धर्म

Charanamrit vs Panchamrit Explained

चरणामृत और पंचामृत में क्या है अंतर? पूजा में दोनों का महत्व जानिए, ज्यादातर लोग कर देते हैं यह गलती

surbhi जुलाई 11, 2026 0
Bowl of Panchamrit and Charanamrit placed before Hindu deities during a traditional worship ritual.
Difference Between Charanamrit and Panchamrit

हिंदू धर्म में पूजा-पाठ के दौरान चरणामृत और पंचामृत का विशेष महत्व माना जाता है। हालांकि कई लोग इन्हें एक ही समझ लेते हैं, जबकि सनातन परंपरा में दोनों का अर्थ, बनाने की विधि और धार्मिक उपयोग अलग-अलग है। आइए जानते हैं कि चरणामृत और पंचामृत में क्या अंतर है और पूजा के बाद इनके बचे हुए भाग का क्या करना चाहिए।

चरणामृत क्या होता है?

चरणामृत का अर्थ है भगवान के चरणों का अमृत। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान के चरणों का स्पर्श प्राप्त जल अत्यंत पवित्र माना जाता है।

चरणामृत तैयार करने के लिए आमतौर पर इन चीजों का उपयोग किया जाता है—

  • स्वच्छ जल
  • गंगाजल
  • तुलसी के पत्ते
  • चंदन

मान्यता है कि चरणामृत का सेवन करने से मन को शांति मिलती है, सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और भगवान की कृपा प्राप्त होती है। इसे तांबे के पात्र में रखना शुभ माना जाता है।

पंचामृत क्या होता है?

पंचामृत का अर्थ है पांच अमृत तत्वों का मिश्रण। इसका उपयोग मुख्य रूप से देवी-देवताओं के अभिषेक (स्नान) में किया जाता है।

पंचामृत बनाने में सामान्यतः इन सामग्रियों का प्रयोग होता है—

  • गाय का दूध
  • दही
  • घी
  • शहद
  • शक्कर (या मिश्री)

कई परंपराओं में इसमें थोड़ी मात्रा में जल भी मिलाया जाता है। अभिषेक के बाद यही पंचामृत भक्तों को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

चरणामृत और पंचामृत में मुख्य अंतर

चरणामृत

पंचामृत

भगवान के चरणों का पवित्र जल माना जाता है

पांच पवित्र पदार्थों से तैयार किया जाता है

जल, गंगाजल, तुलसी और चंदन का उपयोग

दूध, दही, घी, शहद और शक्कर का उपयोग

पूजा के बाद प्रसाद स्वरूप दिया जाता है

अभिषेक के लिए उपयोग होता है, फिर प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है

तांबे के पात्र में रखना शुभ माना जाता है

चांदी, कांसे या मिट्टी के पात्र में रखना शुभ माना जाता है

बचा हुआ चरणामृत या पंचामृत क्या करें?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बचा हुआ चरणामृत या पंचामृत सिंक, नाली या किसी अपवित्र स्थान पर नहीं बहाना चाहिए।

यदि पूजा के बाद यह बच जाए, तो इसे—

  • तुलसी के पौधे में अर्पित करें।
  • किसी पवित्र पौधे या स्वच्छ स्थान पर श्रद्धापूर्वक अर्पित करें।

ऐसा करना धार्मिक दृष्टि से शुभ माना जाता है।

धार्मिक महत्व

चरणामृत और पंचामृत दोनों ही हिंदू पूजा-पद्धति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। चरणामृत जहां भगवान के चरणों की कृपा और आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है, वहीं पंचामृत शुद्धता, समृद्धि और देवपूजन में श्रद्धा का प्रतीक है। दोनों का उपयोग अलग-अलग उद्देश्यों के लिए किया जाता है और इन्हें श्रद्धा एवं सम्मान के साथ ग्रहण करने की परंपरा है.

 

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यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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Devotees pull the grand chariots of Lord Jagannath, Balabhadra, and Subhadra during the Jagannath Rath Yatra in Puri.
Jagannath Rath Yatra 2026: 16 जुलाई से शुरू होगी भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा, जानें 10 खास और रोचक बातें

पुरी: विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा का शुभारंभ 16 जुलाई 2026 (गुरुवार) से होने जा रहा है। यह भव्य धार्मिक उत्सव 24 जुलाई 2026 (शुक्रवार) तक चलेगा। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई भगवान बलभद्र (बलराम) और बहन देवी सुभद्रा अपने-अपने भव्य रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर की यात्रा करेंगे। इस पावन अवसर पर देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं और रथ की रस्सियां खींचकर भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और संस्कृति का अद्भुत संगम भी है। आइए जानते हैं जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी 10 महत्वपूर्ण और रोचक बातें। जगन्नाथ रथ यात्रा की 10 खास बातें 1. आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से होती है शुरुआत जगन्नाथ रथ यात्रा हर वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से प्रारंभ होती है। इसकी शुरुआत ओडिशा के पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर से होती है। 2. तीन देवता, तीन अलग-अलग रथ भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा तीन अलग-अलग रथों में विराजमान होकर गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। यह यात्रा भगवान के अपनी बुआ के घर जाने का प्रतीक मानी जाती है। 3. विशेष लकड़ी से बनते हैं रथ रथ निर्माण के लिए विशेष प्रकार की पवित्र नीम की लकड़ी का उपयोग किया जाता है, जिसे 'दारु' कहा जाता है। शुभ वृक्षों का चयन परंपरागत विधि से किया जाता है। 4. हर रथ का अलग नाम और पहचान भगवान जगन्नाथ का रथ – नंदीघोष (गरुड़ध्वज) भगवान बलभद्र का रथ – तालध्वज देवी सुभद्रा का रथ – दर्पदलन (पद्म रथ) 5. बिना लोहे की कीलों के बनता है रथ मान्यता है कि रथ निर्माण में लोहे की कीलों का उपयोग नहीं किया जाता। रथ निर्माण की प्रक्रिया वसंत पंचमी से शुरू होती है और अक्षय तृतीया से निर्माण कार्य औपचारिक रूप से आरंभ होता है। 6. हेरा पंचमी की अनोखी परंपरा रथ यात्रा के पांचवें दिन 'हेरा पंचमी' मनाई जाती है। मान्यता के अनुसार माता लक्ष्मी नाराज होकर गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं और भगवान जगन्नाथ के रथ के पहिये को सांकेतिक रूप से क्षति पहुंचाती हैं। यह भगवान के बिना उन्हें साथ लिए चले जाने का प्रतीक है। 7. बहुड़ा यात्रा से होती है वापसी भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा लगभग एक सप्ताह गुंडिचा मंदिर में प्रवास करते हैं। इसके बाद आषाढ़ शुक्ल दशमी को उनकी वापसी यात्रा होती है, जिसे बहुड़ा यात्रा कहा जाता है। 8. नीलाद्रि विजय की परंपरा वापसी के बाद भी भगवान जगन्नाथ को माता लक्ष्मी की नाराजगी दूर करनी पड़ती है। जब देवी प्रसन्न होती हैं, तभी भगवान को मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश मिलता है। इस रस्म को नीलाद्रि विजय कहा जाता है। 9. सालबेग की मजार पर रुकता है रथ लोकमान्यता के अनुसार रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ मुस्लिम भक्त सालबेग की मजार के पास कुछ समय के लिए रुकता है। यह भगवान की समभाव और सर्वधर्म सम्मान की परंपरा का प्रतीक माना जाता है। 10. रथ की रस्सी खींचना माना जाता है पुण्य धार्मिक मान्यता है कि जो श्रद्धालु भगवान के रथ की रस्सी खींचते हैं, उन्हें पापों से मुक्ति और भगवान विष्णु के धाम में स्थान प्राप्त होता है। यही वजह है कि हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस सेवा का हिस्सा बनने के लिए पुरी पहुंचते हैं। लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का महापर्व पुरी की यह विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा लगभग तीन किलोमीटर लंबी होती है। भीड़ और श्रद्धालुओं की भारी संख्या के कारण कई बार रथों को गुंडिचा मंदिर तक पहुंचने में पूरा दिन या उससे अधिक समय भी लग जाता है। यह पर्व भारतीय संस्कृति, भक्ति और सनातन परंपरा का जीवंत प्रतीक माना जाता है।  

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भोग में बीज वाले फल चढ़ाना सही या गलत? जानिए क्या कहते हैं धार्मिक नियम और किन बातों का रखें विशेष ध्यान

पूजा-पाठ में भगवान को फल अर्पित करना सनातन परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। हालांकि, कई श्रद्धालुओं के मन में यह सवाल रहता है कि क्या बीज वाले फल भगवान को चढ़ाए जा सकते हैं या नहीं। खासकर आम, तरबूज, लीची या अन्य बड़े बीज वाले फलों को लेकर लोगों में अलग-अलग धारणाएं देखने को मिलती हैं। आइए जानते हैं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस विषय में क्या माना जाता है और भोग लगाते समय किन नियमों का पालन करना चाहिए। क्या भगवान को बीज वाले फल चढ़ा सकते हैं? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान को बीज वाले फल अर्पित करना पूरी तरह स्वीकार्य माना जाता है। फल को सात्विक और पवित्र भोग माना गया है तथा मौसमी फलों का भोग विशेष शुभ माना जाता है। हालांकि, यदि फल में बड़ा बीज हो, जैसे आम, तरबूज या अन्य ऐसे फल, तो भोग लगाने से पहले उसका बीज निकाल देना उचित माना जाता है। मान्यता है कि भगवान को वही स्वरूप में भोग अर्पित करना चाहिए, जैसा भोजन सामान्य रूप से ग्रहण किया जाता है। भोग लगाने से पहले इन नियमों का रखें ध्यान भगवान को फल अर्पित करते समय केवल फल का चयन ही नहीं, बल्कि उसकी शुद्धता और प्रस्तुत करने का तरीका भी महत्वपूर्ण माना गया है। भोग में शामिल किए जाने वाले फलों को पहले साफ पानी से अच्छी तरह धो लें। पूजा से काफी पहले फल काटकर न रखें। भोग से ठीक पहले ही फल धोकर या काटकर अर्पित करें। यदि फल बड़ा है तो उसे स्वच्छ चाकू से काटकर भगवान के सामने रखें। भोग में संभव हो तो तुलसी दल भी शामिल करें, जिसे विशेष रूप से शुभ माना जाता है। भोग लगाते समय मन शांत रखें और पूरी श्रद्धा एवं भक्ति के साथ भगवान का स्मरण करें। श्रद्धा को सबसे अधिक महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान के लिए सबसे महत्वपूर्ण भक्त की सच्ची भावना और श्रद्धा होती है। भोग कितना बड़ा या महंगा है, इससे अधिक महत्व उसे अर्पित करने के भाव का माना गया है। इसलिए पूजा के दौरान अहंकार छोड़कर पूर्ण विश्वास और भक्ति के साथ भगवान को भोग अर्पित करना चाहिए। बड़े बीज वाले फलों के लिए क्या करें? यदि किसी फल में बड़ा और कठोर बीज हो, तो उसे निकालकर फल भगवान को अर्पित करना बेहतर माना जाता है। वहीं छोटे बीज वाले फलों को सामान्य रूप से भी चढ़ाया जा सकता है। उद्देश्य यह माना जाता है कि भगवान को वही भोजन प्रेमपूर्वक अर्पित किया जाए, जिसे आसानी से ग्रहण किया जा सके। ध्यान रखें धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं में विभिन्न क्षेत्रों और संप्रदायों के अनुसार कुछ अंतर हो सकता है। ऐसे में यदि आपके परिवार या गुरु द्वारा बताए गए विशेष पूजा-विधान हैं, तो उनका पालन करना अधिक उचित माना जाता है। पूजा में सबसे महत्वपूर्ण तत्व श्रद्धा, पवित्रता और सच्ची आस्था ही मानी जाती है।  

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