तेहरान, एजेंसियां। ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के उस आरोप को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें अबू धाबी ने ईरान पर दो बैलिस्टिक मिसाइलें दागने का आरोप लगाया था। ईरानी विदेश मंत्रालय ने इन आरोपों को पूरी तरह बेबुनियाद बताते हुए कहा कि इस तरह के आरोप क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकते हैं।
UAE के रक्षा मंत्रालय ने दावा किया था कि उसकी वायु रक्षा प्रणालियों ने ईरान से दागी गई दो बैलिस्टिक मिसाइलों का पता लगाया। UAE के अनुसार, एक मिसाइल उसके क्षेत्रीय जलक्षेत्र के बाहर गिरी, जबकि दूसरी उसके क्षेत्रीय जलक्षेत्र में पहुंची। UAE ने इस घटना के बाद ईरान के साथ सभी व्यापारिक, वाणिज्यिक और वित्तीय लेन-देन अगले आदेश तक रोक दिए।
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघई ने UAE के आरोपों को स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए कहा कि ईरान ने UAE की ओर कोई मिसाइल नहीं दागी। तेहरान ने आरोपों को पड़ोसी देशों के बीच विश्वास बढ़ाने की कोशिशों के विपरीत बताया है।
ईरान की ओर से यह भी संकेत दिया गया है कि ऐसे आरोप क्षेत्र में जारी तनाव को और भड़का सकते हैं। इस घटनाक्रम ने ईरान और खाड़ी देशों के बीच पहले से तनावपूर्ण संबंधों को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है।
मिसाइल विवाद के बाद UAE द्वारा ईरान के साथ व्यापार और वित्तीय गतिविधियां रोकने का फैसला दोनों देशों के आर्थिक संबंधों के लिए बड़ा कदम माना जा रहा है। ईरान और UAE के बीच लंबे समय से महत्वपूर्ण व्यापारिक संबंध रहे हैं, ऐसे में इस रोक का असर क्षेत्रीय कारोबार और समुद्री परिवहन पर पड़ सकता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर पहले से जारी तनाव के बीच यह नया विवाद ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक शिपिंग के लिए भी चिंता बढ़ा रहा है। अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर इस बात पर है कि UAE और ईरान के बीच यह विवाद आगे कितना बढ़ता है और क्या दोनों पक्ष कूटनीतिक बातचीत के जरिए तनाव कम करने की कोशिश करते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ बातचीत को लेकर बड़ा बयान देते हुए कहा है कि फिलहाल दोनों देशों के बीच न तो कोई बातचीत चल रही है और न ही कोई वार्ता निर्धारित है। ट्रंप ने साथ ही दावा किया कि रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य खुला है, जबकि ईरान का कहना है कि जलडमरूमध्य अभी भी जहाजों के लिए बंद है। होर्मुज को लेकर अमेरिका और ईरान के दावे अलग ट्रंप के बयान के मुताबिक अमेरिका की नजर में होर्मुज जलडमरूमध्य नौवहन के लिए खुला है। वहीं ईरान ने इसके विपरीत रुख अपनाते हुए कहा है कि जब तक अमेरिका अंतरिम समझौते की शर्तों को पूरा नहीं करता, तब तक जलडमरूमध्य को फिर से पूरी तरह नहीं खोला जाएगा। ईरान की ओर से जिन शर्तों का उल्लेख किया गया है, उनमें बंदरगाहों की नाकेबंदी हटाना, तेल प्रतिबंधों में राहत और सैन्य धमकियों को रोकना शामिल है। ट्रंप ने होर्मुज को लेकर फिर अपनाया सख्त रुख ट्रंप ने सोशल मीडिया पर एक नक्शा भी साझा किया, जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य को अमेरिका के नए क्षेत्र के रूप में दर्शाया गया। इस कदम को ईरान के खिलाफ उनके सख्त रुख के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। इस बीच ईरान ने भी अमेरिका के रुख पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने से क्षेत्र में कूटनीतिक समाधान की संभावनाएं कमजोर होती दिखाई दे रही हैं। तेल बाजार पर भी बढ़ा दबाव होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर जारी अनिश्चितता का सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ रहा है। बुधवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 91.28 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जबकि अमेरिकी WTI करीब 85.31 डॉलर प्रति बैरल रहा। यह लगातार चौथा दिन है जब तेल की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई। होर्मुज दुनिया के प्रमुख ऊर्जा मार्गों में से एक है। इसलिए यहां लंबे समय तक व्यवधान रहने की स्थिति में वैश्विक तेल आपूर्ति और महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका है। बातचीत की उम्मीदों पर लगा झटका ट्रंप के ताजा बयान से अमेरिका और ईरान के बीच तत्काल बातचीत की उम्मीदों को झटका लगा है। दूसरी ओर, क्षेत्रीय देश होर्मुज के जरिए तेल और अन्य जहाजों की आवाजाही को सामान्य बनाने के प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में अमेरिका-ईरान संबंधों और होर्मुज संकट पर पूरी दुनिया की नजर बनी रहेगी।
इस्लामाबाद, एजेंसियां। पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को चिकित्सा जांच और इलाज के लिए इस्लामाबाद के शिफा इंटरनेशनल अस्पताल में स्थानांतरित करने का आदेश दिया है। अदालत ने उनके स्वास्थ्य को लेकर उठ रही चिंताओं के बीच विशेषज्ञ डॉक्टरों और इमरान खान के निजी चिकित्सक को शामिल कर मेडिकल बोर्ड बनाने का भी निर्देश दिया है। 48 घंटे के भीतर अस्पताल ले जाने का आदेश तीन सदस्यीय पीठ ने अधिकारियों को इमरान खान को अदियाला जेल से शिफा इंटरनेशनल अस्पताल ले जाने का निर्देश दिया है। वहां उनकी व्यापक चिकित्सा जांच की जाएगी और विशेषज्ञ डॉक्टर उनकी स्थिति का आकलन करेंगे। रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने उन्हें अस्पताल में इलाज के लिए 16 सितंबर तक रखने का निर्देश दिया है। निजी डॉक्टर और विशेषज्ञों वाला मेडिकल बोर्ड सुप्रीम कोर्ट ने इमरान खान की जांच के लिए एक मेडिकल बोर्ड गठित करने को कहा है। इसमें विशेषज्ञ डॉक्टरों के साथ उनके निजी चिकित्सक डॉ. फैसल सुल्तान को भी शामिल किया जाएगा। इमरान खान के परिवार और कानूनी टीम की ओर से लंबे समय से बेहतर चिकित्सा सुविधा और निजी डॉक्टरों से जांच की मांग की जा रही थी। परिवार से साप्ताहिक मुलाकात और फोन की अनुमति अदालत ने इमरान खान के परिवार को भी राहत दी है। आदेश के मुताबिक, उन्हें परिवार के सदस्यों से साप्ताहिक मुलाकात की अनुमति दी जाएगी। साथ ही उनके बेटों से फोन पर बातचीत की व्यवस्था करने का निर्देश भी दिया गया है। लंबे समय से सुरक्षा कारणों का हवाला देकर परिवार की मुलाकातों पर प्रतिबंध लगा हुआ था। सरकार ने आदेश पर पुनर्विचार के संकेत दिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पाकिस्तान सरकार के रुख में असमंजस दिखाई दे रहा है। सरकार के एक मंत्री ने आदेश का पालन करने की बात कही, जबकि कानून मंत्री ने सरकारी अस्पताल में इलाज कराने की प्राथमिकता का संकेत देते हुए आदेश में बदलाव की मांग की संभावना जताई है। ऐसे में इमरान खान को अस्पताल स्थानांतरित करने का मामला पाकिस्तान की राजनीति में भी नया मुद्दा बन गया है।
जकार्ता, एजेंसियां। इंडोनेशिया में हालिया बड़े भूकंप के बाद 6.1 तीव्रता का एक तेज झटका भी दर्ज किया गया। यह झटका फ्लोरेस क्षेत्र में आए 7.7 तीव्रता के विनाशकारी भूकंप के बाद महसूस किए गए कई आफ्टरशॉक्स में शामिल था। वहीं, 18 अगस्त को सुमात्रा के तट के पास भी 6.1 तीव्रता का भूकंप दर्ज होने की रिपोर्ट सामने आई है। 7.7 तीव्रता के भूकंप से भारी तबाही इंडोनेशिया के पूर्वी हिस्से में 15 अगस्त को आए 7.7 तीव्रता के भूकंप ने खास तौर पर फ्लोरेस द्वीप और पूर्वी नुसा तेंगारा प्रांत में भारी तबाही मचाई। ताजा रिपोर्टों के अनुसार इस आपदा में कम से कम 68 लोगों की मौत हुई है और 200 से अधिक लोग घायल हुए हैं। हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। लगातार आफ्टरशॉक्स से बढ़ी चिंता बड़े भूकंप के बाद क्षेत्र में लगातार आफ्टरशॉक्स महसूस किए जा रहे हैं। राहत और बचाव कार्यों में भी इन झटकों के कारण मुश्किलें बढ़ रही हैं। कई इलाकों में भूस्खलन के कारण सड़कें बंद हैं और प्रभावित गांवों तक राहत सामग्री पहुंचाने में परेशानी हो रही है। हजारों लोग अस्थायी शिविरों में रहने को मजबूर भूकंप से घरों और सार्वजनिक इमारतों को नुकसान पहुंचने के बाद बड़ी संख्या में लोग अस्थायी शिविरों और खुले स्थानों में रह रहे हैं। स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों को भी नुकसान पहुंचा है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने के साथ उनके मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। इंडोनेशिया पैसिफिक रिंग ऑफ फायर में स्थित होने के कारण भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील देश है। लगातार आ रहे झटकों के बीच प्रशासन ने राहत और बचाव अभियान तेज कर दिया है।