दक्षिण एशिया में सुरक्षा स्थिति एक बार फिर गंभीर होती दिख रही है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जारी तनाव अब खुले सैन्य टकराव का रूप लेता जा रहा है। ताजा घटनाक्रम में अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने पाकिस्तान पर राजधानी काबुल में बड़े पैमाने पर हवाई हमले करने का आरोप लगाया है, जिसमें अब तक 400 लोगों की मौत और 200 से अधिक के घायल होने का दावा किया गया है। हालांकि पाकिस्तान ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।
तालिबान सरकार के अनुसार, यह हमला काबुल के 9वें पुलिस जिले में स्थित एक नशा मुक्ति केंद्र (ड्रग्स रिहैबिलिटेशन अस्पताल) पर किया गया। इस अस्पताल में बड़ी संख्या में मादक पदार्थों के आदी लोगों का इलाज चल रहा था।
हमले के बाद अस्पताल का बड़ा हिस्सा मलबे में तब्दील हो गया और वहां मौजूद मरीजों, स्वास्थ्यकर्मियों और स्थानीय लोगों में भारी हताहत हुए।
अफगान अधिकारियों का कहना है कि अब तक 400 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 200 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हैं। राहत और बचाव कार्य जारी है, लेकिन मलबे में दबे लोगों के कारण मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
स्थानीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई शव अब भी मलबे के नीचे फंसे हुए हैं और अस्पताल की इमारत पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी है।
बताया जा रहा है कि यह हमला सोमवार रात करीब 9 बजे हुआ, जब लोग रमज़ान के दौरान रोज़ा खोलने के बाद बाहर निकले हुए थे। अचानक हुए जोरदार धमाकों से पूरा काबुल दहल उठा।
हमले के तुरंत बाद एंटी-एयरक्राफ्ट फायरिंग शुरू हो गई और शहर में अफरा-तफरी मच गई। लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागते नजर आए।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह हमला दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद, खासकर डूरंड लाइन को लेकर बढ़ते तनाव का परिणाम हो सकता है।
बीते तीन हफ्तों से सीमा पर लगातार गोलीबारी, ड्रोन हमले और सैन्य झड़पें हो रही हैं, जिससे हालात और बिगड़ते जा रहे हैं।
तालिबान के आधिकारिक प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने इस हमले की कड़ी निंदा करते हुए इसे “मानवता के खिलाफ अपराध” बताया है।
उन्होंने कहा कि यह अफगानिस्तान की संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का खुला उल्लंघन है। साथ ही, उन्होंने संकेत दिए कि इस हमले का जवाब दिया जाएगा।
दूसरी ओर, शहबाज शरीफ सरकार ने इन सभी आरोपों को खारिज कर दिया है। पाकिस्तान के आधिकारिक बयान में कहा गया है कि उसकी सेना ने काबुल में किसी भी अस्पताल या नागरिक ठिकाने को निशाना नहीं बनाया।
पाकिस्तान ने इन आरोपों को “बेबुनियाद और भ्रामक” करार दिया है।
इस घटना के बाद पूरे क्षेत्र में अस्थिरता की आशंका बढ़ गई है। यदि यह तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर न केवल दक्षिण एशिया बल्कि वैश्विक सुरक्षा और व्यापार पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर जल्द कूटनीतिक समाधान नहीं निकला, तो यह संघर्ष व्यापक युद्ध का रूप ले सकता है।
कुल मिलाकर, काबुल में हुए इस कथित हमले ने दोनों देशों के बीच पहले से ही खराब रिश्तों को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया है। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में हालात शांत होते हैं या संघर्ष और गहराता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
अंतरिक्ष अन्वेषण के इतिहास में एक नई शुरुआत कर रहा Artemis II mission अपने पहले ही दिन एक अनपेक्षित तकनीकी समस्या से जूझता नजर आया। 1 अप्रैल 2026 को लॉन्च हुए इस मिशन का उद्देश्य 50 वर्षों बाद इंसानों को चंद्रमा की परिक्रमा कराना है, लेकिन यात्रा के कुछ ही घंटों बाद अंतरिक्ष यात्रियों को एक साधारण दिखने वाली, पर अहम दिक्कत का सामना करना पड़ा-वे ईमेल नहीं भेज पा रहे थे। मिशन के कमांडर Reid Wiseman ने रिपोर्ट किया कि उनके पर्सनल कंप्यूटिंग डिवाइस पर Microsoft Outlook काम नहीं कर रहा था। उन्होंने मिशन कंट्रोल से संपर्क कर बताया कि Outlook के दो इंस्टेंस खुल ही नहीं रहे हैं और तकनीकी सहायता की जरूरत है। बताया जाता है कि यह डिवाइस Microsoft Surface Pro था, जिसका उपयोग क्रू संचार और अन्य डिजिटल कार्यों के लिए कर रहा था। अंतरिक्ष में इंटरनेट और सॉफ्टवेयर के सीमित संसाधनों के बीच यह समस्या क्रू के लिए परेशानी का कारण बन गई। हालांकि, NASA की ग्राउंड टीम ने तेजी से प्रतिक्रिया देते हुए रिमोट एक्सेस के जरिए इस समस्या को ठीक कर दिया। मिशन कंट्रोल ने बताया कि Outlook अब खुल रहा है, हालांकि वह “ऑफलाइन” मोड में रहेगा-जो कि अंतरिक्ष में सामान्य स्थिति मानी जाती है। अन्य तकनीकी चुनौतियाँ भी आई सामने Outlook की समस्या के अलावा मिशन को एक और तकनीकी चुनौती का सामना करना पड़ा। लॉन्च के तुरंत बाद अंतरिक्ष यान के टॉयलेट सिस्टम का फैन जाम हो गया था, जिसे बाद में ग्राउंड टीम के निर्देशों से ठीक किया गया। इस दौरान बैकअप सिस्टम का उपयोग किया गया। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस मिशन से पहले भी कई तकनीकी परेशानियां सामने आई थीं, जिनमें हाइड्रोजन और हीलियम लीक तथा हीट शील्ड में खराबी शामिल थीं। बावजूद इसके, 3 अप्रैल को क्रू ने सफलतापूर्वक ट्रांस-लूनर इंजेक्शन बर्न पूरा किया, जिससे यान चंद्रमा की दिशा में आगे बढ़ सका। सोशल मीडिया पर मजेदार प्रतिक्रियाएँ इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर यूजर्स ने मजेदार मीम्स और प्रतिक्रियाओं की बाढ़ ला दी। कई लोगों ने कहा कि “Outlook की समस्या से कोई भी नहीं बच सकता-चाहे वह पृथ्वी हो या अंतरिक्ष।” कुछ यूजर्स ने NASA के सॉफ्टवेयर चयन पर भी सवाल उठाए। मिशन का महत्व Artemis II मिशन में कुल चार अंतरिक्ष यात्री शामिल हैं- Reid Wiseman (कमांडर) Victor Glover (पायलट) Christina Koch (मिशन स्पेशलिस्ट) Jeremy Hansen (मिशन स्पेशलिस्ट) यह मिशन भविष्य में चंद्रमा पर मानव लैंडिंग की तैयारी के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव अब एक नए और खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। पानी और तेल मार्गों को लेकर पहले से जारी टकराव के बीच अब रणनीतिक पुलों को निशाना बनाने की आशंका बढ़ गई है। हालिया घटनाक्रम में अमेरिका द्वारा ईरान के एक महत्वपूर्ण पुल पर किए गए हमले ने इस संकट को और भड़का दिया है, जिसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई के संकेत दिए हैं। अमेरिका का हमला और बढ़ता तनाव रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी हमले में ईरान के सबसे ऊंचे माने जा रहे B1 पुल को निशाना बनाया गया। यह पुल राजधानी तेहरान को करज शहर से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट था, जो अभी निर्माणाधीन था। इस हमले में कम से कम 8 लोगों की मौत और करीब 95 लोग घायल बताए जा रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस हमले के बाद कड़ा रुख अपनाते हुए ईरान को चेतावनी दी कि यदि वह वार्ता के लिए आगे नहीं आता, तो और भी कड़े कदम उठाए जा सकते हैं। ईरान का पलटवार: 8 अहम पुल निशाने पर हमले के बाद ईरान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। ईरान की अर्ध-सरकारी एजेंसी के मुताबिक, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने खाड़ी क्षेत्र और आसपास के देशों के 8 महत्वपूर्ण पुलों को संभावित निशाने के रूप में चिन्हित किया है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं: कुवैत का शेख जाबेर अल-अहमद अल-सबा सी ब्रिज UAE के शेख जायद, अल मकता और शेख खलीफा ब्रिज सऊदी अरब और बहरीन को जोड़ने वाला किंग फहद कॉज़वे जॉर्डन के किंग हुसैन, दामिया और अब्दौन ब्रिज यह सूची इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में संघर्ष और व्यापक हो सकता है, जिससे पूरे खाड़ी क्षेत्र की कनेक्टिविटी और सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। ईरान का सख्त संदेश ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने साफ कहा कि नागरिक ढांचे पर हमले ईरान को झुकाने में सफल नहीं होंगे। उन्होंने इसे विरोधी पक्ष की ‘नैतिक हार’ बताया और संकेत दिया कि जवाबी कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। वैश्विक असर की आशंका विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पुलों और इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले बढ़ते हैं, तो इसका असर केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। यह वैश्विक व्यापार, तेल सप्लाई और समुद्री मार्गों को भी प्रभावित कर सकता है। खासकर खाड़ी क्षेत्र के पुल कई देशों के बीच व्यापार और लॉजिस्टिक्स की लाइफलाइन माने जाते हैं।
अमेरिकी सेना में उस समय बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जब ईरान के साथ जारी तनाव और युद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है। इसी बीच अमेरिका के आर्मी चीफ रैंडी ए. जॉर्ज को अचानक पद से हटाकर तत्काल रिटायर होने के लिए कहा गया है। यह फैसला अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने लिया, जिससे कई सवाल खड़े हो गए हैं। अचानक क्यों लिया गया यह फैसला? पेंटागन की ओर से इस फैसले की पुष्टि तो कर दी गई, लेकिन इसके पीछे कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया। जानकारों का मानना है कि यह कदम अमेरिकी प्रशासन के भीतर चल रहे बड़े सैन्य पुनर्गठन का हिस्सा हो सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन लगातार सेना के शीर्ष नेतृत्व में बदलाव कर रहा है, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंडे के अनुरूप नई रणनीति लागू की जा सके। नए आर्मी चीफ की नियुक्ति रैंडी ए. जॉर्ज के हटने के बाद, वाइस चीफ ऑफ स्टाफ क्रिस्टोफर ला-नेव को कार्यवाहक आर्मी चीफ बनाया गया है। ला-नेव इससे पहले कई महत्वपूर्ण सैन्य पदों पर रह चुके हैं और उन्हें रक्षा मंत्री के करीबी अधिकारियों में भी गिना जाता है। ट्रंप प्रशासन क्यों कर रहा लगातार बदलाव? विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। कई वरिष्ठ अधिकारियों को पहले ही हटाया जा चुका है कुछ को समय से पहले रिटायर किया गया ‘डाइवर्सिटी, इक्विटी और इंक्लूजन’ (DEI) नीतियों को खत्म करने की कोशिश जारी है सूत्रों के मुताबिक, प्रशासन उन अधिकारियों को हटाने की कोशिश कर रहा है, जिन्हें पिछली सरकार की नीतियों से जुड़ा माना जाता है। क्या युद्ध के बीच यह फैसला सही? ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच इस तरह का नेतृत्व परिवर्तन कई विशेषज्ञों को चौंका रहा है। उनका मानना है कि: इससे सैनिकों का मनोबल प्रभावित हो सकता है रणनीतिक फैसलों में अस्थिरता आ सकती है युद्ध के दौरान नेतृत्व में बदलाव जोखिम भरा हो सकता है हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि अमेरिका अपने सैन्य लक्ष्यों को तेजी से पूरा करना चाहता है और इसी दिशा में यह बदलाव किया जा रहा है। रैंडी जॉर्ज का सैन्य करियर रैंडी ए. जॉर्ज एक अनुभवी इन्फैंट्री अधिकारी रहे हैं। वेस्ट प्वाइंट मिलिट्री अकादमी के स्नातक गल्फ वॉर, इराक और अफगानिस्तान में सेवा 2023 में आर्मी चीफ नियुक्त सामान्य कार्यकाल 2027 तक था यानी उनका कार्यकाल अभी पूरा नहीं हुआ था, लेकिन उन्हें समय से पहले ही हटाया गया। आगे क्या हो सकता है? मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आने वाले समय में अमेरिकी सेना और प्रशासन में और बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। यह भी संभावना जताई जा रही है कि कुछ और वरिष्ठ अधिकारियों को हटाया या रिटायर किया जा सकता है।