नई दिल्ली, एजेंसियां। ऑनलाइन फिल्म पाइरेसी के खिलाफ केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने डिजिटल मध्यस्थों को फिल्म पाइरेसी से जुड़े 7,393 URL को निष्क्रिय करने का निर्देश दिया है। सरकार ने लोकसभा में बताया कि इस कार्रवाई में 4,996 Telegram चैनल और 1,263 वेबसाइट भी शामिल हैं।
सरकार की कार्रवाई का उद्देश्य इंटरनेट पर फिल्मों की अनधिकृत रिकॉर्डिंग और उनके अवैध प्रसार पर रोक लगाना है। मंत्रालय के अनुसार, पाइरेटेड फिल्मों की शिकायत मिलने के बाद संबंधित मध्यस्थों को सामग्री हटाने या उस तक पहुंच बंद करने के लिए नोटिस जारी किए जाते हैं।
7,393 URL में बड़ी संख्या में Telegram चैनल और वेबसाइट शामिल हैं, जिनके जरिए कथित तौर पर फिल्मों की अनधिकृत प्रतियां उपलब्ध कराई जा रही थीं।
सरकार ने बताया कि Cinematograph (Amendment) Act, 2023 के बाद फिल्म पाइरेसी से निपटने के लिए कानूनी व्यवस्था को मजबूत किया गया है। संशोधन के जरिए फिल्मों की अनधिकृत रिकॉर्डिंग और ऑनलाइन प्रसार के खिलाफ कार्रवाई के प्रावधान जोड़े गए हैं। इसके अलावा, सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत भी गैरकानूनी सामग्री को हटाने या उस तक पहुंच निष्क्रिय करने की व्यवस्था है।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने फिल्म पाइरेसी से जुड़ी शिकायतों के लिए एक समर्पित संस्थागत व्यवस्था भी बनाई है। कॉपीराइट धारक ऑनलाइन उपलब्ध पाइरेटेड फिल्मों की शिकायत कर सकते हैं, जिसके बाद संबंधित मध्यस्थों को सामग्री हटाने या पहुंच बंद करने के निर्देश दिए जा सकते हैं। मंत्रालय ने संयुक्त सचिव (फिल्म्स) को भी संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत मध्यस्थों को टेकडाउन नोटिस जारी करने के लिए अधिकृत किया है।
सरकार की इस कार्रवाई से फिल्म निर्माताओं, निर्माताओं और कॉपीराइट धारकों को ऑनलाइन पाइरेसी से होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फिल्मों के अवैध प्रसार पर रोक लगाने के लिए आगे भी ऐसी कार्रवाई जारी रहने की संभावना है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
‘बंटवारा 1947’ पर सनी देओल का बयान, बोले- भारत मां है तो पाकिस्तान मौसी है पटना, एजेंसियां। सनी देओल इन दिनों अपनी आगामी फिल्म ‘बंटवारा 1947’ के प्रचार में जुटे हैं। फिल्म के प्रचार कार्यक्रम के दौरान जब उनसे भारत-पाकिस्तान संबंधों और पाकिस्तान को लेकर उनकी राय पूछी गई तो अभिनेता ने राजनीतिक बहस में पड़ने से इनकार किया। इसके बजाय उन्होंने अपने पिता और दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र की एक पुरानी बात साझा की, जिसने अब सोशल मीडिया पर चर्चा छेड़ दी है। धर्मेंद्र की बात को किया याद सनी देओल ने बताया कि उनके पिता धर्मेंद्र कहा करते थे कि भारत उनकी मां है और पाकिस्तान उनकी मौसी है, क्योंकि विभाजन से पहले दोनों देश एक ही मुल्क का हिस्सा थे। सनी ने इसी संदर्भ में कहा कि वह राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी नहीं करना चाहते। उनका जोर फिल्म के मानवीय पक्ष और विभाजन की त्रासदी को समझने पर रहा। फिल्म को राजनीति से अलग रखने की अपील सनी देओल और निर्देशक राजकुमार संतोषी ने फिल्म के प्रचार के दौरान दर्शकों से इसे बिना किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के देखने की अपील की है। दोनों के मुताबिक, ‘बंटवारा 1947’ का केंद्र राजनीतिक संदेश नहीं, बल्कि विभाजन के दौरान लोगों को झेलनी पड़ी मानवीय त्रासदी है। फिल्म विभाजन के दौरान बिछड़ने, विस्थापन और इंसानी रिश्तों पर पड़े असर की कहानी को सामने लाने की कोशिश करती है। बयान के बाद सोशल मीडिया पर बहस सनी देओल का पाकिस्तान को ‘मौसी’ कहने वाला बयान सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोगों ने इसे दोनों देशों के साझा इतिहास और मानवीय रिश्तों के संदर्भ में देखा, जबकि कुछ यूजर्स ने बयान की आलोचना भी की। हालांकि, सनी देओल ने अपने बयान में राजनीतिक बहस से बचते हुए फिल्म के मूल विषय पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही है। 14 अगस्त को रिलीज होगी ‘बंटवारा 1947’ राजकुमार संतोषी के निर्देशन में बनी ‘बंटवारा 1947’ में सनी देओल के साथ प्रीति जिंटा समेत कई कलाकार नजर आएंगे। फिल्म 1947 के भारत विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित है और 14 अगस्त 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है。 फिल्म के रिलीज से पहले सनी देओल का यह बयान अब चर्चा में है। खास तौर पर भारत-पाकिस्तान के साझा इतिहास और विभाजन की मानवीय त्रासदी को लेकर उनकी बात ने फिल्म को लेकर उत्सुकता और बढ़ा दी है।
‘Musafir Cafe’ के दूसरे सीजन का ऐलान, विक्रांत मैसी और वेदिका पिंटो की कहानी फिर बढ़ेगी आगे मुंबई, एजेंसियां। नेटफ्लिक्स की रोमांटिक ड्रामा सीरीज ‘Musafir Cafe’ के प्रशंसकों के लिए बड़ी खुशखबरी है। पहले सीजन को मिली प्रतिक्रिया के बाद नेटफ्लिक्स ने इसके दूसरे सीजन को हरी झंडी दे दी है। सीजन 2 में विक्रांत मैसी, वेदिका पिंटो और महिमा मकवाना अपने-अपने किरदारों में वापसी करेंगे। चंदर, सुधा और प्रीति की कहानी होगी जारी सीरीज में विक्रांत मैसी चंदर, वेदिका पिंटो सुधा और महिमा मकवाना प्रीति की भूमिका निभा रही हैं। पहले सीजन की कहानी इन तीनों किरदारों के रिश्तों, प्यार, दूरी और जिंदगी में लिए गए फैसलों के इर्द-गिर्द घूमती है। पहले सीजन का अंत कई सवालों के साथ हुआ था। ऐसे में दूसरे सीजन में इन किरदारों की जिंदगी किस दिशा में जाती है, यह दर्शकों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण रहेगा। पहले सीजन के क्लिफहैंगर के बाद बढ़ी उत्सुकता ‘Musafir Cafe’ का पहला सीजन 24 जुलाई 2026 को नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुआ था। सीरीज का पहला सीजन आठ एपिसोड का था और इसके अंत ने दर्शकों के बीच आगे की कहानी को लेकर उत्सुकता बढ़ा दी थी। सीजन 2 में प्यार, किस्मत, दूसरी शुरुआत और व्यक्तिगत बदलाव जैसे पहलुओं को आगे बढ़ाए जाने की उम्मीद है। हालांकि, निर्माताओं ने अभी दूसरे सीजन की विस्तृत कहानी का खुलासा नहीं किया है। रिलीज डेट का अभी इंतजार नेटफ्लिक्स ने ‘Musafir Cafe’ के दूसरे सीजन की घोषणा और मुख्य कलाकारों की वापसी की पुष्टि कर दी है, लेकिन इसकी रिलीज डेट अभी सामने नहीं आई है। इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि नया सीजन कब स्ट्रीम होगा। विक्रांत मैसी, वेदिका पिंटो और महिमा मकवाना की वापसी की पुष्टि के बाद अब दर्शकों की नजर सीजन 2 की कहानी और रिलीज डेट पर है।
मुंबई, एजेंसियां। इमरान हाशमी की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘आवारापन 2’ को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने UA 16+ प्रमाणपत्र दे दिया है। हालांकि, प्रमाणपत्र जारी करने से पहले बोर्ड ने फिल्म में कुल 9 बदलाव करने के निर्देश दिए। इनमें हिंसा वाले दृश्यों में कटौती, नशीली दवाओं से जुड़े दृश्यों में चेतावनी और कुछ टेक्स्ट एवं सबटाइटल में बदलाव शामिल हैं। हिंसा और ड्रग्स से जुड़े दृश्यों में बदलाव CBFC ने फिल्म में दिखाई गई अत्यधिक हिंसा वाले कुछ दृश्यों को छोटा करने का निर्देश दिया। इसके अलावा ड्रग्स लेते हुए दिखाए गए एक दृश्य में भी बदलाव किया गया है। फिल्म में बाल तस्करी और ड्रग्स के दुरुपयोग से जुड़े उचित डिस्क्लेमर जोड़ने के निर्देश भी दिए गए हैं। नशीली दवाओं और धूम्रपान से जुड़े कुछ हिस्सों में स्थायी चेतावनी दिखाने को कहा गया है। करीब चार मिनट के दृश्यों पर चली कैंची CBFC के निर्देशों के तहत फिल्म से करीब 4 मिनट की सामग्री हटाई गई, जबकि लगभग 20 सेकंड की सामग्री को बदला गया। इन बदलावों के बाद फिल्म की अंतिम स्वीकृत लंबाई 2 घंटे 20 मिनट 20 सेकंड रह गई है। एंड क्रेडिट में भी फिल्म के संगीत के अनुरूप बदलाव किए गए हैं। 14 अगस्त को सिनेमाघरों में आएगी फिल्म ‘आवारापन 2’ में इमरान हाशमी मुख्य भूमिका में हैं। फिल्म का निर्देशन नितिन कक्कड़ ने किया है। यह 2007 में आई ‘आवारापन’ का सीक्वल है और लंबे समय से इमरान हाशमी के प्रशंसकों के बीच चर्चा में है। फिल्म अब 14 अगस्त 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने के लिए तैयार है। स्वतंत्रता दिवस सप्ताहांत के दौरान रिलीज होने के कारण बॉक्स ऑफिस पर इसे अच्छी शुरुआत की उम्मीद है। ‘UA 16+’ का क्या मतलब है? CBFC का UA 16+ प्रमाणपत्र फिल्म को 16 वर्ष और उससे अधिक उम्र के दर्शकों के लिए उपयुक्त श्रेणी में रखता है। 16 वर्ष से कम उम्र के दर्शकों के लिए अभिभावकीय मार्गदर्शन जरूरी होता है। फिल्म में हिंसा, ड्रग्स और अपराध से जुड़े विषयों को देखते हुए यह प्रमाणपत्र इसकी विषय-वस्तु के अनुरूप माना जा रहा है। नौ बदलावों के बाद अब फिल्म को सेंसर बोर्ड की मंजूरी मिल चुकी है और इसकी सिनेमाघरों में रिलीज का रास्ता साफ हो गया है।