कोलकाता, एजेंसियां। फिल्म 'बंटवारा 1947' के प्रमोशन के लिए अभिनेता सनी देओल और निर्देशक राजकुमार संतोषी कोलकाता पहुंचे। इस दौरान दोनों ने ऐतिहासिक नेताजी भवन का दौरा किया और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रपौत्र सुगाता बोस से मुलाकात की।
नेताजी भवन पहुंचने पर सुगाता बोस ने सनी देओल और राजकुमार संतोषी का स्वागत किया। उन्होंने दोनों को भवन का भ्रमण कराया और भारत के इतिहास से जुड़ी महत्वपूर्ण यादों और घटनाओं के बारे में जानकारी दी।
सुगाता बोस ने फिल्म 'बंटवारा 1947' की सराहना करते हुए इसकी पूरी टीम को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने फिल्म को लेकर अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया भी साझा की।
इस खास मुलाकात के बाद सनी देओल ने सोशल मीडिया पर नेताजी भवन के दौरे और सुगाता बोस के साथ मुलाकात के वीडियो शेयर किए। उन्होंने सुगाता बोस का फिल्म के लिए प्यार और शुभकामनाएं देने पर आभार जताया।
एक अन्य पोस्ट में सनी देओल ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रपौत्र के साथ मुलाकात को इतिहास की एक झलक बताया।
'बंटवारा 1947' में सनी देओल और राजकुमार संतोषी की जोड़ी करीब 30 साल बाद एक साथ नजर आएगी। इससे पहले दोनों ने कई चर्चित फिल्मों में साथ काम किया है। इस पीरियड ड्रामा में करण देओल, अली फजल और अभिमन्यु सिंह भी अहम भूमिकाओं में हैं।
'बंटवारा 1947' भारत के विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित पीरियड ड्रामा है। फिल्म में शबाना आजमी, सनी देओल और प्रीति जिंटा प्रमुख भूमिकाओं में नजर आएंगे। कहानी में विभाजन के दौर की इंसानियत, करुणा और हिम्मत को केंद्र में रखा गया है।
फिल्म का संगीत ए.आर. रहमान ने तैयार किया है, जबकि गीत जावेद अख्तर ने लिखे हैं। फिल्म का निर्माण आमिर खान और अपर्णा पुरोहित ने किया है। 'बंटवारा 1947' 14 अगस्त 2026 को दुनियाभर के सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। अभिनेत्री खुशी कपूर को दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ी कानूनी राहत मिली है। अदालत ने उनके नाम, तस्वीर और पहचान का इस्तेमाल करके बनाए गए अश्लील एवं आपत्तिजनक ऑनलाइन कंटेंट को हटाने का निर्देश दिया है। अदालत ने खुशी कपूर के पर्सनैलिटी राइट्स की भी रक्षा की है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को कंटेंट हटाने का निर्देश दिल्ली हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर मौजूद ऐसे कंटेंट को हटाने के निर्देश दिए हैं, जिसमें खुशी कपूर की पहचान का आपत्तिजनक तरीके से इस्तेमाल किया गया है। अदालत का उद्देश्य ऐसे कंटेंट के प्रसार को रोकना और अभिनेत्री की प्रतिष्ठा तथा निजता की रक्षा करना है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि खुशी कपूर के नाम या उनकी तस्वीर का इस्तेमाल बिना अनुमति व्यावसायिक उद्देश्य से नहीं किया जा सकता। उनके नाम और पहचान से जुड़े अनधिकृत मर्चेंडाइज को लेकर भी अदालत ने सुरक्षा प्रदान की है। कोर्ट ने जारी किया ‘जॉन डो’ आदेश इस मामले में अदालत ने ‘जॉन डो’ आदेश जारी किया है। इसका मतलब है कि जिन अज्ञात लोगों की पहचान अभी सामने नहीं आई है, उनके खिलाफ भी अदालत का आदेश लागू होगा। इससे नए आपत्तिजनक कंटेंट सामने आने पर उसे हटाने की कार्रवाई आसान होगी। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी सार्वजनिक व्यक्ति की वैध आलोचना या गैर-अश्लील अभिव्यक्ति को केवल इस आधार पर नहीं हटाया जा सकता कि वह व्यक्ति के बारे में है। यानी आदेश का उद्देश्य आलोचना पर रोक लगाना नहीं, बल्कि आपत्तिजनक और अनधिकृत व्यावसायिक इस्तेमाल को रोकना है। जाह्नवी कपूर को राहत मिलने के एक दिन बाद आया फैसला खुशी कपूर को मिली यह राहत उनकी बहन जाह्नवी कपूर के मामले से भी मिलती-जुलती है। जाह्नवी को भी इससे एक दिन पहले दिल्ली हाईकोर्ट से इसी तरह की कानूनी सुरक्षा मिली थी। दोनों मामलों में अदालत ने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सेलिब्रिटीज की पहचान और तस्वीरों के अनधिकृत इस्तेमाल को गंभीरता से लिया है।
मुंबई, एजेंसियां। अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनौत ने वरिष्ठ अभिनेता नसीरुद्दीन शाह को लेकर की गई अपनी विवादित टिप्पणी का बचाव किया है। कंगना ने शाह को ‘लोमड़ी’ कहने के साथ ही बॉलीवुड में कथित दोहरे रवैये का आरोप लगाया और पाकिस्तान के प्रति उनके कथित रुख पर भी सवाल उठाए। यह विवाद छात्र आंदोलनों पर बॉलीवुड की चुप्पी को लेकर शुरू हुई बहस के बाद और तेज हुआ है। नसीरुद्दीन शाह के बयान से शुरू हुआ विवाद दरअसल, नसीरुद्दीन शाह ने छात्र प्रदर्शनों के दौरान बॉलीवुड के बड़े सितारों की चुप्पी पर सवाल उठाया था। उन्होंने इस बात पर नाराजगी जताई थी कि जब छात्रों के मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, तब फिल्म इंडस्ट्री के कई बड़े चेहरे खुलकर सामने नहीं आ रहे हैं। शाह ने इस संदर्भ में ‘मुंह में हड्डी दबाए कुत्ते’ वाली उपमा का इस्तेमाल किया था। इसके बाद अभिनेता-गायक पीयूष मिश्रा ने भी शाह के बयान पर सवाल उठाया और झारखंड में चल रहे छात्र आंदोलन को लेकर उनकी चुप्पी पर प्रतिक्रिया दी। इसी बहस में कंगना रनौत भी शामिल हो गईं। कंगना ने नसीरुद्दीन शाह को ‘लोमड़ी’ कहा कंगना ने पीयूष मिश्रा की टिप्पणी का समर्थन करते हुए अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी के जरिए नसीरुद्दीन शाह पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि उन्हें ‘कुत्ता’ कहे जाने में भी कोई आपत्ति नहीं होगी, लेकिन उन्होंने शाह के लिए ‘लोमड़ी’ शब्द का इस्तेमाल किया। कंगना ने आरोप लगाया कि शाह भारत में रहते हुए भी पड़ोसी देश के पक्ष में बोलते हैं। हालांकि, यह कंगना का राजनीतिक आरोप है, कोई स्थापित तथ्य नहीं, इसलिए इसे खबर में आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। बॉलीवुड के ‘पाखंड’ पर भी सवाल कंगना ने इसके बाद फिल्म इंडस्ट्री के रवैये पर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि बॉलीवुड के कई लोग अलग-अलग मुद्दों पर अपनी सुविधा के हिसाब से प्रतिक्रिया देते हैं और कुछ मामलों में चुप रहते हैं। कंगना ने इसी संदर्भ में ‘बॉलीवुड का पाकिस्तान प्रेम कब खत्म होगा’ जैसी टिप्पणी भी की। उनका कहना है कि अगर फिल्म इंडस्ट्री के कलाकार सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर बोलते हैं तो उन्हें सभी मामलों में समान रूप से अपनी आवाज उठानी चाहिए। विवाद ने फिर गरमाई बॉलीवुड की राजनीतिक बहस कंगना और नसीरुद्दीन शाह के बीच यह ताजा विवाद केवल दो कलाकारों तक सीमित नहीं है। इसके जरिए एक बार फिर बॉलीवुड में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कलाकारों की सामाजिक जिम्मेदारी और राजनीतिक मुद्दों पर सितारों की भूमिका को लेकर बहस शुरू हो गई है। हालांकि, अभी तक नसीरुद्दीन शाह की ओर से कंगना की ताजा टिप्पणी पर कोई समान स्तर का जवाब सामने नहीं आया है। इसलिए फिलहाल यह मामला कंगना की आलोचना और उनके आरोपों के इर्द-गिर्द ही चर्चा में है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। बॉलीवुड अभिनेत्री और बीजेपी सांसद कंगना रनौत ने इस साल अपनी पहली तीज मनाई। उन्होंने दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के घर आयोजित तीज समारोह में हिस्सा लिया। इस दौरान कंगना ने अन्य महिलाओं के साथ डांस किया और त्योहार का जमकर आनंद लिया। समारोह की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं। रेखा गुप्ता के घर मनाई पहली तीज कंगना रनौत ने सोशल मीडिया पर तीज समारोह की कई तस्वीरें शेयर की हैं। तस्वीरों में वह दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और अन्य महिलाओं के साथ नजर आ रही हैं। कंगना ने बताया कि यह उनका पहला तीज त्योहार था और उन्हें रेखा गुप्ता के घर परिवार जैसा अपनापन मिला। कंगना ने रेखा गुप्ता की मेहमाननवाजी और प्यार के लिए उनका आभार जताते हुए सभी को तीज की शुभकामनाएं दीं। पारंपरिक लुक में नजर आईं कंगना तीज के मौके पर कंगना रनौत ने हरे और नारंगी रंग की सिल्क साड़ी पहनी थी। इसके साथ उन्होंने हरे रंग का ब्लाउज, चोकर नेकलेस, मैचिंग झुमके और चूड़ियां पहनीं। पारंपरिक लुक में कंगना काफी खूबसूरत नजर आईं। समारोह के दौरान कंगना अन्य महिलाओं के साथ डांस करती भी दिखाई दीं। तस्वीरों में उनके चेहरे पर त्योहार की खुशी साफ नजर आई। 2024 में राजनीति में रखा कदम फिल्मों के साथ-साथ कंगना रनौत राजनीति में भी सक्रिय हैं। उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के टिकट पर हिमाचल प्रदेश की मंडी सीट से चुनाव जीता था। सांसद बनने के बाद वह अपने क्षेत्र से जुड़े सड़क, बुनियादी सुविधाओं, आपदा राहत और सांस्कृतिक विरासत जैसे मुद्दों को लेकर अपनी बात रखती रही हैं। वर्क फ्रंट पर कंगना की नई फिल्म वर्क फ्रंट की बात करें तो कंगना की पिछली सिनेमाघरों में रिलीज हुई फिल्म 'भारत भाग्य विधाता' थी। अब वह अभिनेता आर. माधवन के साथ एक पैन-इंडिया साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म में नजर आएंगी। फिल्म का निर्देशन ए.एल. विजय कर रहे हैं। इससे पहले कंगना और ए.एल. विजय फिल्म 'थलाइवी' में साथ काम कर चुके हैं।