पटना: बिहार में बालू की बढ़ती मांग को देखते हुए राज्य सरकार ने नए बालू घाटों की पहचान की प्रक्रिया शुरू करने का फैसला लिया है। खान एवं भूतत्व विभाग ने सभी जिलों में ऐसे संभावित स्थानों की तलाश करने का निर्देश दिया है, जहां पर्याप्त मात्रा में बालू उपलब्ध है, लेकिन अभी तक उन्हें नीलामी के दायरे में नहीं लाया गया है।
सरकार की इस पहल के बाद राज्य में नीलामी योग्य बालू घाटों की संख्या में करीब 10 से 12 प्रतिशत तक बढ़ोतरी होने का अनुमान है। हालांकि, वास्तविक संख्या स्थलीय जांच और जरूरी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
सरकार के निर्देश के बाद जिलों में सबसे पहले उन स्थानों की पहचान की जाएगी, जहां बालू का पर्याप्त भंडार होने की संभावना है। इसके लिए संभावित स्थलों की सूची तैयार की जाएगी।
इसके बाद संबंधित अधिकारी इन जगहों का मौके पर निरीक्षण करेंगे। जांच के दौरान बालू की उपलब्धता के साथ-साथ यह भी देखा जाएगा कि संबंधित स्थान खनन और नीलामी के लिए निर्धारित मानकों को पूरा करता है या नहीं।
अधिकारियों की रिपोर्ट के आधार पर ही किसी स्थल को आगे की प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा।
स्थलीय जांच में उपयुक्त पाए जाने वाले नए बालू घाटों को संबंधित जिले की District Survey Report यानी DSR में शामिल किया जाएगा। बालू घाटों की नीलामी प्रक्रिया में DSR की अहम भूमिका होती है।
इस रिपोर्ट में खनिज की उपलब्धता और संबंधित क्षेत्र से जुड़े जरूरी सर्वेक्षण का विवरण दर्ज किया जाता है। इसलिए नए स्थलों को DSR में शामिल किए जाने के बाद ही उन्हें नीलामी की अगली प्रक्रिया में ले जाने का रास्ता साफ होगा।
विभागीय अनुमान के अनुसार नए स्थलों की पहचान और जरूरी प्रक्रिया पूरी होने के बाद बिहार में बालू घाटों की संख्या में 10 से 12 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है।
हालांकि यह केवल प्रारंभिक अनुमान है। कितने स्थल वास्तव में खनन के लिए उपयुक्त पाए जाते हैं और कितने नीलामी की प्रक्रिया तक पहुंचते हैं, यह सर्वेक्षण और विभागीय जांच के बाद ही तय होगा।
बालू की पर्याप्त उपलब्धता निर्माण क्षेत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। मकान, सड़क, पुल और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में बड़ी मात्रा में बालू की जरूरत होती है।
नए घाटों से खनन शुरू होने के बाद बाजार में बालू की आपूर्ति बढ़ सकती है। इससे मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बेहतर होने की उम्मीद है और निर्माण कार्यों से जुड़े लोगों को राहत मिल सकती है।
घाटों की संख्या बढ़ने और आपूर्ति में सुधार होने से बालू की उपलब्धता बढ़ने की संभावना है। इसका असर बाजार की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
हालांकि, केवल नए घाट खुलने से कीमतों में कितनी कमी आएगी, यह अभी तय नहीं है। परिवहन लागत, खनन शुल्क, मांग और अन्य बाजार कारक भी अंतिम कीमत को प्रभावित करते हैं।
नए बालू घाटों की नीलामी से राज्य सरकार को अतिरिक्त राजस्व मिलने की संभावना है। अधिक घाट नीलामी के दायरे में आने पर वैध खनन गतिविधियों का विस्तार हो सकता है और सरकारी आय में भी बढ़ोतरी हो सकती है।
फिलहाल जिलों में संभावित स्थलों की पहचान, स्थलीय निरीक्षण और रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। इसके बाद DSR में जरूरी बदलाव किए जाएंगे। इन सभी चरणों के पूरा होने के बाद ही स्पष्ट होगा कि बिहार में कितने नए बालू घाट नीलामी के लिए उपलब्ध हो सकेंगे।
कुल मिलाकर, सरकार की यह पहल बालू की उपलब्धता बढ़ाने, निर्माण गतिविधियों को गति देने और सरकारी राजस्व बढ़ाने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
भागलपुर। बिहार सरकार ने विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के छात्रों के लिए बड़ी पहल की है। प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महाअभियान (PM-JANMAN) के तहत राज्य के छह जिलों में 15 नए छात्रावास बनाए जाएंगे। इन छात्रावासों में पात्र छात्र-छात्राओं को रहने और पढ़ाई की सुविधा मुफ्त मिलेगी। इस परियोजना के लिए सरकार ने 41.25 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है। निर्माण कार्य शुरू करने के लिए 3.75 करोड़ रुपये की पहली किस्त भी जारी कर दी गई है। छह जिलों में बनेंगे 15 नए हॉस्टल PM-JANMAN योजना के तहत भागलपुर, मधेपुरा, पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज और कैमूर में नए छात्रावास बनाए जाएंगे। इनका उद्देश्य दूरदराज के इलाकों में रहने वाले जनजातीय छात्रों को सुरक्षित आवासीय वातावरण और बेहतर शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध कराना है। सरकार ने सभी 15 छात्रावासों का निर्माण और संचालन वित्तीय वर्ष 2026-27 के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा है। 15 से 18 साल के छात्रों को मिलेगा लाभ इन छात्रावासों का संचालन केंद्रीय स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार नेताजी सुभाष चंद्र बोस छात्रावास मॉडल पर किया जाएगा। इसमें 15 से 18 वर्ष की आयु के छात्र-छात्राओं को रहने, पढ़ने और जरूरी शैक्षणिक सुविधाएं नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाएंगी। इन जनजातीय समुदायों को मिलेगा फायदा योजना के तहत असुर, बिरहोर, बिरजिया, हिलखड़िया, माल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया, महेंद्र पहाड़िया और सवर जैसे PVTG समुदायों के छात्र-छात्राओं को लाभ मिलेगा। इन समुदायों के कई परिवार दूरदराज और संसाधन-विहीन इलाकों में रहते हैं, जहां बच्चों के लिए नियमित शिक्षा और आवासीय सुविधाओं तक पहुंच सीमित है। शिक्षा से जोड़ने पर जोर सरकार का उद्देश्य केवल छात्रावास उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि PVTG समुदायों के बच्चों को बेहतर शिक्षा और नियमित विद्यालयी वातावरण से जोड़ना भी है। सुरक्षित आवास मिलने से दूरस्थ क्षेत्रों के छात्रों के लिए पढ़ाई जारी रखना आसान हो सकेगा। पहली किस्त जारी, जल्द शुरू होगा निर्माण परियोजना के लिए 41.25 करोड़ रुपये की मंजूरी के बाद सरकार ने 3.75 करोड़ रुपये की पहली किस्त जारी कर दी है। इससे संबंधित जिलों में छात्रावास निर्माण की प्रक्रिया जल्द शुरू होने की उम्मीद है। समय पर परियोजना पूरी होने पर यह पहल बिहार के विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समुदायों के बच्चों के लिए शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है।
पटना: बिहार में बालू की बढ़ती मांग को देखते हुए राज्य सरकार ने नए बालू घाटों की पहचान की प्रक्रिया शुरू करने का फैसला लिया है। खान एवं भूतत्व विभाग ने सभी जिलों में ऐसे संभावित स्थानों की तलाश करने का निर्देश दिया है, जहां पर्याप्त मात्रा में बालू उपलब्ध है, लेकिन अभी तक उन्हें नीलामी के दायरे में नहीं लाया गया है। सरकार की इस पहल के बाद राज्य में नीलामी योग्य बालू घाटों की संख्या में करीब 10 से 12 प्रतिशत तक बढ़ोतरी होने का अनुमान है। हालांकि, वास्तविक संख्या स्थलीय जांच और जरूरी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी। हर जिले में खोजे जाएंगे नए संभावित घाट सरकार के निर्देश के बाद जिलों में सबसे पहले उन स्थानों की पहचान की जाएगी, जहां बालू का पर्याप्त भंडार होने की संभावना है। इसके लिए संभावित स्थलों की सूची तैयार की जाएगी। इसके बाद संबंधित अधिकारी इन जगहों का मौके पर निरीक्षण करेंगे। जांच के दौरान बालू की उपलब्धता के साथ-साथ यह भी देखा जाएगा कि संबंधित स्थान खनन और नीलामी के लिए निर्धारित मानकों को पूरा करता है या नहीं। अधिकारियों की रिपोर्ट के आधार पर ही किसी स्थल को आगे की प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा। DSR में शामिल किए जाएंगे उपयुक्त स्थल स्थलीय जांच में उपयुक्त पाए जाने वाले नए बालू घाटों को संबंधित जिले की District Survey Report यानी DSR में शामिल किया जाएगा। बालू घाटों की नीलामी प्रक्रिया में DSR की अहम भूमिका होती है। इस रिपोर्ट में खनिज की उपलब्धता और संबंधित क्षेत्र से जुड़े जरूरी सर्वेक्षण का विवरण दर्ज किया जाता है। इसलिए नए स्थलों को DSR में शामिल किए जाने के बाद ही उन्हें नीलामी की अगली प्रक्रिया में ले जाने का रास्ता साफ होगा। 10 से 12% तक बढ़ सकती है घाटों की संख्या विभागीय अनुमान के अनुसार नए स्थलों की पहचान और जरूरी प्रक्रिया पूरी होने के बाद बिहार में बालू घाटों की संख्या में 10 से 12 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। हालांकि यह केवल प्रारंभिक अनुमान है। कितने स्थल वास्तव में खनन के लिए उपयुक्त पाए जाते हैं और कितने नीलामी की प्रक्रिया तक पहुंचते हैं, यह सर्वेक्षण और विभागीय जांच के बाद ही तय होगा। निर्माण कार्यों को मिल सकती है राहत बालू की पर्याप्त उपलब्धता निर्माण क्षेत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। मकान, सड़क, पुल और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में बड़ी मात्रा में बालू की जरूरत होती है। नए घाटों से खनन शुरू होने के बाद बाजार में बालू की आपूर्ति बढ़ सकती है। इससे मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बेहतर होने की उम्मीद है और निर्माण कार्यों से जुड़े लोगों को राहत मिल सकती है। बालू की कीमत पर भी पड़ सकता है असर घाटों की संख्या बढ़ने और आपूर्ति में सुधार होने से बालू की उपलब्धता बढ़ने की संभावना है। इसका असर बाजार की कीमतों पर भी पड़ सकता है। हालांकि, केवल नए घाट खुलने से कीमतों में कितनी कमी आएगी, यह अभी तय नहीं है। परिवहन लागत, खनन शुल्क, मांग और अन्य बाजार कारक भी अंतिम कीमत को प्रभावित करते हैं। सरकार के राजस्व में भी होगा इजाफा नए बालू घाटों की नीलामी से राज्य सरकार को अतिरिक्त राजस्व मिलने की संभावना है। अधिक घाट नीलामी के दायरे में आने पर वैध खनन गतिविधियों का विस्तार हो सकता है और सरकारी आय में भी बढ़ोतरी हो सकती है। फिलहाल जिलों में संभावित स्थलों की पहचान, स्थलीय निरीक्षण और रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। इसके बाद DSR में जरूरी बदलाव किए जाएंगे। इन सभी चरणों के पूरा होने के बाद ही स्पष्ट होगा कि बिहार में कितने नए बालू घाट नीलामी के लिए उपलब्ध हो सकेंगे। कुल मिलाकर, सरकार की यह पहल बालू की उपलब्धता बढ़ाने, निर्माण गतिविधियों को गति देने और सरकारी राजस्व बढ़ाने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।
पटना, एजेंसियां। बिहार में शराबबंदी को लेकर एक बार फिर सियासी बहस तेज हो गई है। हाल ही में सामने आई एक शोध रिपोर्ट में शराबबंदी नीति की समीक्षा और इसके असर पर सवाल उठाए जाने के बाद जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने स्पष्ट कर दिया है कि राज्य में शराबबंदी कानून की समीक्षा या इसे खत्म करने की कोई योजना नहीं है। पार्टी ने शराबबंदी को नीतीश कुमार की प्रमुख नीतियों में शामिल बताते हुए इसके जारी रहने की बात कही है। NCAER रिपोर्ट के बाद फिर गरमाया मुद्दा बिहार में शराबबंदी को लेकर ताजा बहस NCAER की रिपोर्ट के बाद तेज हुई है। रिपोर्ट को लेकर राजनीतिक दलों के बीच अलग-अलग दावे सामने आए हैं। विपक्ष की ओर से शराबबंदी की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए जा रहे हैं, जबकि JDU ने रिपोर्ट के निष्कर्षों को स्वीकार करने से इनकार किया है। JDU का कहना है कि शराबबंदी को लेकर पार्टी और सरकार का रुख स्पष्ट है और इसे कमजोर करने या समाप्त करने का सवाल नहीं है। JDU ने समीक्षा की अटकलों को किया खारिज JDU की ओर से कहा गया है कि शराबबंदी की समीक्षा के नाम पर कानून में ढिलाई देने या इसे खत्म करने की मांग स्वीकार नहीं की जाएगी। इससे पहले भी पार्टी प्रवक्ता अभिषेक झा ने स्पष्ट किया था कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में लागू शराबबंदी को मजबूती से जारी रखा जाएगा। वहीं, बिहार में सत्ता गठबंधन के कुछ नेताओं की ओर से कानून के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठने के बाद यह मुद्दा राजनीतिक रूप से और संवेदनशील हो गया है। करीब एक दशक से लागू है शराबबंदी बिहार में शराबबंदी 2016 से लागू है। नीतीश कुमार सरकार ने इसे सामाजिक सुधार की प्रमुख नीति के तौर पर लागू किया था। तब से शराब की बिक्री, खरीद और सेवन पर प्रतिबंध है। हालांकि, इसके क्रियान्वयन को लेकर लगातार विवाद होते रहे हैं। शराब तस्करी, अवैध शराब और शराबबंदी कानून से जुड़े मुकदमों को लेकर विपक्ष सरकार पर हमला करता रहा है। दूसरी ओर सरकार शराबबंदी को सामाजिक बदलाव से जोड़ते हुए इसके पक्ष में रही है। विपक्ष ने सरकार को घेरा शराबबंदी को लेकर विपक्षी दलों ने सरकार से कानून के प्रभाव और उसके क्रियान्वयन पर जवाब मांगा है। राजनीतिक विरोधियों का तर्क है कि प्रतिबंध के बावजूद अवैध शराब की बिक्री और तस्करी पूरी तरह रोकने में प्रशासन को सफलता नहीं मिली है। वहीं JDU का रुख इसके बिल्कुल विपरीत है। पार्टी शराबबंदी को समाप्त करने या इसकी समीक्षा के बजाय कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने के पक्ष में है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मुद्दा बिहार की राजनीति में और बड़ा बन सकता है।