य से इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने वाली नीतियां लागू की थीं। इन नीतियों के तहत सख्त ईंधन दक्षता और उत्सर्जन मानकों पर जोर दिया गया था। हालांकि, सरकार ने सभी नए वाहनों को अनिवार्य रूप से इलेक्ट्रिक बनाने का नियम नहीं बनाया था, बल्कि कम उत्सर्जन वाले वाहनों की हिस्सेदारी बढ़ाने का लक्ष्य रखा था। ट्रंप के ताजा बयान के बाद अमेरिका में इलेक्ट्रिक वाहनों की नीति, रोजगार और ऑटो उद्योग के भविष्य को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। साथ ही माना जा रहा है कि अमेरिका की नीतियों में बदलाव का असर वैश्विक ऑटोमोबाइल कंपनियों और EV उद्योग पर भी पड़ सकता है।
Black Sea MV OMORFI Attack: काला सागर में मालवाहक पोत MV OMORFI पर हुए हमले के बाद भारत ने कड़ा रुख अपनाया है। इस हमले में एक भारतीय नागरिक की मौत हो गई, जबकि दो अन्य भारतीय सुरक्षित बच गए। घटना को गंभीरता से लेते हुए विदेश मंत्रालय (MEA) ने भारत में यूक्रेन के राजदूत डॉ. ओलेक्जेंडर पोलिशचुक को तलब किया और वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों को लेकर गहरी चिंता और कड़ी नाराजगी जताई। विदेश मंत्रालय ने जताई कड़ी आपत्ति विदेश मंत्रालय ने यूक्रेनी राजदूत से कहा कि निर्दोष नाविकों और आम नागरिकों की जान को खतरे में डालने वाली ऐसी कार्रवाई किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। भारत ने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा, नौवहन की स्वतंत्रता और वैश्विक व्यापार को सुरक्षित रखना सभी देशों की साझा जिम्मेदारी है। मंत्रालय ने यूक्रेन सरकार तक भारत की गंभीर चिंता तत्काल पहुंचाने का आग्रह भी किया। हमले के समय जहाज पर थे तीन भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, 18 जुलाई को जब MV OMORFI पर हमला हुआ, उस समय जहाज पर चालक दल के कुल 10 सदस्य मौजूद थे, जिनमें तीन भारतीय नागरिक भी शामिल थे। हमले में एक भारतीय की मौत हो गई, जबकि दो अन्य भारतीय सुरक्षित हैं। घटना के बाद भारतीय दूतावास लगातार दोनों नागरिकों के संपर्क में है और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। व्यावसायिक जहाजों की सुरक्षा पर जोर भारत ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में चलने वाले वाणिज्यिक जहाजों को किसी भी सैन्य संघर्ष का निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। ऐसे हमले न केवल नाविकों की जान जोखिम में डालते हैं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी गंभीर असर डालते हैं। भारत ने सभी पक्षों से अंतरराष्ट्रीय कानूनों और समुद्री नियमों का पालन करने की अपील की है। हाल ही में रूसी हमले पर भी जताई थी चिंता यह घटना यूक्रेन के तट के पास एक अन्य वाणिज्यिक जहाज पर हुए रूसी हमले के कुछ ही दिनों बाद सामने आई है। उस हमले में चार भारतीयों समेत 10 लोगों की मौत हुई थी। रूस ने दावा किया था कि जहाज पर सैन्य सामग्री ले जाई जा रही थी, लेकिन भारत ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा था कि जहाज में केवल अनाज लदा हुआ था। भारत ने एक बार फिर दोहराया है कि युद्ध या संघर्ष के दौरान भी अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए और व्यापारिक जहाजों को किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई से दूर रखा जाना चाहिए। विदेश मंत्रालय ने कहा कि समुद्री सुरक्षा और वैश्विक व्यापार की निर्बाध आवाजाही अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्राथमिकता होनी चाहिए।
Rawalakot (PoK): पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के रावलकोट में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़प के बाद हालात तनावपूर्ण हो गए हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने गोलीबारी की, जिसमें कम से कम 9 लोगों की मौत होने का दावा किया जा रहा है। हालांकि, इस आंकड़े की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। बातचीत विफल होने के बाद बढ़ा तनाव रिपोर्ट्स के मुताबिक, जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) और प्रशासन के बीच कई दौर की बातचीत बेनतीजा रही। इसके बाद हजारों प्रदर्शनकारी मुजफ्फराबाद की ओर मार्च की तैयारी कर रहे थे। इसी दौरान सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ, जिसके बाद गोलीबारी की खबर सामने आई। 52 दिनों से जारी है आंदोलन बताया जा रहा है कि रावलकोट और आसपास के क्षेत्रों में पिछले 52 दिनों से विरोध प्रदर्शन जारी है। प्रदर्शनकारी विभिन्न स्थानीय मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। ताजा घटना के बाद पूरे इलाके में तनाव और सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो घटना के कई वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। वीडियो में कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि गोलीबारी में कई लोगों की मौत हुई और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। हालांकि, इन वीडियो और मौतों के दावों की स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है। एक वायरल वीडियो में एक व्यक्ति रावलकोट के हालात बताते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय और मीडिया से हस्तक्षेप की अपील करता दिखाई दे रहा है। वह दावा करता है कि फायरिंग के बाद इलाके में अफरा-तफरी मच गई और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। प्रशासन की ओर से आधिकारिक बयान का इंतजार घटना के बाद पूरे इलाके में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई है। फिलहाल पाकिस्तानी प्रशासन की ओर से हताहतों की संख्या या कार्रवाई को लेकर विस्तृत आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। वहीं, हालात पर लगातार नजर रखी जा रही है।